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रामपुर की रामकहानी

मुल्ला की ताबीज

 

रामपुर की रामकहानी- 2

 

हमारे टोले के नंग-धड़ंग बच्चों के कमर में भगई भले न हो, काले रंग के धागों से बनी करधनी जरूर रहती थी। उस करधनी में कउड़ी और छेदहा पैसा के साथ मुल्ला की दी हुई ताबीज भी बँधी रहती थी। किसी बच्चे की तबीयत नासाज हुई तो पहला काम होता था मस्जिद में जाकर मुल्ला जी से झाड़-फूँक कराना। इस काम में मुल्ला तनिक भी आनाकानी नहीं करते थे। विश्वास इतना कि मुल्ला के झाड़ने से बच्चे स्वस्थ भी हो जाते थे। शहर से मैं जब भी गाँव जाता, मुल्ला बड़े अदब और धैर्य से हमारे परिवार का हालचाल पूछते। मुल्ला अब इस दुनिया में नहीं हैं। वे हमारे टोले की नूरी मस्जिद में अपने अंतिम दिनों तक पूरी निष्ठा से अजान करते रहे। उनका असली नाम ‘सेठई’ था। इस नाम से भला कौन बता सकता है कि वे मुसलमान थे?

गाँव के चौकीदार थे जान मोहम्मद। वे बगल के गाँव रेहावे के मूल निवासी थे, किन्तु उनका मन हमारे गाँव में ही लगता था। उनके जीवन का बड़ा हिस्सा हमारे गाँव में ही बीता। सबसे अच्छा फगुआ वही गाते थे। फागुन लगते ही ढोल की थाप सुनाई देने लगती थी। भोजन के बाद शाम होते ही किसी के भी बरामदे में पड़ोस के लोग इकट्ठा हो जाते और रात बारह बजे तक फगुआ का समूह गान चलता रहता था। प्राय: सबके घरों में ढोल, झाल या करताल अर्थात् कोई न कोई बाजा जरूर रहता था। होली के दिन सबेरे के पहर कनई (कीचड़) और राख (सम्मत जलने से बची हुई राख) से होली खेली जाती और दोपहर के बाद रंग की होली। इस दिन दोपहर तक सबको खुली छूट होती जोगीरा के नाम पर गालियों की तुकबंदी करने की। मुझे जोगीरा बिलकुल पसंद नहीं थे। मैंने कीचड़ की होली कभी नहीं खेली। दोपहर के बाद लोग समूह में फगुआ गाते, भाँग घुला हुआ रस पीते और मस्ती करते।

एक साल होली के दिन मेरे घर में बने भाँग के रस (शर्बत) में कुछ सिरफिरे लोगों ने धतूरे का बीज पीसकर मिला दिया था। होसिला कई गिलास पी गए थे। थोड़ी देर में ही उन्हें तेजी से नशा चढ़ने लगा। मैं डर गया और प्रेमसागर पटेल को लेकर साइकिल से महाराजगंज डॉक्टर के पास दवा लेने चला गया। डॉ.एस.एन. राय मेरे परिचित डॉक्टर थे। उनसे दवा लेकर जब हम लोग वापस आने लगे तो हमारे पाँव भी डगमगाने लगे। हम दोनों का भी हँसते-हँसते बुरा हाल था। हम कभी हँसते और कभी इस बात को लेकर चिन्तित हो जाते कि हमने तो दो-दो गिलास ही पिए हैं। होसिला की दशा कैसी होगी जिन्होंने छ: बड़े गिलास पी लिया था और वह भी निचला हिस्सा। हम लोग ढहते-ढिमलाते रात में घर पहुँचे थे। होसिला को स्वस्थ होने में तीन दिन लग गए थे। उनके घर के लोग अनहोनी की आशंका में रोने लगे थे।

ढाँक

आजकल लोगों के घर में न ढोलक है और झाल, और न फगुआ गाने की ललक। गाँव के सैकड़ों नौजवान विदेशों में हैं, फूल अब भी खिलते हैं, आम अब भी बौराते हैं, कोयल अब भी कूकती हैं, वसंत अब भी आता और जाता है किन्तु परदेशियों की विरहिणियाँ अब नहीं गातीं, “जनि जा हो कंत परदेस बसंत निराने।” फागुन भी बीत जाता है और चैत भी। न ढोलक की थाप पर फगुआ सुनाई देता है और न फगुआ के विदा होने पर उदास कर देने वाला चैता।

खलील चाचा (खलील खाँ) के दरवाजे पर चबूतरा अब भी है। गाँव का सबसे बड़ा ताजिया उन्हीं के यहाँ बनता था, इसी चबूतरे पर। जिस दिन से ताजिया बनना शुरू होता उसी दिन से रात में ढाँक-तासा बजना भी शुरू हो जाता। मोहर्रम के दिन की पहली रात को जब मेरे टोले और बड़का टोले के ताजियों के मिलन के लिए गाजे-बाजे के साथ जुलूस निकलता तो मात्र महिलाओं के गीतों से ही मातम फूटता।

ताजिया

बच्चों से लेकर बूढ़े तक जुलूस में उत्साह से शामिल होते। बच्चे मोमबत्ती और फूलझड़ी जलाकर आनंद लेते। पायक रात से ही हाथों में मोरछल लेकर ताजियों की परिक्रमा करने लगते। माएँ इमाम बाबा को कोई न कोई मनौती मान लेतीं और पूरी होने पर संतान की जिम्मेदारी बन जाती उसे निभाने की। किसी को दो साल, किसी को तीन या पाँच साल और किसी-किसी को तो जवान होने तक इमाम साहब का पायक बनना पड़ता। इसमें हिन्दू-मुस्लिम का कोई भेद नहीं था। मेरे गाँव का एक टोला सोनपुर है, जहाँ एक भी घर किसी मुसलमान का नहीं है। किन्तु इस टोले पर भी ताजिया बनता था और यहीँ के लोग पायक भी बनते थे।

गाँव के उत्तर सदानीरा (रेहाव नदी) के किनारे कर्बला का बड़ा मेला लगता था। यहीँ आस-पास के दर्जनों गाँवों के ताजिए आते थे। उनमें से सबसे ऊँचे और सुंदर ताजिए को देखने वालों की भीड़ लगी रहती थी। हर ताजिए के साथ ढाक-तासा बजता। लोग लाठी भाँजने का प्रदर्शन करते और थकरी खेलते। बड़के टोला पर के छतिबल काका जब उछल-उछल कर ढाँक बजाते तो तमाशबीनों की भीड़ लग जाती। इस्माईल भैया भी ढाँक बजाने में माहिर थे। मैं जब इंटर में पहुँचा तब जाकर समझ में आया कि मोहर्रम वास्तव में मुसलमानों का त्योहार है।

लगभग तीन दशक बाद इसबार दुर्गापूजा के समय गाँव में था। पहले मेरे गाँव में दुर्गापूजा मनाने की परम्परा नहीं थी। इस बार मेरे गाँव में तीन-तीन पंडाल बने थे। मैंने अपने गाँव के एक अनुभवी दोस्त से पूछा, “एक ही गाँव में पूजा के तीन पंडाल क्यों? एक पंडाल होने से ज्यादा भव्य बनाया जा सकता था।” उन्होंने कहा, “प्रधानी के चुनाव के कारण गाँव तीन गुटों में बँट चुका है।”

मैंने दुर्गा की मूर्तियों के साथ अपने गाँव की युवा पीढ़ी को अबीर-गुलाल और रंग में सराबोर होकर नाचते और नारा लगाते देखा। नारों में कभी-कभी ‘जय श्री राम’ के नारे भी सुनाई देते थे। छठ पर्व का उल्लास भी मैंने पहली बार गाँव में अनुभव किया। छठ पर्व मनाने की कोई परम्परा हमारे गाँव में नहीं थी। मैंने नए त्योहारों में रँगे हुए अपने गाँव का पहली बार दीदार किया। यह मेरा बिल्कुल अलग और नए ढंग का अनुभव था। गाँव के तालाब सजा दिए गए थे। किनारे तंबू लग गए थे। रामघाट में सुबह जब मैं पहुँचा तो वहाँ डीजे की धुन और भोजपुरी के अश्लील गानों पर लड़कियाँ थिरक रही थीं। छठ की व्रती स्त्रियाँ नदी की धार में खड़ी होकर सूर्य देव के उगने की प्रतीक्षा कर रही थीं। निश्चय ही वह दृश्य बहुत सुहाना था। सबकुछ बदलता है, बदलेगा ही। किन्तु बदलाव की दिशा कैसी है? मैं असमंजस में हूँ।

लगभग चार दशक पहले हमारे गाँव में न कोई मंदिर था और न मस्जिद। आज गाँव में तीन मस्जिद हैं। मेरे टोले तथा गदुलहिया पर बनी मस्जिदें तीस-पैंतीस साल पहले की हैं। बड़का टोले पर तो अभी निर्माणाधीन है। मेरे टोले पर एक मदरसा भी है दो आठ-दस वर्षों से चल रहा है। इसमें अन्य विषयों के साथ दीनी तालीम भी दी जाती है। इसी के बगल में ईदगाह है जिसकी जमीन मुस्लिम समुदाय के लोगों ने आपस के आर्थिक सहयोग से खरीदा है।

भावनंद बाबा का मंदिर सड़क पर होने के कारण चहल-पहल का केन्द्र बना रहता है। सोनपुर में भी एक छोटा सा काली मंदिर बना है, कुछ वर्ष पहले। मायावती के शासनकाल में, जब दलित उभार अपने चरम पर था, बड़के टोला पर एक बौद्ध मंदिर भी बन गया है। इसी टोले पर हिन्दू और इस्लाम, दोनों धर्मों के पाखंडों पर प्रहार करने वाले पंद्रहवीं सदी के आधुनिक संत कबीर के पंथ का एक मठ भी है जो अपनी अप्रासंगिकता की कहानी कहता हुआ उजड़ा पड़ा है।

हमें लगता है कि हम जैसे-जैसे शिक्षित, विकसित और समृद्ध हो रहे हैं, हिन्दू और मुसलमान अधिक बनते जा रहे हैं इंसान कम। मुझे याद है, मेरा नाम जी.एस.वी.एस. इंटर कालेज में डॉ. ऐनुल हक ने लिखवाया था। वे मुझे अपनी बाईक पर बैठाकर सीधे प्रिंसिपल महेन्द्रनाथ द्विवेदी के कक्ष में ले गए थे। प्रिंसिपल साहब ने उनका बड़ा सम्मान किया था। डॉ. ऐनुल हक महाराजगंज के प्रतिष्ठित डॉक्टर थे। मेरी माँ दमा की मरीज थी। उनका इलाज डॉ. ऐनुल हक ही करते थे। वे अपनी डिस्पेंसरी के अलावा बुलाने पर क्षेत्र में जाकर भी मरीजों को देखा करते थे। वे जब किसी दूसरे मरीज को देखने भी मेरे गाँव आते तो मेरे घर कहकर खाना बनवाते और दो रोटी खाकर ही जाते। एक बार जब मैं महाराजगंज से उन्हें लेकर घर लौट रहा था तो रास्ते में सागिर काका (सागिर अली) मिले। वे हमारे टोले के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। उनका घर सड़क के किनारे ही था। उन्हें देखकर डॉ. साहब ने बाइक रोक दी। सलाम-दुआ हुआ। सागिर काका ने जब उनसे कहा कि वे आज उनके घर दो रोटी खाकर जायँ तो डॉ. ऐनुल हक ने हँसते हुए कहा था, “मैं मियाँ-चियाँ के यहाँ नहीं खाता।”

मजहबी कट्टरता या तो हमें तालिबान बनाती है या हमसे बाबरी मस्जिद गिरवाती है। आजादी के साथ हमारा देश बँट गया, मुहम्मद अली जिन्ना की जिद के कारण। धर्म की राजनीति करने वालों का आचरण और स्वभाव धार्मिक नहीं होता। जिन्ना अपने कर्म से मुसलमान नहीं थे। वे दाढ़ी नहीं रखते थे, नमाज पढ़ना नहीं जानते थे, शराब पीते थे और सूअर का मांस भी खाते थे। ( द्रष्टव्य, क्यों हिन्दू से मुस्लिम बन गए थे जिन्ना के पिता! Hindi.news18.com, December 24, 2018)

किन्तु उन्होंने जमकर मजहब की राजनीति की। उन्होंने 16 अगस्त 1946 को जब धर्म के आधार पर देश बाँटने के लिए ‘डाइरेक्ट ऐक्शन डे’ का फरमान जारी किया तो पूरे बंगाल में मौत का तांडव मच गया। पूर्वी बंगाल का मुस्लिम बहुल जिला नोआखाली और पश्चिम बंगाल का महानगर कलकत्ता श्मशान बन गए। मुस्लिम लीग के इशारे पर कलकत्ता में सिर्फ 72 घंटे में 20 हजार से अधिक लोगों का कत्ल हुआ था, तीस हजार से अधिक लोग घायल हुए थे और कई लाख बेघर हो गए थे। यही हाल पंजाब का भी था। साप्रदायिकता का यह तांडव पूरे देश में साल भर चलता रहा- कहीं थोड़ा कम, कहीं ज्यादा।

इस दौरान हुई हिंसा में कम से कम दस लाख लोगों को बेरहमी से काट दिया गया था या जलाकर मार डाला गया था। लगभग पौने दो करोड़ लोगों ने अपना पुस्तैनी घर परिवार छोड़कर अपने कभी न भरने वाले जख्मों के साथ अपने संप्रदाय वाले देश में जाकर शिविरों में शरण ली थी।

जिन्ना को जरूर फायदा हुआ। पाकिस्तान में वे ‘कायदे आजम’ कहे गए। मेरे गाँव के पास के भी एक बड़े मियाँ साहब सबकुछ छोड़कर पाकिस्तान चले गए। संभव है, वे वहाँ सुखी रहे हों, किन्तु दोनो देशों के करोड़ों आम इंसान बरबाद हो गए। निदा फाजली ने ठीक कहा है-

“हिन्दू भी मजे में हैं, मुसलमाँ भी मजे में, इंसान परेशान यहाँ भी है वहाँ भी।”

इसलिए निस्संदेह रास्ता तो दो दिलों को जोड़ने वाला ही मुफीद होगा। आतिश ने कहा है,

“बुतखाना खोद डालिए, मस्जिद को ढाइए। दिल को न तोड़िए, ये खुदा का मुकाम है।”

खदेरू देवान

हम खुशनसीब हैं कि हमारे गाँव में लोगों के दिल हमेशा से जुड़े रहे हैं और आज भी भाई-चारे में कहीं कोई दरार नहीं ने आने पाई है। खदेरू देवान इसके गवाह हैं। वे ‘रामचरितमानस’ और ‘महाभारत’ से कहानियाँ चुनकर उन्हें अपने शब्दों में ढालकर भजन बनाते और गाते हैं। वे अपने भजनों की ऐसी सांगीतिक प्रस्तुति करते हैं कि सुनने वालों की प्यास बुझती ही नहीं, इच्छा बढ़ती जाती है। कभी-कभी तो रातभर भजन होता रहता है। उनकी भजन मंडली में सत्यनारायण, फूलचंद, सन्तराम, रामशिव, चेंपई भगत और सिंहासन के साथ मुंशी रजा भी हैं। यह मंडली सट्टा पर दूर-दूर तक शादी-ब्याह अथवा अन्य माँगलिक अवसरों पर भजन गाने जाती है। वे केवल हिन्दुओं से संबंधित भजन ही नहीं, हजरत मोहम्मद के जीवन की कहानियों को भी उतना ही रस लेकर गाते हैं।

एक बार मैंने उनसे पूछा, “आप मुसलमान होकर हिन्दू देवी-देवताओं की कथाएं तथा भजन गाते हैं तो क्या आप के मुसलमान भाई नाराज नहीं होते?” उन्होंने कहा था, “बिलकुल नहीं। वे खुश होते हैं और उन्हें भजन सुनकर अच्छा लगता है। महाभारत और रामायण की कथाओं में तो त्याग और प्रेम की ही बातें कही गई हैं, अन्याय और अत्याचार से लड़ने की ही तो सीख दी गई है। इन महापुरुषों की कहानियों से हमें बहुत शिक्षा मिलती है

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