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बीबीसी रेडियो

बीबीसी रेडियो की हिन्दी सेवा का बन्द होना

 

लगभग अस्सी वर्षों तक हिन्दुस्तानी भाषा में प्रसारण करने के बाद बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ने अपनी हिन्दी सेवा का रेडियो बन्द कर दिया। पर साथ ही बीबीसी का कहना है के डिजिटल और टीवी के साथ ही एफएम पार्टनर चैनल के ज़रिए वो अपने दर्शकों और श्रोताओं से जुड़ा रहेगा। 27 दिसम्बर 2019 को बीबीसी हिन्दी का सुबह साढ़े छह बजे का कार्यक्रम नमस्कार भारत अन्तिम बार प्रसारित किया गया और शाम साढ़े सात बजे प्रसारित होने वाले कार्यक्रम दिन भर का अन्तिम प्रसारण शुक्रवार 31 जनवरी 2020 को हुआ। बीबीसी का यह भी कहना गया है कि डिजिटल सेवाओं के विस्तार के लिए यह कदम उठाया गया है। 

बीबीसी लंदन से हिन्दी में प्रसारण पहली बार 11 मई 1940 को हुआ था। इसी दिन विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री बने थे। 

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बीबीसी हिन्दुस्तानी सर्विस के नाम से शुरु किए गये प्रसारण का उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप के ब्रितानी सैनिकों तक समाचार पहुँचाना था। भारत की आज़ादी और विभाजन के बाद हिन्दुस्तानी सर्विस का भी विभाजन हो गया और 1949 के जनवरी महीने में इंडियन सेक्शन की शुरुआत हुई। इसका उदघाटन किया भारत ब्रिटेन में भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त और बाद में रक्षा मन्त्री बने कृष्णा मेनन ने। इस सेवा की शुरुआत भारत के जाने-माने प्रसारक ज़ुल्फ़िक़ार बुख़ारी ने की थी, बाद में बलराज साहनी और जॉर्ज ऑरवेल जैसे शानदार प्रसारक इस हिन्दुस्तानी सेवा से जुड़े। इसके बाद पुरुषोत्तम लाल पाहवा, आले हसन, हरीशचन्द्र खन्ना और रत्नाकर भारतीय जैसे शीर्ष प्रसारकों ने मोर्चा संभाला और हिन्दी सेवा ने झंडे गाड़ दिए। 1960 के दशक में आए महेंद्र कौल, हिमांशु कुमार भादुड़ी और ओंकारनाथ श्रीवास्तव। कैलाश बुधवार, भगवान प्रकाश, विश्वदीपक त्रिपाठी और सुभाष वोहरा 1970 के दशक में बीबीसी हिन्दी सेवा से जुड़े। बाद के दशकों में अचला शर्मा, नरेश कौशिक, विजय राणा, जसविंदर सिंह, पंकज सिंह, शिवकांत, ममता गुप्ता, परवेज़ आलम,मधुकर उपाध्याय, पंकज पचौरी, क़ुरबान अली, सीमा चिश्ती, संजीव श्रीवास्तव, शाज़ीज़मां, सलमा ज़ैदी, रेहान फ़ज़ल, राजेश जोशी, रूपा झा, मुकेश शर्मा आदि कई पत्रकार और प्रसारक आए और श्रोताओं के महबूब प्रसारक बने। यह सिलसिला हाल तक जारी रहा। अभी भी बीबीसी हिन्दी की वेबसाइट के लिए बहुत सारे पत्रकार काम करते हैं। 

ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब बीबीसी ने हिन्दी में शॉर्टवेव रेडियो प्रसारण समाप्त करने का फ़ैसला किया। इससे पहले फरवरी 2011 में भी बीबीसी ने घोषणा की थी कि वो बीबीसी हिन्दी रेडियो बन्द करने पर विचार कर रहा है। फिर 12 दिसम्बर 2016 को बीबीसी ने अपने रेडियो कार्यक्रमों को कम कर दिया। बीबीसी हिन्दी ने पहले सुबह आठ से साढ़े आठ तक प्रसारित होने वाला विश्व भारती और शाम को साढ़े नौ से दस बजे तक प्रसारित होने वाला कार्यक्रम घटनाचक्र बन्द कर दिया था। शॉर्टवेव प्रसारण बन्द होने के बावजूद बीबीसी डिजिटल माध्यमों पर अपने कुछ नियमित कार्यक्रम डिजिटल ऑडियो के रूप में प्रसारित करता रहा। इनमें विवेचना और दुनिया-जहाँ जैसे कार्यक्रम शामिल थे। 

4 फ़रवरी 2011 को बीबीसी ने खबर दी थी कि “कुछ भारी वित्तीय कठिनाइयों की वजह से बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ने बहुत सोच विचार कर और दुखी मन से कुछ फैसले लिए हैं। कुछ भाषाओं में शॉर्टवेव रेडियो के प्रसारण बन्द होंगे जिनमे हिन्दी भी शामिल है।”

उस समय बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की ओर से कहा गया था कि इसकी सभी सेवाओं में से 650 नौकरियों में कटौती की जाएगी। ये फ़ैसला विदेश मंत्रालय से मिलने वाले कुल अनुदान में 16 फ़ीसदी की कमी आने के बाद लिया गया। कैरिबियाई देशों के लिए अंग्रेज़ी प्रसारण, अफ़्रीका के लिए पुर्तगाली भाषा में प्रसारण, मैसेडोनियाई और अल्बानियाई और सर्बियाई सेवाएँ बन्द कर दी गयीं इनके अलावा मैडरिन, तुर्की, रूसी, यूक्रेनी, स्पेनिश, अज़ेरी और वियतनामी भाषा के रेडियो प्रसारण भी बन्द हो गये।

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फ़रवरी 2011 में जब यह खबर भारत पहुँची की तो देश के कई जाने-माने लेखकों, इतिहासकारों, पत्रकारों, पर्यावरणविदों ने ब्रितानी सरकार से अपील की कि वो बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के बजट में कटौती पर पुनर्विचार करे ताकि शॉर्ट वेव पर बीबीसी हिन्दी रेडियो के प्रसारण जारी रखे जा सकें। इस अपील पर हस्ताक्षर करने वालों में भारतीय उपमहाद्वीप पर रिपोर्ट करने वाले चर्चित पत्रकार सर मार्क टली, जिलियन राइट, एमजे अकबर, सैम मिलर, इंदर मल्होत्रा, कुलदीप नैय्यर, इतिहासकार विलियम डेलरिंपल और रामचन्द्र गुहा, लेखक विक्रम सेठ, लेखिका अरुंधती रॉय और पर्यावरणविद सुनीता नारायण शामिल थे।

जिन अन्य लोगों ने इस अपील पर हस्ताक्षर किए हैं, वे हैं चर्चित सरोदवादक उस्ताद अमजद अली ख़ान, रिटायर्ड पुलिस अधिकारी और समाजसेवी किरण बेदी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ सेरिब्रल पाल्सी की निदेशक टेस्सा हैम्बलिन, सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश, वकील प्रशांत भूषण, रक्षा मंत्रालय के सलाहकार दिलावर सिंह और फ़ाउंडेसन ऑफ़ रेस्पॉंसिबल मीडिया की नीलिमा माथुर शामिल हैं। अपील कर्ताओं का कहना था कि इन प्रसारणों को भारत के ग्रामीण और अत्यंत ग़रीब क्षेत्रों में लगभग एक करोड़ से अधिक लोग रोज़ सुनते हैं जहाँ कई बार बिजली की सप्लाई भी नहीं होती। साथ ही ये स्कूल और कॉलेज के छात्रों के लिए जानकारी का अहम स्रोत हैं। 

दिल्ली में जारी की गयी इस अपील में कहा गया कि लगातार 70 सालों में बीबीसी हिन्दी रेडियो के प्रसारणों ने संकट के समय निष्पक्ष और सटीक जानकारी दी है, फिर वह चाहे वर्ष 1971 का भारत-पाक युद्ध हो, वर्ष 1975 में आपातकाल का समय हो या फिर वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हो। इस बयान में ये भी कहा गया है कि आज के समय में भारत गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है। इनमें मध्य और पूर्वी भारत में सरकार के ख़िलाफ़ माओवादियों का संघर्ष, पूर्वोत्तर में कुछ जगह विद्रोह और कश्मीर की समस्या अहम हैं। 

बीबीसी हिंदी अब अमरीका में मोबाइल पर ...

बीबीसी हिन्दी सेवा पिछले अस्सी वर्षों तक  ताज़ा समाचार और सम-सामयिक विषयों पर कार्यक्रम प्रसारित करती रही।इन वर्षों में दुनिया में काफ़ी कुछ बदला और हिन्दी सेवा समय के साथ चलती रही। भारत मैं तो एक मुहावरा चल पड़ा था कि अगर सही और प्रामाणिक ख़बर चाहिए तो बीबीसी सुनिए। भारत-चीन युद्ध हो (1962) या भारत-पाकिस्तान युद्ध (1965) बांग्लादेश का  मुक्ति संग्राम (1971) हो या जेपी आन्दोलन और आपातकाल का लगना(1974-77),जनता पार्टी सर्कार का बनना (1977) इंदिरा गाँधी की हत्या हो (1984) या राजीव गाँधी की हत्या (1991) या  फिर कोई और बड़ी अन्तरराष्ट्रीय घटना, ऐसे अनेक मौक़ों पर बीबीसी हिन्दी सेवा ने साबित किया कि यह मुहावरा पूरी तरह सही है। बीबीसी हिन्दी सेवा अपनी विशिष्ट भाषा शैली और निष्पक्षता के लिए हमेशा जानी जाती रही। राजनीति से लेकर खेल के मैदान तक हर विषय पर बीबीसी हिन्दी के  उत्कृष्ट कार्यक्रम हिन्दी पत्रकारिता को दिशा देते रहे। विश्वसनीयता ने बीबीसी की लोकप्रियता का रास्ता अपने आप खोल दिया।  एक स्वतन्त्र सर्वेक्षण के अनुसार, चार वर्ष पहले भारत में करीब सवा करोड़ लोग बीबीसी हिन्दी के प्रसारण सुनते थे।  

दो पूर्व प्रधानमन्त्री, इंद्र कुमार गुजराल और विश्वनाथ प्रताप सिंह बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के स्तम्भकार रह चुके हैं। इसके अलावा फ़िल्मकार देवानंद और मनोज बाजपेयी, कवि और लेखक निदा फ़ाज़ली, साहित्यकार असग़र वजाहत, फ़िल्म स्तम्भकार कोमल नाहटा और भावना सोमैया और खेल पत्रकार प्रदीप मैगज़ीन समय-समय पर वेबसाइट से जुड़े रहे हैं। 

 

समय बदला और अन्य संचार माध्यमों की तरह बीबीसी ने वेबसाइट की अहमियत को पहचाना और वर्ष 2001 में बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य भारत और दुनिया भर के हिन्दीभाषी पाठकों तक समाचार और विश्लेषण पहुँचाना था।यह एक 24X7वेबसाइट है और पत्रकारों की एक टीम सप्ताह के सातों दिन, 24 घंटे दुनिया भर के पाठकों के लिए सामग्री उपलब्ध कराती है। बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के पहले पन्ने पर सभी प्रमुख समाचारों को जगह दी जाती है। और इसके अलावा विश्लेषण, जनरुचि की ख़बरों और फ़ीचरों का प्रकाशन किया जाता है। बीबीसी वेबसाइट के अन्य इंडेक्स हैं- भारत, पाकिस्तान, चीन, खेल, मनोरंजन, विज्ञान, कारोबार, मल्टीमीडिया, ब्लॉग/फ़ोरम, बीबीसी विशेष और लर्निंग इंगलिश । इस समय मुकेश शर्मा हिन्दी सेवा के प्रमुख हैं।बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम

इस तरह रची गई थी राजीव गांधी की हत्या ...

जिस दिन राजीव गाँधी की हत्या हुई थी

अचला शर्मा

पूर्व प्रमुख, बीबीसी हिन्दी सेवा

21 मई 2018

‘राजीव गाँधी मारे गये!’ बुश हाउस की पाँचवीं मंज़िल पर स्थित हमारे ऑफ़िस में एक आवाज़ गूँजी।

वह 21 मई 1991 की शाम थी और लंदन में शायद पौने सात बज रहे थे। मैं बस मिनट भर पहले अपने डेस्क पर लौटी थी। ‘यह कैसे हो सकता है?’ मैंने ख़ुद से कहा।’राजीव तो मद्रास में कहीं चुनाव प्रचार कर रहे हैं’, मैंने अपने सहयोगी से कहा।जवाब आया- ‘ख़बर सच है। कुछ एजेंसियों ने फ़्लैश कर दी है। प्रचार के दौरान एक बम विस्फोट में राजीव गाँधी की मौत हो गयी।’ तभी एक और सहयोगी ने बताया कि न्यूज़ रूम ख़बर की पुष्टि करने की कोशिश कर रहा है। मुझे सिहरन सी महसूस हुई। राजीव गाँधी की कई तस्वीरें एक साथ कोलाज की तरह मेरी आँखों के सामने कौंध गयीं। पहली तस्वीर थी, 31 अक्टूबर 1984 की रात की जब श्रीमति गाँधी की हत्या के बाद राजीव ने राष्ट्र के नाम पहला संदेश दिया था।राजीव गाँधी की मौत हो गयी है। मैंने ख़ुद को यह भयावह तथ्य याद दिलाया। 21 मई 1991 की रात को बीबीसी हिन्दी के रात के प्रसारण के संपादन की ज़िम्मेदारी मेरी थी।

पुण्यतिथि: महज 10 मिनट में ही राजीव ...

और एक वजह यह भी है कि उस रात जो कार्यक्रम मैंने प्रस्तुत किया उसके लिए एशिया ब्रॉडकास्टिंग यूनियन का पुरस्कार भी मिला। बहरहाल, जैसे-जैसे समाचार एजिंसियों पर राजीव गाँधी की मौत के समाचार का ब्योरा आने लगा, बुश हाउस में लोगों का आना शुरू हो गया। दूसरे विभागों और दुनिया भर से अन्य प्रसारण संस्थाओं के फ़ोन आने लगे। सभी बीबीसी हिन्दी सेवा से समाचार की पुष्टि करना चाहते थे। इस बीच हिन्दी सेवा के अध्यक्ष कैलाश बुधवार, पूर्वी सेवा के अध्यक्ष विलियम क्रॉली और उपाध्यक्ष डेविड पेज भी आ पहुंचे। फिर, 90 के दशक के आरम्भ में हिन्दी सेवा के पास अपने हिन्दी भाषी पत्रकारों का लम्बा चौड़ा नैटवर्क नहीं था हालाँकि इस दिशा में काम शुरू हो चुका था। हमारी क़िस्मत अच्छी थी कि बीबीसी के जसविंदर सिंह उस रात हैदराबाद में थे।

बीबीसी के भारत में ब्यूरो प्रमुख मार्क टली और संवाददाता सैम मिलर दिल्ली में थे। हमारे पास अब पाँच घंटे बचे थे। टीम के हर सदस्य ने अलग-अलग मोर्चा संभाला। कोई रिपोर्टरों से सम्पर्क साधने में लग गया तो कोई राजनीतिज्ञों और विश्लेशकों से। पर ऐसा लग रहा था कि सारी दुनिया उस वक़्त भारत को ही फ़ोन लगा रही है। कोई भी फ़ोन मिलना मुश्किल हो रहा था। ख़ैर, हमारी पहली और सबसे बड़ी ज़रूरत थी, मद्रास (चिन्नई) से कोई 30 मील दूर श्रीपेरंबुदूर से घटना का ब्योरा लेना। इसी जगह राजीव गाँधी चुनाव रैली को संबोधित करने जा रहे थे जब एक आत्मघाती बम हमले में उनकी मृत्यु हो गयी। हमने चेन्नई के एक स्थानीय पत्रकार टी वी एस हरि से अनुरोध किया कि वहाँ जाएँ और पूरा ब्योरा जुटाएँ।

A look back at Rajiv Gandhi's assassination- The New Indian Express

इस बीच हैदराबाद से जसविंदर ने राजीव की मृत्यु के बाद वहाँ भड़की हिंसा पर एक रिपोर्ट भेजी। अन्तरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ आनी शुरू हो गयी थीं। अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश, ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री जॉन मेजर, ब्रिटन की लेबर पार्टी के नेता नील किनक, और राष्ट्रमंडल के महासचिव एमेका अन्याकू ने राजीव गाँधी के योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी। लेकिन भारत से प्रतिक्रियाएँ जुटाना उस समय और मुश्किल काम था। फिर भी मधुकर उपाध्याय फ़ोन पर कुछ महत्वपूर्ण नेताओं की प्रतिक्रियाएँ जुटाने में सफल हो गये। अपनी मौत से एक साल पहले राजीव गाँधी ने बीबीसी हिन्दी सेवा के साथ अपने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था- ‘मुझ पर राजनीति में आने का बहुत दबाव था।’ जवाब की तलाश में कार्यक्रम के सह-प्रस्तुतकर्ता परवेज़ आलम ने कुछ राजनीतिक पंडितों से सम्पर्क किया।

इंदर मल्होत्रा का विचार था कि ‘राजीव की हत्या कांग्रेस के लिए वाक़ई एक बड़ा आघात है क्योंकि श्रीमति गाँधी के ज़माने से पार्टा का नियंत्रण एक ही नेता के हाथ में रहा है। ‘जनसत्ता के संपादक प्रभाश जोशी उस रात वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने संकेत दिया कि अन्तरिम नेता के रूप में नरसिम्हा राव का नाम आना स्वाभाविक है। परवेज़ आलम ने एक ही वाक्य में उम्मीद जगाई भी और तोड़ी भी। ‘अगर इतने बीमार हैं तो नेतृत्व कैसे संभालेंगे?’ एक सहयोगी ने संदेह व्यक्त किया।लेकिन प्रोग्राम शुरू होने के ठीक पहले नरसिम्हा राव का नंबर फिर मिलाया गया। उधर से फ़ोन उठने की आवाज़ के साथ ही परवेज़ ने कहा-‘राव साहब’ ‘बोल रहा हूँ।’ उनींदी सी आवाज़ आई। राजीव की मृत्यु पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, ‘मुझे विश्वास ही नहीं हुआ।।।।’

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‘जब ख़बर मिली तो मैं स्तब्ध रह गया। यह हमारे देश के लिए मुश्किल इम्तहान होगा। ज़ाहिर है, काँग्रेस के लिए यह बड़ा झटका है, लेकिन पार्टी इसे भी सहन कर लेगी। मुझे आशा है कि इस त्रासद घटना के बावजूद पार्टी अपनी शक्ति और लोकप्रियता बनाए रखने में सफल होगी।’ यह तो कांग्रेस कार्य समिति पर है, वो जो भी ज़िम्मेदारी दे। मैं जल्दी ही दिल्ली के लिए रवाना हो रहा हूं।’ ‘इसका मतलब राव साहब रेस में शामिल हैं।’ परवेज़ ने टिप्पणी की।जिस वक़्त परवेज़ नरसिम्हा राव का इंटरव्यू तैयार करके स्टूडियो में आए, मैं कार्यक्रम शुरू कर चुकी थी। उस ज़माने में डिजिटल टेक्नॉलोजी नहीं आई थी। 22 मई 1991 की सुबह भारत में लाखों लोगों ने राजीव गाँधी की हत्या का समाचार पहली बार बीबीसी हिन्दी की इसी सभा में सुना था।

31 अक्टूबर का वो दिन

रेहान फ़ज़ल

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

1 नवम्बर 2014

तब मार्क टली और सतीश जैकब बीबीसी के संवाददाता थे लेकिन मार्क टली शहर से बाहर थे और ख़बरों की ज़िम्मेदारी सतीश जैकब पर थी। सतीश जैकब कहते हैं कि अगर उनके दोस्त और जानेमाने पत्रकार आनंद सहाय ने उन्हें एक फ़ोन नहीं किया होता तो शायद वो इतिहास से यूं रूबरू नहीं होते। 

11 मई 2015 को बीबीसी के 75 साल होने पर बीबीसी संवाददातारेहान फ़ज़ल का लेख 

ये सफ़र शुरू हुआ था 11 मई 1940 को, जब दूसरे विश्व युद्ध में लड़ने वाले हिन्दुस्तानी जवानों के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया गया था जिसके ज़रिए वो अपने घरों को संदेश प्रसारित करते थे। अभी हिन्दी प्रसारण को शुरू हुए कुछ ही महीने हुए थे कि ब्रॉडकॉस्टिंग हाउस पर जर्मन विमानों ने हमला किया। उस समय ब्रूस वेलाव्रिज अंग्रेज़ी में समाचार पढ़ रहे थे। इस हमले में सात लोग मारे गये थे लेकिन प्रसारण नहीं रुका। अभी भारत को आज़ाद हुए मात्र पांच महीने हुए थे कि जैसे वज्रपात हुआ। 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बि़ड़ला हाउस में नाथूराम गोडसे ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को गोली मार दी। तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने रुंधे गले से महात्मा गाँधी के निधन की सूचना आल इंडिया रेडियो के माध्यम से पूरे  देश को दी। बीबीसी संवाददाता रॉबर्ट स्टिमसन भी इस घटना के समय दिल्ली में  मौजूद थे उन्होंने अपनी रिपोर्ट के ज़रिये महात्मा गाँधी की हत्या की ख़बर पूरी दुनिया में पहुँचाई।  

BBC हिंदी सेवा के 78 साल पूरे होने पर एक ...

बीबीसी हिन्दी की लोकप्रियता बढ़ी वर्ष 1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान। ये शायद पहली बार हुआ कि किसी प्रधानमन्त्री ने देश को संबोधित कर सीमा पर हो रही हार को सरेआम स्वीकार किया। तीन वर्ष बाद वर्ष 1965 में भारत को एक बार फिर युद्ध के मैदान में उतरना पड़ा। पाकिस्तान के राष्ट्रपति फ़ील्ड मार्शल अयूब ख़ान ने पाकिस्तानी जनता को संबोधित करते हुए युद्ध का एलान किया। 10 जनवरी 1966 को ताशकंद के भारत और पाकिस्तान ने एक समझौते पर दस्तख़त किए। उसी रात ताशकंद में ही भारत के प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री का निधन हो गया। मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर उस समय ताशकंद में मौजूद थे। 1969 में इंसान का एक और सपना पूरा हुआ और वो धरती से ढ़ाई लाख मील दूर चाँद पर जा पहुँचा। चाँद पर इंसान के पहुँचने पर बीबीसी ने हिन्दी में ख़ास कार्यक्रम पेश किया। 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध को जिस तरह से बीबीसी हिन्दी ने कवर किया, उसकी हर जगह तारीफ़ हुई। बांग्लादेश की आज़ादी पर रत्नाकर भारतीय ने विशेष प्रस्तुति के जरिए पेश किया।

26 जून 1975 को तमाम लोकतांत्रिक मूल्यों को धता बताते हुए इंदिरा गाँधी ने आपातकाल की घोषणा की। विपक्ष के नेताओं पर मीडिया से बात करने पर प्रतिबंध के बावजूद बीमारी के कारण जेल से रिहा किए गये जयप्रकाश नारायण ने सबसे पहले बात की।

भारत का सरकारी मीडिया एक तरह से सरकार का लाउडस्पीकर बनकर रह गया था। प्रेस की सेंसरशिप ने भारत में बीबीसी की उपयोगिता और बढ़ा दी थी। संभवत: बीबीसी हिन्दी का ये स्वर्णिम काल था। बाद में भारत के प्रधानमन्त्री बने चन्द्रशेखर, अन्य विपक्षी नेताओं की तरह जेल में बन्द थे।

अनकही कहानी: ब्लूस्टार से पहले टॉप ...

1984 में भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर में घुसकर सिख पृथकतावादियों को निकालने की मुहिम चलाई। ऑपरेशन ब्लू स्टार तो सफल रहा लेकिन उसकी बहुत बड़ी राजनीतिक क़ीमत तत्कालीन सरकार को चुकानी पड़ी।31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गाँधी की अपने अंगरक्षकों ने उन पर गोलियां बरसाकर हत्या कर दी। कम के कम भारत के लोगों को उसकी सबसे पहली ख़बर बीबीसी ने दी।उस समय दिल्ली में बीबीसी के संवाददाता थे सतीश जैकब। उस दिन बीबीसी हिन्दी के आजकल कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए मुख्य प्रसारक ओंकार नाथ श्रीवास्तव ने इंदिरा गाँधी की आवाज़ का एक अंश सुनते हुए कहा “इंदिरा गाँधी को थी कहते हुए ज़बान लरज़ने लगती है।” का कहना था “कुछ इस तरह हुई।

1991 में जब राजीव गाँधी दोबारा सत्ता में आने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे थे, श्रीपेरंबदूर में तमिल पृथकतावादियों ने आत्मघाती बम हमले के ज़रिए उनकी हत्या कर दी।

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