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मरिकी बाभन
रामपुर की रामकहानी

मरिकी बाभन

रामपुर की रामकहानी-7                                        

बचपन में मैंने एक कहावत सुनी थी, “सावन भैंसा चइत चमार, मरिकी बाभन लगन कँहार

अर्थात सावन में भैंसा खूब मोटा हो जाता है क्योंकि उसको चरने के लिए सरेह में चारो तरफ हरी-हरी फसलें लहलहाने लगती हैं। चईत माह में चमारों की बन आती है क्योंकि रबी की फसल की कटाई होने लगती है और चमारों (संकेत मजदूरों की ओर) के घरों में भी गेहूँ की रोटी बनने लगती है। मौतें ज्यादा होती हैं तो ब्राह्मणों के चेहरे निखरने लगते हैं क्योंकि ब्रह्मभोज में दही-चिउड़ा और पुड़ी-सब्जी खाने को खूब मिलता है।

 उन दिनों मौतों का भी मौसम होता था। भादो आते-आते ज्यादातर घरों में अन्न की कमी हो जाती थी। लोग गाँव के धनी-मानी लोगों के यहाँ से धान उधार ले आते थे। इसे ‘मन्नी’ कहा जाता था। एक मन (32 रजिया) धान का फसल होने पर एक मन आठ रजिया वापस करना पड़ता था। मेरे गाँव में सबसे ज्यादा मन्नी सूर्यबली दास देते थे। लोग एकाध मंडा ‘सरया’ या ‘पाउस’ जरूर बोते थे। इस प्रजाति का धान जल्दी तैयार हो जाता था। अन्न की कमी के कारण कुपोषण तथा बरसात के कारण सही और समय से इलाज न हो पाने के कारण सावन-भादो के महीनों में मौतें ज्यादा होती थीं। इसी तरह लगन के समय कँहारों की बहार होती थी क्योंकि शादी-ब्याह में डोली-पालकी ढोने से अच्छी कमाई हो जाती थी, जज्ञ-परोजन में उनको काम भी मिलता था और सुस्वादु भोजन भी।

आज जिस तरह लावारिश साँढ़ गाँवों के किसानों का जीवन दूभर किए हुए हैं उसी तरह पहले लावारिश भैंसे गाँवों में घूमते रहते थे। कोई-कोई मरकहा भी होते थे। एक भैंसा घर के सामने के मेरे खेत में धान की खड़ी फसल चर रहा था। मैंने भाला उठाया और उसे खदेड़ कर अपने खेत से बाहर सड़क के उस पार कर दिया। लौटने लगा तो कुछ ही देर बाद थोड़ी आहट महसूस हुई। पीछे मुड़कर देखा तो भैंसा मुझसे सिर्फ दो-तीन मीटर दूर था। वह मुझे मारने के लिए पीछे-पीछे चुपचाप आ रहा था और मेरे ऊपर प्रहार करने ही वाला था कि मैंने भाला फेंका, चिल्लाया और अपनी पूरी ताकत से भाग कर राम नयन के घर की एक कोठरी में घुस गया। पीछे-पीछे भैंसा, हमारे और उसके बीच मात्र एक-दो फुट की दूरी बच गई थी। मैं मरते-मरते बँचा। कोठरी का दरवाजा इतना सँकरा था कि भैंसा उसमें घुस नहीं सका। वह दरवाजे पर खड़ा हो गया। राम नयन घर पर मौजूद थे और सब देख रहे थे। उन्होंने लाठी उठाई, चिल्लाए। कुछ और लोग भी जहाँ-तहाँ से मार-मार कहते हुए चिल्लाए। भैंसा धीरे-धीरे सड़क के उस पार चला गया। तबसे भैंसा को ही नहीं, भैंस को भी देखकर मैं काँप जाता हूँ।

अब तो लावारिश भैंसे दिखते ही नहीं। उस दिन जब सबेरे के वक्त कटहरा से दो लोग एक चोकरती हुई भैंस को हमारे गाँव की ओर ले जा रहे थे तो मैंने रामबृंद से पूछा, “इधर कहीं भैंसा है क्या ?” उन्होंने थरुआ टोले की तरफ के एक घर की ओर संकेत करते हुए बताया, “नेटुआ है। भैंसा पाले हुए है। तीन-चार गाँवों में भैंसें जब ‘उठती’ हैं तो उसी के यहाँ लोग ले जाते हैं। दो सौ रुपया लेता है एक भैंस को ‘पड़ियाने’ का।”

मित्रो ! यह क्षेपक था। अब ‘मरिकी बाभन’ वाले प्रकरण पर आता हूँ। बचपन में मैं भी अपने गाँव और उसके आस-पास कई बार राम नयन, होसिला, बड़कू भैया, झिनकू भैया आदि के साथ दही-चिउड़ा ( ब्रह्मभोज में भोजन को इसी नाम से पुकारा जाता था। ) खाने जा चुका हूँ। संकोच लगता था किन्तु दही-चिउड़ा मेरी भी कमजोरी है। कुछ लोग तो पता करते रहते थे कि आस-पास के किस गाँव में कितनी मौतें हुई हैं और श्राद्ध किस दिन पड़ेगा। कुछ लोग तो बिन बुलाए ही नियत तिथि को उनके यहाँ पहुँच जाते थे दही-चिउड़ा खाने। ब्राह्मणों के यहाँ तथा कंठीधारी वैष्णवों के यहाँ मृत्यु के तेरहवें दिन और बाकी अन्य जातियों के यहाँ सोलहवें दिन ब्रह्मभोज का विधान था। अमूमन ब्रह्मभोज के दिन प्रात: काल नाई भोजन का आमंत्रण देने आता था और भोजन के समय ‘बिजय’ की सूचना देने भी। यदि दूरी ज्यादा होती तो न्योता देते समय ही सबको ले आने की जिम्मेदारी भी उन्ही में से किसी एक ब्राह्मण को सौंप जाता।

ब्रह्मभोज का दिन आने तक का समय बिताना भी कम कष्टकर नहीं होता है। सबसे ज्यादा तकलीफ घर की महिलाओं और बच्चों को होती है। कहावत प्रचलित है कि, “मरनी से करनी दूभर होले।” यानी, मृत्यु से कठिन होता है मत्यु के बाद का खटकर्म (कर्मकांड)। जबतक बाल न उतर जाय और महापात्र भोजन न कर लें तब तक घर में एक ही वक्त भोजन बनता है, वह भी सादा। भोजन में तेल और हल्दी वर्जित होता है। घर की महिलाएं सुबह-शाम दोनो वक्त नियमित रूप से पास की नदी या तालाब में स्नान करती हैं। जाड़े के महीनों में तो बहुत कठिन होता है दोनो वक्त नहाना। तीर लेने वाला व्यक्ति भी दस दिन तक घर में भोजन नहीं कर सकता। उसे अपने लिए बाहर भोजन खुद पकाना और खाना पड़ता है, सिर्फ एक वक्त। भोजन में तेल, मसाले पूरी तरह वर्जित होते हैं। इन दिनों कई लोग गरुण पुराण भी सुनते हैं-पूरे तामझाम के साथ। इससे आत्मा भटकती नहीं है। ब्राह्मणों ने इतनी पाबंदियाँ क्या सोचकर लगाईं ?

 

 ब्रह्मभोज में ब्राह्मण कमर से ऊपर के कपड़े उतारकार, हाथ-पैर धोकर लोग पंहति ( पंक्ति) में जूट के बोरों या दरी आदि पर बैठते। सागौन या साखू के पत्तों से बने पत्तलों या कभी-कभी पुरइन के पत्तों पर पहले चिउड़ा-दही परोसा जाता। दही डालने से पहले चिउड़ा को लोग पानी से हलका भिगो देते फिर भरपूर मात्रा में दही मिलाते, ऊपर से चीनी या भेली। अब बारी कौर उठाने की होती। यह छूत का भोजन माना जाता। इस भोजन के बाद छूत से घरवालों को मुक्ति मिल जाती। इसलिए इस ब्रह्मभोज में जो ब्राह्मण सबसे पहले कौर उठाता उसे कुछ दच्छिना भी मिलता। घर का स्वामी अपनी क्षमता के अनुसार पाँच-सात रूपए चरणों पर रख कर हाथ जोड़ता कि उसका उद्धार किया जाय। कौर उठाने वाले ब्राह्मण का तर्क होता कि मृत्यु के बाद के इस भोज में सबसे पहले अन्न ग्रहण करने का अर्थ है कि सबसे ज्यादा पाप उसने स्वयं अपने ऊपर ले लिया है। इसके बाद सभी ब्राह्मणों को कुछ न कुछ दच्छिना दी जाती। कभी-कभी अठन्नी या एक-एक रूपये सबको मिल जाते। इसके बाद सभी भोजन करते। पत्तल से दही-चिउड़ा समाप्त होते देर नहीं लगती। बिना दाँत से कूँचे ही दही के साथ चिउड़ा घोंटते (निगलते) जाते। दही-चिउड़ा समाप्त होते ही पुड़ी और सब्जी आने लगती। एक ब्राह्मण सब्जी देता तो दूसरा उसके साथ ही पुड़ी परोसता। भोजन सामग्री पर अधिकार पूरी तरह पुरोहित का होता। अमूमन दो तरह की सब्जियाँ बनाई जातीं। माना जाता कि ब्राह्मण देवता भोजन करके तृप्त होंगे तभी दिवंगत आत्मा का भी उद्धार होगा और वह परिवार भी छुतका से मुक्त होगा। भोजन करने के लिए सोलह ब्राह्मणों की जरूरत पड़ती। इससे कम होने पर लोग कौर नहीं उठाते थे। जो ब्राह्मण देवता किन्हीं कारणों से भोजन करना नहीं चाहते थे, उन्हें खाद्य सामग्री बाँधकर घर लाने की छूट होती थी। किन्तु उन्हें भी पंहति में बैठना पड़ता था। सबके साथ उनका भी भोजन परोसा जाता था। बस वे खाते नहीं थे, चुप चाप बैठे रहते थे और अंत में अपने गमछे में बाँधकर घर ले जाते थे। इसे ‘छन्ना’ कहा जाता था। लोग इसे अच्छा नहीं मानते थे।

ब्रह्मभोज से पहले दसगातर होता-मृत्यु के दसवें दिन, जिसमें महपातर ( महापात्र) भोजन करते। उनसे उऋण होना ज्यादा कठिन होता क्योंकि वे पाँच-दस की संख्या में आते। गाँव के बाहर किसी पेड़ के नीचे या उपयुक्त स्थान पर वे मिट्टी के बर्तनों में सादा सुस्वादु भोजन पकाते और खाते। सबसे कठिन होता भोजन के समय उनको संतुष्ट करना। उन्हें सज्जा ( शय्यादान) देना पड़ता। सज्जा में खटिया, बिस्तर, बर्तन, कपड़े, भोजन की सामग्री आदि सबकुछ। इनके अलावा कुछ नकद भी। ऐसा माना जाता कि जो भी यहाँ सज्जा के रूप में दिया जाता है वह उस लोक में मृतक को प्राप्त होता है। भोजन करने विराजते समय महापात्रों का अगुआ दान के रूप में गृहस्वामी से कोई मूल्यवान वस्तु, पशु या धन प्राप्त करने का प्रयास करता। इसे सामाजिक हैसियत से भी जोड़ दिया गया था। गाँव के लोग देखने भी आते थे कि अमुक व्यक्ति ने सज्जा में क्या-क्या दान किया है। कम देने पर निंदा सुनने के लिए भी तैयार रहना पड़ता था।

एक दिन चार बजे के करीब राम नयन, होसिला को लिए हुए मेरे घर आए और मुझे दही-चिउड़ा खाने के लिए पड़ोस के गाँव कटहरा चलने का आग्रह करने लगे। दरअसल पाँच ब्राह्मणों को अपने साथ ले आने का होसिला ने आश्वासन दे रखा था। दस ब्राह्मणों की व्यवस्था पुरोहित ने कर ली थी। एक पुरोहित खुद थे। होसिला मेरे बचपन के दोस्त थे। मुझसे केवल एक महीना छोटे। हम साथ-साथ कुश्ती लड़ते थे अखाड़े में। पढ़ाई में उनकी रुचि बहुत कम थी। दर्जा सात तक पहुँचते-पहुँचते उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी और निष्ठा के साथ भैंस चराने लगे थे। मैं उन दिनों दर्जा नौ में पढ़ रहा था। दोस्ती बनी हुई थी। मुझसे घिघियाने लगे, “चल S आठ बजे ले लवटि आइल जाई।” मैं उनकी बात टाल न सका। बड़के टोला से दो लोग और आ गए। हम हाथ में लोटा लिए हुए पैदल चल दिए और एक घंटे में कटहरा पहुँच गए।

 टाटी से घेरे हुए छप्पर के घर में रहने वाले उस परिवार का इकलौता जवान बेटा, जो मजदूरी करके अपनी माँ और तीन बहनों का पेट पालता था, किसी अज्ञात बीमारी से दिवंगत हो चुका था। ब्रह्मभोज के दिन भी उसकी माँ सिर पीट-पीट कर रो रही थी। उस घर का कारुणिक दृश्य देखकर मैं भी मन ही मन रोने लगा था। हृदय को विदीर्ण करने वाले उस वातावरण में भी जब हम भोजन के लिए पंहति में बैठे तो हमारे बीच के एक वरिष्ठ विप्र ने कौर उठाने से मना कर दिया क्योंकि संख्या सोलह पूरी नहीं हुई थी। गाँव के कुछ संवेदनशील लोगों ने हाथ जोड़कर हम ब्राह्मण देवताओं से उस परिवार का उद्धार करने का आग्रह किया। हमारे बीच के उस वरिष्ठ विप्र का दिल भी पसीजा और उन्होंने एक रास्ता सुझाया। उन्होंने पंहति में दो पत्तल और रखवा कर सोलह की संख्या पूरी करने का निर्देश दिया। रास्ता आसान था लोगों ने दो पत्तल और रखे। उन पत्तलों पर सभी खाद्य सामग्री रखी गई। भोजन और दक्षिणा के बाद उन दोनो पत्तलों पर रखी गई खाद्य सामग्री उस ब्राह्मण देवता को सुपुर्द की गई और वे कृपा करके उसे अपने घर ले गए। इस घटना के बाद मैंने दही-चिउड़ा खाना सदा के लिए छोड़ दिया।

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29 अक्टूबर 2021 का दिन। प्रात: काल जब मैं मॉर्निंग वाक से वापस पर आ रहा था और लाल रंग के सूरज का बिम्ब कवि केशव के कापालिक का भी कान काट रहा था, तो रास्ते में ही जयश्री भैया ने दुक्खी काका (दुखी मौर्य) के निधन की खबर दी, “बाबू, सुनल S ह S ? दुक्खी काका नाईं बाड़ें।”

इस तरह की खबरें गाँवो में करेंट की तरह फैलती हैं। शहर के लोग तो उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। दुक्खी काका मेरे गाँव के ही नहीं, मेरे पड़ोसी भी थे लिहाजा मैं सीधे उनके घर जाना मुनासिब समझा। दरवाजे पर आठ-दस लोग मौजूद थे, किन्तु घर का कोई भी नहीं था। सिर्फ काकी (उनकी पत्नी) थीं। दसई काका ने हाथ से ही मुझे इशारा किया कि मैं काकी से कुछ न कहूँ। दरअसल काकी से उनके निधन की खबर छिपाई गई थी। उनको बताया गया था कि गोरखपुर से इलाज कराकर और स्वस्थ होकर काका शीघ्र आ रहे हैं। दुक्खी काका को इलाज कराने के लिए तीन दिन पहले गोरखपुर ले जाया गया था। काकी ने मुझे देखकर खुद ही कहा, “बाबू अब्बे थोड़े देर में ऊ आ जईहें। उनकर हाल-चाल ठीक बा।”

मैने भी दिल पर पत्थर रखकर सिर हिला दिया। आठ बजते-बजते पें-पें की आवाज करते हुए एंबुलेंस घर के सामने आकर रुक गई। ज्योंहि दुक्खी काका का शव एंबुलेंस से बाहर निकाला गया, काकी दहाड़ मार कर रो पड़ीं। उनकी रुलाई देखकर वहाँ उपस्थित गाँव के सभी लोगों की आँखें भर आयीँ। देखते-देखते पचासों स्त्री-पुरुष जुट गए। काकी का साथ देती हुई गाँव की कुछ महिलाएं भी रोने लगीं। यद्यपि दुक्खी काका नब्बे पार कर चुके थे और भरपूर जिन्दगी जीकर दिवंगत हुए थे। उनके बेटों और बहुओं ने उनकी भरपूर सेवा भी की थी, किन्तु कोई कितना भी बूढ़ा हो, मृत्यु का शोक तो होता ही है।

 उनके छोटे बेटे की प्रतीक्षा में कुछ समय लगा। हैदराबाद से उसके आते ही शव-यात्रा शुरू हो गई। सारी तैयारी पहले से हो चुकी थी। तब तक लगभग चार बज चुके थे। उनकी शव-यात्रा में मैं भी रामघाट तक गया और अन्तिम क्रिया होने तक वहाँ रुका रहा। पहले जो लोग शव-यात्रा में जाते थे वे वहीं नदी में स्नान करके ही घर लौटते थे। घर आने पर भी उन्हें दाँत से मिर्चा काटना पड़ता था। इसके पहले मुँह में कुछ भी डालना वर्जित था। किन्तु इस बार मेरा अनुभव बिल्कुल अलग था। घाट के बगल में चाय की दूकान थी। जब तक शव जल रहा था, मेरे गाँव के प्रधान शैलेन्द्र मद्धेशिया मुझे उस दूकान तक ले गए। मेरे साथ गाँव के दूसरे कई वरिष्ठ लोग भी थे। उन्होंने सबको चाय पिलायी। मैंने यह भी देखा कि दुक्खी काका के बेटों के अलावा अन्य किसी ने भी नदी में स्नान नहीं किया। शव-यात्रा में शामिल लोग शव के जलने के साथ ही वापस लौट गए। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि नदी में स्नान के लिए पर्याप्त जल नहीं था और पानी का प्रवाह भी कम था। मैंने महेन्द्र मिश्र से नहाने के बारे में पूछा तो उन्होंने, “घरे नहाइल जाई।” कहते हुए साफ मना कर दिया और हाथ पकड़ कर अपनी बाइक तक ले गए। उन्ही की बाइक से मैं घाट तक आया भी था। घर लौटने पर अपनी सहधर्मिणी की जिद पर हरा मिर्चा दाँत से काटा। तीखेपन से कान झनझना उठा। घर के बाहर स्नान करने के बाद ही घर के भीतर प्रवेश कर सका।

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात थी दुक्खी काका के निधन पर उनके पुत्रों द्वारा श्राद्ध कर्म तथा ब्राह्मण भोज का बहिष्कार। उनके बेटों ने न तीर ग्रहण किया, न घंट बाँधा, न महापात्रों को भोजन कराया और न ब्राह्मणों को ही। चकित करने वाली बात यह भी थी कि इसके लिए उनके कुछ पट्टीदारों ने मुँह पीछे नाक-भौं तो सिकोड़ा किन्तु सामने कुछ नहीं कहा। उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा पर भी किसी तरह की आँच नहीं आयी। इसके क्या कारण हैं ? क्या गाँव के दूसरे गरीब लोग ऐसा करने का साहस कर पाते ?

दुक्खी काका के बेटों ने कुछ संतों (साधुओं) को भोजन के लिए आमंत्रित किया। ऐसे आमंत्रित संत-गण अपने तथा पड़ोस के गाँवों के ही थे इसलिए उनकी जातियों के बारे में सभी को पता था। उनमें अहीर भी थे और पटनवार भी, कोइरी भी थे और कोंहार भी, केवट भी थे और चमार भी, कँहार भी थे और धरिकार भी। किन्तु वे अब संत बन चुके थे और संतों की कोई जाति नहीं होती। वे कबीर के इस कथन में विश्वास करते थे,

 “जाति पाँति पूछे नहिं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।”

 संतों ने हरिनाम का गुणगान करने के बाद भोजन किया। तृप्त हुए। बेटों ने उन्हें पहनने के लिए वस्त्र दिए और कुछ दक्षिणा भी। संतों की कृपा से दुक्खी काका का परिवार “छुतका से मुक्त” हो गया। बाद में गाँव के अन्य लोगों ने भी उनके घर भोजन किया।

अपने गाँव के लोगों में मैंने जिस जड़ता का अनुभव किया था उसे देखते हुए ऐसा चमत्कारिक परिवर्तन मेरे लिए अकल्पनीय था।

दूसरे दिन अपने मार्निंग वाकर साथी रामबृंद से मैंने पूछा, “इस तरह से ब्रह्भोज का बहिष्कार क्या गाँव में किसी और ने भी किया है ?” रामबृंद ने गाँव से तो नहीं, किन्तु क्षेत्र से कुछ उदाहरण जरूर दिए और बताया कि गायत्री परिवार तथा आर्य समाजियों की ओर से अब इस क्षेत्र में कुछ लोग सक्रिय हैं। वे हवन-पूजन कराकर बड़े ही संक्षेप में और बहुत कम खर्चे में लोगों को इन कर्मकांडों से मुक्त कर देते हैं। किन्तु दुक्खी काका के बेटों ने जो दृष्टांत प्रस्तुत किया वह न तो गायत्री परिवार का था और न आर्य समाज का। वह कुछ अलग ही था।

दुक्खी काका के दोनो बेटे सरकारी नौकरी करते हैं। घर में ट्रैक्टर है। बहू गाँव के प्राइमरी स्कूल में शिक्षिका है। आस पास की जमीन खरीद कर चारो ओर से चहारदीवारी डाल चुके हैं। उनके घर के बच्चे महाराज गंज के इंग्लिश मीडियम पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं और उन्हें लेने शहर से स्कूल की बस आती है। लगभग एक करोड़ की लागत वाला उनका आलीशान मकान निर्माणाधीन है। गाँव में उनकी हैसियत देखकर सामाजिक असमानता का शब्द हास्यास्पद लगता है। उन्होंने सदियों से चली आ रही एक लिजलिजी कुप्रथा को तोड़कर दिखा दिया और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा पर भी कोई आँच नहीं आई। इसका सीधा तात्पर्य है कि हमारे गाँवों में जाति-प्रथा अपना अंतर्वस्तु खो चुकी है। अब जो आर्थिक दृष्टि से समृद्ध हैं, सामाजिक प्रतिष्ठा भी उन्हें ही मिलेगी। “सर्वे गुणा: कांचनमाश्रयंति।”

जिस वर्ष मैंने दही-चिउड़ा खाना छोड़ा था उसी वर्ष बाऊजी के आदेश पर कटहरा के ही एक परिवार में सत्यनारायण व्रत-कथा का भी अनुष्ठान संपन्न कराया था। इसके लिए बाजार से सत्यनारायण ब्रत-कथा की पोथी खरीदी। एक दिन पहले पूजन संबंधी तरीके का खूब अभ्यास किया तब जाकर वहाँ कथा का अनुष्ठान संपन्न हो सका। अनुष्ठान के दौरान अपराधबोध की एक विचित्र अनुभूति हुई थी मुझे, जब कथा सुनने वाले उस अनपढ़ गरीब अँधेड़ दंपति ने मुझ जैसे पंद्रह वर्षीय ‘ब्राह्मण देवता’ का पाँव छूकर आशीर्वाद लिया था। सत्यनारायण कथा के बाद सजाव दही और चिउड़ा का भोजन हुआ और अपेक्षा से अधिक दान-दक्षिणा लेकर हम घर आए थे। इतना सम्मान और मुफ्त में दान-दक्षिणा पाने की खुशी तो हुई किन्तु उस दंपति द्वारा मेरा पाँव छूकर आशीर्वाद लेने की घटना मेरे मन से निकल ही नहीं रही थी। बाऊजी के मन में कहीं न कहीं यह भाव था कि अवसर मिलने पर पुरोहिती करने की क्षमता भी उनके बेटे में विकसित होनी चाहिए ताकि उससे भी कुछ कमाई हो सके। आखिर हमारा तो यही पेशा है न? बाऊजी ने बाद में इस तरह का एक-दो और प्रस्ताव मेरे सामने रखा था और मैंने आनाकानी की तो उन्होंने जोर देना छोड़ दिया था। सत्यनारायण व्रत-कथा कहने का मेरा वह पहला अवसर था और आखिरी भी

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