एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी

माचिस कौन ले गया , अगिया बेताल  

 

  • शरद कोकास 

 

    भाग – 18   

 

          वाकणकर सर के साथ अवशेषों को संरक्षित करने की प्रक्रिया पूर्ण करते ही हम लोगों के अध्ययन का एक अध्याय पूर्ण हो चुका था सो शाम को हम लोग थोड़ा मनोरंजन चाहते थे और उसके लिए सिटी अर्थात दंगवाड़ा जाने से बेहतर और क्या हो सकता था। किशोर आज मुखर था और बार बार राममिलन को छेड़े जा रहा था। नदी के पास बरगद का एक बड़ा पेड़ देखकर किशोर ने कहा “जानते हो पंडित, इस बरगद पर एक भूत रहता है।“  राममिलन ने गुस्से में कहा “वो हमें भूत-वूत से डर नाही लगता हमरे बजरंग बली सब भूतों की छुट्टी कर देते हैं। “हमें नहीं पता था पंडित की यह बात सुनकर किशोर त्रिवेदी के दिमाग़ में कोई शरारत जन्म ले चुकी है।“ खैर, ऐसे ही हँसी मज़ाक करते हुए हम लोगों ने नाला पार किया और दंगवाड़ा गाँव पहुँचे। चौक में पहुँच कर उसी दुकान के पटिये पर बैठकर चाय पी, अखबार पढ़ा और थोड़ी देर गाँव वालों के साथ गपशप करने के बाद वापस लौटे। इतने दिनों में गाँव वालों पर हम लोग ऐसा रोब जमा चुके थे जैसे हम उन्हीं के बाप-दादों का इतिहास लिखने वहाँ आए हों सो हम लोगों की ख़ातिरदारी भी बढ़िया होती थी। गाँव की यह सैर हम लोगों के लिए बहुत रोमांचक होती थी हमें उनकी ज़िन्दगी को करीब से जानने का अवसर भी मिलता था और हमारी सामाजिकता की भूख भी इससे शांत होती थी।

लौटते समय अन्धेरा हो चुका था। गाँव की ओर जाते समय हमने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था कि पिछले दिनों हुई वर्षा के कारण नाले में पानी कुछ बढ़ गया था और वे पत्थर जिन पर पाँव रखकर हम लोग पहले नाला पार करते थे पानी में डूब गए थे। जाते समय गपशप के बीच ध्यान ही नहीं रहा कि इस बार जिन पत्थरों पर हमने पाँव रखकर नाला पार किया था उन पत्थरों को चिन्हित कर लें। राम मिलन उन्हें छेड़े जाने की वज़ह से गुस्से में थे और अपनी खामख्याली में हम लोगों से अलग-थलग और आगे आगे चल रहे थे। नाले तक पहुँचने से पहले किशोर ने हम लोगों को धीरे से एक टीले की ओट में छुप जाने का इशारा किया और ख़ुद राममिलन के बहुत पीछे हो गए। हम समझ गए किशोर अपनी शरारत को अंजाम देने जा रहे हैं। राममिलन नाले पर पहुँचकर कुछ पल ठहरे और हम लोगों की राह देखी फिर यह सोचकर कि हम लोग बहुत पीछे रह गए हैं नाला पार करने के लिए अकेले ही आगे बढ़ गए। पत्थरों पर सम्भल कर पाँव रखते हुए जैसे ही वे बीच नाले तक पहुँचे किशोर तेज़ी से दबे पाँव आगे बढ़े और धीरे से उन्हें धक्का दे दिया। राम मिलन धड़ाम से पानी में गिर पड़े और हाय-तौबा मचाने लगे “अरे कौन है ससुरा हमका गिराय दिया ..।“ और वे जोरों से राम राम कहने लगे। किशोर ने कुछ कदम पीछे हटकर इस तरह अभिनय किया जैसे वे उनकी आवाज़ सुनकर दूर से दौड़े चले आए हों।

“क्या हुआ पंडित कौनो भूत-वूत धक्का दे दिया का?“ भूत का नाम सुनते ही पंडित जी की घिग्गी बन्ध गई और वे ज़ोर ज़ोर से रटने लगे “भूत पिसाच निकट नहीं आवै महावीर जब नाम सुनावै..।“ हम लोग चट्टानों की ओट से बाहर निकलकर जब तक उनके करीब पहुँचे तब तक वे उठकर खड़े हो चुके थे। लेकिन फिर उन्हें ध्यान आया कि उनका एक जूता पानी के भीतर रेत-वेत में कहीं दब गया है। वे झुक कर पानी में हाथ डालकर अपना जूता तलाशने लगे। किशोर ने चिल्लाकर कहा “अरे अशोक जरा माचिस तो देना… पंडित का जूता अन्धेरे में दिख नहीं रहा है।“ अशोक ने दूर से हाथ बढ़ाकर कहा “लो“। कुछ सेकंड रुककर किशोर ने फिर कहा “माचिस तो दे यार अशोक, अन्धेरे में कुछ सूझ नहीं रहा है।“ अशोक बोला “अभी तो यार तुम्हारे हाथ में पकड़ाई है माचिस ..तुमने हाथ बढ़ाया था ना ?“ किशोर सहित हम सब ने एक स्वर में कहा “हमने तो हाथ नहीं बढ़ाया।“ “किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया तो फिर माचिस कौन अगिया बेताल ले गया?“ किशोर बोला।

अगिया बेताल का नाम सुनते ही राममिलन भैया की तो हवा बन्द हो गई। गनीमत इस समय तक उनका जूता मिल गया था। उन्होंने दोनों जूते हाथ में लिए और गीले कपड़ों में, डर के मारे बगैर जूता पहने हनुमान चालीसा पढते हुए और लगभग दौड़ते हुए कैम्प की ओर बढ़ गए। हम लोग भी उनके साथ ही थे और बमुश्किल अपनी हँसी दबाते हुए उनका साथ दे रहे थे। हाँलाकि कैम्प तक पँहुचते हुए हँसी रोकना मुश्किल हो गया और पंडित जैसे ही तम्बू में घुसे हम लोग बाहर पेट पकड़ पकड़ कर हँसने लगे। यह हमने सोचा ही नहीं कि राममिलन भैया हमारे इस तरह हँसने से हमारी शरारत समझ गए होंगे।

इस घटना से राममिलन भैया अत्यन्त दुखी थे और घोषणा कर चुके थे कि अब वे एक पल भी इस कैम्प में नहीं रहना चाहते। डॉ. आर्य ने बहुत गम्भीरता से हम लोगों से कहा कि “देखो भाई ,पंडित बहुत डर गया है, अब उसे ज़्यादा परेशान मत करो वरना वह कैम्प छोड़कर चल देगा और बात सर तक पहँच जाएगी तो बहुत मुश्किल हो जाएगी।“ डॉ.वाकणकर कल शाम ही किसी काम से उज्जैन चले गए थे। हमने सोचा जब तक वे आएँ तब तक तो मज़ा लिया ही जा सकता है उसके बाद हम लोग राममिलन भैया से माफ़ी-वाफी मांग लेंगे और उन्हें प्रसन्न कर लेंगे, वैसे भी इतने सह्रदय हैं कि बुरा नहीं मानेंगे। सो हमने डॉ. आर्य को भी अपनी शरारत पार्टी में शामिल कर लिया और फिर अगले दिन भी राममिलन जी को छेड़कर मज़ा लेते रहे। राममिलन भैया चूँकि हम लोगों से नाराज़ थे इसलिए उन्होंने घोषणा की कि वे हम लोगों के साथ टेंट में रात नहीं बिताएँगे सो उस दिन वे अपना बिस्तर हम लोगों के टेंट से उठाकर ले गए और अवशेषों वाले तम्बू में शिफ्ट हो गए।

बहरहाल डॉ. वाकणकर की अनुपस्थिति में आर्य सर के मार्गदर्शन में अगले दिन भी हम लोगों ने ट्रेंच क्रमांक चार पर स्वतंत्र रूप से काम किया और पुन: पेग क्रमांक दो से प्रारम्भ कर दक्षिण की ओर दो मीटर के वर्गाकार टुकड़े में खुदाई की। दोपहर तक हम लोग 1.35 मीटर तक पहुँच चुके थे। यह एक बड़ी उपलब्धि थी। इस बीच दूसरे स्तर पर हमें दस सेंटीमीटर की रेत की एक परत मिली तथा इसके पश्चात तीसरे स्तर पर ईट का बना एक फ्लोर प्राप्त हुआ। इस फ्लोर को स्पष्ट रूप से प्राप्त करने के लिए हमने बाईं ओर इसका विस्तार किया। रेत की परत के विषय में डॉ.आर्य ने बताया कि हो सकता है किसी समय नदी की बाढ़ यहाँ तक आई हो और उसमें यह बस्ती डूब गई हो, यह अवशेष उसीके हो सकते हैं।

डॉ.वाकणकर शाम का काम समाप्त होने से पूर्व शिविर पहुँच चुके थे। मुख्य ट्रेंच देखने के बाद वे हमारी ट्रेंच पर आये। सबसे पहले उन्होंने तीसरे स्तर पर प्राप्त इस फ्लोर का अवलोकन किया और बताया कि यह किसी ताम्राश्मयुगीन मकान का हिस्सा लगता है जो किसी आक्रमण अथवा अग्निकांड के फलस्वरूप नष्ट हुआ है। सर द्वारा प्रदत्त इस जानकारी ने हमें उत्साह से भर दिया। हमें याद आया कि हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो में भी खुदाई के दौरान इसी तरह पूरा का पूरा शहर निकला था। वहाँ उन अवशेषों के बीच खड़े पुरातत्ववेत्ताओं के छाया चित्र हम लोगों ने देखे थे। हम लोग कल्पना करने लगे कि बस दो-तीन दिनों में हम भी यहाँ पूरा शहर ढूँढ निकालेंगे और फिर इन अवशेषों के बीच खड़े रहकर फोटो खिचवायेंगे। ग़नीमत कि डॉ वाकणकर से हम लोगों ने अपने इस शेखचिल्ली वाले ख़्वाब के बारे में कुछ नहीं कहा वर्ना वे उसी क्षण हमारा स्वप्न भंग कर देते।

यह बात तो हमें बहुत बाद में समझ आई कि किसी भी अवशेष की प्रारम्भिक अवस्था को देखकर उसके भविष्य के बारे में अटकलें नहीं लगाना चाहिये क्योंकि अनुमान गलत भी हो सकते हैं और पूर्वाग्रहों के आधार पर लिखा गया इतिहास हमेशा-हमेशा के लिए गलत मान्यताओं को स्थापित कर देता है। हमारे देश के इतिहास लेखन में कई बार ऐसा हुआ है जब यथार्थ से अधिक अनुमान या कल्पना को स्थान दिया गया। इतिहासकारों में इस बात पर विवाद अब तक जारी है। जो भी हो आज साईट से लौटते समय हम लोग बहुत उत्साह में थे। ऐसा लग रहा था जैसे हमारा आना सार्थक हो गया हो। इस खुशी में आज हम लोग फिर एक बार सिटी का चक्कर लगा आए। हाँ ..आज राम मिलन भैया हमारे साथ नहीं गए।

लेखक पुरातत्वेत्ता, कवि और कहानीकार हैं तथा सबलोग के नियमित स्तम्भ लेखक हैं|

सम्पर्क- +918871665060, sharadkokas.60@gmail.com

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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