Tag: ‘डेथ स्क्रिप्ट’ आशुतोष भारद्वाज

एक देश बारह दुनिया
पुस्तक-समीक्षा

नागरिकता के अर्थ की तलाश है ‘एक देश बारह दुनिया’

 

हाल के कुछ वर्षों में जनपक्षधर पत्रकारिता से जुड़े जो जीवन्त रिपोर्ताज प्रकाशित हुए हैं, उनमें की ‘एक देश बारह दुनिया’ का विशेष महत्व है। यह पुस्तक 2021 में राजपाल एंड संस से प्रकाशित हुई है। हिन्दी पत्रकारिता की विश्वसनीयता अपने ढलान पर है। ऐसे मुश्किल वक्त में सुदूर देहात, गुमनाम जनजातियों, विस्थापन का दंश झेलते उत्पीड़ित मनुष्यता का जो यथार्थ अभिव्यक्ति अपने रिपोर्टिंग (साहित्यिक गुण के कारण रिपोर्ताज कहना ज्यादा उचित है) में पत्रकार ने दिया है वह हिन्दी पाठकों को एकबारगी हिन्दी पत्रकारिता के प्रति विश्वास जगाता है। यह किताब निश्चित रूप से ‘रुकतापर’ (पुष्यमित्र), ‘डेथ स्क्रिप्ट’ (आशुतोष भारद्वाज, अंग्रेजी में) के श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। बल्कि इस किताब का रेंज बाकी दोनों किताबों से ज्यादा विस्तृत है भौगोलिक और विषयगत दोनों ही दृष्टि से। छह रिपोर्टिंग महाराष्ट्र से, एक-एक रिपोर्टिंग गुजरात, मध्यप्रदेश और राजस्थान से और तीन छत्तीसगढ़ से। सभी रिपोर्टिंग अलग-अलग विषयों पर है जिसमें भुखमरी, वैश्यावृत्ति, विस्थापन, कलाओं के पहचान का संकट, पलायन, गरीबी, पर्यावरण संकट, कॉरपोरेट की लूट, नक्सल तथा पुलिसिया हिंसा, पुरातत्व की अनदेखी, कृषि तथा जल संकट की अनदेखी शामिल है।

   यह यह संयोग ही है कि इस किताब का पहला अध्याय भुखमरी पर है और अंतिम अध्याय कृषि संकट पर दोनों ही स्थितियों में गरीब आदमी मर रहा है या आत्महत्या कर रहा है।

‘मेलघाट’ का क्षेत्र बाघ संरक्षण के लिए जाना जाता है। लोग पर्यटनवादी दृष्टिकोण से आते हैं, घूमकर चले जाते हैं। लेखक इस क्षेत्र का यथार्थ जनता के सामने रखते हैं। लिखते हैं ‘मेलघाट पर छोटे बच्चों की मौत के आंकड़े यहाँ की पहाड़ियों से ज्यादा ऊँचे हैं।’ 1991 से अबतक 10762 बच्चों की मौत भूख से हो गयी है। इसलिए लेखक खीझ और व्यंग्य दोनों के मिश्रित भाव में लिखते हैं ‘ मेलघाट, बच्चों के मौत के घाट पर!’ 

यहाँ के कोरकू जनजाति (आदिवासी) के लिए संघर्ष का मतलब है जंगल जीना और मैदानी इलाकों में काम तलाशना। उनका पूरा संघर्ष इसी दो काम के लिए है। जंगल में बाघ होना अच्छे पर्यावरण का प्रतीक है लेकिन इसी जंगल में सदियों से रह रहे आदिवासी सरकार और कॉरपोरेट की नजर में जंगल के लिए खतरा लग रहे हैं। यह सरकारी दमन और कॉरपोरेट लूट का क्रूरतम चेहरा है। हमारे देश में पर्यटनवादी दृष्टिकोण इतना हावी है कि जहाँ अस्पताल,स्कूल तथा अन्य जरूरी सुविधाएँ होना चाहिए वहाँ बाघ संरक्षण के नाम पर पैसे बहाए जा रहे हैं। लेखक ने इस भद्दे पर्यटनवादी रवैया पर एकदम सटीक लिखा है कि ‘मेलघाट के नजारे तभी तक सुंदर हैं जब तक कि आप बीमार नहीं होते।’ यहाँ से अस्पताल की दूरी 70 किलोमीटर से भी ज्यादा है।

वन कानून और अधिकारियों के मनमाने व्यवहार के कारण यहाँ के जनता के लिए चारागाह भी सिमटते जा रहे हैं। यह स्थिति केवल महाराष्ट्र के आदिवासियों के साथ नहीं है बल्कि संपूर्ण भारत के आदिवासी इस कपटपूर्ण व्यवहार के शिकार हैं। जंगल सम्बन्धित नीतियाँ बनाते हुए शायद ही स्थानीय आदिवासियों की राय ली जाती है। फलस्वरूप , आदिवासी या तो आन्दोलनरत हैं या विस्थापन से जूझ रहे हैं। इस प्रवृत्ति के कारण ही लेखक ने जाँच-परखकर लिखा है कि ‘देश जंगल के भीतर बनाम जंगल के बाहर की दुनिया में विभाजित है।’ इस विभाजन के कर्ता-धर्ता हैं कॉरपोरेट, नेता और ब्यूरोक्रेसी। बस्तर के लोकगीतों में कहा जाता है, नरक वह है जहाँ दूर- दूर तक शाल का वृक्ष हो और वहाँ खड़ा हो एक खाकी वर्दी वाला। यही बात सुखदेव एवले कह रहे हैं मेलघाट में ‘ अफसर के आने का मतलब है खतरा आ गया है।’ हमारे देश की लोकतांत्रिक संस्थाएँ आज भी आदिवासियों के जमीन को उपनिवेश की तरह देखती हैं। यह रिपोर्टिंग स्थानीय होते हुए भी राष्ट्रीय पीड़ा को बयां करती है और कुछ मामलों में ग्लोबल है खासकर आदिवासियों के जमीन लूटने और विस्थापन के संदर्भ में।

 कमाठीपुरा एशिया का सबसे बड़ा रेड लाइट इलाका है। यहाँ के क्रूर यथार्थ और सेक्स वर्कर्स के जीवन को संजय लीला भंसाली की आने वाली फिल्म ‘गंगूबाई’ से कतई नहीं समझा जा सकता है। इसे समझने के लिए नलिनी जमाल जैसी सेक्स वर्कर (बाद में व्यवसायी और सामाजिक कार्यकर्ता बनी) की आत्मकथा ‘एक सेक्स वर्कर की आत्मकथा’ पढ़ना पड़ेगा या इस किताब में दर्ज रिपोर्टिंग ‘पिंजरेनुमा कोठरियों में जिंदगी’ पढ़ना होगा। जबतक सेक्स वर्कर के नजरिए से उनकी जिंदगी को नहीं समझेंगे हम उनके लिए या तो सहानुभूति रखेंगे या उनसे नफ़रत करेंगे।

  रेड लाइट एरिया के चमक-दमक से इतर यहाँ की कोठरियों में एक बेड इतना ही जगह होती है। ‘यहाँ ग्राहकों के घुसने के कई दरवाजे हैं, चढ़ने के कई सीढ़ियाँ हैं। लेकिन, यहाँ से इन लड़कियों के निकलने के रास्ते आसान नहीं है।’ इनके लिए रास्ता कठिन बनाया है लड़कियों की गरीबी, अशिक्षा, धोखेबाज प्रेमियों, सामाजिक रूढ़ियों और शोषक परिवारों ने। ये सब सभ्य समाज के धूर्तता के जिंदा सबूत हैं। यही कारण है कि यहाँ काम करने वाली महिलाएँ कहती हैं कि उन्हें यहाँ आजादी और आत्मविश्वास का अनुभव होता है।

 सभ्य समाज ने इन्हें इस दलदल में धकेला और जब भी उन्हें इनकी जमीनें हड़पनी होती हैं तो सामाजिक कल्याण और नागरिक असुविधा के नामपर इन्हें विस्थापित कर दिया जाता है। शांतिनगर जैसे मोहल्ले 1993 से 2008 तक 199बार उजाड़े गए हैं। सरकार अपने सभ्य नागरिकों को इसके लिए कोई दोष नहीं देती है कि आख़िर बस्तियों की संख्या कम होने के बावजूद ग्राहकों की संख्या क्यों बढ़ रही है? क्यों ज्यादातर ग्राहकों को कमसिन देह ही चाहिए भोगने के लिए? इसपर सामाजिक कल्याण के ठेकेदार बात नहीं करते। बस कॉरपोरेट को जमीन दिलवानी हो तो नैतिकता के नाम पर बस्ती पर बुलडोजर चलवा दिया जाता है। मजेदार बात है कि जिस बस्ती को अनैतिक कहा जाता है वहाँ दंगा होते नहीं सुना गया है। इसलिए यहाँ की जटिल परिस्थितियों को समझने के लिए फिल्मों के ‘उमराव जान’ वाली नजरिए से बाहर निकलकर मंटो की ‘काली सलवार’ तक की यात्रा करना पड़ेगा।

 भारत में आदिवासी, दलित (हर वर्ग और धर्म के) और अन्य (वैसे जाति-जनजाति जिनका नाम भारत सरकार के जाति सूची में नहीं है) समूह प्रायः उपेक्षा का शिकार है। खासकर जमीन और रोजगार की उपलब्धता के मामले में। ‘अपने देश के परदेसी’, ‘कोई सितारा नहीं चमकता’, ‘गन्नों के खेतों में चीनी कड़वी’ इस मुद्दे का भयावह दृश्य और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ‘तीरमली’ घुमन्तू जनजाति नंदी बैल के सहारे अपना जीवनयापन करते रहे हैं तो ‘सैय्यद मदारी’ खतरनाक करतब (स्टंट) करके अपना जीवन चलाते हैं। बदलते समय में इनकी कला और पहचान दोनों सिमट गए। लेकिन एक चीज बची रह गयी वह है ‘सामूहिकता’। इसलिए जहाँ भी इनकी बस्तियाँ हैं वहाँ खेती और अन्य काम सामुहिकता बंटवारे के विचारधारा पर केंद्रित है। इनके पास प्रायः आधार कार्ड और अन्य नागरिक पहचान की योजनाओं की अनुपलब्धता है। ‘सैय्यद मदारी’ का तो महाराष्ट्र सरकार के जाति सूची में नाम तक शामिल नहीं है। ये सब ‘अन्य’ हैं इस देश में। ये सच में ‘उपेक्षा’ के चबूतरे पर हैं। इन्होंने अपने कला पर कभी टिकट नहीं लगाया। सबका मनोरंजन किया। इसलिए लाखों कमाने वाले स्टन्टमैन को सब जानते हैं, दारा सिंह को मोटरसाइकिल खींचने के लिए जानते हैं पर एक हाथ से मोटरसाइकिल रोकने वाले ‘सैय्यद मदारी’ को कोई नहीं जानता!

  महाराष्ट्र गन्ना के उत्पादन के लिए जाना जाता है मस्सा क्षेत्र के अवलोकन के जरिए लेखक ने बताया है कि गन्ना उत्पादन में शामिल जोड़ा (मजदूर पति-पत्नी) कैसे मुकादम (दलाल) के जरिए शोषित है और जमीन मालिकों के बंधुआ मजदूर बनने पर मजबूर है। उसके बच्चे स्कूल छोड़ने को मजबूर हैं। गरीबी का यह चक्रीय प्रक्रिया उन्हें मजदूर से ‘नागरिक’ (सम्मानजनक जीवन) नहीं बनने दे रही है। गन्नों को जड़ से उखाड़ने की प्रक्रिया में कई वर्षों से यहाँ जोड़ा और उनके बच्चे अपने ‘जड़’ से उखाड़ दिए गए हैं। यहाँ मजदूरी करके रोटी पाना देश के नीति निर्माताओं की चिंतन में शामिल नहीं है। यहाँ मजदूरी ही देशभक्ति है। दरअसल भारत का ग्रामीण और अर्ध नगरीय जीवन का बड़ा हिस्सा विकास के मूल विचार से विस्थापित हो चुका है। लेखक इसे राष्ट्रीय परिघटना के रूप में भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के रिपोर्टिंग के माध्यम से बताते हैं।

  ‘पारधी’ आदिवासी समुदाय को अंग्रेजों ने 1871 में अपराधिक जनजाति घोषित किया था। 1952 में यह कानून समाप्त हुआ। लेकिन आम जनता आज भी उन्हें अपराधी की तरह देखती है। यह बेहद सकारात्मक बात है कि पारधी समूह ने आदिवासी दर्शन के अनुकूल अपने शैक्षणिक संस्थान का मॉडल विकसित किया जिसपर भारतीय शिक्षाशास्त्रियों को शोध करना चाहिए। इन्होंने स्कूल का नाम ‘पाठशाला’ की ‘समाजशाला’ रखा है। टीचिंग-लर्निंग मटीरियल भी रचनात्मक हैं। शिक्षा का वैकल्पिक मॉडल और उपेक्षित जनों का शिक्षाशास्त्र कैसा होना चाहिए उसका बेजोड़ नमूना है पारधी समुदाय और उनका शिक्षण संस्थान। जरूरत है कि जनता अपना नजरिया बदले और उन्हें सम्मान दे।

   मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के रिपोर्टिंग क्रमशः पर्यावरण और नर्मदा नदी के विनाश, कॉरपोरेट लूट, राजनीतिक कुटिलता के कारण भुखमरी से आत्महत्या करते किसान, आदिवासी और पुरातत्व के घोर उपेक्षा का कड़वा यथार्थ प्रस्तुत करता है। नर्मदा पर बांध और तवा परियोजना ने अमरकंटक और समूचे आसपास के इलाके को खतरे में डाल चुका है। सरकार जिंदगी और सुविधा में ‘सुविधा’ चुन रही है। यह सुविधा कुछ मुट्ठी भर लोगों के मुनाफे के लिए है, उनके पूँजी और राजनेताओं के चंदे की सुविधा आम जनता अपनी जिंदगी से चुका रहा है और आगे भी चुकाएगा। इसलिए लेखक ने महत्वपूर्ण सवाल रखा है ‘पुरातन ग्राम’ का इतिहास क्यों नहीं लिखा गया? लिखा गया होता तो शहरीकरण प्रकृति को लील नहीं पाता। छत्तीसगढ़ में नक्सल और पुलिस हिंसा दोनों तरफ से आम आदमी ‘गलतफहमी’ में मारा जा रहा है। वहाँ की ऊर्जा से बिजली बनायी जा रही है पर उनके ही गाँव में बिजली नहीं है। इसी को कहते हैं ‘चिराग तले अंधेरा’ का यथार्थ रूप। अधिकारी ऑफिस में ही सर्वेक्षण कर ले रहे हैं और किसानों को मुआवजा नहीं मिल रहा है। सरकार कहती है विपक्ष झूठ कहता है किसान मजे में हैं। इन्हीं राजनीति में कहीं मदकूद्वीप जैसा धरोहर उपेक्षित रह जाता है। ‘जनता का इतिहास’ वैसे भी उपेक्षित ही रह जाता है।

   लेखक जन पक्षधर पत्रकार हैं इसीलिए वह भी अपने आप को जनता के इतिहास में ही रखते हैं। इसीलिए वह इस बात को मानते हैं कि वे जिस जनता की बात करते हैं उनसे ही उनकी पहचान बनती है, नहीं तो उन जैसे रिपोर्टरों को मेट्रोपॉलिटन सिटीज वाले सेलिब्रिटी पत्रकार उपेक्षित ही समझते हैं। पत्रकार होने के नाते उनकी यह टिप्पणी उल्लेखनीय है कि ‘कुछ लोगों को किताबें व्यापकता की ओर ले जाती होंगी, मुझे इस तरह की यात्राएं।’ यही व्यापकता इस किताब की विविध विषयों में है जो इसे खास बनाती है