
बहुसंख्यकों की श्रेष्ठता ग्रन्थि और अल्पसंख्यकों के अलगाववाद की प्रवृत्ति स्वतन्त्रता पूर्व ही शुरू हो गयी थी। स्वतन्त्रता आन्दोलन में जैसे जैसे ब्रिटिश प्रणाली के लोकतन्त्र का प्रयोग भारत में शुरू हुआ और पृथक निर्वाचन प्रणाली 1909 में आरम्भ की गयी वैसे वैसे इस लोकतन्त्र का संकट भी उपस्थित होता गया। अगर हम यह कहें कि 1947 का विभाजन ब्रिटिश प्रणाली के लोकतन्त्र का संकट ही था तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। ब्रिटिश सरकार ने ऐसी लोकतान्त्रिक प्रणाली बनाकर नहीं दी कि इस देश में धार्मिक अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समाज शान्ति, सद्भाव और पारस्परिक विश्वास के साथ रह सकें। कॉंग्रेस पार्टी ने 1928 में नेहरू(मोतीलाल) रिपोर्ट के माध्यम से एक गम्भीर प्रयास किया था लेकिन मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना ने उसे बेहद आक्रामक और अतार्किक ढंग से खारिज कर दिया। 1944 में जेल से छूटने के बाद महात्मा गाँधी मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना से कई बार मिलने गये और एक संघीय ढाँचे का प्रस्ताव रखकर चर्चा करने और उन्हें अलगाववाद से दूर करने के लिए समझाने की कोशिश की लेकिन वे नहीं माने।
लेकिन धार्मिक अल्पसंख्यकों के मन में अलगाव का बीज बोकर और बहुसंख्यकों के मन में श्रेष्ठता का भाव पैदा कर एक सन्देह पैदा करने वाली लोकतान्त्रिक प्रणाली विकसित करने की कोशिश 1909 में शुरू हो चुकी थी और कभी बंग भंग तो कभी दूसरे प्रयासों से उसे पुष्ट करने की कोशिशें हुईं। दूसरी ओर भारत को एक राष्ट्र बनाने में लगे नेताओं को लग रहा था कि इससे भारत में अँग्रेजों के विरुद्ध एकता कायम हो रही है। यह अपने में हैरानी की बात है 1916 के लखनऊ समझौते में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और मोहम्मद अली जिन्ना ने स्वयं हिन्दू मुस्लिम एकता कायम करते हुए पृथक निर्वाचन प्रणाली को भारत के विविधतापूर्ण समाज के लोकतन्त्र हेतु उचित बताया। बल्कि मुसलमानों को जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व देने का फार्मूला स्वीकार किया गया और इस फार्मूले को लोकमान्य तिलक सही कहा।(भारत का स्वतन्त्रता संघर्ष, पृ 120)
औपनिवेशिक दासता को चुनौती देने के लिए कौमी एकता कायम करने का जो लोकतान्त्रिक मॉडल विकसित किया गया वह दोषपूर्ण था और उसके दोष को हमारे स्वतन्त्रता आन्दोलन के नेता समझ नहीं पाए। गाँधी जब दक्षिण अफ्रीका से लौटकर इस देश के राजनीतिक क्षितिज पर आये उसके काफी पहले से धार्मिक अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक पैदा करने वाली जनगणना 1872 में शुरू हो चुकी थी। गाँधी ने अलग ढंग के लोकतन्त्र की बात की और वे उसे गाँव गणराज्य पर आधारित विकेन्द्रित लोकतन्त्र बनाना चाहते थे। वे संघीय ढाँचा निर्मित करना चाहते थे और तमाम क्षेत्रों को पर्याप्त स्वायत्तता देना चाहते थे। ऐसा लोकतन्त्र जहाँ चुनावी प्रतिस्पर्धा से कटुता न निर्मित हो। इसीलिए वे अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में ब्रिटिश संसद के लिए बहुत कठोर शब्द का प्रयोग करते हैं। इन सबसे बावजूद वे स्वयं एक ऐसी आकर्षक लोकतान्त्रिक प्रणाली का निर्माण नहीं कर पाये जिससे भारत की एकता कायम रह सके और विभाजन रुक जाए।
पारस्परिक प्रतिस्पर्धा और उसके परिणामस्वरूप सामुदायिक विभाजन की प्रक्रिया ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली में भी निहित थी। इसीलिए गाँधी ब्रिटिश प्रभाव में विकसित हुई काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से भिन्न अलग शिक्षा प्रणाली विकसित करना चाहते थे। ऐसे तमाम सुझाव कानपुर दंगों पर बनी भगवान दास कमेटी की रिपोर्ट में मौजूद हैं। लेकिन वह सब हो न सका और शैक्षणिक संस्थान एक समुदाय को दूसरे के प्रति अविश्वास पैदा करने के केन्द्र बनते गये। यह स्थिति भारत के लेकर इंग्लैंड तक मौजूद थी। रहमत अली भी यही कर रहे थे और बाद में हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी इसी काम में लग गया। अगर हम इतिहास के प्रसिद्ध समाजशास्त्री सतीश सब्बरवाल को समझें तो सामुदायिक टकराव और फिर अलगाव होते रास्ते साफ दिखते हैं। (सतीश सब्बरवाल—स्पाइल्स आफ कंटेन्शन्स-हाउ इण्डिया वाज डिवाइडेड इन 1947)
साधारण बहुमत प्रणाली यानी फर्स्ट पास्ट पोस्ट सिस्टम वाले लोकतन्त्र के इसी खौफ ने स्वतन्त्रता से पहले भारत के धार्मिक अल्पसंख्यक तबके के एक हिस्से में भय पैदा किया और फिर उस भावना से खेलकर झूठ और हिंसा का सहारा लेकर जिन्ना ने पाकिस्तान का निर्माण किया। गाँधी इसी खौफ को मिटाने में लगे थे और जिन्ना, मुस्लिम लीग और पीछे से अँग्रेज सरकार इस प्रणाली को परोसते हुए इसी खौफ को बढ़ाने में लगे थे। इस अविश्वास और खौफ को बढ़ाने में हिन्दू महासभा और संघ पीछे नहीं थे। आज उसी खौफ को दर्शाते हुए भारत में बहुसंख्यकवाद विकसित हो रहा है और लोकतन्त्र संकट में आ गया है। अगर 1947 के पहले एक व्यक्ति एक वोट वाले लोकतन्त्र के डर के चलते भारत का विभाजन हुआ तो आज उसी को खत्म करके भारत दूसरे विभाजन की ओर जा रहा है। जाहिर सी बात है भारत इस समय सामाजिक और राजनीतिक रूप से बुरी तरह विभाजित है और यह विभाजन लोकतन्त्र को संकट में डाले बिना नहीं हुआ है।
1947 से पहले जिस तरह का झूठ और आक्रामक आख्यान के माध्यम से जिन्ना और मुस्लिम लीग ने विभाजनकारी राजनीति खड़ी की आज उसी तरह के आख्यान के माध्यम से संघ परिवार अपनी राजनीति खड़ी कर चुका है। इकबाल और उसके बाद जिन्ना की तर्क प्रणाली यह थी कि हिन्दू और मुस्लिम एक राष्ट्र हैं ही नहीं। वे एक साथ नहीं रह सकते। वे एक साथ रहेंगे तो इस्लाम की ओजस्विता प्रकट नहीं हो पाएगी। हिन्दू उन्हें उभरने नहीं देंगे। इसी तरह का तर्क कॉंग्रेस के बड़े नेता और हिन्दू महासभा से भी जुड़े लाला लाजपत राय ने भी दिया था। बाद में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, डॉ भीमराव अम्बेडकर भी अपने ग्रन्थों में इसी प्रकार का तर्क दे रहे थे। ऐसे तर्क को आत्मनिर्णय के अधिकार के बहाने बाद में कॉंग्रेस पार्टी और उसके नेता पण्डित जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल और मौलाना आजाद ने भी एक हद तक स्वीकार किया। लेकिन सिन्ध, पंजाब, पश्चिमोत्तर प्रान्त और देश के दूसरे हिस्सों में खान अब्दुल गफ्फार खान, अल्ला बख्श और सिकन्दर हयात जैसे कई मुस्लिम नेता थे जो इस तर्क का विरोध कर रहे थे। जिनमें से सीमान्त गाँधी को मजबूरन पाकिस्तान जाना पड़ा, तो अल्लाबख्श की हत्या हो गयी। सिकन्दर हयात ढुलमुल में थे और मुस्लिम लीग के आक्रामक अभियान के आगे ढह गये।
(डॉ भीमराव अम्बेडकरप–थाट्स आन पाकिस्तान या पाकिस्तान आर पार्टीशन आफ इण्डिया)
अगर स्वतन्त्रता पूर्व उस प्रकार की राजनीति पर चल कर देश का विभाजन हो सकता है तो स्वतन्त्रता के उपरान्त इस प्रकार की राजनीति से देश का विभाजन क्यों नहीं होगा? यह विभाजन भौगोलिक रूप से जल्दी भले न हो लेकिन सामाजिक और राजनीतिक रूप से हो चुका है। सबसे बड़ी बात है कि देश की वे तथाकथित सेक्यूलर पार्टियाँ जिन्हें अल्पसंख्यक समुदाय के वोट मिलते हैं और जो अपने संविधान और कार्यप्रणाली में साम्प्रदायिक नहीं हैं वे अब अपनी पार्टी के मुस्लिम चेहरे को आगे करने से घबराती हैं और उन मुद्दों पर हस्तक्षेप भी नहीं करतीं जो स्पष्ट रूप से धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के साथ भेदभाव से जुड़े हैं। विडम्बना देखिए कि इस विभाजन को रोक पाने में लोकतान्त्रिक संस्थाएँ सक्षम नहीं हो पा रही हैं। संविधान के तहत बनी हुई लोकतान्त्रिक संस्थाएँ ही वैसे काम कर रही हैं जो एक ओर धार्मिक अल्पसंख्यकों में अलगाव और उपेक्षा का भाव पैदा कर रही हैं तो दूसरी ओर बहुसंख्यकों के भीतर श्रेष्ठता, नफरत, दमन और हिंसा की भावना पैदा कर रही हैं। हिंसा और दंगा होने पर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को जिस तरह से गिरफ्तार किया जाता है और उन पर निवारक नजरबन्दी कानून लागू करके उन्हें लम्बे समय तक जेल में रखा जाता है और बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को बख्श दिया जाता है वह अपने में विभेद और पृथकतावाद पैदा करने का ही तरीका है। धार्मिक अल्पसंख्यकों को विश्वास में लेकर किसी कानून का निर्माण और उनकी रक्षा करने का दायित्व निभाने के बजाय उन पर बहुमत का बुलडोजर और रोडरोलर चलाने की राजनीति भारतीय लोकतन्त्र को पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसा ही बना रही है। हम अपने न्यायप्रिय निर्णयों से विभेदनकारी भावनाओं को दूर करने के बजाय पड़ोसी देशों से नफरत और अन्याय की प्रेरणा लेने के लिए तैयार रहते हैं।
अल्पसंख्यकों के मतों के प्रभाव को कम करने के लिए नये तरीके से परिसीमन, फिर उनके वोट काटने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण और डराने धमकाने के तरीके अपनाए जा रहे हैं। इस बीच कई उपचुनावों में उन्हें वोट डालने से रोकने के लिए सुरक्षा बलों का इस्तेमाल किया गया है। इसी के साथ विदेशी घुसपैठिया बताकर बहुत सारे लोगों की नागरिकता छीनने की भी तैयारी है। जिनकी नागरिकता ली जा रही है उन्हें सामान्य आबादी से अलग रखने के लिए असम में तो बड़े पैमाने पर बन्दी शिविर बनाए गये हैं। देश के दूसरे हिस्सों से भी बांग्ला बोलने वाले लोगों को पकड़कर उस पार भेजा जाता है और फिर जब यह पता चलता है कि वे तो भारतीय नागरिक हैं तो बड़ी बेशर्मी से उन्हें वापस लाया जाता है। देश के पूर्वोत्तर हिस्सों में बड़ी आबादी अपने को भारतीय साबित करने में जी जान से लगी हुई है। उत्तर प्रदेश में भी ऐसे शिविरों को बनाए जाने का आदेश दिया गया है और लोगों के माँ बाप की जन्मतिथि के हिसाब से उनके जन्म और नागरिकता को फर्जी बताया जा रहा है।
चुनाव प्रणाली के माध्यम से निर्मित किए जा रहे लोकतान्त्रिक संकट में तो सरकारी संस्थाएँ लगी हैं लेकिन सामाजिक स्तर पर जो संकट पैदा किए जा रहे हैं उनमें गैर-सरकारी संस्थाएँ सक्रिय हैं। यह बात अलग है कि उन्हें ताकत देने का काम या संरक्षण देने का काम सरकारी संस्थाएँ करती रहती हैं। चाहे गोरक्षा के बहाने अल्पसंख्यकों की लिंचिंग की घटना हो या फिर मदरसों पर बुलडोजर चलाने से लेकर नमाज पढ़ने पर होने वाले विरोध और आपत्तियों का सवाल हो या फिर क्रिसमस मनाने पर होने वाला विरोध हो यह सब उस लोकतन्त्र में गहरे संकट की आहट ही है। संविधान ने सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार दिया है और अल्पसंख्यकों की भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए विशेष अधिकार दिये हैं। ऐसे में विशेष अधिकार कौन कहे सामान्य अधिकार की हिफाजत भी मुश्किल हो रही है।
हम अगर टकरावों के दुष्चक्र के इतिहास का अवलोकन करें तो पाएँगे कि इसके तीन चरण प्रमुख रूप से होते हैं। पहला टकराव धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों पर रचे जाने वाले आख्यान के माध्यम से होता है। दूसरा टकराव संस्थाओं पर कब्जा करने और उसकी राजनीति के माध्यम से होता है और तीसरा टकराव शारीरिक तौर पर होने वाली हिंसा और दंगों के माध्यम से होता है। सीएए, एनआरसी, अन्तर्रधार्मिक विवाहों को रोकने वाले कानून, धर्मान्तरण रोकने वाले कानून, गोरक्षा सम्बन्धी कानून, मदरसों पर नियन्त्रण, बुलडोजर की कार्रवाई यह सब इन्हीं चरणों के रूप हैं। आखिरी चरण नागरिकता से वंचित किए जाने वाला हो सकता है। यही चरण आखिर में किसी भी देश में विभाजन का रूप धारण करते हैं। कम से कम भारत का अनुभव तो ऐसा ही होता है। तमाम राजनीतिक अध्ययन यह बताते हैं कि आजाद भारत में रहने वाला धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय लम्बे समय से गैर धार्मिक दलों को ही मतदान करता रहा है। बल्कि कई राजनीतिक अध्ययन यह भी बताते हैं कि एम.एन श्रीनिवास द्वारा प्रतिपादित वोट बैंक का सिद्धान्त व्यावहारिक रूप से सटीक नहीं है। लेकिन मीडिया और चुनाव विश्लेषक बड़ी बारीकी से उसी सिद्धान्त पर अपने आख्यान और विमर्श रचते हैं। आजादी के पहले भले ही उसके एक तबके ने मुस्लिम लीग को मतदान किया और वह भी 1946 के चुनाव में लेकिन उसके पहले और उसके बाद वह या तो कॉंग्रेस को वोट देता रहा है या फिर बाद में कॉंग्रेस और उन राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को मतदान करता रहा है जो घोषित रूप से साम्प्रदायिक नहीं हैं। आज भी वह कहीं कॉंग्रेस पार्टी, समाजवादी पार्टी, कहीं तृणमूल कॉंग्रेस, कहीं द्रमुक, कहीं कम्युनिस्ट पार्टी तो कहीं तेलुगू देशम को वोट देता है। लेकिन इस बीच एक नयी प्रवृत्ति यह उभरी है कि वह इन दलों के अलावा आल इण्डिया इतेहादुल मुसलमीन यानी असदुद्दीन ओवैसी के दल को भी मतदान करने लगा है। बिहार विधानसभा का चुनाव और महाराष्ट्र में हाल में हुआ स्थानीय निकायों का चुनाव इसका प्रमाण है। महाराष्ट्र में ओवैसी की पार्टी को सात प्रतिशत वोट मिलना सेक्यूलर राजनीति को नये किस्म का धक्का है। संघ परिवार यही चाहता है। वह एक ओर कॉंग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे दलों को परिवारवादी और मुसलमानों की पार्टी बताकर उनसे हिन्दुओं को दूर करना चाहता है तो दूसरी ओर ओवैसी जैसे लोगों के दलों की ओर अल्पसंख्यक वोटों को ठेल कर स्पष्ट रूप से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण चाहता है।
वास्तव में लोकतन्त्र का यह संकट इसलिए पैदा हुआ क्योंकि लोकतन्त्र का अर्थ अधिकतम संख्या बल जुटाकर येन केन प्रकारेण सत्ता पर कब्जा करने तक रह गया। सचमुच यहाँ इकबाल का व्यंग्य में कहा गया वह शेर सही बैठता दिखाई दे रहा है—कि जम्हूरियत इक तर्जे हुकूमत है कि जिसमें बन्दों को गिना करते हैं तौला नहीं करते। उसके भीतर से सेवा भाव और पारस्परिकता और विश्वास की भावना बाहर निकलती रही। उसके भीतर साधन की पवित्रता गायब होती गयी। दिखाने के लिए आदर्श आचार संहित जारी होती है लेकिन वह कमजोर उम्मीदवारों और विपक्षी दलों के लिए होती है। उसका सत्ताधारी दल पालन नहीं करते। क्योंकि चुनाव आयोग स्वायत्त नहीं है। अब तो चुनाव आयोग के अधिकारियों पर आजीवन मुकदमा न चलाने और उनकी नियुक्ति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाकर उसे पक्षपात के लिए परम स्वतन्त्र होने का दर्जा दे दिया गया है। वह चुनाव प्रणाली पर सन्देह पैदा करने वाले सवालों का सही उत्तर देने के बजाय प्रतिउत्तर करते हुए अधिक सन्देह पैदा करता है। लोकतन्त्र तभी तक लोकतन्त्र रहता है जब तक उसमें जनता की इच्छा की प्रधानता रहती है। निश्चित तौर पर जनता की यह इच्छा सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संस्थाओं के माध्यम से प्रकट होती है। लेकिन जब जनता की वह इच्छा संकेन्द्रित पूँजी और राजनीतिक दलों के संगठित गिरोह के वशीभूत हो जाती है तब लोकतन्त्र बीमार हो जाता है। भारत की इस बीमार होते लोकतन्त्र के लिए किसी महाभिषक की आवश्यकता है। लेकिन किसी महाभिषक के पास कोई संजीवनी बूटी नहीं होती। उसके लिए तमाम औषधालय चाहिए जो निरन्तर लोकतान्त्रिक संस्थाओं को निष्पक्ष और स्वायत्त बनाएँ उन्हें मूल्य शिक्त करें और जनता के भीतर ऐसी सामाजिक क्रान्ति पैदा करें कि वह धर्म और राजनीति के अन्तर को समझ कर दोनों को गड्मड् न करे। क्योंकि डॉ लोहिया ने ठीक ही कहा है कि किसी एक धर्म को किसी एक राजनीति से मिलाने से धर्म भ्रष्ट हो जाता है और राजनीति कलही हो जाती है। भारत के राजनीति शास्त्रियों को लोकतन्त्र के मौजूद स्वरूप पर भी विचार करना होगा और यह भी सोचना होगा कि पूँजीपतियों के हाथ में कैद इस लोकतन्त्र की आयु कितनी लघु या कितनी दीर्घ हो सकती है।










