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‘एकुशे जुलाई’ : बर्बर वामपन्थी और ममता बनर्जी का संघर्ष

 

पिछले सौ वर्षों से विश्व का बुद्धिजीवी वर्ग और लगभग पचास वर्षों से पश्चिम बंगाल सहित वामपन्थी जमात के संस्पर्श में आये लोग ‘सांइटिफीक सोशियलिज्म’ का नाम सुन रहे हैं। परन्तु क्या ‘सांइटिफीक रिगिंग’ याद है? सांइटिफिक रिगिंग चुनाव के समय वामपन्थी दलों द्वारा सरकारी तन्त्र तथा पार्टी की सांगठनिक व्यवस्था द्वारा ‘बुथ कैप्चरिंग’ के विभिन्न तरीके को पश्चिम बंगाल में ‘सांइटिफीक रिगिंग’ कहा गया है। इसमें विपक्षी दलों के पोलिंग एजेंट्स को मारना, हत्या करना, विपक्षियों के वोटर्स को धमकाना, उनका वोट अपने कमरेड से दिलवाना, उनका हुक्का-पानी बंद करना, वोट छापना, बैलेट बॉक्स की लूट जैसे योजनाबद्ध तरीके से किए जाने वाले कार्य शामिल हैं। इसमें पुलिस और अन्य सरकारी अधिकारी वामपन्थी शासन का पूर्ण सहयोग करने को बाध्य किए जाते हैं। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के साढ़े तीन दशक तक के शासन का सबसे बड़े कारणों में एक था ‘सांइटिफिक रिगिंग’!

इसी ‘सांइटिफिक रिगिंग’ के विरोध में 21 जुलाई 1993 में युवा काँग्रेस की फायर ब्रांड नेतृ ममता बनर्जी ने आन्दोलन किया। आन्दोलन की मुख्य माँग थी स्वतन्त्र और निष्पक्ष मतदान करवाने के लिए मतदाता की सचित्र वोटर कार्ड को अनिवार्य किया जाए। इस लोकतांत्रिक देश में जनता को अपना प्रतिनिधि चुनने का संविधान प्रदत्त अधिकार है। परन्तु वामपन्थी शासन तो संविधान से ऊपर पार्टी के मेनिफेस्टो को मानता है इसलिए वे स्वतन्त्र और निष्पक्ष मतदान के मुद्दे पर जो वृहत आन्दोलन हो रहा था उसे हर कीमत पर रोकना चाहते थे। युवा काँग्रेस ने यह तय किया था कि राज्य सरकार के सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग ‘राइटर्स’ का घेराव किया जाएगा। ब्रिगेड में एक सभा हुई फिर अलग अलग रास्तों से लोग राइटर्स बिल्डिंग की ओर बढ़ने लगे। एक विशाल जनसमूह इस विरोध मार्च में शामिल था। मेयो रोड और रेड रोड क्रासिंग के पास एक रैली जब पहुंची तो पुलिस ने रोका। तत्कालीन मुख्यमन्त्री ज्योति बसु का स्पष्ट निर्देश था कि युवा काँग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा राइटर्स का घेराव नहीं होना चाहिए।

पुलिस ने भीड़ को रोकने के लिए लाठीचार्ज की, आँसू गैस छोड़ी, उधर से रैली में से भी पत्थरबाजी चालू हो गई पुलिस पर इससे एक पुलिसकर्मी बुरी तरह लहुलुहान भी हो गया। अन्ततः पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी जिससे तेरह लोगों की मौत हो गई और दो सौ से ज्यादा लोग इस घटनाक्रम में गंभीर रूप से घायल हुए थे। टी बोर्ड के सामने स्वयं ममता बनर्जी भी बुरी तरह से घायल हो गयीं थी। कार्यकर्ताओं ने उनके चारों ओर एक सुरक्षात्मक घेरा बनाकर उन्हें पुलिस के लाठीचार्ज से बचाया। उसमें वर्तमान के तृणमूल काँग्रेस सांसद सौगत राय भी थे।

 

इसी मौके का फायदा उठाकर ममता बनर्जी की भी हत्या कर देने की साज़िश वामपंथियों ने की थी। म‌ई 2011 में उड़िसा उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश सुशांत चटर्जी की अध्यक्षता में एक जाँच आयोग का गठन किया गया। इस आयोग के समक्ष एक इंस्पेक्टर और एक कांस्टेबल ने कहा कि उन्हें एक उच्च पदस्थ आई पी एस अधिकारी ने 21 जुलाई 1993 को ममता बनर्जी की हत्या के लिए कहा था। ममता बनर्जी के तत्कालीन निजी सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि उन्हें भी धमकी दी गई थी कि अगर पुलिसकर्मियों ने उन पर हमला करने का प्रयास किया तो वो उन पर गोली चला देगा।

इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट हो जाता है कि वामपन्थी शासन अपने विपक्षियों को सरकारी तन्त्र की सहायता से भी हत्या कर अपने रास्ते से हटा देने से नहीं हिचकती। वामपंथ में लोकतांत्रिक मूल्यों और अधिकारों के लिए कोई जगह नहीं है। येन केन प्रकारेण सत्ता और शक्ति पार्टी के हाथ में रहनी चाहिए। भूतपूर्व मुख्यमन्त्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भी सुशांत चटर्जी आयोग के समक्ष पुलिस फायरिंग का पक्ष लिया। जाँच आयोग को अधिकारियों ने बताया कि कोलकाता पुलिस मुख्यालय और राज्य सचिवालय से संबंधित फाइल गायब है! ध्यातव्य हो कि सांई बाड़ी हत्याकांड की भी फाइलें गायब हो गई थीं। अब इतनी महत्वपूर्ण फाइलें गायब हो गई या कर दीं ग‌ई इसको समझने के लिए किसी ‘सांइटिफिक इंटेलेक्ट’ की आवश्यकता तो है नहीं। वो भी तब जब राज्य का तत्कालीन मुख्यमन्त्री ज्योति बसु किसी जाँच आयोग का गठन भी नहीं करते बल्कि कहते हैं कि “पुलिस ने बहुत अच्छा काम किया था।”

 

इस घटना के बाद जनभावना ममता बनर्जी से जुड़ने लगी। फिर आगे चल कर तृणमूल काँग्रेस की स्थापना हुई और 2011 से सत्ता में ममता बनर्जी हैं। एकुशे जुलाई की घटना को ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर का टर्निंग प्वाइंट माना जाता है। आखिर उस दिन ममता बनर्जी ने जिस स्वतन्त्र और निष्पक्ष मतदान हेतु और ‘सांइटिफिक रिगिंग’ से पश्चिम बंगाल की जनता को मुक्ति दिलाने के लिए आन्दोलन किया जिसमें 13 निरपराध नागरिकों की पुलिस ने गोली मारकर हत्या कर दी आज राज्य में चुनाव के दौरान और चुनाव के पश्चात क्या हो रहा है? एकुशे जुलाई तृणमूल काँग्रेस विशेषकर ममता बनर्जी के लिए यह गहन विवेचना और नैतिक रूप से स्वयं से प्रश्न पूछने का दिन है कि “क्या पश्चिम बंगाल में तृणमूल काँग्रेस की सरकार में और भी विभत्स रूप से वही ‘सांइटिफिक रिगिंग’नहीं हो रही जिसके विरुद्ध आन्दोलन उन्होंने आन्दोलन किया था?”

आज भी बंगाल में पंचायत चुनाव, कांउसिलर का चुनाव, विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव विपक्षी दलों को अपना जान जोखिम में डालकर चुनाव प्रक्रिया में भाग लेना पड़ता है। वो मतदाता जो विपक्षी दलों के पक्ष में वोट देता है अथवा उसका समर्थन करता है उसके साथ मारपीट, व्यवसायिक स्थान पर हिंसा, घरों को तोड़फोड़ देना, वृद्धा मां, पत्नी के साथ मारपीट, महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी घृणित घटनाएं होती हैं। बैलेट पेपर छपाई, बैलेट बॉक्स की लूट, विपक्षी उम्मीदवारों पर जानलेवा हमला, पोलिंग एजेंट्स पर हमला आदि जैसी घटनाओं ने जनता को इस कदर भयभीत कर दिया है कि बहुत से लोग वोट देने नहीं जाते। बड़ाबाजार जैसे इलाकों में मतदान के दिन एक बम धमाका कर दिया जाता है और मतदाता डर से घर से बाहर नहीं निकलते। वही माडल तो चल रहा है। बस झंडे, नारे और सत्ताशीन लोगों के नाम बदले हैं।

सत्तारूढ़ ममता बनर्जी को चाहिए कि ‘एकुशे जुलाई’ के उन तेरह शहिदों के बलिदान का स्मरण करते हुए पश्चिम बंगाल में जिस वामपन्थी बर्बरता के खिलाफ वे संपूर्ण जीवन सड़क से संसद तक संघर्ष करती रहीं उसका वास्तविक अन्त अपने सरकार के माध्यम से ही करें और पश्चिम बंगाल की जनता को लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभयता के साथ अपने संविधान प्रदत्त अधिकारों के प्रयोग का अवसर दें

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