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विश्व आदिवासी दिवस
मुद्दा

विश्व आदिवासी दिवस की सार्थकता

 

संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के अधिकार के लिए घोषणा पत्र

 

    संयुक्त राष्ट्र संघ के एक विशेष पदाधिकारी ज़ोस आर मार्टिनेज़ कोबो को विश्व के सभी आदिवासियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, जातीय भेदभाव और आर्थिक परिस्थिति के विषय में एक विस्तृति अध्ययन और उस पर आधारित एक प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का कार्यभार मिला।तत्पश्चात उन्होंने एक विस्तृत रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्तुत किया जिसमें आदिवासियों के घोर शोषण का ज़िक्र था। पूरे विश्व में आदिवासियों के जल जंगल और ज़मीन के शोषण और संघर्ष की गाथाएँ एक समान थीं। इसी प्रतिवेदन के आधार पर 9 अगस्त 1982 को प्रथम बार संयुक्त राष्ट्र संघ के एकनॉमिक एंड सोशल काउन्सिल (ईकोसोक) ने आदिवासियों से सम्बन्धित एक कार्यकारी समूह का गठन किया जिसे वर्किंग ग्रूप ऑन इंडिजेनस पॉप्युलेशन कहा गया।

    1994 में संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा गठित आदिवासियों से सम्बन्धित कार्यकारी समूह ने इसी 9 अगस्त को सर्वसम्मति से प्रत्येक वर्ष ‘विश्व के आदिवासियों का अन्तर्राष्ट्रीय दिवस’, के रूप में मनाए जाने का प्रस्ताव पारित किया। तब से यह चलन में है और पूरे विश्व में हर वर्ष 9 अगस्त को आदिवासी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

    संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के लिए घोषणा पत्र की यात्रा इतनी आसान नहीं थी। इस लेख में मैं इसी बात की चर्चा करूँगा। पूरी प्रक्रिया से सम्बन्धित जो संधियाँ, सम्मेलन, कन्वेन्शन, मानवाधिकार तथा अन्य प्रावधान का ज़िक्र थोड़ी संयम से करूँगा नहीं तो पूरा लेख जटिल और नीरस हो जाएगा। लेख को सरल बनाने के लिए कुछ बिन्दुओं को जानबूझकर चर्चा से दूर रखूँगा, किन्तु आप आश्वासित रहें कि मूल भाव में किसी प्रकार का समझौता या परिवर्तन नहीं होगा।

    1994 में संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा गठित आदिवासियों से सम्बन्धित कार्यकारी समूह ने आदिवासियों के अधिकार के घोषणा पत्र का एक प्रारम्भिक ड्राफ़्ट, ‘अल्पसंख्यकों के भेदभाव और संरक्षण पर रोकथाम के लिए गठित उप-आयोग’, को प्रस्तुत किया था। समीक्षा के बाद इसे अनुमोदित कर दिया गया। इसके पश्चात, इसे संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग के पास विचार के लिए भेजा गया, जिसे आगे की चर्चा के लिए एकनॉमिक एंड सोशल काउन्सिल (एकोसोक) और संयुक्त राष्ट्र संघ के आम सभा में प्रस्तुत किया गया।

    जैसा कि अपेक्षित था, अनेक राष्ट्र तुरन्त विरोध में खड़े हो गये। मूल रूप से इसकी दो वजह थीं। पहला, इस प्रारम्भिक प्रारूप में आदिवासी समुदाय के लिए स्वशासन या आत्मनिर्णय के प्रावधान का ज़िक्र था, जिसके अन्तर्गत आदिवासी समुदाय को अपने क्षेत्र में अपने पारम्परिक शासन व्यवस्था को लागू करने और आत्मनिर्णय का अधिकार प्राप्त होता। दूसरा, महत्वपूर्ण माँग थी कि आदिवासी भूमि पर जल जंगल और ज़मीन पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर उनका प्रथम अधिकार होगा ना कि किसी राष्ट्र का। यह दोनो प्रावधान अनेक सरकारों को स्तब्ध करने के लिए काफ़ी था। कालक्रम देखें तो पाते हैं की इस प्रारम्भिक प्रारूप को यहाँ तक पहुँचने में ही 12 वर्ष लग गये। पर ये तो मात्र अभी संघर्ष की शुरुआत थी।

    1994 के प्रारम्भिक ड्राफ़्ट के बहुराष्ट्रीय विरोध को संतुलित करने के लिए 1995 में एक ‘ओपन एनडेड इन्टर शेशनल वर्किंग ग्रूप’, का गठन किया गया। उसी दरमियान, संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1995-2004 को विश्व आदिवासी दशक घोषित कर दिया। ओपन एनडेड इन्टर शेशनल वर्किंग ग्रूप को यह उम्मीद थी कि शायद इसी विश्व आदिवासी दशक के दौरान ही आदिवासियों के अधिकार के घोषणा पत्र का एक प्रारम्भिक ड्राफ़्ट पारित कर दिया जाएगा। किन्तु ऐसा हुआ नहीं। संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार आयोग ने पुनः आदिवासी दशक (द्वितीय) को दस वर्षों के लिए 2005-2015 तक बढ़ा दिया।

    2006 में संयुक्त राष्ट्र संघ के आंतरिक ढाँचे में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए और इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र संघ का मानवाधिकार आयोग परिवर्तित होकर संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार परिषद बन गया। और 2006 में ही 29 जून को संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार परिषद ने संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के अधिकार के लिए घोषणा पत्र को विभिन्न राष्ट्रों के समक्ष प्रस्तुत करने की लिए अनुमोदित कर दिया।

    अन्ततः 13 सितम्बर 2007 को, लगभग 25 वर्षों के अथक परिश्रम और सतत संघर्ष के पश्चात आदिवासियों के अधिकार के लिए घोषणा पत्र को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंगीकृत कर लिया। कुल 144 राष्ट्रों ने इसके समर्थन में वोटिंग की, 11 देश तटस्थ रहे और कुछ विकसित राष्ट्रों ने इसका विरोध किया। जो 11 देश तटस्थ रहें वो थे बंग्लादेश, भूटान, रूसी संघ, जॉर्जिया, केन्या, नाइजीरिया, कोलम्बिया, बुरुंडी, समोआ, अजेरबैजान और यूकरैन। अनेक विकसित राष्ट्र जैसे कि अमेरिका, कनाडा, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया ने शुरुआत में विरोध किया और वहीं यूकरैन, प्रशांत महासागर के उपद्वीप देश, अनेक एशियाई देशों ने उदासीन रवैया अपनाये रखा।

    कनाडा में वहाँ के आदिवासियों को ‘प्रथम नागरिक’ या ‘फ़र्स्ट नेशन’ का दर्जा प्राप्त है। शुरूआत में कनाडा ने संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र का विरोध किया था। उनका मानना था कि संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र कनाडा के संविधान के अनुकूल नहीं था और विशेष रूप से कनाडा के संविधान के अनुच्छेद 35 के ठीक विपरीत था। ‘असेम्ब्ली ओफ़ फ़र्स्ट नेशन’, ने जब संगठित होकर इसके लिए दबाव बनाया तब उनको उत्तर देते हुए तब की कनाडा की सरकार ने कहा कि कुछ आदिवासियों के हित के रक्षा के लिए हम अन्य सामान्य नागरिकों के साथ असंतुलित व्यवहार नहीं कर सकते हैं। असेम्ब्ली ओफ़ फ़र्स्ट नेशन का संगठित प्रयास होता रहा और अन्ततः 12 नवम्बर 2010 को कनाडा सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र को अंगीकृत कर लिया।

    ऑस्ट्रेलिया में भी इसी प्रकार का घटनाक्रम चला। और 3 अप्रैल 2009 को ‘रुड्ड सरकार’ ने आदिवासियों के संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र को अंगीकृत कर लिया जिसके लिए उनके संविधान में विशेष बदलाव भी करना पड़ा। तत्पश्चात्, ऑस्ट्रेलिया के अनेक सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत पारम्परिक उद्घोषणा के साथ होती है जिसमें वो उस भूमि के पारम्परिक स्वामी, वहाँ के आदिवासियों का आभार व्यक्त करते हैं। वे उन सभी अतीत के आदिवासी पुरखों, वर्तमान आदिवासी समुदाय और आने वाली इस पवित्र भूमि की पीढ़ी का भी आभार और सम्मान व्यक्त करते हैं। ऑस्ट्रेलिया में इस प्रकार की उदघोषणा इस बात की परिचायक है कि ऑस्ट्रेलिया ने वहाँ के आदिवासियों को उनकी खोए हुए अधिकार, सम्मान के साथ वापस किया है।

    न्यूजीलैंड सरकार ने ‘माओरी’ आदिवासियों के दबाव में 19 अप्रैल 2010 को संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र को अंगीकृत कर लिया था। उत्तरी अमेरिका ने भी 16 दिसम्बर 2010 को राष्ट्रपति बराक ओबामा के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र को अंगीकृत कर लिया।   

    विकसित देशों से जो सफल उदाहरण हमें देखने को मिले हैं उनका यहाँ एक विशेष संदर्भ है। उन देशों में मानवाधिकार के प्रति लोग जागरूक हैं। उन सबमें सामूहिकता है। शिक्षित जन, समाजिक बदलाव को सकारात्मक ढंग से देखते हैं। इसलिए जब मैं विशेष रूप से भारत की चर्चा करूँगा तब एक उम्मीद अवश्य होगी की हम अपने अधिकार को ले कर जागरूक होंगे और आने वाले समय में सरकार से अपने अधिकार की माँग संवैधानिक दायरे में रह कर मज़बूती से करेंगे। अप्रैल 2009 में आयोजित डरबन रिव्यू कॉन्फ़्रेन्स में तब तक कुल 182 देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के अधिकार के लिए घोषणा पत्र को अंगीकृत कर लिया था।

संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के अधिकार के लिए घोषणा पत्र (यूएनड्रिप)

    पूरे विश्व में लगभग 37 करोड़ आदिवासी हैं। 13 सितम्बर 2007 को विश्व भर के आदिवासियों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन था। इसी दिन संयुक्त राष्ट्र संघ ने, आदिवासियों के अधिकार का संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र को अंगीकृत किया था। इस चर्चा में मुख्य रूप से इस घोषणा पत्र की गूढ़ बातों को रखूँगा। घोषणा पत्र का मूल उद्देश्य निम्नलिखित बातों से स्पष्ट हो जाएँगी।

    संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकार परिषद (ह्यूमन राइट्स काउन्सिल) के प्रस्ताव संख्या 1/2, दिनांक 29 जून 2009 के आधार पर, संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के अधिकार के लिए का घोषणा पत्र को अपने 107 वें अधिवेशन में 13 सितम्बर 2007 को अंगीकृत कर लिया। घोषणा पत्र के शुरुआत में ही कहा गया है कि आदिवासी समुदाय को अन्य समुदायों की भाँति ही बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए। आदिवासी समाज में विविधता है और वे एक विशिष्ट भाषा एवं संस्कृति को मानने वाला समाज है। इस विविधता का सम्मान होना चाहिए। आदिवासी समुदाय को उनकी विशिष्ट संस्कृति और जीवन शैली के आधार पर कोई भी राष्ट्र उनसे भेदभाव पूर्ण व्यवहार नहीं कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस तथ्य पर भी चिन्ता जतायी कि बाहरी समुदाय के द्वारा आदिवासी समुदाय के जल जंगल और ज़मीन के दोहन का एक ऐतिहासिक क्रम रहा है और फलस्वरूप आदिवासी समुदाय ने निरन्तर दर्द, दुःख, असहाय और अन्याय ही झेला है। राष्ट्र निर्माण के नाम पर भी आदिवासी समुदायों को हाशिए पर रखा जाता है। अनेक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में आदिवासी प्रतिनिधियों को बोलते सुना है की अनेक राष्ट्र अप्रत्यक्ष रूप से आदिवासियों को मानव जाती में ही नहीं गिनते हैं। यह सच्चाई है और मन में बड़ा आक्रोश भी होता है। वर्तमान में ‘ब्लैक लाइव्ज़ मैटर’ आन्दोलन इसका प्रमाण है।

    संयुक्त राष्ट्र संघ, आदिवासियों के विशिष्ट संस्कृति और जीवन शैली का सम्मान करती है और विभिन्न राष्ट्रों से अपेक्षा करती है कि अन्तर राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद संघियों, समझौतों एवं अन्य प्रावधानों के अनुरूप अपने अपने राष्ट्र में आदिवासियों के इन अधिकारों का सम्मान करें।

    संयुक्त राष्ट्र संघ ने यह भी कहा है कि आदिवासी देशज ज्ञान, संस्कृति और पारम्परिक प्रथा, सतत और न्यायसंगत विकास को अपनाती है जिसके कारण पर्यावरण का उचित प्रबंधन, संरक्षण और संवर्धन में आदिवासी समुदाय का विशेष योगदान रहता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने आदिवासी समुदाय को शिक्षा के अधिकार के विषय में भी (यूएनड्रिप) में विशेष उल्लेख किया है।

    संयुक्त राष्ट्र संघ ने आदिवासियों के अधिकार के लिए घोषणा पत्र में स्पष्ट रूप से कहा है कि संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुरूप, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार के अन्तर्राष्ट्रीय अनुबन्धों के अन्तर्गत, अन्तर्राष्ट्रीय नागरिक और राजनीतिक अधिकार के साथ-साथ वियना घोषणा को आधार मानते हुए आदिवासी समाज को आत्मनिर्णय और स्वशासन का अधिकार मिलना चाहिए। ऐसे में आदिवासी समाज स्वतन्त्र रूप से अपनी राजनीतिक स्थिति का निर्धारण कर सकेंगे और अपने आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास को स्वयं आगे बढ़ा सकेंगे।

    संयुक्त राष्ट्र संघ विभिन्न राष्ट्रों से अपील भी करती है कि वो अपने सम्बन्धित राष्ट्र में आदिवासी अधिकारों के प्रति संवेदनशील हों और आदिवासी समुदाय के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निष्ठापूर्ण निर्वाहन करे। संयुक्त राष्ट्र संघ ने (यूएनड्रिप) के अन्तर्गत यह भी आश्वासन दिया है की वो आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।

    इस घोषणा पत्र में कुल 46 अनुच्छेद हैं और रोचक बात ये हैं की ये सभी अनुच्छेद एक दूसरे के संपूरक हैं। वर्तमान चर्चा के लिए मैंने 5 बिन्दुओं को विशेष रूप से शामिल किया है। अनुच्छेद 1 में आदिवासी समुदाय को संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में मान्यता प्राप्त मानवाधिकार और मौलिक स्वतन्त्रता और मूलभूत स्वतन्त्रताओं के सभी प्रकार के अधिकारों का ज़िक्र है।

  1. पूर्व सूचना एवं दवाब मुक्त सहमति: संयुक्त राष्ट्र संघ ने आदिवासियों के अधिकार के लिए घोषणा पत्र में मूल रूप से अनुच्छेद 10, 19 और अनुच्छेद 32 (2) देशज समुदाय के ‘पूर्व सूचना एवं दवाब मुक्त सहमति’, के अधिकार की चर्चा करती है। अनुच्छेद 10 कहती है कि आदिवासी समुदाय को किसी भी हाल में अपने मूल निवास स्थान से जबरन नहीं हटाया जा सकता है। उनसे पूर्व सूचना एवं दवाब मुक्त सहमति के पश्चात ही उन्हें अन्यत्र पुनर्वास किया जा सकता है। ऐसी परिस्थिति में यह सरकार की जवाबदेही होगी कि उनका उचित पुनर्वास और मुआवजा सुनिश्चित करे। एक महत्वपूर्ण बात जो इस अनुच्छेद में वर्णित है, उसके अनुसार आदिवासी समुदाय को योजना समाप्ति के उपरांत मूल भूमि या वन आदिवासी समुदाय को पुनः वापस देने के प्रावधान की चर्चा करती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के आदिवासी घोषणा पत्र के अनुच्छेद 19 और 32 के अनुसार जब भी कोई विकासात्मक योजनाएँ कहीं लागू होंगी तो सर्वप्रथम वहाँ के लोगों को पूर्व सूचना एवं दवाब मुक्त सहमति के अनुरूप सार्वजनिक चर्चा करना अनिवार्य होगा और जब वहाँ के निवासी इस योजना पर अपनी सहमति और समर्थन देंगे तभी वह योजना उस क्षेत्र में कार्यान्वित हो सकती है

  1. सांस्कृतिक एवं धार्मिक अधिकार : अनुच्छेद 5 के अनुसार आदिवासी समाज को अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और धार्मिक रक्षा का अधिकार प्राप्त होगा। अनुच्छेद 8 (1) के अनुसार कोई भी अन्य समाज, आदिवासी समाज पर अपनी संस्कृति नहीं थोप सकता और ना ही जबरन सांस्कृतिक बदलाव के लिए दबाव डाल सकता है। अनुच्छेद 8 (2) (अ) के अनुसार, आदिवासी संस्कृति की रक्षा का दायित्व सरकार पर होगा और सरकार को इसे हर हाल में सुनिश्चित करना है। अनुच्छेद 31 (1) आदिवासी देशज ज्ञान से सम्बन्धित है जो आदिवासी समुदायों को अपने पारम्परिक ज्ञान को प्रचार, प्रसार और संवर्धन का अधिकार प्रदान करती है।
  2. आत्मनिर्णय और स्वशासन का अधिकार: घोषणा पत्र के अनुच्छेद 3 और 4 में आदिवासी समुदाय को आत्मनिर्णय और स्वशासन का अधिकार प्राप्त है। अनुच्छेद 5 में आदिवासी समुदाय को अपने विशिष्ट रूढ़ि परम्परा और शासन व्यवस्था को पालन करने का अधिकार है। अनुच्छेद 18 के अनुसार, सरकार को, आदिवासी समुदाय को उन सभी मामलों में निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना होगा जिनसे उनके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। सरकार एकतरफ़ा निर्णय नहीं ले सकती है।
  3. भूमि वन और जल संसाधनों पर अधिकार : अनुच्छेद 8 (2) (ब) के अनुसार सरकार पर किसी भी प्रकार के आदिवासी विस्थापन को रोकने का दायित्व होगा। आदिवासी को उनकी इच्छा के विपरीत उनके पारम्परिक जल जंगल ज़मीन से बेदख़ल नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार का अधिकार हम अनुच्छेद 10 में भी देखते हैं जिसकी चर्चा पहले ही किया जा चुका है। अनुच्छेद 25, आदिवासी समुदाय को अपनी पारम्परिक आदिवासी धर्म और प्रकृति के बीच संबंध को मान्यता, संरक्षण और संवर्धन का अधिकार प्रदान करती है। अनुच्छेद 26 (1) अनुसार आदिवासी समुदाय का अपने भूमि, वन और जल संसाधनों पर सम्पूर्ण अधिकार होगा। वहीं अनुच्छेद 26 (2) में आदिवासियों के पारम्परिक संसाधनों के नियन्त्रण एवं इस्तेमाल पारम्परिक तौर तरीक़े से करने का अधिकार निहित है। अनुच्छेद 26 (3) कहती है कि यह सरकार का दायित्व होगा कि वो आदिवासी समुदाय को उनके भूमि वन और जल संसाधनों पर अधिकार को कानूनी मान्यता और संरक्षण देंगे।
  4. शैक्षिक अधिकार: अनुच्छेद 14 (1) और 14 (3) यह अधिकार प्रदान करता है कि आदिवासी समुदाय के बच्चों को उनकी मातृभाषा में ज्ञान अर्जित करने का हक़ है। सरकार को ये दिशा निर्देश भी है कि वो इस प्रकार के अधिकार को आदिवासी समुदाय को सुनिश्चित कराए।

    अनुच्छेद 37 आदिवासियों के अधिकार के लिए संयुक्त राष्ट्र का घोषणा पत्र का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अनुच्छेद है। इस अनुच्छेद के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र का आदिवासियों के अधिकार के लिए घोषणा पत्र के किसी भी अनुच्छेद में किसी भी तरह से अन्तर्राष्ट्रीय संघि, समझौते या अन्य प्रावधानों को कमजोर या कमजोर करने की मंशा नहीं रखता है। किसी भी अनुच्छेद का आकलन इन अन्तर्राष्ट्रीय संघि, समझौते या अन्य प्रावधानों को कमजोर करने की दृष्टिकोण से नहीं किया जाना चाहिए।

भारत के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के लिए घोषणा पत्र और इसकी सार्थकता

    इतनी चर्चा के पश्चात अब हम धरातल की सच्चाई से भी अवगत हो लें। संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के लिए घोषणा पत्र क़ानूनी रूप से किसी राष्ट्र को बाध्य नहीं कर सकता है। यह एक बहुत बड़ी विडम्बना है। यहाँ संयुक्त राष्ट्र एक दंत हीन और विष रहित सर्प के जैसा प्रतीत होता है, जो डरा तो सकता है किन्तु हानि नहीं पहुँचा सकता।

 यह किसी राष्ट्र पर निर्भर करता है की जब वह संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के लिए घोषणा पत्र को अपने देश में अंगीकृत कर लेता है तो उसका अनुपालन किस प्रकार से करेगा। किन्तु निराश होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा देखा गया है कि जिन राष्ट्रों ने इसे अंगीकृत किया है उनपर एक नैतिक दबाव बन जाता है। एक प्रकार से घोषणा पत्र का अंगीकृत करना, उस राष्ट्र की नैतिक ज़िम्मेदारी बन जाती है और इसका अनुपालन करना अप्रत्यक्ष रूप से उस पर वैश्विक दबाव बनाता है। संयुक्त राष्ट्र के अनेक सम्मेलनों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आदिवासियों की स्तिथि पर चर्चा की जाती है और मानवाधिकारों के मापदंड का आकलन इन्हीं कारकों के आधार पर एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र का करते हैं और उस देश की छवि उसी प्रकार से बनती है।

    भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के लिए घोषणा पत्र के समर्थन में वोट किया था किन्तु भारत का हमेशा से कहना है की उनके देश में सभी नागरिक मूलवासी और आदिवासी ही हैं। इसलिए भारत मानता है कि ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के लिए घोषणा पत्र को अंगीकृत करना या नहीं करना लगभग बराबर है। भारत के पक्ष को समझने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन के 2 महत्वपूर्ण कन्वेन्शन को जानना निहायत आवश्यक है। अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन के कन्वेन्शन संख्या 107 जो वर्ष 1957 में आयी थी और कन्वेन्शन संख्या 169 जो वर्ष 1989 में आयी थी।

    अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आइएलओ) कन्वेन्शन 107 में जनजाति शब्द का ज़िक्र है। भारत ने इस कन्वेन्शन को अंगीकृत किया था क्योंकि भारत ने अनुसूचित जनजाति को संवैधानिक अधिकार और मान्यता पहले से ही दिया हुआ था। इस अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आइएलओ) कन्वेन्शन 107 के अनुसार भारत को किसी भी प्रकार के अतिरिक्त अधिकार आदिवासी समुदाय को देने की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए भारत ने इस कन्वेन्शन को बिना हिचक के अंगीकृत कर लिया था।

    वहीं जब अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आइएलओ) कन्वेन्शन 169, वर्ष 1989 में आयीं तो उसमें देशज और आदिवासी समुदाय के अधिकारों का ज़िक्र था। और इसमें ऐसे अनेक प्रावधान और अधिकारों का ज़िक्र था जो आदिवासी समुदाय को पूर्व सूचना एवं दवाब मुक्त सहमति, आत्मनिर्णय और स्वशासन का अधिकार, भूमि वन और जल संसाधनों पर अधिकार, रूढ़िवादी सांस्कृतिक एवं धार्मिक अधिकार, शिक्षा का अधिकार और अन्य ऐसे अनेक प्रकार के अधिकार देने की बात कर रहे थे जो सरकार को असहज स्तिथि में डाल देतीं। उपरोक्त अधिकारों में से ऐसे अनेक अधिकार थे जिस से सरकार को भारी आर्थिक नुक़सान हो सकती था क्योंकि आज भी अनेक प्राकृतिक संसाधन आदिवासी समुदाय के संरक्षण में उनके क्षेत्रों में बची हुई है और शायद उनके दोहन के बिना राष्ट्र निर्माण सम्भव नहीं है।

    इस पर भी बहुत बहस हुई थी की देशज आदिवासी किसे मानेंगे और उसकी क्या परिभाषा होगी। ज़ोस आर मार्टिनेज़ कोबो ने देशज आदिवासी शब्द को परिभाषित किया है। सरल रूप में, देशज आदिवासी समाज हम उन्हें कहेंगे जो किसी एक निवास स्थान में आदिकाल से निवास करते आए हैं। उनके पूर्वजों ने उनके निवास स्थान को सर्वप्रथम प्राकृतिक रूप से बदलकर द्वितीयक वातावरण में परिवर्तित किया। इसमें निवास और खेती के लिए भूमि निर्माण शामिल था। यह क्षेत्र पारम्परिक और ऐतिहासिक रूप से आदिवासी देशज समाज की धरोहर मानी जाती है। प्रायः यह क्षेत्र किसी भी प्रकार के बाहरी आक्रमण या औपनिवेशिक शक्ति के आगमन के पहले से स्थापित समाज हैं। ऐसे समाज की विशिष्ट भाषा, विशिष्ट संस्कृति और विशिष्ट जातीय पहचान होती है जो मुख्य धारा की समाज से भिन्न होती है। ऐसे विशेषताओं वाले समाज को ही हम देशज आदिवासी समाज कहेंगे। जैविक विविधता के कन्वेन्शन के अनुच्छेद संख्या 8 (ज) में भी देशज आदिवासी समाज को इसी तरह परिभाषित किया गया है।

    भारत अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में हमेशा ये पक्ष रखता है की भारत देश में आदि काल से ही असंख्य आक्रमण होते आए हैं और ऐसे में यह बता पाना कठिन है कि कौन सा समुदाय अपने प्रारम्भिक काल से किस स्थान का निवासी है या देशज आदिवासी है। ऐसे में किसी समुदाय को यहाँ का देशज आदिवासी या मूलवासी कहना कठिन होगा। इसलिए भारत के सभी निवासी देशज हैं। दूसरा दलील जो भारत देता आया है, उसके अनुसार भारत के अनुसूचित जनजातियों को पहले से ही अनेक सुरक्षात्मक और विकासात्मक प्रावधान दिए हुए हैं, इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के लिए घोषणा पत्र के अन्तर्गत अधिकारों की आवश्यकता नहीं है। आदिवासियों के लिए विभिन्न मौलिक अधिकार, 5 वीं और 6 ठी अनुसूची के अधिकारों, पेसा क़ानून इत्यादि की दुहाई दी जाती है। एक बड़ा मौलिक प्रश्न है कि जब इतने सारे सक्षम प्रावधान हैं ,तब भी आज आदिवासियों की विषम परिस्थिति क्यों है? जब इस सवाल का जवाब मिल जाए तभी आप आदिवासी दिवस को सार्थक समझें अन्यथा संघर्ष जारी रखें

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