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सामयिक

मई और जून की गरमी..

 

  • महेंद्र राजा जैन        

 

मई और जून का महीना! इन दो महीनों की गरमी बहुत लोगों को पसन्द नहीं होगी। यही बात उन लाखों/करोड़ों विद्यार्थियों के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है जिन्हें इस समय परीक्षाओं की तैयारी करनी होती है या परीक्षा देनी होती है – और परीक्षाएँ भी ऐसी जगहों पर जहाँ कभी-कभी न तो पंखे होते हैं और पीने को ठंडा पानी तो दूर, कहीं-कहीं सादा पानी भी नहीं मिल पाता। ऐसे लोगों के लिए एक खुशखबरी यह है कि अमेरिका में कुछ शोधकर्ताओं ने खोज कर पता लगाया है कि इन दो महीनों में गरमी के कारण अधिकाँश छात्रों को परीक्षाओं में अच्छे अंक नहीं मिल पाते।

हारवर्ड विश्वविद्यालय, यूनीवर्सिटी कालेज लास एँजिल्स और जार्जिया स्टेट यूनीवर्सिटी ने मिल कर तेरह वर्ष तक एक करोड़ से अधिक सेकण्डरी छात्रों के परीक्षा-परिणामों का अध्ययन कर उनकी तुलना उत्तरी ठन्डे प्रदेशों में होने वाली परीक्षाओं से की तो पता चला कि तापमान में एक प्रतिशत की गिरावट का परिणाम परीक्षा फल में भी औसत एक प्रतिशत की कमी होता है। ब्रिटेन में तो स्थिति और भी खराब है। शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि परीक्षा हाल में एयरकंडीशनिंग का भी परीक्षाफल के स्कोर पर असर पड़ता है। वहाँ स्कूलों और कालेजों में एयरकंडीशनिंग की अपेक्षा खिड़कियाँ अक्सर बन्द मिलेंगी यानी खिड़कियाँ इस कदर बन्द रहती हैं कि जरूरत पड़ने पर आसानी से खोली नहीं जा सकतीं।

यह कुछ ठीक भी है, क्योंकि वहाँ वर्ष भर में बहुत कम समय यानी कुछ सप्ताह भी ऐसे नहीं होते किएयरकंडीशनिंग की जाए। लेकिन वहाँ जून का महीना ऐसा होता है जब औसत तापमान 21 सेंटीग्रेड (70 फारेनहाइट) से अधिक हो जाता है और वहाँ इसी महीने में अधिकांश परीक्षाएँ होती हैं। ज्ञातव्य है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण अन्य देशों के समान वहाँ का मौसम भी अबपहले से कुछ बदल गया है और जून में बहुत गरमी पड़ने लगी है।

इन सब बातों पर विचार करने पर हमें यह सोचने को बाध्य होना पड़ता है कि परीक्षाएँ मई-जून में ही क्यों होती हैं। छात्रों को इन्हीं महीनों में अपनी कठिनतम परीक्षाओं की तैयारी करने को क्यों कहा जाता है जबकि बाहर लू चल रही होती है और लोगों को सलाह दी जाती है कि बाहर कम-से-कम निकलें। भारत में प्रायमरी स्कूलों से लेकर हाई स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों में भी परीक्षाएँ इन्हीं महीनों में होती हैं। यह निश्चय ही अंग्रेजी शिक्षा पद्धति का प्रभाव कहा जा सकता है। देश में जब अंग्रेजी शासन था उस समय इंगलैंड में मई-जून के महीने ऐसे गर्म नहीं होते थे जैसे आजकल ग्लोबल वार्मिंग के कारण हो जाते हैं। इन महीनों में वहाँ की गरमी भारत में सितम्बर-अक्टूबर की गरमी के समान होती थी।

अतः वहाँ परीक्षाएँ अप्रैल से लेकर जून तक होती थीं और बीच में दो माह का अवकाश होकर सितम्बर से नया सत्र शुरू होता था। उसी के अनुसार अंग्रेजों ने यहाँ भी शिक्षा पद्धति शुरू की, जो अब तक यानी स्वतन्त्रता के 73 वर्ष बाद भी ज्यों की त्यों चली आ रही है। पर अब स्थिति काफी बदल गयी है। अब सोचना पड़ता है कि क्या कारण है कि अभी भी हम छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े छात्रों को भी इस भीषण गर्मी में परीक्षा की तैयारी करने और परीक्षाओं में बैठने के लिए बाध्य करते हैं – ऐसी परीक्षाएँ जो कभी-कभी उनके जीवन की महत्वपूर्ण परीक्षाएँ होती हैं। क्या ऐसा कुछ नहीं किया जा सकता कि यदि मई-जून में ही परीक्षाएँ रखना आवश्यक समझा जाए तो आनलाइन परीक्षा की बात सोची जाए या फिर शिक्षा का पूरा ढाँचा ही बदल कर परीक्षाएँ शीत ऋतु में रखी जाए।

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केवल शिक्षा पद्धति ही क्यों, अदालतें, बैंक, पोस्ट आफिस, दुकानों आदि के खुलने-बन्द होने के समय में भी इसी प्रकार परिवर्तन किया जा सकता है कि लोगों को धूप में बाहर न निकलना पड़े। मुझे कुछ वर्ष तक अफ्रीकी देशों में रहने/काम करने का अवसर मिला है। वहाँ अधिकांशतः सुबह 7 बजे से 11-12 बजे तक और फिर 3-4 बजे से शाम को 7-8 बजे तक अदालतें, बैंक, कारखाने, दुकानें आदि खुली रहती हैं और दोपहर को 3-4 घन्टे का अवकाश रहता है। क्या ऐसा ही कुछ यहाँ नहीं किया जा सकता है। मेरे विचार से इस परिवर्तन से कोई हानि नहीं होने वाली है और लोग इस परिवर्तन का समर्थन करेंगे। इससे आफिसों में अधिक कार्य होगा, दुकानों में अधिक बिक्री होगी और लोग भी धीरे-धीरे इसके अभ्यस्त हो जाएँगे।

mahendra raja jain