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राष्ट्रीय शिक्षा नीति और ट्रांसजेंडर

शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं  – नेल्सन मंडेला

शिक्षा मानव विकास और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का शक्तिशाली माध्यम है। 86वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार बना। संविधान लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण पर ज़ोर देता है, जिसे शिक्षा से प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) का लक्ष्य सभी के लिए, विशेषकर सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों ( सोशियो-इकोनोमिकली डिसऐडभैनडेज्ड ग्रुप -एसईडीजी), लड़कियों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए समान और समावेशी शिक्षा सुनिश्चित करना है। यह चिंता इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि माध्यमिक स्तर पर बालिकाओं की उच्च ड्रॉपआउट दर (मासिक धर्म, शौचालय की कमी, लंबी दूरी के कारण) और ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों की अत्यंत न्यून सहभागिता शिक्षा प्रयासों के वांछित परिणाम को बाधित करती है। एक प्रगतिशील शिक्षा नीति वंचित समूहों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए किस हद तक सामाजिक न्याय सुनिश्चित कर पाएगी? क्या उन्हें उच्च शिक्षा और रोजगार में समान सहभागिता के अवसर प्राप्त हो सकेंगे? क्या राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 सामाजिक न्याय की प्रासंगिकता को समाज तक सफलतापूर्वक संप्रेषित कर पाएगी? समावेशी शिक्षा एक महती दायित्व है, जो हम सबके पारस्परिक प्रयासों से, शिक्षा में समावेशी पद्धतियों के निरंतर विकास से और राज्य द्वारा संस्थागत, सामाजिक तथा नीतिगत बाधाओं को दूर करने से ही निभाया जा सकता है।

यह देखना शेष है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के क्रियान्वयन के पाँच वर्ष पश्चात् क्या शिक्षा में सामाजिक न्याय के संदर्भ में समावेशी शिक्षा का उद्देश्य पूर्ण हुआ है? यह लेख एनईपी 2020 के तहत भारतीय शिक्षण संस्थानों में ट्रांसजेंडर छात्रों की स्थिति का विश्लेषण करता है। यह उनकी भागीदारी, पहचान, अधिकार, पहुँच और कल्याण को प्रभावित करने वाली संस्थागत, सामाजिक और नीतिगत बाधाओं पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य एसईडीजी से संबंधित लड़कियों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के शैक्षिक विकास में अवरोध उत्पन्न करने वाले क्षेत्रीय, सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों का पता लगाना है।

समावेशी शिक्षा: नीतिगत पहल या खोखली रिवायत 

सरकारी नीतियों के बावजूद, भारत में स्कूली और उच्च शिक्षा में सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों (सोशियो-इकोनोमिकली डिसऐडभैनडेज्ड ग्रुप – एसईडीजीएस) की अत्यल्प उपस्थिति एक बड़ी चुनौती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 का लक्ष्य समता और समावेशन के माध्यम से इस अंतराल को समाप्त करना है। यह नीति शिक्षा से महिलाओं, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों औरएसईडीजी समूह की न्यूनतम सहभागिता के मूलभूत कारणों (जैसे जानकारी का अभाव, वित्तीय बाधाएं, भौगोलिक/भाषाई अवरोध, कठोर प्रवेश प्रक्रियाएं, सीमित रोज़गार क्षमता, कौशल-उन्मुख पाठ्यक्रमों की अनुपलब्धता और छात्र-हितैषी तंत्रों की कमी) को दूर करने पर केंद्रित है।

एनईपी 2020 सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों (एसईडीजी समूह )की अवधारणा प्रस्तुत करती है, जिसमें महिलाएं और ट्रांसजेंडर व्यक्ति शामिल हैं, जिनकी स्कूल/कॉलेज छोड़ने की दर सर्वाधिक है। सबसे गरीब परिवारों की लड़कियों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुँच सबसे कम है। नीतिगत पहलें लड़कियों और ट्रांसजेंडर बच्चों को शिक्षा तक पहुँचने में सहायता करती हैं और स्थानीय बाधाओं का समाधान करने वाले समुदाय-आधारित हस्तक्षेपों का समर्थन करती हैं, ताकि व्यावसायिक शिक्षा सहित, किसी भी लिंग के बच्चों के लिए शिक्षा तक पहुँच में असमानता समाप्त हो सके।

शिक्षा मंत्रालय के ‘समग्र शिक्षा’ कार्यक्रम का लक्ष्य स्कूली शिक्षा में लैंगिक और सामाजिक असमानताओं को दूर करना है, जिसमें लड़कियों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों पर विशेष ध्यान दिया गया है। नामांकन बढ़ाने हेतु इसकी पहलों में आस-पास स्कूल खोलना, कक्षा VIII तक एसईडीजी समूह को मुफ्त पाठ्यपुस्तकें, लिंग-पृथक शौचालय, शिक्षकों के लिए संवेदीकरण कार्यक्रम, लड़कियों हेतु आत्मरक्षा प्रशिक्षण, आवासीय स्कूल और दूरदराज के क्षेत्रों में शिक्षक आवासीय क्वार्टर शामिल हैं।

निष्ठा (नेशनल इनिशिएटिव फॉर स्कूल हेड्सएंड टीचर्सफॉर होलिस्टिक एडवांसमेंट)

नेशनल इनिशिएटिव फॉर स्कूल हेड्स’ एंड टीचर्स’ फॉर होलिस्टिक एडवांसमेंट (निष्ठा) समग्र शिक्षा के तहत शुरू किया गया शिक्षकों के लिए एक राष्ट्रव्यापी एकीकृत शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत शिक्षकों को शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया में लैंगिक आयामों की प्रासंगिकता के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, जो शिक्षकों को लिंग-संवेदनशील कक्षा वातावरण विकसित करके सीखने की गतिविधियों का उपयोग और अनुकूलन करने में सहायता करेगा। इसके अतिरिक्त, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने सभी आवेदन पत्रों/शैक्षणिक प्रमाण-पत्रों और अपने तथा अन्य संबद्ध कॉलेजों द्वारा संसाधित किए गए अन्य सभी प्रासंगिक दस्तावेजों में ट्रांसजेंडर श्रेणी के लिए एक कॉलम प्रस्तुत किया है। समावेशी और समान शिक्षा को व्यवहार में लाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है।

एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) ने भी शिक्षा में लिंग से संबंधित मुद्दों को समझने पर शिक्षकों की क्षमता निर्माण के लिए एक शिक्षक प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित किया है। ट्रांसजेंडर बच्चों से संबंधित चिंताओं को विभिन्न ग्रंथों और मैनुअल में संबोधित किया गया है। यूजीसी ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों (एचईआई) को ट्रांसजेंडर समुदायों के विभिन्न मुद्दों का समाधान करने के लिए भी निर्देश जारी किए हैं।

जेंडर इन्क्लूजन फंड

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) के तहत, भारत सरकार ने जेंडर इन्क्लूजन फंड (जीआईएफ) की स्थापना की है, जिसका उद्देश्य सभी बालिकाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करने और सहायता प्रदान करने में राज्यों की क्षमता का निर्माण करना है। इस फंड के तहत, बालिकाओं, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, और सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित समूहों (एसईडीजी) के विद्यार्थियों को 50% तक छात्रवृत्ति और 20% तक वित्तीय सहायता का प्रावधान है। जीआईएफ का मुख्य लक्ष्य बालिकाओं और ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों की स्कूल और कॉलेज में उच्च भागीदारी सुनिश्चित करना, लैंगिक असमानताओं का उन्मूलन, लैंगिक समानता और समावेशन स्थापित करना तथा समग्र शिक्षा के माध्यम से बालिकाओं की नेतृत्व क्षमताओं का संवर्धन करना है। राज्य सरकारें इस फंड का उपयोग दूर-दराज के विद्यार्थियों (बालिकाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों) को सशर्त नकद हस्तांतरण, छात्रवृत्ति, शौचालय, साइकिल और विशेष बोर्डिंग (छात्रावास) सुविधाएँ प्रदान करके शिक्षा तक पहुँचने में सहयोग देंगी। यह फंड राज्य सरकारों को सामाजिक हस्तक्षेपों को समर्थन और विस्तार देने में भी सक्षम बनाएगा, ताकि बालिकाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की सरकारी योजनाओं तक पहुँच में बाधा डालने वाली चुनौतियों का समाधान किया जा सके।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी)  ने समावेशी और समान शिक्षा को व्यवहार में लाने  के लिए सभी प्रासंगिक दस्तावेजों में ट्रांसजेंडर श्रेणी के लिए एक कॉलम प्रस्तुत  तो किया ही है, साथ ही, उच्च शिक्षण संस्थानों (एचईआई) को ट्रांसजेंडर समुदायों के विभिन्न मुद्दों का समाधान करने के लिए आवश्यक निर्देश भी जारी किए हैं।

क्या ये प्रयास उनकी सहभागिता एवं पहचान हेतु पर्याप्त हैं? विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) के अनुरूप उच्च शिक्षा से संबंधित पाठ्यक्रम में संशोधन अवश्य किया, किंतु उसमें ट्रांसजेंडर से संबंधित पाठ्यक्रम को पहचान दिलाने से वंचित रह गए। मूल्यवर्धक पाठ्यक्रम (वी ए सी) की श्रेणी में ट्रांसजेंडर को मान्यता प्रदान की जानी चाहिए ताकि एक सामान्य वातावरण का निर्माण हो सके, जो समावेशी शिक्षा के उद्देश्य को सिद्ध करे।

ट्रांसजेंडर के शैक्षिक विकास की ओर बाधाएं

निस्संदेह, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 द्वारा समाज की परिवर्तित गतिशीलता को स्वीकार करते हुए और विद्यालयी शिक्षा में बच्चों तथा उच्च शिक्षा में युवाओं के समग्र विकास हेतु एक समग्र दृष्टिकोण का अनुसरण करते हुए, भारत की शिक्षा प्रणाली में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गयी है। तथापि, महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों द्वारा सामना की जाने वाली अनेक शैक्षिक चुनौतियाँ अभी भी विद्यमान हैं, और सामाजिक रूप से निर्धारित भूमिकाओं के कारण उन्हें समान अवसर प्राप्त नहीं होते हैं।

राज्यों द्वारा पहल

समावेश के लिए विभिन्न राज्यों ने पहल की है: तमिलनाडु (2008) ट्रांसजेंडर कल्याण नीति जारी करने वाला पहला राज्य बना, जिसने मुफ्त सेवाएँ, छात्रवृत्ति और आय-सृजन कार्यक्रम प्रदान किए। ओडिशा (2015) ने अधिकारों और न्याय के लिए मिशन शुरू किया, जिसमें माता-पिता को सहायता, छात्रवृत्तियाँ और कौशल वृद्धि हेतु वजीफा शामिल है। केरल ‘सफलम’, ‘वर्णम’ और ‘समन्वय’ योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता और स्कूल छोड़ने वालों के लिए नामांकन सुनिश्चित करता है। कर्नाटक सिविल सेवा संशोधन नियम (2021) में 1% आरक्षण प्रदान करता है। असम (2020) ने शैक्षिक सुविधाओं तक पहुँच, मुफ्त व्यावसायिक पाठ्यक्रम और अधिकार संरक्षण के लिए नीति लागू की।

ट्रांसजेंडर समुदाय शिक्षा में बड़ी बाधाओं का सामना करता है, जैसे सामाजिक समर्थन की कमी, हिंसा और भेदभाव, तथा निरंतर अन्याय का अनुभव। अनुमानतः 50-60% ट्रांसजेंडर व्यक्ति कभी विद्यालय नहीं गए हैं और भेदभाव के शिकार हुए हैं। इन चुनौतियों के निवारण हेतु, समुदाय को सामाजिक सहयोग और शिक्षित करना आवश्यक है, जो उन्हें उनके अधिकार समझने और करियर लक्ष्यों के प्रति जागरूक होने में सहायता करेगा। सभी ट्रांसजेंडर छात्रों के लिए शिक्षा का मौलिक अधिकार सुनिश्चित हो और पूर्वाग्रह समाप्त किया जाए। ऐसे मॉडल शिक्षण संस्थानों को इस ओर प्रोत्साहित करना चाहिए जो व्यावसायिक पाठ्यक्रम प्रदान करते हैं, ताकि ट्रांसजेंडर छात्र इन पाठ्यक्रमों को आगे बढ़ाकर रोज़गार प्राप्त कर सकें।

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शुभ्रा पंत कोठारी

लेखिका जाकिर हुसैन कॉलेज (सान्ध्य) दिल्ली में असिस्टेण्ट प्रोफेसर हैं। संपर्क +919871105590
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