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रावण
प्रासंगिक

रावण न मरा है और न कभी मरेगा?

 

आज दशहरा है जिसे लोक में दसराहा भी कहा जाता है। दसराहा माने रावण। इसे परिष्कृत भाषा में विजयदशमी भी कहा जाता है। रावण को हर हाल में रहना है? रावण शरीर से गया है लेकिन अपनी असलियत से नहीं। रावण रावण है कोई लल्लू पंजू नहीं। उसकी माया और प्रताप का क्या कहना? उसके वंशज बहुत हैं। उसके वंशजों का विस्तार कुंभकर्ण, मेघनाद, कंस, हिटलर और मुसोलिनी भर के रूप में न देखें? वे पुतलों में खामोश हो गए हैं लेकिन अशरीरी होकर भी गजब ढा रहे हैं। रावणत्व कामदेव की तरह बिना देह के एक कार्यक्रम बनाकर सबको धड़ाधड़ आउट कर रहा है। विकास विकास चिल्ला रहा है और न जाने कितने रूपों में कार्यवाही कर रहा है। रावण की माया विचित्र है और उसके जीवित वंशज भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में छुट्टा सांडों की तरह घूम रहे हैं और लगातार दंहक रहे हैं? वे कस्बों, शहरों-महानगरों और चौपालों में नए तरह के कामों को अंजाम दे रहे हैं। राम का रामत्व हम तलाश रहे हैं नाम राम का लेते हैं लेकिन रावण की दुनिया का आनंद उठाते हैं लेकिन ये महानुभाव रावण के बापों का काम रहे हैं? रावण के पुतलों के दहन का क्या मतलब? रावण जैसे पात्रों के मरने का क्या काम, अब तो रावणों के वंशजों की अच्छी खासी पूंछ-परख है। जहाँ देखो वहाँ रावण मिलेगें, तरह-तरह के मिलेंगे। एक ढूंढोगे हज़ार मिलेंगे बल्कि उनके बाप और वंशज भी मिलेगें? उनकी औलादें मिलेंगी। आप जश्न मनाते रहिए, खुशी मनाते रहिए। पुतले फूंकते रहिए, बल्कि वे बड़ी लम्बी तादाद में प्रतीक स्वरूप स्वयं पुतले फूंकते हैं। कल अनेक स्थानों में रावण के पुतलों को फूंका गया। लेकिन रावण अपने रुतवे के साथ हाज़िर है।

अनेक लोग सोचते हैं कि अपने देश में आज़ादी कहाँ है? और जनतन्त्र का तो किसी तरह कोई सवाल ही नहीं है? संसद तो बिचारी हो गई है। धूमिल ने लिखा है कि संसद तेली की वह घानी है जिसमें आधा तेल और आधा पानी है। न्यायालयों में न्याय केवल हवा हवाई है। जनतन्त्र तो देखा-दिखाई है। बस उसे ढूंढते रह जाओगे। व्यवस्था की मुद्राएं मिथक में ढल चुकी हैं। यथार्थ है कि सत्ता के विरोध में बोलते ही आप देशद्रोही हो जायेंगे? उनके गुण नहीं गायेंगे तो मार दिये जायेंगे? इस देश में नागरिक की कोई हैसियत नहीं। वह नागरिक तो केवल वोट देने के लिये बना है। वह वोट दे रहा है शायद यही उसका असली धर्म है। सत्ता और प्रशासन मात्र गर्राने के लिये, अपनी-अपनी हाँकने के लिए ही होते हैं। रावण चल रहा है अविराम और रावणत्व चल रहा है अभिराम। क्या छवियां हैं।

रावणत्व बज रहा है चौबीस कैरेट सोने की तरह। उसकी चमक ने अनेकों को पागल बना दिया है। यानी विष रस भरा कनक घट जैसे। वैसे अरसे से राम के नाम का बाज़ार बन चुका है। हत्या करने पर जय श्रीराम और बलात्कार पर बलात्कारी का भव्य जुलूस और जय श्री राम। यह रामत्व का नया मॉडल है? समूचे तीर्थस्थल एक बड़े सुसज्जित मॉल के रूप में जलवा दिखा रहे हैं। यह राम के महत्ता की नई लीला, पुरुषार्थ और दुनिया है।

आप सोचते हैं कि सत्ता ने अपनी छवि समाप्त कर ली है। छवि तो लेखकों की भी समाप्त करने के प्रयास हुए हैं। कोई करे या नहीं लेखक भी अपनी छवि समाप्त करवाने के काम में दिन रात लगे हैं। वे छपें, चमकें और पुरस्कार पीटू रूप में जानें जाएं यही उनकी ख्वाहिश है। इस दौर में जो सुझाव देगा, आलोचना करेगा उसे नेस्तनाबूद कर दिया जायेगा? मजाल है सत्ता के बारे में बोलना? आप उसके चारण बन सकते हैं। उसका प्रतिरोध नहीं कर सकते? पत्रकार और मीडिया अपनी छवि पहले ही ख़त्म कर चुके हैं। अब तो उसकी कोई कीमत ही नहीं बची। तमाम एंकर मिलेंगे रात को एक साथ होते हैं। वे सरकार की तरफ से बोलतें हैं। कुछ तो लड़ते भी हैं। लगता है नहीं वास्तव में सत्ताओं ने उन्हें तरीके से खरीद लिया है या बिना खरीदे हुए भी वे बिक चुके हैं। आजकल व्यंग्यकार भी बिक जाते हैं। सांसद विधायक बिक जाने के विराट पैमाने पर रिकॉर्ड बना रहे हैं। ये आरोप बार-बार मत लगाइए। उनकी गतिविधियां इससे सिद्ध होती रहती हैं और वे लगातार प्रमाणित हो चुके हैं। इस बात में दम है।

मेरे एक परिचित पत्रकार हैं, उनकी आग पहले ही ठंडी हो गई है। वे बस अपने बायोडेटा में पत्रकार का तमगा चिपकाए हुए अपना तुर्रा चढा रहे हैं। वे कितने हिस्सों में बंट गये है, कुछ कहा नहीं जा सकता? उनका जन्म बिकने में ही लगा है। वे कई बार पाला बदल चुके हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वे जब भी होते हैं किसी के चमचा बनकर ही जीवित होते हैं। जब जहाँ से उन्हे पैसे और सुविधायें मिली उन्ही उन्हीं की तरफ से भोंकने लगते हैं। उनका कुछ भी स्पष्ट नहीं है। शब्दों की बाजीगरी है उनके पास । ऐसे ही शब्दों के के बाजीगर हैं और कुछ ज़मीर बिना लेखक भी मिलते हैं। उन्हें लगता है कि कोई उनकी असलियत नहीं जानता? वे सार्वजनिक मंचों पर अच्छी खासी तकरीर कर लेते हैं। उन्हें दो बार सुन भर लीजिए उनकी पोल खुल जायेगी। वही शेरो-शायरी वही लफ़्फाजी। उन्होंने अपना दूर-दूर तक मारकेट मार्किट बनाया हुआ है। अपने इस इल्म पर वे दूर-दूर तक ठंसते रहते हैं। उनके गण भी फैले हैं, एक दो-बार में उनकी असलियत समझ में नहीं आती? लेकिन जब खुल जाती है तो केवल आप उन पर पिच्च से थूक ही सकते हैं?

इस दौरान बहुत कुछ बदला है। हमारी जिजीविषा दिन-ब-दिन दुर्दम हुई है। झांसे कभी नया संसार नहीं रच सकते। हाँ, इस बीच असमंजस की खाइयां ज्यादह चौड़ी हुई हैं। लोगों में शंका के पाट विस्तीर्ण हुए हैं। किन्हीं-किन्हीं को अभी भी लगता है कि कोई बात नहीं। सब ठीक ही होगा। अभी भी कुछ लोग इल्हाम पाले हुए हैं। सत्तायें किसी की सगी नहीं होतीं। उनका काम बाजा बजाना और बजवाना होता है। रावण घूम रहे हैं। कुम्भकर्ण, मेघनाद ही धमाचौकड़ी मचाए हुए हैं। पुरातत्व का उत्खनन अपने पक्ष में किया जा रहा है। अनेक प्रश्न हमारा पीछा कर रहे हैं और निरन्तर दहाड़ रहे हैं। जिस देश में मात्र अपनी छवि चमकाने के लिए1200 रुपए करोड़ प्रति माह खर्च किये जा रहे हों। वहाँ कुछ भी हो सकता है। सत्ता में काबिज जो पहले खूब दहाड़ते थे वे अपने मुंह में दही जमा कर चुप्पी साधे हुए हैं। भले ही समूचा देश गुड़-गोबर हो जाय उनकी बला से। प्रशासन और सत्तायें अपने नशे में कब किसी शरीफ आदमी को मौत के घाट उतार दें। कुछ कहा नहीं जा सकता? क्या अनुदान की पुंगी बजाने से मरने वाले की या उसके परिवार की भरपाई हो सकती है?

एक मित्र की किताब पढ़ रहा था। सभी को पता है कि पूर्व में तो इतिहास में अभागे ही हुआ करते थे। अब तो समूचा वर्तमान अभागा हो चुका है? आज़ादी और जनतन्त्र अभागा हो गया है। इन अभागों की क्या कोई पूंछ-परख है हमारे समय में। स्त्री, दलित, वंचित, आदिवासी वृद्ध बच्चे कब कहाँ खोद कर गाड़ दिए जाएं। मुसलमानों को तो रोज़-रोज़ गाड़ने के उपक्रम चल रहे हैं। कहीं कोई ठिकाना नहीं। नीचताओं के खुले आसमान में क्या सुशासन की उत्तम से उत्तम घोषणाओं से हमारा गुजारा और जीवन सम्भव है। बिक चुके मीडिया के कराह से एक भयावह त्रासदी फैली हुई है। कोई भी अन्याय-अत्याचार कभी भी आदमी की विकास यात्रा को थाम नहीं सकता? लेखकों को धमकाने से अभिव्यक्ति का पटाक्षेप नहीं हो सकता। अहमद फ़राज़ के शब्दों में-“हरफे-ताज़ा की तरह क़िस्स-ए-पारीना कहूँ/ कल की तारीख को मैं आज का आईना कहूं/सब जिसे ताज़ा मुहब्बत का नशा कहते हैं/ मैं फ़राज़ उसको खुमारे-मये दोशीना कहूं? /”एक कवि के शब्द याद कीजिये-“यह न समझना धुआं ज़‍िन्‍दगी में अब कोई आग नहीं है/, जिसको मिलकर गा न सकें हम /ऐसा कोई राग नहीं। ’’माना कि ज़‍िन्‍दगी इम्तिहान लेती है, लेकिन जाहिर है कि वह बड़ों-बड़ों की हस्ती भी मिटा देती है

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