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राजनीति से हटकर —अजय तिवारी

  • अजय तिवारी
हर बात को राजनीति मं घसीटकर देखना आज के वातावरण में आम बात हो गयी है। इसका प्रसार पिछले पाँच साल में हुआ है जबसे यह तर्क दिया जाने लगा है कि ‘क्या पहले ऐसा नहीं होता था क्या?’ ‘कांग्रेसी शासन में भी तो यह होता था!’ वग़ैरह! यह सीधे संघ-भाजपा की सत्ता के प्रचार अभियान की रणनीति से जुड़ा है। लेकिन हम यहाँ जिन बिंदुओं पर चर्चा करने जा रहे हैं, उनके लिए इस संकीर्ण राजनीतिक नज़रिये से दूर, सचमुच देशहित के आधार पर सोचना ज़रूरी है।
अमरीका में एक अनुसंधान हुआ है कि जिस खगोलीय घटना से साढ़े चार अरब वर्ष पहले चंद्रमा की उत्पत्ति हुई, उसी से पृथ्वी पर जीवन आया। इस परिघटना के दो नियामक तत्व हैं—(१) कार्बन-नाइट्रोजन का अनुपात; (२) कार्बन, नाइट्रोजन और सल्फ़र की पूरी मात्रा। हम इसके तकनीकी ब्योरे में नहीं जाएँगे। लेकिन जिस वैज्ञानिक समूह ने यह खोज की है, उसका नेतृत्व भारतीय मूल के वैज्ञानिक कर रहे हैं। उस वैज्ञानिक का नाम है राजदीप दासगुप्त और यह खोज राइस विश्वविद्यालय में की गयी है। 
क्या हमारी चिंता का विषय यह नहीं होना चाहिए कि भारत के वैज्ञानिकों को भारत में रहकर अनुसंधान और खोज का पूरा मौक़ा मिले? आज़ादी के तुरंत बाद यदि यह स्थिति नहीं थी तो अब विकास के इतने ऊँचे स्तर पर पहुँचने के बाद भी हम राष्ट्रीय हित के ऐसे प्रश्नों पर उदासीन बने रहें?
इस बात को उठाने के पीछे एक इतिहास भी है। छठें दशक के उत्तरार्ध में, संभवत: १९५७-५८ में, जीवन की उत्पत्ति पर अमरीका में चल रहे शोध से भी भारतीय वैज्ञानिक जुडे थे लेकिन उनका कहीं नाम तक नहीं आता। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. कृष्ण वल्लभ सहाय अमरीका के एक विश्वविद्यालय में प्रो. फ़ॉक्स के मातहत यह शोधकार्य कर रहे थे। उनका शोध काफी आगे बढ़ चुका था जब उन्हें पता चला कि खोज पूरी होने के बाद डॉ. फ़ॉक्स उनकी हत्या की तैयारी कर चुके हैं।
मेरे पिता बद्रीनाथ तिवारी तब इलाहाबाद में थे, ‘द लीडर’ अखबार में वरिष्ठ उपसंपादक थे। प्रो. सहाय उनके शिक्षक रह चुके थे और उन्हें बहुत मानते थे। दोनों के विचार काफी अलग थे, डॉ. सहाय आस्तिक और बद्रीनाथ तिवारी नास्तिक; डॉ. सहाय रज्जू भैया के निकट, संघ के हमदर्द, तिवारी जी संघ से अलग होने के बाद वामपंथी। किसी माध्यम से डॉ. सहाय ने पिताजी से संपर्क किया। पिताजी ने कम्युनिस्ट पार्टी की मदद से उनके बच निकलने में सहायता की। फिर स्वयं डॉ. सहाय का साक्षात्कार लिया जिसे  ‘द लीडर’ ने पूरे पृष्ठ पर प्रकाशित किया।
दोनों घटनाओं में अंतर इतना ही है कि अब भारतीय वैज्ञानिकों से काम लेकर उनकी हत्या का उपक्रम नहीं हो रहा, किंतु जीवन की उत्पत्ति पर शोधकार्य भारत के ही वैज्ञानिक कर रहे हैं, यह असंदिग्ध है। प्रथम विश्वयुद्ध में लूट-खसोट से अर्जित समृद्धि के बाद से अमरीका लगातार विज्ञान-प्रौद्योगिकी में बढ़त बनाने के लिए दुनिया भर के मस्तिष्कों का उपयोग कर रहा है। यह बता देने से अब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि ये भारतीय मूल के वैज्ञानिक हैं। उनके शोध का लाभ भारत को नहीं मिलता। अमरीका को मिलता है। एक तरफ भूमंडलीकरण के नामपर भारत के मध्यवर्ग को अमरीका के अनुकूल बनाया गया है, दूसरी तरफ बौद्धिक संपदा क़ानून के द्वारा हर चीज़ पर अमरीकी दावा किया जा रहा है। इस विसंगति का समाधान हमारे राष्ट्रीय हित का विषय है, इसे कॉंग्रेस-भाजपा की संकीर्ण राजनीति के नज़रिए से देखना देशद्रोह है।
आज इस तरह के मुद्दों की भरमार है जिनपर हमारा मध्यवर्ग भ्रमित है, वह जनता और देश के आधार पर सोचने में अक्षम है। यह उदासीनता जानबूझकर लायी गयी है ताकि पूँजीपरस्त राजनीतिज्ञ नूरा कुश्ती करते हुए अमरीका की सेवा करते रहें और जनता मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम, गाय-गोबर, सवर्ण-दलित, आरक्षण-मेरिट में उलझी रहे। इससे निकलने में कोई पूँजीवादी दल जनता की सहायता नहीं करता। बुद्धिजीवियों को इसमें पहल करनी होगी और उन्हें जनसाधारण का नज़रिया अपनाकर देशहित के आधार पर क़दम उठाना होगा।

लेखक हिन्दी के प्रसिद्द आलोचक हैं|

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