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एनडीटीवी रविश मोदी
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एनडीटीवी, रविश और मोदी का रिश्ता पुराना है

 

जब से लोगों को यह पता चला है कि गौतम अडानी ने एनडीटीवी का शेयर खरीदा है, दो पक्षों में बंटे लोगों की मुख्यत: दो प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग खुश हैं, ताने मार रहे हैं, रविश कुमार की नौकरी जाने, यूट्यूब चैनल खोलने, अडानी से तनख्वाह लेने, झुककर काम करने, मालिक मानने जैसी बातें कर रहे हैं तो दूसरे गुट के लोग जो पिछले आठ साल से स्वयं को एनडीटीवी के ब्रांड एंबेसडर, प्रवक्ता, प्रसारक, डिफेंडर मानते थे तथा ये मानते थे कि यही एक चैनल है जो लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ के रूप में कार्य कर रहा है, गोदी मीडिया नहीं है, ईमानदार पत्रकारिता की मिसाल है, रविश सर्वश्रेष्ठ एंकर हैं, आदि वे इस डील से नाखुश हैं।

ये दोनों गुट इस डील से एनडीटीवी और रविश के कारण इतना ज्यादा प्रभावित नहीं हुए हैं बल्कि इनके प्रभावित होने का केंद्र नरेंद्र मोदी हैं। एनडीटीवी और रविश एक सुत्र हैं और ये डील एक माध्यम। मूल आकर्षण का केंद्र मोदी हैं। जो मोदी के समर्थक हैं वो खुश हैं और इस खुशी में सामने वाले को ताने मारने का एक भी मौका नहीं छोड़ रहे तो मोदी विरोधी गुट इस डील को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा तक बता दे रहा है। वास्तव में हमारे देश में लोकतन्त्र और संविधान बहुत चयनित मौके पर सुविधानुसार खतरे में आता है और मजबूत होता हुआ घोषित होता है।

आपातकाल में मीडिया को सेंसर कर सरकार की सच्चाई बताने वाले पत्रकारों को जेल में डाल कर अमानवीय यातना देने वाली कांग्रेसी और इसके समर्थक वामपंथी भी इस व्यापारिक मुद्दे को लोकतन्त्र पर खतरा बता रहे हैं। है न मजेदार सुविधावाद!

चैनल चलाने के लिए जो गणित बैठाया जाता है उसके मंजे हुए खिलाड़ी हैं प्रणय रॉय। ऐसे ही 1988 से चैनल नहीं चला रहे और स्टाक एक्सचेंज में हरी झंडी वाली शेयर प्राइस बनाए रखें हैं। अपनी ब्रांडिंग और इस ब्रांड को ‘इन कैश’ कैसे करना है ये मीडिया घरानों को इन समर्थकों और विरोधियों से बहुत ज्यादा अच्छे से आता है। सभी चैनलों का अपना गणित है।

इस देश को 2002 का दुखद अनुभव है। गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में आग लगा कर कारसेवकों को जिंदा जलाया जाना हो या इसके प्रतिक्रियास्वरूप गुजरात दंगा हो दोनों ही बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। तब आपने एनडीटीवी की रिपोर्टिंग देखी होगी। जो लोग उस समय मेरी तरह ही छोटे रहे होगे वो आज भी खोज कर पढ या देख सकते हैं। पिछले दो दशक से लगातार एनडीटीवी ‘मोदी विरोधी’ पत्रकारिता कर रहा है। जी हां, मोदी विरोधी पत्रकारिता। आप कोई भी रिपोर्टिंग देखिए सिर्फ आलोचनात्मक, नाकारात्मक पुट देने का प्रयास, खामियों को खोजने के चक्कर में ग़लत तथ्य देने तक की घटनाएं घटीं है। रविश कुमार के अनेक विडियो सार्वजनिक पटल पर मिल जाएंगे। 2007 के चुनाव के नतीजे घोषित होने वाले थे। तब रविश कुमार अमित शाह के घर पर रिपोर्टिंग के लिए गए थे।

इस विडियो में वो पूछते हैं कि “…आप अपनी मां के साथ हैं। इस चुनाव में कोई ऐसा बयान जो आपकी पार्टी की ओर से हो और जिस पर आपको पश्चाताप हो रहा हो…” आप सोचिए ऐसे मौके पर क्या इस प्रकार के सवाल पूछने चाहिए? भाजपा को अपने अमूक बयान पर अफसोस है ऐसा ही एक ‘गिल्ट गेम’ खेलना चाहते होंगे। आखिर जीत के समय जब सभी जगह बधाईयों का महौल होगा तब एनडीटीवी पर चलेगा कि भाजपा चुनाव तो जीत ग‌ई मगर उसे अपने इस बयान पर बहुत अफसोस है! इस विडियो को 2019 में फिर से रिएडिट कर यूट्यूब पर चलाया गया और रविश कहते हैं, न मैं बदला न अमित शाह। इसी विडियो में वो कहते हैं ”मैं अपनी ‘लाल माइक’ के साथ” और “अच्छा तो यहां गांधी जी की भी तस्वीर है” आप विचार करें ये एजेंडा पत्रकारिता नहीं तो क्या है। चुनाव नतीजों की घोषणा से पूर्व की जाने वाली रिपोर्टिंग वास्तव में ये तो बाइट लेना कहा जाएगा इसमें इन वाक्यों का क्या मतलब है? अमीत शाह के घर में गांधी जी की फोटो, कोई तो अफसोस होगा के बारे में जानने की चाहत और अपने हाथ की माइक के लाल रंग पर जोर देकर बोलने के पीछे की मंशा को सभी समझते हैं।

भारतीय टीवी पत्रकारिता जगत में एक विशेष विचारधारा, वर्ग और संगठन समूह को लाभ पहुंचाने, उसके पक्ष और हित में जनमानस को तैयार करने हेतु पूरे तन्त्र के साथ समन्वय कर काम करने वालों में इनकी अग्रणी भूमिका रही है। परन्तु नरेन्द्र मोदी के मामले में यह दांव उल्टा पड़ गया। उन्हें बदनाम करने की जितनी कोशिश हुई वे उतना ज्यादा मजबूत, कद्दावर, और प्रसिद्ध हो ग‌ए। इनकी लगातार दश वर्षों तक ‘मोदी विरोधी पत्रकारिता’ के कारण गुजरात का एक मुख्यमंत्री जो साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं वो संपूर्ण भारत और विशेषकर हिंदी पट्टी में सुप्रसिद्ध हो ग‌ए, आइकन और रोल माॅडल हो ग‌ए। उनकी तत्कालीन प्रस्तावित अमेरिका यात्रा तक प्रभावी और प्रचलित हो गई क्योंकि इसका भी इस नेक्सस ने विरोध किया, चिट्ठियां लिखीं। किसी के हाथ में ‘लाल माइक’ तो किसी के हाथ में ‘लाल कलम’ दिखी।

इस प्रकार मोदी की राजनीति को इन्होंने सहयोग किया। आज भी पिछले आठ वर्षों से केंद्र सरकार के कार्यों और नीतियों के प्रति इनकी रिपोर्टिंग की दिशा और दशा एक ही है। आखिर किसकी गोदी में है एनडीटीवी और रविश कुमार? सरकार के विरुद्ध आवाज उठाना ही पत्रकार का कर्तव्य है तो गैर भाजपा सरकारों अथवा केरल की सरकार से कितने सवाल पूछते हुए प्राइम टाइम देखे आपने? केरल से आई एस‌ आई एस के आतंकवादी निकले, सैकड़ों निरपराध लोगों की दिनदहाड़े बर्बरतापूर्ण हत्याएं हुई, भ्रष्टाचार हुए परन्तु प्राइम टाइम की दिशा किधर है? म‌ई 2014 से पहले के रविश की रिपोर्टिंग इसकी गवाही देती है कि वे पत्रकार के कर्तव्य से ज्यादा विशेष विचारधारा के प्रति अपनी निष्ठा का पालन करने वाली पत्रकारिता करते रहे हैं।आप एक खेमा तैयार करेंगे तो स्वाभाविक है कि दर्शकों में दूसरा खेमा स्वयंमेव तैयार हो जाएगा। इसी बहुसंख्यक खेमें ने अपने कंधे पर बैठाकर मोदी को दिल्ली की गद्दी पर बैठा दिया।

आपको अगर ऐसा लगता है कि सरकार की ओर जिन मिडिया घरानों का झुकाव है उन्हें सरकार या संबंधित सत्तासीन पार्टी से आर्थिक लाभ मिलता है तो क्या सरकार के विरुद्ध विषवमन करने वाले एनडीटीवी को फंडिंग नहीं होती होगी? विचारणीय है कि क्या इस प्रकार की पत्रकारिता के लिए उन्हें एक भाजपा, मोदी, हिन्दुत्व विरोधी समूह और संस्थानों से आर्थिक लाभ, पर्सनल ब्रांडिंग में सहयोग, पुरस्कार, और अन्यान्य सुविधाएं नहीं मिलीं हैं? आप अन्य चैनलों को जिन मानदंडों पर तौल कर गोदी मीडिया कहते हैं तो उसी आधार पर एनडीटीवी और रविश कुमार को क्या कहेंगे?

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