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बवाना फ़ैक्टरी की आग
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बवाना फ़ैक्टरी की आग में 17 महिला श्रमिकों की भयावह मौत

 

बवाना फ़ैक्टरी की आग में 17 महिला श्रमिकों की भयावह मौत की परवाह किसे है ? इस अग्निकांड में जो 17 मज़दूर जलकर मरे, वे सभी महिलाएँ हैं. सबसे हृदयविदारक यह है कि वे जिस तरह बैठकर काम कर रही थीं, उसी हालत में जलकर मर गयीं. किसी के बचने की गुंजाइश नहीं थी क्योंकि फ़ैक्टरी का एकमात्र दरवाज़ा बंद था. मज़दूरों (महिलाओं) के अंदर आने के बाद उसपर ताला लग जाता था.

फ़ैक्टरी किसी और और चीज़ के लाइसेंस पर चल रही थी लेकिन वहाँ पटाके बनते थे. आग लगने से पहले न नगर निगम को पता था, न दिल्ली सरकार को, न उपराज्यपाल को पता था, न केंद्र सरकार को, न दिल्ली पुलिस को पता था, न श्रम विभाग को, कि यहाँ अवैध कारख़ाना चल रहा है!!??

ऐसे कारख़ाने में केवल महिलाएँ क्यों रखी गयी थीं??

क्योंकि महिलाएँ कम वेतन लेती हैं. ज़्यादा डरती हैं. इसलिए अधिक काम करती हैं. ज़्यादा श्रम, ज़्यादा उतपादन, ज़्यादा मुनाफ़ा, ज़्यादा अनुशासन और कम पारिश्रमिक. अब फ़ैक्टरी में सुरक्षा उपायों पर कौन नाहक ख़र्च करे? निगरानी करने वाली संस्थाएँ भी किसी अज्ञात कारण से चुप और उदासीन रहती हैं। लोग कहते हैं, उनका हिस्सा पहुँच जाता है.

दिल्ली की तीन प्रमुख राजनीतिक पार्टियाँ – भाजपा, आप और काँग्रेस – 20 विधायकों को अयोग्य ठहराने या न ठहराये जाने के महान जनहितकारी सवाल पर सारी शक्ति लगाए हुए हैं. वामपंथी दल, ख़ासकर माकपा, प्रकाश करात के गुटबाज़-अहंकार के चक्रवात में फँसी है और आत्मविनाश के रास्ते पर दौड़ रही है. ऐसे में इन मुर्दों की फ़िक्र कौन करे?

भाजपा-आरएसएस और उसके प्रत्यक्ष-प्रच्छन्न संगठन पद्मावती के सम्मान की रक्षा के लिए आगज़नी और तोड़फोड़ जैसे ‘मेक इन इंडिया’ के महान राष्ट्रीय आयोजन में व्यस्त हैं. इस महायज्ञ में मज़दूरों की, ख़ासकर महिलाओं की चिंता कौन करे? क्या एक (काल्पनिक) पद्मावती के सम्मान-रक्षक इन 17 पद्मिनियों के लिए ज़रा भी व्यथित न होंगे?

जायसी की पद्मावती तो राजपूतों की पराजय और मृत्यु के बाद स्वेच्छा से जौहर करके मरी थीं. इन श्रमिक महिलाओं को तो राजपूती शान के साथ रूपकुँवर की तरह ज़बरदस्ती मौत के मुँह में झोंक दिया गया. ये सभी महिलाएँ अपने परिवार के साथ रोज़ी कमाने उत्तर प्रदेश से आयी थीं. उनमें से कइयों की पहचान नहीं हो पायी है. भला ‘अमीरी रेखा’ (कुमार अम्बुज) के ज़माने में इन ग़रीब-बेबस-बेनाम पद्मिनियों की क्या पहचान???

क्या यह हमारे ‘विकास’ की एक तस्वीर नहीं है? मैं जानता हूँ, यह सब कहना राष्ट्रद्रोह में गिना जायगा. प्रसिद्ध साहित्य में भी यह संवेदना न बची, केवल डर और स्वार्थ से काम हुआ, तो फिर बचेगा ही क्या? एक फ़ैक्टरी में अग्निकांड की यह घटना एक उदाहरण है. एक कसौटी. जिसे सामने रखकर हम अपनी राजनीति और साहित्य की और खुद अपनी संवेदनशीलता परख सकते हैं

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