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राही मासूम रज़ा
शख्सियत

एक अज़ीम शख़्सियत थे राही मासूम रज़ा

 

राही मासूम रज़ा के सबसे बड़े आलोचक प्रो. कुँवर पाल सिंह से मिलने अलीगढ़ जाना चाहता था। उनसे मिलना सिर्फ इसलिए नहीं चाहता था कि वे राही मासूम रज़ा के सबसे बड़े आलोचक हैं बल्कि इसलिए भी कि वे उनके सबसे अच्छे दोस्त रहे हैं। राही मासूम रज़ा ने 1966 ई. में अपना पहला और सबसे चर्चित हिन्दी उपन्यास ‘आधा गाँव’ अपने इन्हीं ‘पूरे दोस्त’ कुँवर पाल सिंह के नाम समर्पित किया था। मग़र दूरभाष पर कुँवर पाल सिंह से हुई बातचीत के बाद सबसे पहले मेरा गंगौली जाना तय हुआ। गंगौली राही मासूम रज़ा का गाँव है। यह न सिर्फ उनका एक गाँव है बल्कि यह राही मासूम रज़ा का ‘आधा गाँव’ भी है। मैंने उनके ‘आधा गाँव’ को कागज के सफों पर पढ़ा था, अब हक़ीकत में देखने जाना था।

वास्तव में गंगौली के ढ़ेर सारे किस्से-कहानियों से पहले ही वाकिफ़ हो चुका था, कुछ तो ‘आधा गाँव’ के जरिये और कुछ दूसरे जरियों से। दूसरे जरियों में ‘अभिनव कदम’ पत्रिका का राही मासूम रज़ा विशेषांक की अव्वल भूमिका रही थी। इस विशेषांक का संपादन राही मासूम रज़ा की पचहतरवीं सालगिरह पर मऊ, उत्तर प्रदेश से जय प्रकाश ‘धूमकेतु’ जी ने किया था। कुँवर पाल सिंह ने तब तक राही मासूम रज़ा की अप्रकाशित कृतियों का संपादन अवश्य किया था, मगर राही मासूम रज़ा पर उनकी कोई विधिवत आलोचनात्मक किताबें सामने नहीं आयी थीं।

बाद में, शिल्पायन प्रकाशन से ‘राही और उनका रचना-संसार’ तथा साहित्य अकादमी से भारतीय साहित्य के निर्माता श्रृंखला के तहत ‘राही मासूम रज़ा’ नाम की दो किताबें आयीं। ऐसे में, राही मासूम रज़ा के पाठकों के लिए ‘अभिनव कदम’ का यह विशेषांक विशेष महत्व की चीज था। धूमकेतु जी को शुक्रिया कि उन्होंने मेरे लिए यह विशेषांक न केवल दीं, बल्कि इस बेशकीमती चीज को उपहार में दीं। इसके साथ, एक यह भी याद जुड़ी हुई है कि इस विशेषांक को मेरे लिए हासिल करने में बक्सर के नरेंद्र जी को काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। उन्हें बक्सर से मऊ और मऊ से पटना की कठिन यात्रा में काफ़ी कष्ट उठाना पड़ा था। इसके लिए नरेंद्र जी का आज भी हृदय से शुक्रगुज़ार हूँ।

यह गंगौली थी। एक मस्ज़िद के सामने मुहम्मदाबाद-कासिमाबाद मुख्य मार्ग पर बस से उतर गया। बस से उतरते ही इत्मीनान के लिए एक बार चहुँ ओर नजरें दौड़ाई। थोड़ी दूर आगे गाँव की ओर जाने का एक रास्ता दिखा और उसे पकड़कर धीरे-धीरे गाँव की ओर बढ़ने लगा। कुछ दूर चलने के बाद गाँव की गलियां शुरू हो रही थीं। एक गली पकड़कर आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ने लगा। गली में हर तरफ से खट खट खट खट की आवाजें आ रही थीं। ये आवाजें मेरे लिए बिल्कुल नयी थीं। इनके स्रोत का अनुमान करना भी मेरे लिए गलत साबित हुआ। चूंकि इनसे मिलती-जुलती आवाजें प्रिंटिंग मशीनों की सुन रखी थीं, इसलिए मैंने यह अनुमान लगाया कि ये आवाजें प्रिंटिंग मशीनों की हो सकती हैं। मगर शहर से दूर एक गाँव के इतने घरों में एक साथ इतनी प्रिंटिंग मशीनों के चलने का क्या औचित्य ! फिर एक बुजुर्ग से पूछ बैठा। जवाब मिला कि ये खट खट खट खट की आवाज़ें चलते हुए करघों की हैं।

बुनकरों की गंगौली देखकर पल भर के लिए कबीर की याद आयी। आखिर वे भी तो इसी इलाके के जुलाहे थे ! गंगौली की इन तंग गलियों को घूमते-घामते प्रधान साहब के दरवाज़े पहुँचा। यह फाटकों वाला मुहल्ला है। सैय्यदों की एक पट्टी। राही मासूम रज़ा वल्द सैय्यद बशीर हसन आब्दी का पुश्तैनी दरवाज़ा। यहाँ से ही उत्तर पट्टी और दक्खिन पट्टी के बीच पसरी ‘आधा गाँव’ की कथा-भूमि देखने की शुरुआत करनी थी। नील गोदाम और नूरुद्दीन शहीद के मक़बरे को देखना था। फुन्नन मियाँ, गया अहीर, झांगटिया बो और उन सबकी हक़ीक़त समझनी थी जो भले-बुरे रूपों में ‛आधा गाँव’ की हलचल में शामिल थे।

उस मजलिस को भी समझनी थी जिसमें आदि से अंत तक मुहर्रम की मर्सिया सुनाई पड़ती है। परंतु सबसे अधिक मुझे ‛आधा गाँव’ के ‛मासूम’ को जानना था। मासूम यानी राही मासूम रज़ा। फाटक वालों ने राही मासूम रज़ा के संबंध में बहुत बातें कीं और कुछ ऐसी भी बातें बतायीं जिनके सच होने में संदेह रहा। हाँ, रोमांचित करने वाली एक बात यह हुई कि ‛आधा गाँव’ के कुछ किरदारों से भी मिलना नसीब हुआ। इन किरदारों के साथ कुछ युवकों ने मुझे अपने साथ लेकर ‛आधा गाँव’ की कथा-भूमि को काफ़ी हद तक देखने-समझने में गाइड की भूमिका निभायी। इस तरह गंगौली को देखते-समझते आख़िरकार ग़ाज़ीपुर के लिए रवाना हो गया।

गंगौली राही मासूम रज़ा का गाँव है और ग़ाज़ीपुर उनका शहर। यह शहर उनके जीवन का प्रस्थान-बिंदु भी है। वे ‛आधा गाँव’ में ग़ाज़ीपुर के संबंध में कहते हैं कि ‛यह मेरा शहर है। मैं जब भी अपने शहर की गलियों से गुज़रता हूँ, यह मेरे कंधे पर हाथ रख देता है। मेरी छोटी-छोटी कहानियों के रास्ते पर मुझे जगह-जगह मिलता है। परंतु इसकी संपूर्ण वास्तविकता अब तक मेरे काबू में नहीं आयी है, इसलिए इसे एक बार फिर देखना चाहता हूँ।’ वे अपने शहर ग़ाज़ीपुर को इसलिए भी देखना चाहते हैं कि उनका ‛यह शहर इतिहास से बेख़बर है, इसे इतनी फ़ुरसत ही नहीं मिलती कि कभी बरगद की ठंडी छाँव में लेटकर अपने इतिहास के विषय में सोचे; जो रामायण से आगे तक फैला हुआ है।’ ग़ाज़ीपुर शहर गंगा के किनारे बसा है और गंगा के उस पार का इलाका बक्सर का इलाका है।

इसलिए वे कहते हैं कि ‛यह संभव नहीं कि अगर अब भी इस किले की पुरानी दीवार पर कोई आ बैठे और अपनी आँखें बंद कर ले तो उस पार के गाँव और मैदान और खेत घने जंगलों में बदल जाएँ और तपोवन में ऋषियों की कुटियाँ दिखाई देने लगें। और वह देखे कि अयोध्या के दो राजकुमार कंधे से कमानें लटकाये तपोवन के पवित्र सन्नाटे की रक्षा कर रहे हैं।’ मग़र ग़ाज़ीपुर के इस पुराने किले की दीवारों पर अब कोई बैठता ही नहीं। वे कहते हैं कि इस ‛किले की दीवार पर अब कोई पहरेदार नहीं घूमता, न ही उनतक कोई विद्यार्थी ही आता है, जो डूबते हुए सूरज की रोशनी में चमचमाती हुई गंगा से कुछ कहे या सुने। गँदले पानी की इस महान धारा को न जाने कितनी कहानियाँ याद होंगीं।…गंगा के किनारे न जाने कब से मेल्हते हुए इस शहर को इसका ख़्याल भी नहीं आता कि गंगा के पाठशाले में बैठकर अपने पुरखों की कहानियाँ सुनें।’

हिंदुस्तान में शहरों, बाजारों, मुहल्लों, सड़कों, इमारतों और स्टेशनों के नाम बदलने की अब एक नयी रवायत शुरू हुई है। इसकी भनक राही मासूम रज़ा को आधी सदी पहले लग गयी थी। शायद इसीलिए वे ‛आधा गाँव’ में अपने इस उँघते शहर ग़ाज़ीपुर के इतिहास का एक दिलचस्प परिच्छेद उद्घाटित करते हैं। ग़ाज़ीपुर के बारे में ‛कहते हैं कि आषाढ़ की एक काली रात में तुगलक के एक सरदार सय्यद मसउद ग़ाज़ी ने बाढ़ पर आयी गंगा को पार करके गादिपुरी पर हमला किया। चुनाँचे यह शहर गादिपुरी से ग़ाज़ीपुर हो गया। रास्ते वही हैं, गलियाँ भी वही रहीं, मकान भी वही रहे, नाम बदल गया।’ इसी तरह वे अपनी गंगौली के नाम का भी इतिहास लिखते हैं कि ‛मसऊद ग़ाज़ी के एक लड़के, नूरुद्दीन शहीद ( यह शहीद कैसे और क्यों हुए, यह मुझे नहीं मालूम और शायद किसी को नहीं मालूम) दो नदियां पार कर के ग़ाज़ीपुर से कोई बारह-चौदह मील दूर, गंगौली को फ़तह किया।

कहते हैं इस गाँव के राजा का नाम गंग था और उसी के नाम पर इस गाँव का नाम गंगौली पड़ा। लेकिन इस सैय्यद ख़ानदान के पाँव जमने के बाद भी इस गाँव का नाम नूरपुर या नूरुद्दीन नगर नहीं हुआ-मेरी गंगौली का नाम मेरे ग़ाज़ीपुर से बुरा नहीं।’ इसी सिलसिले में वे कहते हैं कि ‛नाम शायद एक ऊपरी खोल होता है जिसे बदला जा सकता है। नाम का व्यक्तित्व से कोई अटूट रिश्ता नहीं होता शायद। क्योंकि यदि ऐसा होता तो ग़ाज़ीपुर बनकर गादिपुरी को भी बदल जाना चाहिए या फिर कम-से-कम इतना होता कि हारने वाले ठाकुर, ब्राह्मण, कायस्थ, अहीर, भर और चमार अपने को गादिपुरी कहते और जीतने वाले सय्यद, शेख और पठान अपने को ग़ाज़ीपुरी। परंतु ऐसा नहीं हुआ। सब ग़ाज़ीपुरी हैं और शहर का नाम न बदला होता तो सब गादिपुरी होते।’ वे आगे कहते हैं कि ‛गंगा इस ग़ाज़ीपुर को भी उसी तरह सीने से लगाये हुए है जिस तरह वह गादिपुरी को लगाए हुए थी। इसलिए नाम गादिपुरी हो या ग़ाज़ीपुरी। कोई फ़र्क नहीं पड़ता।’

राही मासूम रज़ा

मैं ग़ाज़ीपुर में था। स्वामी सहजानंद सरस्वती, अब्दुल हमीद और राही मासूम रज़ा का शहर ग़ाज़ीपुर। सबेरे-सबेरे बशीर साहब की कोठी में दाख़िल हुआ। बशीर साहब यानी राही मासूम रज़ा के अब्बा सैय्यद बशीर हसन आब्दी। इसी कोठी में उनका बचपन गुजरा था और इसी में वे युवा भी हुए थे। राही मासूम रज़ा की बहन मुन्नी मेरे सामने थीं। पल भर के लिए लगा कि ख़ुद राही मासूम रज़ा से मुख़ातिब हूँ। असल में उनकी सूरत और कद-काठी काफ़ी हद तक राही साहब से मिलती-जुलती थी। उन्होंने बेहद स्नेह के साथ बातचीत शुरू कीं। राही साहब की ग़ाज़ीपुर, गंगौली, अलीगढ़ और मुम्बई के ढ़ेर सारे किस्से ! अलीगढ़ और मुंबई की कुछ बातों से वे नावाक़िफ़ मालूम पड़ती थीं, मग़र उनके ज़ेहन में उनके बचपन की कुछ दिलचस्प स्मृतियाँ थीं। राही साहब के नौ भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं सल्लन। वे उसी तीन आंगन और चौबीस कोठरी वाली बशीर साहब की कोठी में एक लम्बी उम्र के साथ अस्वस्थ्य चल रही थीं। उनसे भी राही साहब के ग़ाज़ीपुर से जुड़ी अनेक बातें हुईं। एक पहर तक आत्मीय बातचीत का सिलसिला चला, फिर राही मासूम रज़ा की दोनों बहनों से विदा ले कर आगे के लिए निकल पड़ा।

ऐसा लग सकता है कि गंगौली और बशीर साहब की कोठी के ज़िक्र में कोई महत्व की बात नहीं हुई है। ऐसा लगना शायद स्वाभाविक भी हो। लेकिन राही मासूम रज़ा पर कायदे की कोई बात करने से पहले मामूली-सी जान पड़ने वाली गंगौली और बशीर साहब की कोठी का ज़िक्र बेहद ज़रूरी है क्योंकि ये ही वे प्लेटफॉर्म हैं जिनसे उन पर विधिवत बात करने के लिए आगे निकला जा सकता है।

अब पब्बर राम से मिलने जाना था। वे ग़ाज़ीपुर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बहुत पुराने लीडर थे। महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन से भी वे जुड़े थे। लेकिन उनका अधिकतर जुड़ाव क्रांतिकारी आंदोलनों के साथ रहा था। आज़ादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों ने आंकुशपुर ट्रेन डकैती की योजना को पब्बर राम के ही नेतृत्व में अंजाम दिया था। बाद में पब्बर राम ने सन् 1957 ई. और सन् 1967 ई. में दो बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से उत्तर प्रदेश की विधान सभा में ग़ाज़ीपुर का प्रतिनिधित्व भी किया था। राही मासूम रज़ा और उनके बड़े भाई मुनीस रज़ा दोनों ही ग़ाज़ीपुर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के छात्र संगठन से जुड़े थे। इसलिए उनसे राही मासूम रज़ा के गहरे सरोकार थे। मुनीस रज़ा बाद में देश के प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों में शुमार हुए और वे इंदिरा गांधी के बेहद करीबी भी माने जाते थे।

बात सन् 1953 ई. की है। नगरपालिका का सीधा चुनाव घोषित हुआ। इससे पहले परोक्ष चुनाव हुआ करता था। इस बार जनता को अपना अध्यक्ष चुनने का अवसर मिला था। पब्बर राम ग़ाज़ीपुर नगरपालिका के अध्यक्ष पद के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार घोषित किये गये, त्रिलोकीनाथ दत्त जनसंघ के उम्मीदवार और राही मासूम रज़ा के अब्बा बशीर हसन आब्दी कांग्रेस के उम्मीदवार घोषित किये गये। बशीर साहब जमींदार तो थे ही, उस पर अलग से वे पूर्वी उत्तर प्रदेश में दीवानी मामलों के सबसे बड़े वकील माने जाते थे। अपने अब्बा का कांग्रेस का उम्मीदवार होना राही मासूम रज़ा को नागवार ग़ुज़र रहा था। इसलिए उन्होंने कांग्रेस की उम्मीदवारी वापस लेने के लिए अपने अब्बा से काफी मिन्नतें कीं। जब राही साहब अपने अब्बा को इसके लिए राजी कर पाने में असफल साबित हुए तो वे अपने बड़े भाई मुनीस रज़ा के साथ सीपीआई के उम्मीदवार पब्बर राम के पास गये। दोनों भाई पब्बर राम और सरयू राय को साथ लेकर कांग्रेस की उम्मीदवारी वापस कराने के लिए अब्बा के पास आये। मग़र बशीर साहब ने कांग्रेस के साथ वादाख़िलाफ़ी करने में अपनी असमर्थता ज़ाहिर कर दी। तब क्या था !

इस चुनाव ने एक अलग ही नज़ीर कायम की। राही साहब ने अपने अब्बा को पब्बर राम के सामने ही कह दिया कि जब आप कांग्रेस के साथ वादाख़िलाफ़ी नहीं कर सकते तो हम भला सीपीआई के साथ वादाख़िलाफ़ी कैसे कर सकते हैं ! राही साहब ने अपने अब्बा को यह ज़बान दे कर उसी दिन अपना घर छोड़ दिया कि जब तक आपको चुनाव में शिकस्त नहीं दे देते देते, तब तक घर वापस नहीं लौट सकते। राही मासूम रज़ा ने उसी दिन अपना घर छोड़ दिया। राही साहब अपने बड़े भाई मुनीस रज़ा के साथ मिलकर पब्बर राम की तरफ़दारी में और अपने अब्बा बशीर हसन आब्दी के ख़िलाफ़ चुनावी मुहिम में लग गये। वे नुक्कड़ सभाओं में भाषण देकर और ग़ज़लें गा कर चुनाव प्रचार करते। मुनीस रज़ा तो रात तक घर वापस लौट जाते लेकिन राही मासूम रज़ा अपने अब्बा को शिकस्त देने में दिन-रात एक करते रहे। आख़िर में कॉमरेड पब्बर राम की जीत हुई और कांग्रेस के बशीर हसन आब्दी की हार।

पब्बर राम के बिल्कुल पास बैठा था। बातचीत के लिए उनके इशारों का इंतज़ार कर रहा था। तब वे बेहद बीमार थे। मग़र कुछ देर बाद जब उनसे कहा गया कि आपसे मिलने कोई बिहार से आये हैं तब उन्होंने मेरी तरफ़ अपनी नज़रें घुमायीं और हल्की मुस्कान के साथ पूछा कि बिहार में कहाँ से आये हो ? मेरे परिचय के बाद उन्होंने किसान आंदोलन के दरम्यान मगध में अपनी सक्रियता और उनसे जुड़ी अनेक घटनाओं का ज़िक्र किया। पब्बर राम किसान आंदोलन से गहरे रूप में जुड़े हुए थे। फिर आने का मक़सद जानकर खिल उठे। राही मासूम रज़ा के संबंध में अनेक बातें बतायीं मग़र यहाँ उनमें एक का ज़िक्र किया जाना मुनासिब है।

यह बात सन् 1953 ई. की है। ग़ाज़ीपुर के मुहल्ला कोर्ट के ऊपर एक मस्ज़िद थी और मस्ज़िद से सटा एक स्कूल था। मस्ज़िद का गुंबद पुराना हो चला था जिसके स्कूल के ऊपर गिरने का खतरा बना हुआ था। ग़ाज़ीपुर नगरपालिका अध्यक्ष की हैसियत से पब्बर राम ने मस्ज़िद के गुंबद गिराने की नोटिस दी। मस्ज़िद का गुंबद गिरा भी नहीं था कि मस्ज़िद की जमीन हड़प लेने की नियत से केशवदेव रजगढ़िया नाम का एक मारवाड़ी मस्ज़िद की जमीन में नीव खोदवा कर हनुमान जी की मूर्ति निकलने का हंगामा खड़ा करवा दिया। नतीजतन ग़ाज़ीपुर में एक सामुदायिक बलवा खड़ा हो गया। इस बलवे को शांत करने में राही मासूम रज़ा ने जी-जान एक कर दी थी। बकौल पब्बर राम राही ने इस बलवे को शांत करने में अव्वल दर्जे की भूमिका निभायी थी।

राही मासूम रज़ा

राही मासूम रज़ा ने ग़ाज़ीपुर के छात्र जीवन में वामपंथी छात्र राजनीति और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़कर अनेक सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक गतिविधियों को अंजाम दे कर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। पब्बर राम कहते हैं कि अपने अब्बा को चुनाव में पराजित करने की प्रतिज्ञा पूरी कर राही मासूम रज़ा जब अपने अब्बा से मिले तो उनके अब्बा को उनसे कोई शिकायत नहीं थी बल्कि उन्हें अपने बेटे पर नाज़ था। इसलिए राही मासूम रज़ा को उन्होंने खुशी से अपने कलेजे से लगा लिया था। राही साहब की राजनीतिक और साहित्यिक रुचि पर वामपंथी प्रभाव ग़ाज़ीपुर में ही पड़ चुका था जो आजीवन बना रहा। वे इसके लिए अपना राजनीतिक गुरु अपने बड़े भाई मुनीस रज़ा को मानते थे।

राही मासूम रज़ा उर्दू में ऊँची पढ़ाई के लिए सन् 1955 ई. में ग़ाज़ीपुर से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय चले आते हैं। यहाँ वे एक दिलकश शायर के रूप में काफ़ी मशहूर हुए। कहते हैं कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय में लड़कियों के बीच घिरे रहने का साहस और सौभाग्य अलीगढ़ के शायद दो ही शायरों को हुआ। एक उर्दू के मशहूर शायर मज़ाज़ को जिनके नाम गर्ल्स हॉस्टल की लड़कियां रात होने पर अपने बंद कमरों में लॉटरी निकाला करती थीं और मज़ाज़ के पच्चीस-तीस साल बाद दूसरा शायर राही मासूम रज़ा हुए जिनके नाम लड़कियों की वो लॉटरी मंसूब हो गयी।

राही मासूम रज़ा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उर्दू में एम.ए. और पी-एच.डी. करने के बाद वहीं प्राध्यापक की नौकरी करना चाहते थे। वस्तुतः उन्होंने उर्दू विभाग में कुछ दिनों तक अस्थायी प्राध्यापक के तौर पर अध्यापन भी किया, मग़र सन् 1965 ई. में नैय्यर जहाँ से निकाह की वज़ह से उन्हें उर्दू विभाग से निकलना पड़ा। नैय्यर जहाँ कर्नल यूनुस खां के तीन बच्चों की माँ थीं। इस निक़ाह के चलते बड़े-बड़े लोग राही मासूम रज़ा के ख़िलाफ़ थे। मग़र राही साहब अपने फैसलों पर अडिग रहने वाले इंसान थे। वे कहा करते थे कि ‛मैं तीन माँओं का बेटा हूँ, एक नफ़ीसा बेगम जिनका साया बचपन में ही उठ गया और दूसरी माँ गंगा है और तीसरी माँ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी।’ आख़िरकार नैय्यर जहाँ प्रकरण के कारण इस तीसरी माँ का साया भी राही साहब के सिर से हमेशा के लिए उठ गया और उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छोड़नी पड़ी।

अलीगढ़ में उनके सबसे अज़ीज़ दोस्त थे कुँवरपाल सिंह। वे इन्हें के.पी. कहा करते थे। दोनों अलीगढ़ में वली मंजिल में काफ़ी दिनों तक साथ रहे थे। राही साहब ने कुँवरपाल सिंह के जोर पर ही ‛आधा गाँव’ उपन्यास लिखा। इस उपन्यास से राही साहब को काफ़ी प्रसिद्धि भी मिली। मग़र इस प्रसिद्धि से उन्हें कायदे का कोई काम नहीं मिल सका।

राही मासूम रज़ा सन् 1967 ई. की शुरुआत में नैय्यर जहाँ के साथ मुम्बई चले आते हैं। मुम्बई के शुरुआती दिनों में उन्हें काफ़ी मुसीबतों का सामना करना पड़ा था। सन् 1972 ई. में कुँवरपाल सिंह को लिखे ख़त में वे कहते हैं कि ‛यार के.पी. तुम और हद्दन न होते तो इन चार वर्षों में मेरी ज़िंदगी क्या होती, इसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता। हद्दन तो मेरा छोटा भाई है। तुम मेरे पूरे दोस्त हो। इस जन्म में तुम दोनों का क़र्ज़ उतारना मेरे लिए नामुमकिन है।’ इस समय तक उनकी रोजी-रोटी की समस्या हल हो चुकी थी। सन् 1974 ई. आते-आते तो राही साहब की गिनती मुम्बई के सफलतम संवाद और पटकथा लेखकों में होने लगी थी। मग़र उनके लिए सिनेमा से अधिक महत्व की चीज साहित्य था। वे कहते थे कि ‛फ़िल्म तो मेरी रोजी-रोटी है और साहित्य मेरा ओढ़ना-बिछौना है। साहित्य सृजन के बिना मैं जीवन की कल्पना नहीं रह सकता।’ सन् 1968 ई. से सन् 1970 ई. के बीच संघर्षों से भरे उन्हीं दिनों में उन्होंने टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी और ओस की बूंद जैसा अहम उपन्यास लिखा।

राही मासूम रज़ा

राही मासूम रज़ा की पहचान हिन्दी सिनेमा के सफल पटकथा और संवाद लेखक के साथ हिन्दी के एक मशहूर उपन्यासकार की है। उन्होंने तीन सौ से अधिक फिल्में लिखीं और हिन्दी में नौ बेहतरीन उपन्यासों की रचना की है। महाभारत धारावाहिक की पटकथा और संवाद लेखन के लिए तो वे विख्यात हैं ही, उन्हें अनेक काव्यों, ग़ज़लों और गीतों की रचना के लिए भी भरपूर ख्याति प्राप्त हुई है। उनके गुज़रने के बाद उनके अप्रकाशित व प्रकाशित लेखों का अनेक पुस्तकों के रूप में संपादन हुआ है।

राही मासूम रज़ा की चिंता के केंद्र में हिंदुस्तान की समन्वित संस्कृति है। इसके लिए वे हर जोखिम को उठाने के लिए तैयार थे। मुंबई में रह कर भी वे बाल ठाकरे और शिवसेना के ख़िलाफ़ पत्र-पत्रिकाओं में बेबाक़ औ बेख़ौफ हो कर लिखा करते थे। वे भाजपा और आरएसएस की जमकर मुख़ालफ़त करते थे। लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के विरोध में उन्हें पत्र लिखकर उनके कारनामों का विरोध किया था। अपने लेखन में वे कांग्रेस के भीतर की साम्प्रदायिक शक्तियों की सदैव कटु आलोचना किया करते। वे फ़िल्म राइटर्स एसोसिएशन में इंदिरा गांधी के आपातकाल का विरोध करने वाले एकलौता लेखक थे। जिस ताकत के साथ उन्होंने हिंदूवादी साम्प्रदायिकता का विरोध किया, उसी ताकत के साथ मुस्लिम साम्प्रदायिकता पर भी प्रहार किया था। वे हर क़िस्म की कट्टरता के विरोधी थे। इसलिए उनके लेखन का बहुत बड़ा हिस्सा साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ और हिंदुस्तान की साझी संस्कृति के पक्ष में है।

राही मासूम रज़ा आजीवन वामपंथी विचारधारा से जुड़े रहे। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता से उन्होंने किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। यही वज़ह है कि जब कभी ही सही, मग़र अब भी उनकी याद में उनकी गंगौली लाल झंडों से पट जाती है। राही मासूम रज़ा के स्कूल के सर्टिफिकेट में उनकी जन्मतिथि 1 सितम्बर, सन् 1927 ई. लिखी हुई है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उनकी अधिसंख्य किताबों में उनका जन्मदिन 1 सितम्बर ही है। इसलिए इसी तारीख को उनका जन्मदिन मनाया जाता है। एक प्रतिबद्ध वामपंथी लेखक और जन बुद्धिजीवी के रूप में राही मासूम रज़ा का नाम हमेशा अदब के साथ लिया जाता रहेगा

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