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मोनिका ओ माय डार्लिंग
सिनेमा

मोनिका ओ माय डार्लिंग

 

मोनिका आज भी डार्लिंग है’

70 के दशक का अत्यन्त लोकप्रिय गीत ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’ आज भी थ्रिल पैदा करता है, हेलेन का मादक क्लासिक नृत्य, रोमांच से भरपूर अदाकारी, हाव-भाव बाँधे रखता है। वासन बाला के निर्देशन में इसी टाइटल मोनिका ओ माय डार्लिंग से नेटफ्लिक्स पर सस्पेंस और रेट्रो संगीत के जादू से भरपूर मर्डर मिस्ट्री फिल्म आई है। फिल्म की कहानी जापानी लेखक केईगो हिगाशिनों के उपन्यास ‘बुरुतासु नो शिंजो’ का रूपांतरण है, कहानी का भारतीयकरण किया है योगेश चंदेकर ने, कहानी में सही-ग़लत, नायक-खलनायक, पाप-पुण्य जैसी स्टीरियोटाइप धारणाएं तोड़ी गई हैं इसमें मुख्य है कि परिस्थितियों के बीच मनुष्य के निर्णयों के परिणाम के वे खुद जिम्मेदार हैं दूसरे किस्मत कब आपको झटके में ऊँचाइयों तक पहुंचा दे और कब लुढ़काकर वापस पहले पायेदान पर नहीं पता। बढ़िया पटकथा, बेहतरीन निर्देशन, दमदार अदाकारी कहानी में अप्रत्याशित मोड़ और जबरदस्त संगीत फ़िल्म की सफलता के कारक है। बल्कि फ़िल्म का एक्स फैक्टर ही है रेट्रो टच के साथ अचिंत ठक्कर का अत्यन्त प्रभावशाली संगीत जो नॉस्टेल्जिया के साथ-साथ कहानी को तीव्र गति से आगे बढ़ाता है। बैकग्राउंड में भी रेट्रो-धुनों से सराबोर कहानी का फ्लो आपको पलक झपकाने का भी समय नहीं देते बल्कि आप एक बार भी कहीं इधर- उधर हुए कि आपको फ़िल्म रिवाइंड करनी पड़ जायेगी, जो थिएटर में संभव नहीं।

फिल्म मर्डर से शुरू होकर मर्डर पर ख़त्म होती है और रहस्य बरकरार शायद दूसरे पार्ट के लिए । पुणे शहर की एक प्रसिद्ध रोबोटिक कंपनी ‘युनिकोर्न’ मानव की सुविधा के लिए रोबोट बनाता है ताकि लेकिन एक रोबोट की तकनीकी गड़बड़ी (अथवा जानबूझकर की गई) से एक कर्मचारी की मौत हो जाती है लेकिन कंपनी का मालिक इस दुर्घटना को रफ़ा-दफ़ा कर देता है, कंपनी की 50वीं एनिवर्सरी पर कर्मचारियों को बोनस दे सबको खुश कर दिया, इस दुर्घटना के बारे में अब कोई कुछ नहीं बोलेगा। ‘फ़रीदी’ नाम के सुपरवाइजर को नौकरी से निकाल दिया जाता है वह बार बार सवाल कर रहा है। इस दुर्घटना (मर्डर) के छह महीने बाद फिर सीरियल मर्डर्स का सिलसिला चालू होता है, क़त्ल किसने किये, क्यों किये दर्शकों के सभी अनुमान फेल हो जाते हैं, रहस्य रोमांच, हास्य-भय को गीत-संगीत, सिनेमेटोग्राफी का अद्भुत् समायोजन व असाधारण ढंग से पर्दे पर उतारा है, दर्शक साँस रोककर फ़िल्म का आनंद लेते हैं।

6 महीने बाद ‘युनिकोर्न रोबोट कंपनी’ की मोनिका (हुमा कुरैशी) एक साथ तीन कर्मचारियों को ब्लैकमेल कर रही है तो तीनों मिलकर मोनिका की मर्डर की तैयारी करते हैं निशिकांत (सिकंदर खेर) उसका मर्डर करने की बात करता है जयंत (राजकुमार राव) बॉडी को ठिकाने लगाएगा और अरविंद (भगवती पेरूमल) से जंगल में फेंक देगा लेकिन पासा पलट जाता है पहले निशिकांत फिर अरविन्द का मर्डर हो जाता है, इनके बीच गौर्या (सुकांत गोयल) जो साइकिक है कहानी बढ़ाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है, कौन कातिल है, कौन मर रहा है इसके लिए आपको फिल्म देखनी होगी।  

अब वो महत्वपूर्ण तथ्य जिनका इस समीक्षा के माध्यम से मैं आपको ध्यान दिलाना चाहूंगी जिस वजह से फ़िल्म सिर्फ़ मर्डर मिस्ट्री से आगे भी बहुत कुछ कह जाती है जिसे पटकथा लेखन में संवादों में आसानी से पकड़ा जा सकता पर रहस्य रोमांच की गति में पकड़ में नहीं आते पर उन्हें भी जानना ज़रूरी है। कहानी एक ओर तेज़ी से बदलते परिवेश को दिखाती है तो दूसरी ओर वर्ग/वर्ण व्यवस्था की जड़ मानसिकता की ओर भी इंगित करती है; स्त्रियों की प्रगतिशील सोच सामने रखती है तो स्त्री के प्रति पुरुष की परम्परागत सोच भी उघाड़ कर रख देती है। कुछ संवादों से आपको रूबरू करवाती हूँ, अविवाहित लेकिन प्रेग्नेंट होने पर मोनिका किसी भी स्टीरियोटाइप फ़िल्मी डायलाग ‘मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ’ के स्थान पर कहती है “तुम बाप बनने वाले हो जय” सुनकर आपको हँसी आती है, लेकिन मोनिका कहीं भी चालाक या तथाकथित चरित्रहीन नहीं प्रतीत होती इसके लिए दोनों बराबर जिम्मेदार है। हमें लगता है जो सही भी लगता है कि वह ब्लैकमेल कर रही है लेकिन उसका कहना कि बच्चे की परवरिश पढ़ाई लिखाई के लिए पैसा तो चाहिए न”? ये तरीका कितना सही या गलत है इस पर सबके विचार अलग हो सकतें हैं, विवाह के बाद बच्चों की जिम्मेदारी अभिभावक लेतें हैं लेकिन अविवाहित होने पर सिर्फ लड़की को अपराधी की तरह कटघरे में खड़ी कर दिया जाता है लेकिन आज के युग में ‘मोनिका का चारित्रिक प्रमाणपत्र’ आप नहीं बना सकतें, यह फिल्म का महत्वपूर्ण ट्रीटमेंट का है कि आप नैतिकता को परिस्थितियों में कैद नहीं कर सकते, कौन सही है कौन गलत ? लेकिन आज भी कोई लड़का विवाह पूर्व बच्चे की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता। हाल ही में श्रद्धा-अफताब का केस ज्वलंत उदाहरण हैं फिल्म में भी मोनिका के मर्डर की बात हो रही है एक दृश्य में जय मोनिका को मार रहा है और पीछे अंग्रेजी गाना चल रहा है Love You So Much (I Want to Kill You) “मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, तुम्हें मरना चाहता हूँ” 

तीनों में से कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता उनका रवैया वही कि “चलो मैं अच्छे डॉक्टर को जानता हूं और रफ़ा-दफा करते हैं”। मोनिका बेहिचक कहती है तू करा ले अबार्शन…तेरह साल की उम्र से खुद को संभालती आई हूं इस बच्चे को भी संभाल लूंगी… तू जिम्मेदारी तो उठाएगा नहीं कम से कम फोन नहीं उठा ले” एक सीन में निशिकांत कहता है मोनिका ने अरविन्द से भी कहा कि ‘अरविंद जूनियर उसके पेट में पल रहा है” जबकि अरविन्द तो एक पारिवारिक आदमी है, गोवा की कोंफ्रेंस में पी कर उनके सम्बन्ध बन भी गए तो क्या हुआ! “मुझे तो कुछ याद भी नहींयानी वो पारिवारिक है इसलिए उसे माफ़ किया जाना चाहिए। मरने से पहले मोनिका कहती है ‘तुम तो अच्छे लोग हो न’ सफ़ेदपोश लोगों पर कटाक्ष है।

मिडिल क्लास जयंत का कहना है कि “मुझे मिडिल क्लास के दलदल से निकलना था, बहुत मेहनत की, बहुत पढ़ाई की यहां तक पहुंचा” लेकिन निशिकांत उसके संघर्ष को सिरे से खारिज कर देता है कहता है “तुम पैरासाइट हो मैं तुमसे नफरत करता हूं, स्टाइलिश कपड़े यह सफेद जूते और यह खराब सड़े हुए परफ्यूम जिसमें तू नहा कर आया है इससे तुम हमारे जैसे नहीं होंगे रहोगे वही है” सदियों के सामाजिक वैषम्य को हम इस संवाद में देखतें हैं, इसी परिवेश में ‘फरीदी’ नामक व्यक्ति जिसे बलि का बकरा बना कर निकाल दिया गया यह उसके अनुसार “यदि आपकी फैक्ट्री की मशीनरी हंड्रेड परसेंट सुरक्षित है, सुपरवाइजर देव प्रकाश की मौत मशीन की वजह से नहीं हुई सर तो मुझे, फरीदी शेख, को नौकरी से क्यों निकाला गया? देव प्रकाश की मौत एक दुर्घटना थी उसमें रोबोटिक मशीनरी से कोई लेना-देना नहीं किसी कोई हाथ नहीं है! आई वांट आनसर राइट नाउ” लेकिन कोई जवाबदेही नहीं इसमें मशीनरी के दुष्प्रभाव और आदमी के मशीन होते चले जाने का संकेत है रोबोटिक पावर के नुकसान। रिश्तों में धोखेबाजी और छद्म व्यवहार भी नज़र आता है निशिकान्त के मरने पर उसकी बहन कहती है “क्या मैं दुखी दिख रही हूं? मैं दुखी दिखने की कोशिश कर रही हूं, मैं दुखी नहीं हूं, मुझे खुशी है कि वह कमीना मर गया…डैडू की पिछली शादी का बेटा था, डैडी ने मेरी मां के लिए उसकी मां को छोड़ा”

इन सबके बीच एसीपी नायडू के रूप में राधिका आप्टे के मजेदार सहज ढंग से अपना किरदार निभाया है नायडू खूब हँसते हुए कहती है “मुझे सीरियसली लेना, मेरी सूरत पर मत जाना अब मैं इतनी सुंदर हूं तो क्या करूं क्या करूं” साँप सीढ़ी के खेल-सी (पोस्टर भी देख सकतें है) इस मर्डर मिस्ट्री को डार्क कॉमेडी के साथ बहुत सलीके से प्रस्तुत किया गया है, रहस्य-रोमांच में हास्य का पुट दर्शक को बाँधे रखता है, फिल्म बिना किसी फूहड़ता, घटिया जोक्स का सहारा लिए आगे बढ़ती है, हयूमेर कहानी के साथ उभरता है। टिपिकल बॉलीवुड फिल्मों की तरह आप दिमाग साइड पर नहीं रख सकते बल्कि फिल्म आपसे अच्छी खासी कसरत करवाती है पर थकाती नहीं आपको मज़ा आता है जैसे जिसका क़त्ल करना था वह बच गया! जिसने क़त्ल करना था उसका ख़ून हो गया ! कातिल कौन है? “मोनिका का एक डायलोग ‘वाय वाय वाय वाय वाय नहीं, हाऊ हाऊ हाऊ हाऊ हाऊ’ यानी फ़िल्म में आपके सभी पासे ग़लत पड़ते जाते हैं और आपको लगता है ये कैसे हुआ? यही रहस्य रोमांच फिल्म को रोमांचक व मजेदार बना रहा है, क़ातिल कभी रोबोट, कभी इंसान, कभी साँप वो भी कोबरा है फिल्म में साँप सीढ़ी का खेल चल रहा है जिसकी किस्मत अच्छी होगी सांप से बच जाएगा अंत में जयंत का क्या हुआ दो-दो साँप उसे डसने को तैयार खड़े है इसके लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी

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