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होली: रंगों का टूटता जादू

 

  आप यह शीर्षक पढ़कर चौंके नहीं। कहाँ होली जैसा उमंग उल्लास और आनंद का त्योहार और कहाँ मैं उसके रंगों के टूटते जादू और निरंतर पड़ रहे नए बदलावों और संदर्भों को ले बैठा। जीवन के बहत्तरवें साल में हूं। होली के पूर्व के दौर के रंगों की स्मृतियां दस्तक दे रहीं हैं। कितनी सुहानी कितनी मोहक कितनी स्नेह के रंगों में सराबोर होती थी होली। 20-25 साल के युवा इस मजे को क्या जान पाएंगे? होली सबके सर चढ़कर बोलती थी। क्या बुड्ढे क्या नौजवान। होली के दस दिन पूर्व से ही समूची फिजाओं में मस्ती का आलम हो जाता था।

आज नजीर अकबराबादी याद आ रहे हैं। देख बहारें होली की-उनकी कविता बेहद याद आ रही है। रंग बरसने लगते थे। गांव की उस होली को याद करते हुए लगता है सभी चीजें बारिश की तरह झमाझम मेरे दिलो-दिमाग में बरस रही हैं। अब हम कहां आ गए? होली के पूर्व से ही होली के सुचने यानी झाड़-झंखाड और अन्य चीज़ों को जुगाड़ने की होड़ मच जाया करती थी। गांव मेडौर में कहां क्या है? उसकी सूचना होरी सुचने वाले होरहा अपने दिमाग़ में लपक लिया करते?

उनके भीतर प्रेम और समर्पण के त्यौहार की एक लपट होती थी। एक विरल उत्साह हिलोरें लेने लगता? इस तरह समूची सामग्री का संचयन होता। हाय! अब वे बातें कहां? “राम हीरा हिराए दियो कचरे में /बीती सारी उमरिया नखरे में/”। स्थितियों की, समय की और यादों की अनवरत बारिश हो रही है। बघेली बोली के कवि शिवशंकर सरस की पंक्तियां याद आ गई। – “बहत-बहत कहां चले गएन/ सहत-सहत कहां चले गएन/ हम कहेन चोर कहेन लुच्चा/ कहत-कहत कहां चले गएन/”

  कुछ समय बाद हम होली के समय में शूट की हुई तस्वीरों को देखकर ही मजा ले लेंगे और अपने को भाग्यशाली मानेंगे? शायद यही हाल जनतंत्र का भी है। पूर्व का जनतंत्र और अबका जनतंत्र देखते-देखते सनाका खा रहे हैं। जनतंत्र का इतना बड़ा उत्सव लेकिन फीका-फीका सा। आज़ादी का अमृत महोत्सव देखिए और अपना कपार धुनिए। झूठ-झांसों के वादों-सपनों में फंसा हुआ नागरिक। जनकल्याण की कोई बात नहीं। केवल बातों को हांकने की कार्रवाई चल रही है। जय हो।

  आप सोचते होंगे कि मैं क्या गप्पें लगा रहा हूँ लेकिन हक़ीक़त यही है जो मैं आपसे बयान करने जा रहा हूँ। सचमुच वह कोई गप्प नहीं है। यह हमारे समय की भयावह विभीषिका है। आप जानते हैं कि समूचे ढांचे टूट रहे हैं, नये ढांचे बन रहे हैं। हमारे पारम्परिक लोकगीतों में डिस्को और रैप संगीत घुस आया है। गाँव में विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले पारम्परिक लोकगीतों में, उनकी छवियों में और कहन-भंगिमा में कुछ ऐसा घालमेल हुआ है कि सारा मजा किरकिरा हो गया। लोकनृत्यों में पारम्परिक पोशाकें बदल रहीं हैं। नृत्य की थिरकनों और लयकारी में तब्दीलियाँ हो रहीं हैं। भाव मुद्रायें बिखर गईं हैं। प्रायः संस्कारों के अवसरों पर, ऋतुओं के अवसरों पर गाये जाने वाले गीतों में मिलावट होने लगी है। देवी-गीतों में या तो फ़िल्मी गीत गाए जा रहे हैं, अथवा जो भजने गाई जा रही हैं, उनमें मिलावट आ गई है। गणेश उत्सवों पर भी मिलावटी गीत बड़े धड़ल्ले से गाए जा रहे हैं।

       आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता तथा उत्तर संरचना, उत्तर संरचनावाद ने सब पर धोबिया पछाड़ का दाँव लगाया है। इसलिए सबकुछ तहस-नहस होने की स्थिति में है। हर कला का स्वरूप बदल रहा है। यूँ तो मनमाने प्रयोग हमेशा हुए हैं। लेकिन वे जीवन को बेहतर बनाने के परिप्रेक्ष्य में और कलाकार की प्रयोगधर्मिता के वृत्त में रहे हैं? हमारे पारम्परिक त्योहार उनकी रंग छटाएं उनकी रागात्मक प्रकृति धीरे-धीरे बदल रही है। इन सबके बदले कृत्रिमताओं की आँधियाँ चल रहीं हैं? क्या यह सब कुछ हमारी चिन्ता का विषय नहीं है। लोकगीतों के अनेक प्रकार होते थे। जो बहुत लोकप्रिय भी थे और विभिन्न अवसरों पर उनका उपयोग भी किया जाता था। जैसे लमटेरा या बम भोलिया, कार्तिक स्नान के लिए जाती हुई महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले गीत, चैती, फगुआ, बारहमासी और धान का रोपा लगाते हुये गीत।

       मुझे याद है कि जब गाँव घरों में यज्ञ होते थे और हवन डाले जाते थे, तब स्त्री-पुरुष मिलकर बहुत अच्छी ध्वनि में लोकगीत गाते थे। जिन्हें बाबा के गीत या लमटेरा आदि कहते थे। त्योहार हमारे जीवन में उल्लास, उमंग, साहचर्य और सामूहिकता का भाव पैदा करते रहे हैं। ये हमारे सामाजिक जीवन की विविधता को अभिव्यक्त करते रहे हैं। हमारे भीतर साल भर में पनपी दुश्मनी, मनमुटाव तीखेपन को कम करके सौहार्द और भाई चारे की भावना को रोपते रहे हैं। सबको पता है कि हिन्दू समाज बहुत लम्बे अरसे से चार वर्गों में बंटा है। इन विभाजनों के इधर भयावह रूप विकसित हुए हैं। लेकिन इन चार वर्णों में जबरदस्त संगति का सिलसिला भी रहा है। हमारे यहाँ इन वर्णों के अपने-अपने त्योहार भी रहे हैं। मसलन रक्षाबन्धन ब्राह्मणों का, दशहरा क्षत्रियों का, दीपावली वैश्यों का, और होली शूद्रों का।

  हिन्दू समाज में समन्वय की एक अजश्र धारा भी लगातार प्रवाहित होती रही है। यूँ तो चाहे जिस वर्ण का त्योहार हो हम सामूहिकता से उसे मनाते रहे हैं। तय है कि हमारा जीवन संकटों, विपदाओं, दुःखों और सुखों से हमेशा ओत प्रोत रहा है। लेकिन हम इन्हें रसमय, भावमय बनाने में कभी नहीं हिचकते। हमारी मान्यता है कि जहाँ भी थोड़ी सी खुशी हो हम उसे बटोर लें। हमारे इन त्यौहारों में मुसलमान भी शामिल होते रहे हैं और उनके पर्वों में और गमों में हम भी साझीदार होते रहे हैं।

   आप जानते हैं कि त्योहार ही रहे हैं जिनसे हम संकटों, कष्टों और दुःखों को भुलाकर, उन्हें एक किनारे ठेलकर कुछ समय के लिये खुशियाँ पैदा करते रहे हैं। गाँव में एक कहावत प्रचलित है कि हम इतने व्यस्त हैं कि मरने की फुरसत नहीं है। आदमी कभी भी काम से मुक्त नहीं होता। कोई न कोई काम उसे घेरे रहता है। जाहिर है कि हम ऐसे लोग हैं जो मर-मर कर जीते हैं और जी-जी कर मरते हैं। यह हमारे जीवन का सच है। हम समूचे जीवन को देखें तो अनुभव करेंगे कि जहाँ लोग नाक में कपड़ा डालकर निकलते हैं वहाँ लोग झुग्गी-झोपड़ी बनाकर रहते हैं, खाते पीते हैं, बच्चे पैदा होते हैं और त्योहार मनाते हैं। वहाँ शादियाँ और बारातें सजती हैं। लेकिन इस जीने के अंदाज में खुशियों के अवसर हमेशा निकाल लेते हैं। थोड़े से पैसों के लिए महीने के महीने गुजारते हैं।

यही तो हमारी जिजीविषा है। मुस्लिम समाज में ईद भी इसी तरह का त्योहार है। ग़रीब से ग़रीब आदमी अपने गमों के दायरे से निकलकर थोड़ी सी खुशी, थोड़े से सपने कहीं न कहीं खोज लेता है। मुंशी प्रेमचन्द्र की कहानी ‘ईदगाह’ मुझे स्मरण आ रही है, उसमें हामिद का मेला जाना याद आ रहा है। उसकी थोड़ी सी खुशी याद आ रही है जो अपनी दादी के लिये दिन भर बिना कुछ खाए पिए चिमटा खरीद कर लाता है। हमारे जीवन में यह थोड़ी सी खुशी कितने काम की चीज़ है। इस खुशी का अंदाजा लगा पाना बहुत मुश्किल काम है। वह बिहारी की नायिका की तरह-वह चितवन औरै कछू /जेहिं बस होत सुजान की भांति है-जिसमें समूचे गम तिरोहित हो जाते हैं।

 जब मैं कहता हूँ कि होली शूद्रों का त्योहार है तो उसका तात्पर्य किसी हीन भावना से नहीं होता किसी तरह के संघर्ष से नहीं होता। मुझे लगता है हमारे शूद्रों या आदिवासी और हरिजनों ने हिन्दू समाज के तीनों वर्णों की तुलना में वर्जनाएं लगभग नहीं है। हिन्दू समाज में विधवाओं की क्या स्थिति है, छोटे वर्णों कि क्या स्थिति है और अनंत परिवर्तनों के बाद स्त्रियों की क्या स्थिति है। यह किसी से छिपा नहीं है?

  विकास के कितने दौरों से गुज़रने के बावजूद भी वह विधवा समस्या से आक्रांत है। हमारे समाज का व्यवहार विधवाओं के प्रति अपमानजनक और असहज है। निराला ने विधवाओं का बहुत मार्मिक चित्रण किया है। उन्हें वह इष्टदेव के मन्दिर की पूजा सी के रूप में चित्रित किया है। यह बताने की ज़रूरत नहीं कि समूचे लांछन पीड़ाएं दुःख-दैन्य-तड़प और हिकारत वहाँ माजूद है। मेरी जानकारी में शूद्रों के यहाँ विधवाओं का कोई चलन नहीं है। पति की मृत्यु के पश्चात उस स्त्री का हाथ थामकर फिर उसे जीवन की धुरी में ले आया जाता है।

शूद्रों के यहाँ अन्य वर्णों की तरह झूठे और फ़रेबी अहंकार भी नहीं है। मुझे जितनी सहजता वहाँ दिखती है वह अन्यत्र मुश्किल है। मैं अपने बचपन की तरफ़ लौटता हूँ होली में पूरा गाँव एकजुट होता था। गाँव का हर छोटा-बड़ा अमीर-ग़रीब ऊँच-नीच होली जुटाने में तन्मय हो जाता था। छोटे से गाँव की होली भी पहाड़ बराबर बनाई जाती थी। बारी खोंपे-कटीली झाड़ियाँ और अनावश्यक लकड़ियों के टुकड़े इकट्ठा किए जाते थे। गाते बजाते हुए होली जलाई जाती थी। इस मंगल कामना के साथ कि हे होली! हमारी अलैया-बलैया, रोग-दोख, हीरा-पीरा सब अपने साथ लेती जाओ।

होली का रंग सबके ऊपर चढ़कर बोलता था। प्रेम में क्या रंग क्या कीचड़ क्या धूल। क्या अबीर रंग न सही कीचड़ तो है मिलने के लिये। क्या रंग क्या कीचड़ होली के लिये तो प्रेम चाहिये, उमंग और उत्साह चाहिए, जो अब किसी तरह नहीं मिलता। अपनी निर्मलता के लिये रंग और कीचड़ में कोई भेद नहीं। होली रंग-गुलाल, भंग, हंसी-खुशी मिलने-जुलने हंसने-हंसाने भेंटने रंग में सराबोर करने का त्योहार रहा है।

होली के बराबर मस्ती मैंने किसी त्योहार में शायद नहीं देखी? यह बच्चों से लेकर बड़े बूढ़ों तक को, नई नवेली स्त्रियों से लेकर बूढ़ी हो गई स्त्रियों को एक लाइन में लगा देने का त्योहार रहा है। छोटे-छोटे बच्चे, बड़े-बूढ़ों से हंसी ठिठौली और मजाक करते थे। कहते थे बुरा न मानो होली है। अर्थात समानता छोटे बड़े की आयु और जाति का कोई बन्धन नहीं है। मुझे याद पड़ता है कि सचमुच उस जमाने में कोई बुरा नहीं मानता था। सामूहिकता के जितने रंग होली में रहे हैं वे किसी अन्य त्योहार में नहीं।

होली शालीनता से अधिक मन के मिलन उमंग और उल्लास का त्योहार है। गंदगी खराबी को खत्म करो यह अभियान लेकर होली आती रही है। घरों की लिपाई, पोताई, सफाई दूर भगाती रही है। गाँव घर की टोले मोहल्ले की गंदगी इकट्ठा करके एक क्षण में स्वाहा कर दी जाती रही है। गंदगी, कूड़ा-करकट, धूल-धक्कड़ इकट्ठा करने में भी सामूहिकता होती थी। जलाने में भी सामूहिकता। उमंग उल्लास और मस्ती के डूबने में भी सामूहिकता। समूची वर्जनाओं को समाप्त करने में भी सामूहिकता। ऐसी छटा, ऐसा सौन्दर्य और ऐसा मिलन और कहाँ। कहावत है साझे की होली ही अच्छी होती है बांकी कुछ नहीं। होली इकट्ठा करने की होड़ होती थी। अर्थात कौन कितनी गंदगी इकट्ठा कर सकता और उसे कैसे भस्म कर सकता है।

   मुझे स्मरण आता है कि चौगानों में अन्य स्थानों में पुरुष होली जलाते थे और घरों में स्त्रियाँ अलग से होली जलाती थी। एक और रिवाज़ था कि शादी के बाद दूल्हे को पहली होली ससुराल में मनानी पड़ती थी। होली के बारे में कहने को बहुत कुछ है। इस दौर में कबीर के नाम पर प्रचलित होली की कविताओं और छंदों को छोड़ दूँ तो कुछ होली गीत मुझे अब भी याद आ रहे हैं नजीर अकबरावादी ने लिखा- “जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की/ और डफ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की/” उसी तरह यश मालवीय ने लिखा- “फागुन के दिन आ गये हंसे खेत-खपरैल/एक हंसी में घुल गया मन का सारा मैल/”

    किसी ने लिखा किताबों के बाहर भी फागुन आफिस के बाहर भी फागुन। और उन गीतों का क्या कहना आई होली रे कन्हाई सुना दे जरा बांसुरी। और जब फ़िल्मों में यह गाना प्रचलित हुआ आज बिरज में होली रे रसिया अथवा रंग बरसे भीजे चुनर वाली। तो रीतिकाल के एक कवि ने यूँ ही नहीं कहा- “नैन नचाय कह्यो मुसकाय/लला फिर खेलन आइयो होली।”

इतने लम्बे अन्तराल के बाद आज जब मैं होली के बारे में सोचता हूँ तो धन और वैभव का प्रदर्शन तो दिखता है। औपचारिकताएं तो दिखतीं हैं लेकिन इन सबके बीच से प्रेम-उमंग-उत्साह ग़ायब है। पकवान तो बहुत सारे दिखते हैं बाज़ार मिठाइयों से पटे पड़े हैं लेकिन न तो खुरमा है न तो खुरमी है न बेसन के सेव हैं न कुसली-गुझिया है। अब तो सब सूखा ही सूखा दिखाई पड़ता है। हम लोग हाय-हलो में दिन स्वाहा कर रहे हैं। देश के बड़े-बड़े नेता हाकिम-हुकाम अख़बारों में आकाशवाणी में और दूरदर्शन में मात्र बधाइयाँ परोसते आपको मिल जाएंगे। उससे होना क्या है। मात्र औपचारिकताएं ही तो पूरी होनी हैं। वह उमंग कहाँ मिलेगी जहाँ हमारे मन बसते हैं

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