आवरण कथादेश

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भारत

आज पूरे विश्व में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या एआई) की चर्चा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका प्रादुर्भाव चौथी औद्योगिक क्रान्ति का उद्घोष है। लेकिन जहाँ इसमें अपार सकारात्मक सम्भावनाएँ देखी जा रही हैं, वहीं इसके सम्भावित दुष्परिणामों को लेकर आशंकाएँ भी हैं। इस दृष्टि से कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तुलना परमाणु ऊर्जा से की जा सकती है, जिसकी खोज के साथ ही एक ऐसा जिन्न बोतल से बाहर आ गया, जो आसुरी संहारकारी शक्तियों से भी लैस है और मानवता के कल्याण की सामर्थ्य भी रखता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी सम्भावनाओं और आशंकाओं पर विचार-विमर्श करने के लिए नयी दिल्ली के भारत मण्डपम में इस वर्ष 16 फरवरी से लेकर 21 फरवरी तक एक वैश्विक सम्मेलन आयोजित किया गया; नाम दिया गया – इण्डिया एआई इम्पैक्ट समिट। इस सम्मेलन के उद्देश्यों और इसमें लिए गये निर्णयों की चर्चा करने के पूर्व विषयवस्तु की पृष्ठभूमि पर विचार आवश्यक लगता है।

अठारहवीं सदी में स्टीम इंजन ने पहली औद्योगिक क्रान्ति का सूत्रपात किया और इसके साथ ही जो काम मजदूर अपने हाथों से करते थे, वे स्टीम इंजन चालित मशीनों से होने लगे। परिणामस्वरूप वस्तुओं के उत्पादन में अप्रत्याशित तेजी आ गयी। उन्नीसवीं सदी में जब बिजली का प्रादुर्भाव और विस्तार हुआ, तब दूसरी औद्योगिक क्रान्ति आई; स्टीम इंजन चालित मशीनों का स्थान बिजली चालित मशीनों ने ले लिया। साथ ही, बिजली के प्रकाश की सुविधा के कारण कारखानों में दिन-रात काम होने लग गया। एक बार फिर उत्पादन में बेतहाशा वृद्धि हुई।

बीसवीं सदी में औद्योगिक उत्पादन की प्रक्रिया में कम्प्यूटर और इण्टरनेट भी जुड़ गये और कारखानों में स्वचालन की प्रक्रिया शुरू हो गयी। यह तीसरी औद्योगिक क्रान्ति थी। स्वचालन के कारण कम कामगारों द्वारा और भी अधिक उत्पादन होने लग गया। लेकिन ये मशीनें सौंपे गये काम को यन्त्रवत् दुहराती रह सकती हैं, मनुष्यों की तरह सोचने-समझने, विश्लेषण करने और स्वतन्त्र रूप से फैसले लेने में समर्थ नहीं हैं।

लेकिन इक्कीसवीं सदी एक नये क्रान्तिकारी दौर से गुजर रही है, जिसमें मशीनें अधिक विकसित होती जा रही हैं; इतनी विकसित कि अब वे मनुष्यों की ही तरह सोचने-समझने, विश्लेषण करने और स्वतन्त्र रूप से फैसले लेने में समर्थ हो रही हैं, यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सम्पन्न होती जा रही हैं। यही है, चौथी औद्योगिक क्रान्ति।

विषयवस्तु की गहराई में उतरने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता की अवधारणा की चर्चा भी जरूरी हो जाती है।

अपने दैनिक जीवन में आपका वास्ता कृत्रिम बुद्धिमत्ता से कई बार पड़ा होगा। यूट्यूब पर अपनी पसन्द के वीडियो देखते समय आपने देखा होगा कि जैसे ही आप चन्द वीडियो देख लेते हैं, यूट्यूब को आपकी पसन्द समझ में आने लगती है और वह स्वयं ही आपकी पसन्द से मेल खाते विकल्प सुझाने लगता है। आपने गीत-संगीत का आनंद देने वाले वैसे उपकरण भी अवश्य ही देखे होंगे, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता से युक्त किसी सहायिका से लैस होते हैं। इस सहायिका से आप किसी खास गाने की फरमाइश कर सकते हैं और सवाल भी पूछ सकते हैं, जैसे—आज का तापमान क्या है? कई व्यापारिक संगठनों में ग्राहकों के सवालों का जवाब देने के लिए किसी मनुष्य के स्थान पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले उपकरण इस्तेमाल होते हैं, जिन्हें ‘चैटबॉट’ कहा जाता है। ये आपके साथ संवाद करने और आपके प्रश्नों का जवाब देने में सक्षम होते हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता वास्तव में कम्प्यूटर ही होता है, जिसे ठीक उसी प्रकार प्रशिक्षित किया जाता है जैसे मनुष्यों को। इस प्रशिक्षण के तीन आयाम होते हैं—कम्प्यूटर विजन, नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (यानी एनएलपी) और स्टैटिस्टिकल डेटा।

पहले कम्प्यूटर विजन को समझते हैं। मान लें कि किसी छोटे बच्चे ने पहले कभी कार नहीं देखी है। आप उसे एक-एक करके कारों के दस अलग-अलग मॉडल दिखलाते हैं। इन मॉडलों को वह बच्चा जब देखता है, तो उसका मस्तिष्क इनके रूप-रंग और आकार-प्रकार का अपने मस्तिष्क में विश्लेषण करता है और यह अंकित कर लेता है कि कार होती कैसी है। जब उस बच्चे को आप कार का कोई नया मॉडल दिखलाएँगे, तो अपने मस्तिष्क में पहले से अंकित छवि के आधार पर वह इस मॉडल का विश्लेषण करेगा और उसे एक कार के रूप में पहचानेगा। एक कम्प्यूटर को भी ठीक इसी प्रकार प्रशिक्षित कर वस्तुओं इत्यादि की पहचान करने में सक्षम बनाया जाता है। अन्तर यह है कि मनुष्य अपनी आँखों से देखते हैं और कम्प्यूटर कैमरे की मदद से।

एनएलपी’ को हम सामान्य भाषा में मानवीय भाषा को पढ़ने, समझने, लिखने और बोलने की क्षमता कह सकते हैं। जिस प्रकार मनुष्यों को अक्षरज्ञान, शब्दज्ञान, वाक्य-विन्यास इत्यादि के द्वारा किसी भाषा का प्रशिक्षण देकर उसे उस भाषा को पढ़ने, लिखने, समझने और बोलने के लायक बना दिया जाता है, ठीक उसी प्रकार कम्प्यूटर को भी भाषाओं का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण द्वारा कम्प्यूटर को एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद भी सिखाया जा सकता है।

स्टैटिस्टिकल डेटा यानी सांख्यिकीय आँकड़ों के विश्लेषण द्वारा निष्कर्ष निकालने और उसके आधार पर निर्णय लेने में तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता का जवाब ही नहीं है। यह कल्पनातीत रूप से विशालकाय आँकड़ों का अध्ययन कर उनके अन्दर छिपे पैटर्न को समझने और इस आधार पर सटीक सलाह देने में सक्षम है। मौसम का सटीक पूर्वानुमान इसका एक उदाहरण है। यह कम्प्यूटर में संग्रहीत मौसम सम्बन्धी आँकड़ों, जैसे हवा की गति, आर्द्रता, तापमान इत्यादि के विश्लेषण के आधार पर यह बता देती है कि आने वाले दिनों में मौसम कैसा रहने वाला है। अन्य क्षेत्रों में भी विशालकाय आँकड़ों के अध्ययन के द्वारा भविष्यवाणियाँ करना सहज होने लगा है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सकारात्मक प्रयोग द्वारा मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है—विशेषकर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में। जहाँ तक शिक्षा का प्रश्न है, हर छात्र के सीखने की गति और क्षमता समान नहीं होती और कक्षा की पढ़ाई का हर विद्यार्थी को बराबर लाभ नहीं मिल पाता। कृत्रिम बुद्धिमत्ता युक्त शिक्षक छात्रों को उनकी जरूरत के हिसाब से पढ़ाने के साथ-साथ उनकी शंकाओं का समाधान भी कर सकने में सक्षम है; वह भी बिना थके। साथ ही, कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले शिक्षक की सुविधा रात-दिन, कभी भी उपलब्ध रहेगी। कम विकसित इलाकों में, जहाँ अच्छे स्कूल नहीं हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा शिक्षा की गुणवत्ता में क्रान्तिकारी सुधार लाया जा सकता है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का महत्त्वपूर्ण योगदान हो सकता है। इसके द्वारा किसी रोगी के सम्पूर्ण चिकित्सकीय इतिहास का विस्तृत अध्ययन और विश्लेषण मानव डॉक्टर की तुलना में अधिक शीघ्रता और दक्षता से किया जा सकता है और इनके आधार पर अधिक सटीक इलाज की सलाह दी जा सकती है। साथ ही, कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाला मेडिकल असिस्टेण्ट चौबीसों घंटे किसी मरीज की सेवा और निगरानी कर सकता है और आपातकाल में डॉक्टर को तुरंत सूचित कर सकता है। गरीब और पिछड़े इलाकों में, जहाँ स्वास्थ्य सुविधाएँ अपर्याप्त हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता वरदान साबित हो सकती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से बिना ड्राइवर के चलने वाली कारें विकसित हो रही हैं और जैसे ही ये बाजारों में उपलब्ध होने लग जाएँगी, परिवहन के क्षेत्र में एक नयी क्रान्ति आएगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से बैंक कर्ज के आवेदकों की भुगतान क्षमता का आकलन अधिक सटीक ढंग से कर सकते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रयोग की सम्भावनाएँ अत्यन्त विस्तृत हैं और इन सम्भावनाओं का सम्पूर्ण आकलन अभी शेष है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर चिन्ताएँ भी हैं। एक चिन्ता तो यह है कि जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाली मशीनें मनुष्यों द्वारा किए जाने वाले काम सम्भाल लेंगी, तो इससे बेरोजगारी बढ़ेगी। उन विकसित देशों में जहाँ जन्म दर घट रही है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपयोगी साबित हो सकती है, लेकिन भारत जैसे विकासमान देशों के लिए इससे युवा बेरोजगारी बढ़ सकती है।

व्यक्तिगत डेटा को लेकर भी चिन्ताएँ हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाली मशीनों को प्रशिक्षित करने में नागरिकों के निजी जीवन से जुड़ी जानकारियों का प्रयोग होता रहा है, जिससे व्यक्तिगत गोपनीयता अपना अर्थ खो रही है। यदि नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले कंप्यूटरों के पास पहुँच जाती है, तो अपराधी तत्त्व उन जानकारियों का विश्लेषण कर आम लोगों के निजी जीवन के बारे में ऐसी जानकारियाँ हासिल कर सकते हैं, जिनका दुरुपयोग ब्लैकमेलिंग के लिए किया जा सकता है। साथ ही, अपराधी तत्त्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से अत्यन्त विकसित साइबर आक्रमण की योजना भी बना सकते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के डीप फेक वीडियो बनाकर उन्हें आपत्तिजनक स्थिति में दिखलाने और उनका चरित्र-हनन करने की घटनाएँ भी प्रायः सामने आती रहती हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा लिए गये निर्णय निष्पक्ष न होकर पूर्वाग्रहग्रस्त और भेदभावपूर्ण भी हो सकते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि कम्प्यूटर को किन जानकारियों और आँकड़ों की मदद से प्रशिक्षित किया गया है।

एक चिन्ता यह भी जताई जा रही है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मॉडलों को विकसित और प्रशिक्षित करने में जिन डेटा सेंटरों का इस्तेमाल किया जाता है, वे विशालकाय होते हैं और उनके लिए भारी मात्रा में बिजली की जरूरत पड़ती है। भारी मात्रा में अतिरिक्त बिजली का उत्पादन पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है।

लेकिन एक बड़ी चिन्ता इस बात को लेकर है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मॉडलों का विकास अत्यन्त खर्चीला है और इस वजह से अमरीका स्थित कुछ बड़ी कम्पनियाँ, जैसे ओपन एआई (चैटजीपीटी मॉडल), अल्फाबेट (गूगल डीपमाइंड मॉडल), माइक्रोसॉफ्ट (कोपायलट एआई मॉडल) इत्यादि ही इस मैदान में टिक पा रही हैं, वह भी भारी कर्ज लेकर। चीन ने भी इस क्षेत्र में कदम रखा है और भारी-भरकम सरकारी वित्तीय सहायता के बूते पर डीपसीक नामक मॉडल विकसित किया है। ऐसे में यह भय व्यक्त किया जा रहा है कि यदि इस टेक्नोलॉजी पर केवल दो देशों का ही अधिकार रहता है, तो ये देश इसका उपयोग मानव कल्याण के लिए करने की बजाय केवल अपने लाभ और शेष विश्व पर तकनीकी आधिपत्य के लिए करेंगे, जिससे एक नये प्रकार का उपनिवेशवाद जन्म ले सकता है।

शेष विश्व की चिन्ताओं के आलोक में पहला वैश्विक कृत्रिम बुद्धिमत्ता सम्मेलन 2023 में ब्रिटेन के ब्लेचली पार्क में, दूसरा सम्मेलन दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में और तीसरा सम्मेलन फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित किया गया, जिनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास को एक सार्थक, सुरक्षित, कल्याणकारी और नैतिक दिशा देने पर गहन चर्चाएँ हुईं। चूँकि ये तीन सम्मेलन विकसित देशों में आयोजित हुए, अतः जिन मुद्दों पर बल दिया गया था, उनमें विकासमान देशों का दृष्टिकोण सही ढंग से प्रतिबिम्बित नहीं हो पाया। पहली बार यह सम्मेलन एक विकासमान देश में हुआ। विकासमान देश अपने लिए आवाज उठाने हेतु भारत की ओर देखते हैं और इस सम्मेलन में भारत ने अपनी इस जवाबदेही का बखूबी निर्वहन किया।

सम्मेलन में 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिनमें विभिन्न देशों के 20 राष्ट्राध्यक्ष और 60 मन्त्री शामिल थे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र की सभी जानी-मानी तकनीकी हस्तियाँ इस सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए आई हुई थीं, जैसे—गूगल के सुंदर पिचाई, ओपन एआई के सैम ऑल्टमैन, आन्थ्रोपिक के डारियो आमादेई और गूगल डीपमाइंड के डेमिस हसाबिस। रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुकेश अंबानी और विश्व बैंक के सांगबू किम भी सम्मेलन में शामिल हुए।

इस सम्मेलन को सही दिशा देने के इरादे से यह तय किया गया कि इसमें की जाने वाली चर्चाएँ तीन स्तंभों पर टिकी होंगी—मानव, पृथ्वी और प्रगति। उद्देश्य यह था कि सम्मेलन में होने वाली बहसें अपने ऊँचे उद्देश्यों से भटकने नहीं पाएँ। सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने 19 फरवरी को किया। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव अंटोनियो गुटेरेस समारोह के मुख्य वक्ताओं में थे। मैक्रों ने आधार कार्ड द्वारा देश के 140 करोड़ देशवासियों की डिजिटल पहचान सुनिश्चित किए जाने और यूपीआई के माध्यम से सहज डिजिटल भुगतान की सुविधा उपलब्ध कराने की प्रशंसा करते हुए कहा कि भारत ने जो कर दिखाया है, वह अन्य कोई भी देश नहीं कर पाया है। गुटेरेस ने अपने वक्तव्य में ज़ोर देकर कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का लाभ केवल चन्द ताकतवर देशों और अरबपतियों तक ही सीमित नहीं रहे; पूरे विश्व को इसका लाभ मिले।

मोदी ने अपने उद्घाटन भाषण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रति मानव-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाए जाने पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का लाभ हर व्यक्ति तक पहुँचे और यह सुनिश्चित करने के लिए विकासमान देशों और उपेक्षित रहती आई भाषाओं का खास ध्यान रखा जाए। उन्होंने डिजिटल सम्पदा के संरक्षण पर बल देते हुए कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला डेटा जिस देश में उत्पन्न किया जा रहा हो, उसे उसी देश की सम्पदा माना जाए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रणालियाँ विधिसम्मत और समाज के लिए सुरक्षित हों, इनके दुरुपयोग पर अंकुश लगाने के लिए वैश्विक मानदंडों का निर्धारण हो और उनके अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए एक कारगर व्यवस्था बने। इस संदर्भ में उन्होंने डीपफेक के गलत इस्तेमाल पर अंकुश लगाने और बच्चों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े कुप्रभावों से बचाने के लिए नियम बनाने का भी सुझाव दिया।

प्रधानमन्त्री के अभिभाषण को आधार बनाकर सम्मेलन के अन्त में एक घोषणा-पत्र जारी किया गया, जिस पर नब्बे से अधिक देशों और संगठनों ने हस्ताक्षर किए। इस प्रकार भारत ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भावी दिशा के निर्धारण के लिए एक खाका तय कर दिया है। 2027 का सम्मेलन जिनेवा में और 2028 का सम्मेलन संयुक्त अरब अमीरात में होगा और दिल्ली का घोषणा-पत्र इनके लिए मार्गदर्शक का कार्य करेगा।

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धीरंजन मालवे

लेखक बीबीसी में प्रसारणकर्मी एवं प्रसार भारती के पूर्व उच्चाधिकारी रहे हैं। सम्पर्क +919810463338, dhiranjan@gmail.com
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