
यायावरी में साहित्य-सृजन
रमेश याज्ञिक प्रायः अल्पचर्चित लेखक हैं। उनसे हिन्दी-संसार थोड़ा-बहुत यदि परिचित है तो मुक्तिबोध के राजनांदगाँव के दौर के उनके मित्र के रूप में, अथवा उन संस्मरणात्मक निबन्धों के लेखक के रूप में, जो मुक्तिबोध के व्यक्तित्व के कुछ अन्तरंग पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। ‘मुक्तिबोध ने दोबारा कॉमरेड कब कहा’, ‘मुक्तिबोध क्या पढ़ते थे’, ‘मुक्तिबोध से पढ़ना-लिखना सीखा’, और ‘मुक्तिबोध के पात्र यशराज नहीं रहे’—ये लेख प्रकाशित होने के बाद पर्याप्त रूप से चर्चित हुए। मगर इन लेखों का प्रकाशन भी लगभग चार दशक पहले हुआ था। सो, उनकी स्मृति भी अब झीनी रह गयी है। मुक्तिबोध 1958 में दिग्विजय महाविद्यालय में प्राध्यापक हो कर राजनांदगाँव आये थे। उसी वर्ष रमेश याज्ञिक ने महाविद्यालय में स्नातक वाणिज्य पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था। वह बड़ी उम्र के छात्र थे, पढ़ाई में लम्बे व्यवधान के बाद पुनः विद्यार्थी हुए थे। मुक्तिबोध के साथ उनका सम्बन्ध दोस्ताना था। अपने संस्मरणों में उन्होंने मुक्तिबोध की रुचि, उनके व्यवहार, पठन-पाठन, चिन्तन, सृजन, बौद्धिक दृष्टिकोण, राजनीतिक चेतना और सामाजिक सक्रियता आदि को ले कर कतिपय मार्मिक प्रसंगों का उल्लेख किया है।
लेकिन रमेश याज्ञिक ने इन लेखों के अलावा भी बहुत-कुछ लिखा है। वह हिन्दी के उन थोड़े-से लेखकों में हैं जिन्होंने यायावर-लेखन की सर्वथा भिन्न पद्धति पेश की। यायावरी में लेखन की ऐसी अनूठी मिसाल हिन्दी में नहीं है । उन्होंने अनवरत यात्राओं के दरम्यान लिखा, यात्रा को विचार और अनुभव की निरन्तर खोज का माध्यम बनाया और उनके सहारे ऐसा साहित्य रचा जिसे किसी अन्य हिन्दी-लेखक ने अब तक सम्भव नहीं किया है। दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, इंदौर, हैदराबाद, कोलकाता, अहमदाबाद, आदि न जाने कितने शहरों से उन्होंने ‘देशबन्धु’ के सम्पादक को हर सप्ताह पत्र लिखे जो ‘यात्री के पत्र’ स्तम्भ में बरसों प्रकाशित हुए। उनके ये पत्र प्रचलित ढंग के पत्र नहीं हैं, वे विविध सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर लिखी लालित्यपूर्ण टिप्पणियाँ हैं। वह पत्रकार नहीं थे, लेकिन हरिशंकर परसाई की तरह उन्होंने केवल दैनिक अखबारों में, विशेषतः रविवारीय परिशिष्टों में, लिखा। उनका साहित्य परम्परागत अर्थ में यात्रा-वृत्तान्त नहीं है लेकिन वह यात्राओं में, यात्राओं के बारे में, जगहों और लोगों के बारे में लिखे गये निबन्ध हैं। अखबारों में छपने के बावजूद उनके लेखन को अखबारी लेखन नहीं कहा जा सकता। लेखन उनके लिए केवल अभिव्यक्ति और सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की आत्मा को टटोलने का साधन था। राजनांदगाँव की सांस्कृतिक भूमि से निकले रमेश याज्ञिक ने अपनी लेखनी से छोटे-बड़े शहरों, यात्राओं और उनमें भटकते व्यक्ति की नागरिक संवेदना को शब्द दिये। इस अर्थ में उनका योगदान हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता की परम्परा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अपने नियमित स्तम्भ में स्व. याज्ञिक देश-भर में घूमते हुए अपने अनुभवों को सामाजिक-राजनैतिक सन्दर्भों में विश्लेषित किया करते थे। पाठकों के बीच यह अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। ‘देशबन्धु’ (रायपुर) तथा ‘सबेरा संकेत’ (राजनांदगाँव) और ‘स्वतन्त्र भारत’ (लखनऊ) में यह प्रमुखता से पढ़ा जाता था। बाद में यह पुस्तकाकार रूप में तीन संग्रहों—’यात्री के पत्र’, ‘जगहें और लोग’ तथा ‘अपने शहर में अजनबी’ में संकलित हुआ। इन पुस्तकों पर यदि हिन्दी-संसार का ध्यान जाता तो उनके साहित्य के वैशिष्ट्य से समुचित परिचय हुआ होता। स्व. याज्ञिक ने बड़ी संख्या में राजनैतिक टिप्पणियाँ लिखी हैं तथा सामाजिक विषयों पर भी प्रचुर लेखन किया है। उन्होंने कहानियाँ भी लिखी हैं, जिनका एक संकलन ‘बाबूजी आप कब लौटेंगे’ प्रकाशित है। अपनी बेबाक आत्मस्वीकृतियों की पुस्तक ‘और अकेला मैं’ में उन्होंने विरल साहस के साथ अपने जीवन के विविध प्रसंगों का अकुंठ चित्रण किया है।
रमेश याज्ञिक का जन्म गोंदिया में 26 मई, 1934 को हुआ था। गोंदिया में उनका बीड़ी पत्ते का पारिवारिक व्यवसाय था। वहीं गुजराती माध्यम से उनकी प्रारम्भिक शिक्षा हुई। गुजराती उनकी मातृभाषा थी। पिता छोटाभाई भट्ट की मृत्यु के बाद उनका व्यवसाय राजनांदगाँव स्थानान्तरित हुआ जहाँ दिग्विजय महाविद्यालय से उन्होंने वाणिज्य स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। अध्ययन के दौरान मुक्तिबोध से उनका सम्पर्क हुआ। कला-संस्कृति में उनकी अभिरुचि को मुक्तिबोध के सान्निध्य में प्रोत्साहन मिला। मुक्तिबोध के साथ पुस्तकों के लेनदेन के कारण उनकी साहित्यिक सोच-समझ विकसित हुई। वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गये। गाय छाप बीड़ी के उत्पादन और बीड़ी पत्ते के व्यापार से उनके परिवार को अकूत सम्पत्ति और प्रतिष्ठा प्राप्त हुई थी। उनका परिवार छत्तीसगढ़ और विदर्भ के बीड़ी पत्ते के बड़े कारोबारियों में से एक था। पिता के न रहने के बाद माँ ने कारोबार सँभाला, और उसे ऊँचाइयों तक ले गयीं। रमेश याज्ञिक के बड़े भाई घनश्याम भाई याज्ञिक के व्यापक राजनीतिक सम्पर्क थे। वह पुराने मध्यप्रदेश में कॉंग्रेस के विधायक नामजद किये गये थे।
लेकिन रमेश याज्ञिक की रुचि व्यवसाय में नहीं थी। राजनीति और कला-संस्कृति में दिलचस्पी तथा मार्क्सवाद की शिक्षा के कारण एक सम्पन्न व्यवसायी परिवार से होने के बावजूद वह मजदूरों के हितों के हिमायती थे। माँ के निधन के बाद उन्हें व्यवसाय की ओर जाना पड़ा लेकिन उसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। बड़े भाई घनश्याम भाई याज्ञिक रईस तबीयत के व्यक्ति थे। उनके खर्चों का हिसाब नहीं था। अपने स्वभाव के चलते माँ के बाद व्यवसाय सँभालने की जिम्मेदारी का निर्वाह वह भी अपेक्षित ढंग से नहीं कर पाये। फलस्वरूप कारोबार में गिरावट आने लगी। कुछ वर्षों बाद बीड़ी पत्ते का कारोबार समेटना पड़ा। व्यापार बन्द होने के बाद नियमित आमदनी का कोई स्रोत नहीं रह गया। सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा देनदारी चुकाने और दीगर खर्चों में खत्म हो गया।
कुछ वर्ष बाद दोनों भाइयों के बीच सम्पत्ति का बँटवारा होने पर नियमित आमदनी के लिये रमेश याज्ञिक ने एक व्यापारिक कम्पनी की एजेन्सी ले ली। उस काम के सिलसिले में उन्हें निरन्तर देश के विभिन्न हिस्सों में यात्रा करनी पड़ती थी। वह अनेक वर्ष ऐसी व्यावसायिक यात्राएँ करते हुए देश के विभिन्न नगरों में घूमते रहे। राजनीति और साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी ही। रेल-यात्राओं में भी वह अध्ययन करते रहते। भारत के वैविध्यपूर्ण जीवन के प्रत्यक्ष अवलोकन से उन्हें एक ओर सांस्कृतिक समृद्धि से सीधे परिचय का अवसर मिलता, वहीं दूसरी ओर समाज में व्याप्त विसंगतियों की पहचान और परख उनके भीतर लिखने की आन्तरिक विवशता उत्पन्न करती। यात्राओं के दौरान अलग-अलग ठिकानों से नियमित रूप से ‘देशबन्धु’ को लिखे पत्र जब छपने लगे तो पाठकों ने इसे पसन्द किया। फिर यह सिलसिला चल निकला। तब शायद ही उन्हें अनुमान रहा होगा कि उनके स्तम्भ से दरअसल एक नये ढंग की साहित्यिक विधा जन्म ले रही है। उनकी कृतियों का आलोचनात्मक परीक्षण हो तो इस विधा के गुण-लक्षणों को और साहित्यिक वैशिष्ट्य को समुचित पहचान मिलेगी। रमेश याज्ञिक के यात्रा-लेखन के पीछे उनकी यायावर वृत्ति तो थी ही, कमोबेश उनकी व्यावसायिक परिस्थितियाँ या उनकी कारोबारी विवशता ने भी किसी हद तक उन्हें यात्रा-लेखन के लिये प्रेरित किया।
रमेश याज्ञिक का लेखन पत्रकारिता और साहित्य के साझा परिसर में सम्भव हुआ है। उनके गद्य में साहित्य की तरल संवेदना और पत्रकारिता की वैचारिक प्रखरता का विलक्षण संयोग है। यूँ भी वह निपट औपचारिक ढब के साहित्यकार नहीं थे, न ही वे पत्रकारिता के रूढ़ विधान में आबद्ध पत्रकार थे। न तो उन्होंने आधुनिक गद्य-विधाओं के बने-बनाए विधागत दायरे में रह कर सृजन किया, न ही चीजों को ठेठ सूचना के स्तर पर ग्रहण करने वाला विवरणपरक गद्य लिखा। उनके गद्य में दरअसल एक ऐसी समाज-सजगता मिलती है जो दैनंदिन के प्रेक्षण में संवेदना और विचार के द्वैत को विसर्जित कर जीवन के मर्मस्थलों का स्पर्श करती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि उनकी यह समाज-सजगता किसी-न-किसी रूप में उनकी वैचारिक-सर्जनात्मक प्रतिबद्धता से सम्बन्धित है, अथवा उसका स्वाभाविक प्रतिफलन है। उनकी प्रतिबद्धता मार्क्सवाद की वैचारिकी से निर्मित थी। ‘यात्री के पत्र’ के लेखों को पढ़ते हुए अनुभव किया जा सकता है कि पत्रकारिता और सृजनात्मक तथा वैचारिक लेखन के बीच की सन्धि पर रह कर रमेश याज्ञिक ने एक भिन्न और अपारम्परिक किस्म का साहित्य रचा है। पहली बार और सम्भवतः अब तक आखिरी बार ऐसा साहित्य इन लेखों के माध्यम से सामने आया है, जो न तो ठीक-ठीक अखबारी लेखन है, न किसी भी कोण से यात्रा-वृत्तान्त है, और न ही कथात्मक रचना। इन लेखों में इन सब का मिला-जुला रूप यानी सम्मिश्र और संकरित गद्य है। रमेश याज्ञिक ने यात्राओं के दरम्यान अपने अनुभव को केन्द्र में रख कर परसाई की तरह अखबारों में देश की जनता और उसकी विविध समस्याओं पर एकाग्र टिप्पणियाँ लिखी हैं। इन टिप्पणियों को उन्होंने जन-संवाद का माध्यम बनाया। अवलोकन, संवाद और विश्लेषण की दैनंदिनता, और बौद्धिक सहजता इन टिप्पणियों की अनन्य विशेषताएँ हैं। इसमें न सिर्फ उनके बौद्धिक और संवेदनात्मक रुझान का पता चलता है, बल्कि एक सजग भारतीय बुद्धिजीवी के नागरिक बोध को भी वे परिभाषित करती हैं। नागरिक अधिकार और नागरिक कर्त्तव्य उनके नागरिक बोध का अविभाज्य हिस्सा हैं।
‘यात्री के पत्र’ में प्रकाशित पत्र महज पत्र नहीं, व्यवस्थित निबन्ध हैं जिनमें व्यक्ति, समाज, सामाजिक जीवन, शहर, भाषा, संस्कृति, स्थान, लोग, धर्म और धार्मिक-नैतिक पाखण्ड, भ्रष्टाचार, सांस्कृतिक अवनति, अतीत और वर्तमान के बीच की असंगतियाँ, और न जाने कितने विषयों को छूते हुए वैचारिक, आख्यानात्मक वृत्तान्त प्रस्तुत किये गये हैं। उनमें सामाजिक जीवन, संस्कृति, मनुष्य के दैनंदिन संघर्ष, पीड़ा और सुख-दुःख के विभिन्न प्रसंगों की चर्चा करते हुए रमेश याज्ञिक ने अपने समकालीन जीवन के भीतर मनुष्य होने की अर्थवत्ता की पड़ताल की है। इनमें जीवन की बहु छवियाँ और बदलते समय के चेहरे पर पड़े खरोंच के निशान हैं। रमेश याज्ञिक का विचारक और सर्जक इन निबन्धात्मक टिप्पणियों में एकान्वित भाव से, परस्पर घुल-मिल कर, एक-दूसरे को सहारा देते हुए मानो एक ही काया में प्रकट हो उठते हैं। इन निबन्धों में छोटे बड़े शहरों की कहानियाँ, आम लोगों के जीवन की दुश्वारियाँ, प्रभु वर्ग की परोपजीविता और संवेदनहीनता, सांस्कृतिक विडम्बनाओं की पहचान, व्यवस्था के अन्तर्विरोधों और नैतिक कदाचार के आख्यान, अतीत और परम्परा के प्रति युक्तिसंगत दृष्टिकोण, वैचारिक बहसों और राजनीतिक द्वन्द्वों-अभिसन्धियों के विश्लेषण आदि एक साथ देखने को मिलते हैं।
घुमक्कड़ी में लिखा गया उनका साहित्य स्वानुभव पर आधारित है। वह उनके देखे-सुने का अपना पाठ है—एक रचनात्मक पाठ जो स्वानुभव को समष्टिगत अनुभव, सबके अनुभव में रूपान्तरित कर देता है।
उनकी इन रचनाओं में छोटे शहरों और आम लोगों की कहानियाँ हैं जो उनके विचार-जगत और संवेदन-जगत में द्वंद्व, आत्मसजगता और संवेदनशीलता को रेखांकित करती हैं। एक ओर कला संस्कृति में गहरी रुचि, और दूसरी ओर जन-संघर्ष और श्रमिक आन्दोलनों की राजनीति—रमेश याज्ञिक ने उनके बीच सन्तुलन को साध लिया था; अन्यथा यह सोचना आसान नहीं था कि अत्यन्त सम्पन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाला व्यक्ति अपने निजी स्वार्थों से मुक्त हो कर ट्रेड यूनियन गतिविधियों में सक्रिय रहे, और अपने वर्गीय हितों से समझौता न कर अपने ही कारखानों में काम करने वाले निम्नवर्गीय मजदूरों की हिमायत करे। उनके लेखन में भी सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों की गहरी पड़ताल के पीछे उनके वर्गबोध की गहरी भूमिका है। उनका यायावर-लेखन भले ही अपने स्वरूप में पत्रकारिता के समीप जान पड़ता है लेकिन वह राजनीतिक रिपोर्टिंग नहीं है। उनकी रुचि समाचार की तात्कालिकता से अधिक समाज को पढ़ने-समझने और उसे मूल्यबोध के स्तर पर अभिव्यक्त करने में थी।
यात्राएँ उनके लिये केवल कारोबार की अनिवार्यता या देशाटन का माध्यम-भर नहीं थीं। वह उसे जीवन को देखने-समझने का जरिया और अनुभव अर्जित करने की पद्धति की तरह देखते थे। यात्राएँ उनके तईं समाज की आत्मा को पढ़ने और उसकी वैचारिक चेतना को जाँचने-परखने और साथ ही आत्मचिन्तन का माध्यम थीं। उनमें वह स्मृति के सामाजिक और सामुदायिक आयामों का अन्वेषण करते थे और वर्त्तमान के सारतत्त्व को ग्रहण करने की कोशिश करते थे। इसलिये उनकी लेखन में गहरी सामाजिक संवेदना दिखाई देती है। वह ग़रीब मजदूरों, कस्बाई जीवन के हाशिये पर रह गये लोगों और निम्नमध्यवर्गीय जीवन की विडम्बनाओं को पकड़ने का प्रयत्न करते थे। उनकी भाषा दैनिक पत्रकारिता की तात्कालिक और सूचनात्मक भाषा नहीं थी। उसमें निहित साहित्यिक संवेदना का स्पर्श और उसका सौन्दर्यबोध उनके समूचे लेखन को विशिष्ट बनाता है। उनकी एक पुस्तक ‘जगहें और लोग’ के शीर्षक की व्यंजना पर ग़ौर करे तो उनकी प्राथमिकताओं और प्रतिबद्धताओं को समझा जा सकता है। मनुष्य-जीवन जगहों और लोगों से हो निर्मित होता है। यात्रा व्यक्ति को उनके करीब ले जाती है। रमेश याज्ञिक अपनी यात्राओं में उन्हें गहरी संवेदना और समझ के साथ आविष्कृत करने का प्रयत्न करते थे। मनुष्य और समाज के बीच सम्बन्धों को समझने की कोशिश में उन्होंने जीवन के भीतर मौजूद उन शक्तियों की पड़ताल का जतन किया जो उसे विकृत करने में संलग्न हैं।
याज्ञिक सक्रिय राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता थे। वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राजनांदगाँव शाखा के प्रमुख स्तम्भ थे। ’60 और ’70 के दशकों में उन्होंने अनेक राजनीतिक गतिविधियों में भाग लिया । राजनांदगाँव में मजदूर-आन्दोलन का समृद्ध इतिहास रहा है। यहाँ 1893 में यानी देश के औद्योगिकीकरण के आरम्भिक दौर में रियासत के प्रमुख, राजा बलरामदास ने बंगाल नागपुर कॉटन मिल की स्थापना की थी। बीसवीं सदी के दूसरे दशक में ही मिल में हड़तालें और श्रमिक संघर्ष की शुरुआत हो चुकी थी। 1950 के बाद तेभागा आन्दोलन के भूमिगत क्रान्तिकारी अशोक राय ने राजनांदगाँव आ कर प्रकाश राय के नाम से काम करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के झण्डे के नीचे मजदूरों को संगठित किया। मुक्तिबोध नागपुर में रहते हुए राजनांदगाँव आने को लेकर सशंकित थे। लेकिन जब उन्हें वहाँ की ट्रेड यूनियन गतिविधियों के बारे में जानकारी हुई तो वह निश्चिन्त हो गये कि यह शहर बौद्धिक रूप से जीवन्त होगा। रमेश याज्ञिक ट्रेड यूनियन गतिविधियों में कॉमरेड प्रकाश राय के सहकर्मी थे।
रमेश याज्ञिक प्रबुद्ध लेखक और जागरूक नागरिक थे। अपने लेखन एवं जीवन में उन्होंने सदैव धर्मनिरपेक्षता, लोकतान्त्रिक मूल्यों तथा तर्कशीलता को तरजीह दी। वे अन्धविश्वास, धर्मांधता, जातिवाद और कूपमंडूकता की प्रवृत्तियों के खिलाफ निरन्तर संघर्षरत रहे। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य के रूप में आजीवन काम किया। उन्होंने पूर्वी जर्मनी और सोवियत संघ की यात्रा की। 2007 में उनका निधन हुआ।
अपनी कर्मभूमि राजनांदगाँव से उन्हें बहुत लगाव था। वह राजनांदगांव के रियासतकालीन इतिहास के गहरे जानकार थे। रियासतकालीन इतिहास के अनौपचारिक और उन्मुक्त वृत्तान्त रचते हुए उन्होंने उसकी ऐतिहासिक स्मृतियों का जीर्णोद्धार किया। वह जमाने की आँधी में शहर के इतिहास, भूगोल, भाषा, संस्कृति, परम्पराओं, स्मृतियों के विलोपन से दुःखी थे। इस विषय पर अपनी चिन्ताओं को व्यक्त करने के ध्येय से उन्होंने दैनिक ‘सबेरा संकेत’ में ‘शहर अपना तब और अब’ स्तम्भ लिखा। इस स्तम्भ में उन्होंने कोरी तथ्यात्मक और सूचनात्मक सामग्री प्रस्तुत नहीं की, बल्कि उन्हें मानवीय दृष्टि और संवेदना से जोड़ने का प्रयत्न किया। यह कृति एक शहर के भीतर हो रहे अन्दरूनी बदलाव और उसके साथ बदलते जीवन-मूल्यों को समझने की दृष्टि देती है। इसे हिन्दी-प्रदेश के किसी भी शहर के बदलने की बानगी के तौर पर, उसके एक लघु बिम्ब (माइक्रोकॉज़्म) के रूप में पढ़ा जा सकता है। रमेश याज्ञिक के यायावर लेखन के वृत्तान्तों में एक तरह की आत्मपरकता और चिन्ताकुलता को लक्ष्य किया जा सकता है जो निजी स्तर पर उनके भीतर चल रहे आन्तरिक उद्वेलन को सूचित करती हैं। जाहिर है, इससे उनकी कृतियों में आत्मकथात्मक स्पर्श मिलता है।
यात्रा शृंखला की तीन पुस्तकों के अतिरिक्त उनकी अन्य कृतियों में ‘अहिंसा के पक्ष में, अन्धश्रद्धा के विरोध में’ तथा ‘वह सब जो दिखता है’ प्रमुख हैं। मौलिक लेखन के अलावा उन्होंने गुजराती के दो उपन्यासों—‘आशका माँडल’ और ‘नीरजा भार्गव’—और कथाकार मंटो पर केन्द्रित एक पुस्तक का अनुवाद भी किया है। गुजराती के व्यंग्य-लेखक विनोद भट्ट की रचनाओं के अनुवाद भी उन्होंने किये हैं। वह अनेक पुरस्कारों तथा अलंकरणों से विभूषित किये गये। रमेश याज्ञिक केवल एक स्तम्भकार नहीं थे, बल्कि एक संवेदनशील लेखक, विचारक और समाज की भीतरी छटपटाहट को देखने-समझने वाले बौद्धिक थे।










