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प्रियंका गाँधी वाड्रा
राजनीति

प्रियंका गाँधी वाड्रा का सियासी जुआ  

 

फरवरी 2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधान-सभा चुनाव में जीत के लिए कांग्रेस पार्टी ने अपनी राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा पर दाँव लगाया है। स्वयं प्रियंका इस चुनावी वैतरणी से पार उतरने के लिए ‘घोषणाबाजी’ की लोक-लुभावन राजनीति का जुआ खेल रही हैं। उन्होंने पिछले एक-डेढ़ महीने में लोक-लुभावन घोषणाओं की झड़ी लगाकर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की है। उन्होंने उत्तर प्रदेश विधान-सभा की 403 सीटों पर 40 फीसद महिला उम्मीदवार लड़ाने की घोषणा के साथ इसकी शुरुआत की।

इसके बाद उन्होंने कांग्रेस की सरकार बनने पर किसानों के कर्ज और और बिजली बिल माफ़ करने की घोषणा की। तीसरी बड़ी घोषणा लड़कियों को स्मार्टफोन और स्कूटी देने की और चौथी घोषणा नागरिकों को 10 लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज  की सुविधा देने की है। उन्होंने महिलाओं के लिए तीन रसोई गैस सिलेंडर और बस पास मुफ्त देने और बिजली बिल आधा करने  जैसी घोषणाएं  भी की हैं। शिक्षा, रोजगार, व्यापार के सम्बन्ध में भी वे बहुत जल्द ऐसी कुछ लोक-लुभावन घोषणाएं करने वाली हैं।

लेकिन इन घोषणाओं के बारे में आम मतदाताओं और अधिकांश चुनाव विश्लेषकों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया यह है कि ‘न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी’; अर्थात् न तो कांग्रेस की सरकार बनेगी, और न ही इन हवा-हवाई घोषणाओं को पूरा करने की नौबत आएगी। ऐसा नहीं है कि स्वयं प्रियंका या उनकी पार्टी इस सच्चाई से अवगत नहीं हैं। फिर यह प्रश्न उठता है कि वे यह जुआ क्यों खेल रही हैं? दरअसल, उप्र में मरणासन्न कांग्रेस की जान बचाए रखने के लिए उनके पास इस तरह का जुआ खेलने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। लेकिन जुए ही की तरह इस दाँव का खतरा यह है कि ‘छब्बे बनने चली कांग्रेस कहीं दुबे’ बनकर न रह जाये!

प्रियंका गाँधी की इन घोषणाओं से एक सवाल यह भी उठता है कि उनकी पार्टी यह घोषणाएं पंजाब, उत्तराखंड, गोवा या मणिपुर जैसे अन्य चुनावी राज्यों में क्यों नहीं कर रही है? क्या वहाँ की महिलाओं, किसानों और गरीबों को इसकी जरूरत नहीं है? जरूरत तो है लेकिन वहाँ कांग्रेस चुनावी गुणा-गणित में है। इसलिए जुआ खेलने से परहेज कर रही है। उप्र में कांग्रेस की दुर्दशा जगजाहिर है। इसीलिए जुआ खेला जा रहा है। यह सवर्ण मतदाताओं को फुसलाकर भाजपा को कमजोर करने की सुचिंतित रणनीति भी है। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के परंपरागत वोटबैंक रहे सवर्ण मतदाता 1989 में उसके क्रमिक अवसान के बाद भाजपा की ओर चले गये हैं। भाजपा के उभार में हिंदुत्ववादी राजनीति और सवर्ण जातियों के ध्रुवीकरण की निर्णायक भूमिका रही है।

उप्र के पिछले विधान-सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की बैसाखी के सहारे कांग्रेस 7 सीट और 5 फीसद मत प्राप्त कर सकी थी। इसबार समाजवादी पार्टी ने उसे झटक दिया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ सोनिया गाँधी चुनाव जीत सकी थीं। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी तक कांग्रेस परिवार की परम्परागत सीट से बड़े अंतर से चुनाव हार गए थे। इस तरह के निराशाजनक चुनाव परिणामों के बावजूद कांग्रेसियों द्वारा पिछले 4-5 साल में जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा करने या फिर जनता के बीच जाने की जहमत नहीं उठाई गयी।

पार्टी की इसी निष्क्रियता और किंकर्तव्यविमूढ़ता से त्रस्त होकर जितिन प्रसाद और हरेंद्र मलिक जैसे बड़े नेता कांग्रेस से किनारा करके अन्य राजनीतिक दलों  की ओर खिसक रहे हैं। वे सब अपने राजनीतिक भविष्य के प्रति आशंकित हैं। आज उप्र में कांग्रेस की हालत यह है कि उसके पास न तो नेता है, न नीति है, न संगठन है, न ही कार्यकर्त्ता है। लल्लू के नेतृत्व में कांग्रेस आज भाजपा, सपा, बसपा जैसी पार्टियों के बाद दूरस्थ चौथे स्थान पर है। राष्ट्रीय लोकदल, आम आदमी पार्टी, पीस पार्टी और ए आई एम आई एम जैसे छोटे दल आगामी चुनाव में उससे आगे निकलकर चौथे स्थान पर आने की फिराक में हैं। इस परिस्थिति में प्रियंका के पास ‘घोषणाबाजी’ के जुए के अलावा विकल्प ही क्या बचता है?

प्रियंका गाँधी वाड्रा द्वारा की जा रही इन घोषणाओं के वास्तविक मायने क्या हैं? दरअसल, किसी जमाने में दक्षिण भारत से शुरू हुई लोक-लुभावन घोषणाओं और मुफ्तखोरी की यह राजनीति आज दिल्ली तक पैर पसार चुकी है। वोट के बदले फ्री साड़ी, टी.वी, फ्रिज, लैपटॉप और बिजली-पानी देने की रणनीति यदा-कदा और यत्र-तत्र सफल भी हुई है। संभवतः प्रियंका की प्रेरणा भी यही है।

प्रियंका ने महिलाओं को लुभाने के लिए उन्हें 40 फीसद पार्टी टिकिट देने का जो दाँव खेला है, उससे न तो महिलाओं का भला होने वाला है, न ही कांग्रेस पार्टी को कुछ लाभ मिलने वाला है। कांग्रेस पार्टी के लिए चुनाव लड़ सकने वाली 161 महिला प्रत्याशियों का जुगाड़ करना टेढ़ी खीर साबित होने वाली है। जो पार्टी ‘न तीन में है, न तेरह में है’, उसके टिकिट पर चुनाव लड़कर कोई महिला अपने राजनीतिक भविष्य को भला क्योंकर स्वाहा करेगी!

यह घोषणा खाना-पूरी से अधिक कुछ नहीं है। विडम्बनापूर्ण ही है कि जिस मंच से उन्होंने यह घोषणा की थी, उसपर मौजूद 15 लोगों में प्रियंका सहित कुल तीन ही महिलायें थीं। अगर कांग्रेस पार्टी महिला सशक्तिकरण के प्रति वास्तव में गंभीर थी तो उसने यू पी ए सरकार के 10 साल के कार्यकाल में महिला आरक्षण विधेयक पास क्यों नहीं किया? या फिर सांगठनिक पदों की नियुक्तियों में महिलाओं की भागीदारी क्यों नहीं बढ़ायी? अगर ऐसा किया होता तो आज उन्हें 161 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए दमखम वाली प्रत्याशियों का टोटा न पड़ता!

उत्तर प्रदेश मंडल और कमंडल की कोख से निकली जातिवादी और हिंदुत्ववादी राजनीति की प्रयोगशाला है। 2014 और 2019 के  लोकसभा चुनावों और पिछले विधान-सभा चुनाव में जाति का जादू नहीं चला। लोगों ने विकास और बदलाव के लिए मतदान किया। यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी विधान-चुनाव में उप्र का मतदाता फिर से विकास और सुशासन के लिए मतदान करता है या फिर जातिवादी राजनीति की ओर वापसी करता है। वर्तमान परिदृश्य में कांग्रेस के साथ न तो कोई जाति जुड़ती दिखती है और न ही उनके पास विकास एवं बदलाव का कोई विश्वसनीय मॉडल है। प्रियंका को यह समझने की आवश्यकता है कि उप्र में कांग्रेस शून्य है और उसे किसी निर्णायक भूमिका में आने के लिए दूरगामी नीति और लम्बे संघर्ष की आवश्यकता है।

क्या प्रियंका के पास उतना धैर्य, समय और इच्छाशक्ति है? दो-चार महीने मीडिया और सोशल मीडिया में सक्रिय रहने मात्र से उप्र जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक राज्य में चुनाव जीतने के मंसूबे ख्याली पुलाव पकाने से अधिक कुछ नहीं हैं। महज जबानी जमा खर्च से न तो जनता को लुभाया जा सकता है, न ही भरमाया जा सकता है। प्रियंका इस बात से अनभिज्ञ नहीं हैं कि भाजपा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, सपा अखिलेश यादव और बसपा मायावती के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। यह जानते हुए भी वे अपने चुनाव लड़ने के सवाल पर कन्नी काट रही हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे स्वयं आगामी चुनाव में होने वाले कांग्रेस के हश्र से आशंकित हैं। नेतृत्वविहीन कांग्रेस भला क्या चुनाव लड़ेगी? इसलिए प्रियंका हारते हुए जुआरी की तरह ‘घोषणाबाजी’ का दाँव खेल रही हैं। 

चुनाव लड़ने-न लड़ने को लेकर प्रियंका का ‘दोचित्तापन’ उनके वादों और दावों को संदिग्ध बनाता है। इससे उनकी चुनावी रणनीति कमजोर पड़ती है। उन्हें जल्दी से जल्दी निर्णय लेकर या तो खुद के चुनाव  लड़ने की स्पष्ट घोषणा करनी चाहिए या फिर सपा-बसपा जैसी किसी पार्टी की पूँछ पकड़कर यह चुनावी वैतरणी पार करने का जतन करना चाहिए। प्रियंका के इस ‘दोचित्तेपन’ और सियासी जुए के चलते साख-संकट से जूझती कांग्रेस शून्य पर सिमट जाये तो अचरज नहीं होना चाहिए

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