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स्मृति शेष

लोक को समर्पित एक जीवन्त लेखक डॉ. बलदेव

 

डॉ. बलदेव हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य लेखन की दुनिया के एक व्यापक भूगोल का हिस्सा बने रहे। आजीवन सृजन रत रहकर उन्होंने साहित्य की अनवरत सेवा की। एक साहित्यकार होने की वजह भर से ही मेरा सम्बन्ध उनसे नहीं था बल्कि वे मेरे लिए एक संरक्षक की तरह भी थे। वे मेरे प्राचार्य रहे। एक अध्यापक के रूप में उनके अधीन काम करने का कुछ दिनों तक मुझे अवसर भी मिला, फिर बाद में जाकर उनके घर के निकट जब मेरा भी घर बना तो एक तरह से वे मेरे पड़ोसी भी बन गये। मैं दूसरी पीढ़ी का था इसलिए उनके साथ मेरे पिता तुल्य सम्बन्ध थे। मैं उन्हें बलदेव चाचा के नाम से पुकारता रहा। दो अलग-अलग पीढ़ी के होने के बावजूद विचारों में खुले पन की वजह से हमारे बीच मित्रवत सम्बन्ध रहे, पर यह सम्बन्ध हमेशा मर्यादा की परिधि के भीतर ही बना रहा। वे जब भी कुछ बात कहते या कुछ करते तो सचेत रहते कि अपने पुत्र तुल्य दूसरी पीढ़ी के लड़के के साथ वे बातें कर रहे हैं। वे बात-बात में कहते कि तुम तो मेरे बेटे की तरह हो, तुमसे मैं क्या कहूं।

एक लम्बे समय तक मेरा उनका साथ बना रहा। इस दरमियान मैं जब अपने पुराने मकान को छोड़कर नयी कालोनी श्रीकुंज में शिफ्ट हो गया तो मेरे दूर चले जाने का उन्हें थोड़ा दुख भी हुआ। तब भी समय बेसमय उनके यहाँ मैं आता जाता रहा। मैं जब भी पहुंचता चाचा-चाची सब काम छोड़कर मेरे पास बैठ जाते और अपना सुख-दुख साझा करने लगते। उनके जीवन में कई किस्म के पारिवारिक उतार चढ़ाव भी आए पर उनका उन्होंने डटकर सामना भी किया।

उनकी सहजता का एहसास सिर्फ उन लोगों को ही हो सका जो उनके करीब रहकर उन्हें जान सके। उनकी इसी सहजता का कई लोगों ने बेजा लाभ भी उठाया और उन्हें बदनाम भी किया पर उन्होंने अंततः सबको माफ कर दिया। बाद में जाकर उनका जब स्वास्थ्य बिगड़ा तो वे घर में ही बंधे रह गये। एक घूमने फिरने वाला स्वतंत्र आदमी जब घर में बन्ध जाए तो उसकी हालत क्या हो जाती होगी यह आप समझ सकते हैं।

आखरी दिनों में बलदेव चाचा की स्थिति भी कुछ-कुछ वैसी ही हो गयी थी। मैं जब भी उनके घर जाता ,कुर्सी पर अक्सर टीवी पर पुराने पिक्चर देखते हुए वे मिलते। मेरे पहुंचते ही टीवी बन्द कर देते और चाची से कहते कि रमेश के लिए चाय बनाओ। मैं मना करता तो कहने लगते कि तुम्हारे बहाने मुझे भी एक कप चाय पीने को मिल जाएगी। चाची यह बात जानती समझती थीं। घर में रह रहकर उनका पाचन तंत्र शिथिल होता जा रहा था पर वे खान पान को लेकर अंत तक बेपरवाह रहे। उन्होंने जिन्दगी को अपनी तरह से जिया और ऐसा जिया कि उनकी वजह से किसी को कोई तकलीफ न हुई।

एक बार मैं डॉ. बलदेव के साथ सृजन सम्मान के कार्यक्रम में रायपुर गया था। उनदिनों रायगढ़ के सबसे पुराने पत्रकार अनुपम दास गुप्ता एमएमआई रायपुर में भर्ती थे और अपने जीवन की अंतिम सांसें गिन रहे थे। तत्कालीन शिक्षा मंत्री सत्यनारायण शर्मा की पहल पर सृजन सम्मान के मंच से अनुपम दास गुप्ता के लिए कुछ आर्थिक सहायता की घोषणा हुई थी जिसे पहुंचाने के लिए बलदेव चाचा तत्कालीन राज्य मंत्री दर्जा प्राप्त लक्ष्मण मस्तुरिया के साथ मैं एमएमआई गया और अनुपम दास गुप्ता को वह राशि उनके माध्यम से भेंट की गयी। वह एक मार्मिक और दुखद क्षण था।

कुछ दिनों बाद ही पत्रकार अनुपम दास गुप्ता जी चल बसे थे। समय बीत जाने के बाद अब तो लक्ष्मण मस्तुरिया और बलदेव चाचा भी नहीं रहे। उनकी संगति की अनेक स्मृतियां भर बची रह गयी हैं। उनकी पीढ़ी के ज्यादातर लोगों से जिनमें रवि श्रीवास्तव, परदेसी राम वर्मा, बसन्त देशमुख, पवन दीवान इत्यादि प्रमुख हैं, मेरा परिचय बलदेव चाचा के माध्यम से ही हुआ था। चाहे भिलाई होटल में आयोजित दुर्ग जिला साक्षरता समिति का पुस्तक लेखन वर्कशॉप हो या एस.सी.ई.आर.टी.का बाईलिंगवल डिक्शनरी लेखन वर्कशॉप हो, मैं उनके साथ रहकर काम किया।

विश्वबोध तथा छायावाद एवं श्रेष्ठ निबन्ध नामक अपने सम्पादित पुस्तकों के माध्यम से पद्मश्री मुकुटधर पांडेय के समूचे साहित्य को जनचर्चा में लाने का श्रेय डॉ. बलदेव को तो जाता ही है, साथ ही साथ लोकाक्षर पत्रिका को बतौर लेखक साझा सहयोग प्रदान कर छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्ध करने के लिए भी उन्होंने बड़ा योगदान दिया। छत्तीसगढ़ी कवियों की कविताओं को पुस्तक के रूप में संग्रहित करके भी उन्होंने एक ऐतिहासिक एवं उल्लेखनीय कार्य किया।

इन सबसे हटकर मुझे लगता है कि वे हिन्दी के एक प्रतिभावान कवि थे। सिसरिंगा की घाटी पर, समुद्र सीरीज पर, पचमढ़ी सिरीज पर लिखी गयी उनकी कविताएं इसके जीवंत प्रमाण हैं। “बृक्ष में तब्दील हो गयी औरत” “खिलना भूलकर” उनके चर्चित काव्य संग्रह हैं। पत्र पत्रिकाओं में अपनी कविताओं को प्रकाशित करने को लेकर अगर वे सजग रहते तो संभव है उनकी कविताओं को एक ब्यापक स्पेस मिलता और उन पर अधिक चर्चा हो पाती। डॉ. बलदेव की कविताएं आम जनजीवन के दुख दर्द का प्रतिनिधित्व करती हुईं अपनी जन सरोकारिता के इतिहास को लिख कर चली गयीं। इन कविताओं को पढ़ते हुए रायगढ़ के एक समृद्ध कवि की यादें आज भी ताजा हो उठती हैं।

 छत्तीसगढ़ ग्रंथ अकादमी द्वारा प्रकाशित किताब “रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव” भी उनकी महत्वपूर्ण कृति है जिसके माध्यम से रायगढ़ की संस्कृति से छत्तीसगढ़ के कालेज के छात्र-छात्राओं और आम लोगों का परिचय रायगढ़ घराने से हो सका। इसके अलावा उन्होंने विश्वरंजन जी की कविताओं का छत्तीसगढ़ी अनुवाद भी किया जो पुस्तक के रूप में पाठकों तक पहुंचा। जनकवि आनंदी सहाय शुक्ल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर उन्होंने ढाई आखर नाम की किताब भी लिखी जो चर्चा में बनी रही।

रायगढ़ के संगीत घराने को लेकर भी उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण काम किए और उनका दस्तावेजीकरण कर रायगढ़ कत्थक घराने को एक नयी पहचान देने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। एक अच्छा लेखक जो अपनी मीठी बातों से युवा पीढ़ी को बांध लेता था, उसने युवाओं से, बच्चों से खूब प्यार भी किया। वह प्यार ही आजीवन उनकी पूँजी रही। जन्म तिथि 27 मई को उन्हें याद करना हमें एक नयी रचनात्मक खुशी देता है

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