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देशकाल

देशभक्त बनाम देशद्रोही

क्या भारत माता की जय कह देने से किसी की देशभक्ति साबित हो जाएगी? देशभक्त है कौन? क्या जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में अपने से कमजोरों को कष्ट दिया हो, रिश्वत ली हो, कानून तोड़ा हो और मौका मिलने पर तिरंगे की ओट में अपने उग्र तेवर से अपनी भावनाओं को जाहिर करें, तो क्या ऐसे लोगों की अभिव्यक्ति को देशभक्ति मानी जा सकती है?

जब हम राष्ट्र की बात करते हैं तो उसमें अपने देश की अस्मिता को बनाए रखने का भाव आता है। यह अस्मिता विभिन्न जातीयता और संस्कृति के भौगोलिक गठजोड़ के साथ है। जिसे बनाए रखना राष्ट्र निर्माण की अहम भूमिका है। दुनिया के देशों ने अपने राष्ट्र निर्माण को अपने-अपने तरीकों से पाया है। हमने भी एक लम्बी ऐतिहासिक परम्परा की विरासत को, आजादी की लड़ाई से गणतन्त्र की स्थापना तक में अपने राष्ट्र को पाया है। राष्ट्र की अस्मिता उसमें रहने वाले लोगों से बनती है। अस्मिता का सवाल राष्ट्र का भी सवाल है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए देश के सरकारों की जिम्मेदारी है की वह अपने लोगों की अस्मिता को बनाए रखें। निःसंदेह देशप्रेम, राष्ट्र की अस्मितामूलक अवधारणा है। प्रेम, राष्ट्र का भावात्मक पहलू है।

देश कोई वायवीय चीज नहीं जो दिखाई ना दे। खतरा तो तब है जब सरकार खुद को देश मान लेती है। उनके विचार और उनकी अस्मिता नागरिकों पर थोप कर एक राष्ट्र की, राष्ट्रीयता पर, कट्टर राष्ट्रवाद का निर्माण किया जाता है। राष्ट्रवाद का यह रूप जिसमें नागरिक अधिकारों का हनन और विशेष सांस्कृतिक विचारधारा को थोपने की कोशिश हो, उसे हम आज आधुनिक विश्व के मंच से कह सकते हैं की यह राष्ट्रवाद के आधारभूत भावना के खिलाफ है। इसको समझने में दुनिया को हजारों साल लगे हैं। जो राष्ट्र की मूल भावना के खिलाफ है उसे देश भक्ति नहीं कही जा सकती।

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हिन्दी साहित्य के आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने एक बेहतरीन निबंध लिखा था ‘श्रद्धा और भक्ति’। उनका मानना था कि श्रद्धा सामाजिक भाव है, जो व्यक्ति के कर्मों की ओर देखता है। जबकि भक्ति का निर्माण श्रद्धा और प्रेम के गठजोड़ से होता है। “कोरी श्रद्धा में याचकता का भाव नहीं है। जब प्रेम के साथ उसका सहयोग होता है तभी इस भाव की प्राप्ति होती है। श्रद्धावान श्रद्धेय पर अपने निमित्त किसी प्रकार का प्रभाव डालना नहीं चाहता, पर भक्त दाक्षिण्य चाहता है” [1]

भक्तों की स्थिति चरणों में होती है। किसी याचक की तरह भक्त भगवान से प्रेम कर सकता है,समाधान और प्रश्न भी पूछ सकता है। पर भक्त बहस नहीं कर सकते, चुनौती नहीं दे सकते ,क्योंकि उसकी संभावना भक्त की मनोदशा में होती ही नहीं है। जब भक्ति आराध्य के लिए पैदा हो जाती है तो भक्तों को भगवान के सिवा कुछ नजर नहीं आता । भक्ति की भावना भक्तों से समर्पण का भाव रखती है। तो ऐसे में सवाल यह आता है कि भक्त और भक्ति के जोड़ से बने राष्ट्रवादी भक्ति का निर्माण कैसे होता है?

जब राजतन्त्र/कबीलाई/सामंती समाजों के दौर में आपसी एकजुटता के प्रतीक धर्म, जाति, भाषा आदि के नाम पर जनता को अपने कबीले और राज्य की वफादारी के लिए लामबंद किया जाता था। यह उस दौर के राष्ट्र निर्माण का स्वरूप था। आज आधुनिक राष्ट्र-राज्य में देश की संप्रभुता को बनाए रखने तरीका सबसे बेहतरीन तरीका लोकतन्त्र और संविधान है।

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यहां फिर एक सवाल पैदा होता है की ,संविधान को खतरा किससे है? यह खतरा उस पुरानी राज निष्ठा/सामंती निष्ठा/कबीलाई निष्ठा से जुड़ी है। जिसमें राजा की रक्षा से देश की रक्षा जुड़ी हुई थी। यानी राजा और देश एक दूसरे के प्रतिबिंब थे जब-जब इस तरह की भावना बलवती होगी तब-तब नागरिकों और संविधान का ह्रास होगा। ऐसी स्थिति में हमें समझना और समझाना होगा कि हमारा संविधान तर्क की सामूहिकतावादी कसौटी पर बनाया गया राष्ट्र का रक्षक है।

इसलिए कई बार सरकारें संवैधानिक राष्ट्र को कट्टर राष्ट्रवाद से नियंत्रित करना चाहती है। जिसके लिए वह पुरानी कबीलाई, सामंती, राजतांत्रिक तरीकों का सहारा लेती है। विश्व प्रसिद्ध राजनैतिक चिन्तक एरिक हॉब्सबाम का मानना है कि “राष्ट्रवाद एक इजाद की गई परम्परा है।“ जो रचित है जिसका निर्माण किया जाता है प्रतीकों के माध्यम से और यह माध्यम औज़ार की भांति राष्ट्रवाद की भावना को तैयार करने में उपयोग किया जाता है।

आज के दौर में इस काल्पनिक राष्ट्रवाद के निर्माण में मास मीडिया की अहम भूमिका है। जिसे सरकार अपने हिसाब से नियंत्रण में लेकर इस्तेमाल करती है। यह मास मीडिया का टूल और भी खतरनाक हो जाता है,ऐसे देशों और समाजों में जहां की जनता निरक्षरता, गरीबी, जाति, धार्मिक, लैंगिक आदि भेदभाव की भावनाओं के संगम में लगातार डुबकी लगाती रहती है। इस कृत्रिम राष्ट्रवाद को खड़ा करने वाला मास मीडिया अपने कॉरपोरेट साधकों की भीगी बिल्ली बन कर रह जाता है और अपने निजी हितों को ऊपर रखकर पत्रकारिता की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। सरकारों की दलाली करने लगता है।

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इस खतरे को भांपते हुए फ्रेंच विद्वान ज्यां बोड्रिलार्ड का कहना है- कि “आज हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जो सिम्यूलेशन या प्रतिकृति अर्थात अति यथार्थता का समाज है। यहां सब आभासी है, ढोंग है, पाखण्ड है। हम सब उन वस्तुओं का अनुकरण करने में लगे हैं जो किसी भी अर्थ में यथार्थ या वास्तविकता नहीं है।“[2]

उनका कहना था कि मास मीडिया ने हमारी समय और स्थान की जो भी चेतना है उसे नए सिरे से जमा दिया है।मास मीडिया के इस संगठित खतरे को हम आज देख सकते हैं।

इन सारे सवालों और खतरों के बीच देश भक्ति को कैसे समझें? हम कह सकते हैं लोकतांत्रिक राष्ट्र और उसके संविधान के प्रति हमारी जिम्मेदारी और हमारा अपना निजी कर्तव्य देशभक्ति को प्रदर्शित करता है। संविधान अपनी मूल भावना से खिलवाड़ किए बगैर अपने को बदलने के लिए स्पेस देता है। संविधान हमें भक्त नहीं नागरिक बनाता है। नागरिक आप तब हैं ,जब आपको अपने कर्तव्यों और अधिकारों की समझ हो। नागरिक चेतना के बगैर देशभक्ति की चेतना ईमानदारी से नहीं निभाई जा सकती है।

आजादी की लड़ाई के दौरान आधुनिक हिन्दुस्तान का निर्माण हो रहा था। उस वक्त सावित्रीबाई फुले, ज्योतिबा फुले, आम्बेडकर, बिरसा मुंडा जैसे लोग उपेक्षित समुदाय के लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इन समतामूलक सेनानियों ने आजाद हिन्दुस्तान का राष्ट्र कैसा होगा, इसकी आधारभूत संरचना को बनाने में अपना संघर्षमय योगदान दिया था।

जब कोई अति उत्साही व्यक्ति या समूह राष्ट्रवाद का झंडा उठाता है और सरकार के हितों से, अपने हितों को जोड़कर दूसरों को देशद्रोही कहता है। वस्तुतः उस स्थिति में किसी को देशद्रोही कहने वाले लोग स्वयं देशद्रोह कर रहे होते हैं। आधुनिक भारत के निर्माण में एक मिश्रित संस्कृति का योगदान रहा है। हमारा राष्ट्र समन्वयात्मक संस्कृति का राष्ट्र है। राजाओं की लड़ाई से आजाद हिन्दुस्तान की तुलना नहीं की जा सकती है। इसलिए देशभक्त बनाम देशद्रोही का नैरेटिव, कट्टर राष्ट्रवादी सरकारों द्वारा गढ़ी जाती है। निःसंदेह देशद्रोह का एक संवैधानिक कायदा है, जिसके जायज इस्तेमाल की जिम्मेदारी कानून की होती है।

कानून के बेजा इस्तेमाल कट्टर राष्ट्रवाद में होता है।इसकी देश भक्ति में आलोचना की गुंजाइश नहीं होती है।यहाँ विरोध के खतरे होते हैं। यहाँ सत्ता का विरोध ,देश का विरोध मान लिया जाएगा। इस तरह का राष्ट्रवाद अपने भीतर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आत्मसात करके चलता है।हिटलर इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है। इस तरह की धारणा के हिसाब से अगर हम आधुनिक भारत से उदाहरण लें, तो कई महान लोग भी देशद्रोह की चपेट में आ जाएँगे। उदाहरण के तौर पर हम पत्रकार और साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र की बात करें तो उन्होंने अपने नाटक ‘भारत दुर्दशा’ में भारत की दयनीय स्थिति के लिए भारतीय समाज की मानसिकता को जिम्मेदार बताया है। जिसमें नाटक एक चरित्र कहता है-

“महाराज! धर्म ने सबसे पहिले सेवा की। रचि बहु बिधि के वाक्य पुरानन माँहि घुसाए।।

शैव शाक्त, वैष्णव अनेक मत प्रगटि चलाए। जाति अनेकन करी नीच अरु ऊंच बनायो।।

खान पान सम्बन्ध सबन सों बरजि छड़ायो। जन्मपत्र बिधि मिले ब्याह नहिं होन देत अब।।

बालकपन में ब्याहि प्रीतिबल नास कियो सब। करि कुलीन के बहुत ब्याह बल बीरज मारयो।।

बिधवा-ब्याह निषेध कियो बिभिचार प्रचारयो।रोकि बिलायत-गमन कूपमंडूक बनायो।।

औरन को संसर्ग छुड़ाइ प्रचार घटायो। बहु देवी देवता भूत प्रेतादि पुजाई।।“[3]

इसके अलावा नाटक एक चरित्र जिसका नाम भारत भाग्य है वो मूर्च्छित भारत को उठाते हुए कहता है की” हाय, भारत भैया, उठो! देखो विद्या का सूर्य पश्चिम से उदय हुआ चला आता है, अब सोने का समय नहीं है।“[4]

पहली नजर में भारतेंदु अपनी ही संस्कृति के आलोचक और वदेशी ज्ञान के प्रशंसक लगते हैं। जो काफी है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर देशद्रोह का आरोप लगाने के लिए। लेकिन वो आत्ममंथन से एक बेहतर देश और समाज की कल्पना करते हैं। इसी तरह बाबा साहब आम्बेडकर भी समतामूलक समाज के लिए असमानतामूलक संस्कृति का विरोध करते हैं। वे आजादी की लड़ाई को दो स्तरों पर लड़ते हैं। अधिकार के लिए सत्ता और संस्कृति की आलोचना,लोकतांत्रिक राष्ट्र की बुनियाद है। कट्टर राष्ट्रवाद की संस्कृति में अधिकार और आलोचना विषयगत हो जाते हैं। जिसे सत्ता की संस्कृति अपनी सुविधा से देशद्रोही की संज्ञा देती है।

राष्ट्र हित के लिए सत्ता की आलोचना देशभक्ति है। चाटुकारिता और प्रशंसा सरकारों को अनियंत्रित और आत्ममुग्ध बना देती है। ऐसे में भारतेंदु और आम्बेडकर जैसे महान विचारक आधुनिक हिन्दुस्तान की राष्ट्रीय संस्कृति को गढ़ रहे थे।

राष्ट्रवाद का दूत बनकर हमेशा से दुनिया में कोई ना कोई व्यक्ति उभरता रहा है। इसे उभारने के लिए कई बार संस्कृति का,तो कई बार मास मीडिया का इस्तेमाल किया जाता है। प्रचार और विज्ञापन पूँजीवाद के सहारे से राष्ट्रवाद अपना दूत ढूंढ लेता है और उस राष्ट्रवादी दूत को प्रचारित प्रसारित करता है कि मानो कि वह एक ऐसा महानायक है, जिसकी संभावना और जिसके बने रहने में ही देश की संभावना बनी रहेगी। इसके विपरीत आजादी की लड़ाई में हम कई नायकों और महानायकों को एक साथ संघर्ष करते हुए पाते हैं। नरम दल और गरम दल की देशभक्ति, तो दूसरी ओर हिंदुत्व और दलित/आदिवासी की देशभक्ति के नजरिए में फर्क था। संविधान ने अपने भीतर सभी नजरियों को स्पेस दिया।

इन विचारों के बाद हम कह सकते हैं की बांटने की राजनीति और विचार, जिसमें समन्वय और जुड़ाव का बोध नहीं है, जो राष्ट्र की लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है, वह देशद्रोह हो सकता है। लेकिन इसे तय करने का अधिकार एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में किसी व्यक्ति के पास नहीं अपितु संविधान के पास है। इसके बावजूद यह अंतिम सत्य नहीं है। पाकिस्तान और बांग्लादेश का अलग होना इसका उदाहरण है। जब दोनों एक साथ थे एक झंडे के नीचे। बंटवारे में किसी के लिए कोई न कोई देशद्रोही हुआ होगा। लेकिन बंटवारे के बाद जब दो देश बन गए तब सभी देशद्रोही ,देशभक्त साबित हुए होंगे।

देशद्रोह का ठप्पा भी विषयगत है। देशभक्ति और देशद्रोह के बीच कई बार मनुष्यता रह जाती है। हम इसे भूल जाते हैं। आदिम मनुष्य से आधुनिक मनुष्य बनने की राह में सभी धर्म और विचारों ने अपने-अपने हिसाब से मनुष्यता को जानने की कोशिश की है। सही मायने में मनुष्यता की कसौटी किसी भी भक्ति बनाम द्रोही से बड़ी है। डॉ आम्बेडकर ने एक साक्षात्कार में कहा था की- “मैं महसूस करता हूँ की संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए,खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब सिद्ध होगा। दूसरी ओर, संविधान चाहे कितना भी खराब क्यों न हो,यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए,अच्छें हों तो संविधान अच्छा साबित होगा।“[5]

आम्बेडकर के इस कथन से इतना तो साबित होता है कि संविधान को हम सिर्फ राजनीतिक सत्ता के संरक्षण में नहीं छोड़ सकते उसको बचाने की जिम्मेदारी देश के नागरिकों की होगी। संविधान भारतीय संस्कृति के उच्चतम मूल्यों की आधुनिक चेतना है। जिसमें मनुष्यता को बनाए रखने की सबसे ज्यादा संभावना मौजूद है। संविधान का उदारवादी चरित्र, मनुष्यता को सर्वोपरि रखते हुए उसमें बदलाव की गुंजाइश भी मौजूद है। जहाँ मनुष्यता हीं सबसे बड़ी देशभक्ति है।

[1] चिंतामणि,रामचन्द्र शुक्ल

[2]  आधुनिकता, उत्तर-आधुनिकता एवं नव-समाजशास्त्रीय सिद्धांत, एस.एल.दोषी

[3]  भारत दुर्दशा, भारतेंदु हरिश्चंद्र

[4]  भारत दुर्दशा, भारतेंदु हरिश्चंद्र

[5]  द वायर,ऑनलाइन पत्रिका

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