रिपोर्ट

ट्रांसजेण्डर का उच्च शिक्षा के माध्यम से मुख्यधारा में समावेशन

 

प्रौढ़, सतत शिक्षा और विस्तार विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस (IOE) के तत्वावधान में ‘ट्रांसजेण्डर का उच्च शिक्षा के माध्यम से मुख्यधारा में समावेशन’ विषय पर दिनांक 12 मार्च, 2021 में एक राष्ट्रीय स्तर का वेबिनार आयोजित किया। यह कार्यक्रम भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय सामाजिक रक्षा संस्थान (NSID) के साथ सहयोग की पहल का हिस्सा था। राष्ट्रीय सामाजिक रक्षा संस्थान (NISD) के तकनीकी सहयोग के साथ विभाग ट्रांसजेण्डर समुदाय के लिए शैक्षिक और रोजगार के अवसरों की तलाश के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। वेबिनार का उद्देश्य अकादमिक जगत में ट्रांसजेण्डर समुदाय के सामने आने वाली चुनौतियों की पहचान करना और शिक्षण संस्थानोंमें उपलब्ध अवसरों के संदर्भ में उन्हें और संवेदनशील बनाना है। इस वेबिनार की मेजबानी संयोजक प्रोफेसर राजेश एवं सहसंयोजक डॉ. गीता मिश्रा द्वारा किया गया।

संक्षिप्त विवरण के साथ कार्यक्रम की शुरूआत डॉ. गीता मिश्रा द्वारा की गयी, जिसके बाद मंच पर प्रख्यात वक्ताओं की उपस्थिति का जिक्र करते हुए प्रोफेसर राजेश द्वारा कार्यक्रम के उद्देश्यों को सांझा किया गया। उन्होंने ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों के अधिकारों का सम्मान करने, उनके लिए समृद्ध साहित्य (एससीईआरटी, एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों सहित) को विकसित करने और इस संदर्भ में विभिन्न  हितधारकों को शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया। जिससे ट्रांसजेण्डर समुदाय के सशक्तिकरण के लक्ष्य को हासिल किया जा सके।

रेशमा प्रसाद (सदस्य:ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय परिषद) ने अपने वक्तव्य कहा कि, ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के प्रावधानों के अंतर्गत 2020 में इसे स्थापित किया गया। रेशमा प्रसाद ने ट्रांसजेण्डर समुदाय के साथ मिलकर समुदाय के अपने समावेशन और सशक्तिकरण के लिए कई कार्य किये है। उन्होंने ट्रांसजेण्डर से सम्बन्धित विभिन्न योजनाओं एवं गतिविधियों में ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों को शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया। जिससे ट्रांसजेण्डर समुदाय को तेजी से मान्यता एवं स्वीकृत प्राप्त हो सके। उन्होंने विश्वविद्यालय स्तर के पर होने वाले विभिन्न अनुसंधान परियोजनाओं के सदस्यों के रूप में ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों की भर्ती की आवश्यकता पर बल देते हुए इस पहल को ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों के कल्याण से सम्बन्धित बयाया। इससे लाभार्थियों को आत्मनिर्भर बनने एवं और समाज के भीतर जिम्मेदारी वाले पदों को संभालने के लिए अनुभव प्राप्त होगा।

मुख्य अतिथि, प्रोफेसर पी.सी. जोशी (कुलपति:दिल्ली विश्वविद्यालय) ने आयोजकों को इस प्रासंगिक विषय पर वेबिनार का आयोजन करने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने भारत और इसकी विविधता की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए विभिन्न अवसरों पर भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस संदर्भ में दिए गये वक्तव्यों का उल्लेख किया। अनेकता में एकता का भाव भारतीय संस्कृति के केंद्र में है जिसे सराहा और स्वीकार किया जाना चाहिए। पी.सी. जोशी जी ने सभी जातियों, धर्मों और लिंगों के व्यक्तियों के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता के महत्त्व और प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे।

विशिष्ट अतिथि, प्रोफेसर बालराम पाणि (दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों के डीन) ने भारत के संविधान में वर्णित सभी लोगों के लिए समान अधिकार एवं अवसर के अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपना वक्तव्य दिया। उन्होंने ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों के कल्याण के लिए अनुसंधान नेटवर्क विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। माननीय मुख्य अतिथि प्रोफेसर के. पार्थसारथी (कुलपति:तमिलनाडु ओपन यूनिवर्सिटी) ने जनगणना 2011 के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए अपना वक्तव्य दिया, जिसमें पहली बार ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों के विवरण को उनके सशक्तीकरण की स्थिति, साक्षरता और जाति के रूप में मान्यता दी गयी थी।

इसके अलावा, उन्होंने कहा कि ट्रांसजेण्डर समुदाय के अधिकांश व्यक्तियों को सामाजिक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है, जो उन्हें औपचारिक शिक्षा प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करता। उपरोक्त संदर्भ में ट्रांसजेण्डर समुदाय को आजीविका कमाने के लिए अन्य गतिविधियों जैसे सड़कों पर भीख माँगने जैसे इत्यादि कार्यों का सहारा लेने के लिए मजबूर करता है। इन वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए, यह आवश्यक है कि भारत सरकार व्यावसायिक कौशल, प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों आदि के माध्यम से ट्रांसजेण्डर समुदाय को कौशल प्रदान करे। यद्यपि, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में तीसरे लिंग को शामिल करने की आवश्यकता का उल्लेख किया गया है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि नीति को यथार्थ बनाने के लिए सभी प्रयासों एवं संभावनाओं पर ध्यान दिया जाए।

प्रोफेसर के. पार्थसारथी ने बताया कि तमिलनाडु भारत का पहला राज्य है जिसने ‘ट्रांसजेण्डर कल्याणकारी नीति’ तैयार की है, जो ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों को तमिलनाडु के सरकारी अस्पतालों में ‘सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी’ (एसआरएस) करवाने का लाभ उपलब्ध करवाता है। उन्होंने मार्च, 2009 में शुरू की गयी ‘मानसु’ (Manasu) नामक एक टेलीफोन हेल्पलाइन सेवा शुरू होने की सूचना दी, जिसे तमिलनाडु एआईडीएसकी पहल-स्वैच्छिक स्वास्थ्य सेवाओं द्वारा स्थापित किया गया था। इसके अलावा, ‘सृष्टि मदुराई’ (Srishti Madurai) (तमिलनाडु में पहली क्वीर और एलजीबीटी छात्र स्वयंसेवी समूह) ने अक्टूबर, 2011 में मदुराई शहर में एलजीबीटी लोगों के लिए एक हेल्पलाइन सेवा शुरू की। जून, 2013 में, हेल्पलाइन एक टैगलाइन “Just having someone understanding to talk to can save a life” के साथ 24 घंटे सेवा प्रदान करने करने वाली बन गयी। अंत में, कुलपति ने ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों के समावेशीकरण के लिए तमिलनाडु राज्य में किए गये विभिन्न अन्य कदमों और पहलों की जानकारी दी।

कार्यक्रम के अन्य अतिथि डॉ. वीरेंद्र मिश्रा (निदेशक : राष्ट्रीय सामाजिक रक्षा संस्थान -NISD) ने ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों को उच्च शिक्षा के माध्यम से मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि ट्रांसजेण्डर समुदाय को बहिष्करण से मुख्यधारा में लाये जाने की आवश्यकता है। बहिष्करण कलंक से उपजा है और इसलिए, हमारे समाज को इस कलंक से छुटकारा पाने की आवश्यकता है। उन्होंने प्राचीन काल से प्रयुक्त किन्नर शब्द की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि दी है। इसके अलावा, उन्होंने ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (1871)’ के माध्यम से एक आपराधिक स्थिति के, हिजरा के बारे में बताया। इस अधिनियम द्वारा इन्हें अपराधी घोषित कर दिया गया।

इसलिए उन्होंने इस बात पर बल दिया कि ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 उन्हें मान्यता देने एवं उन्हें हमारे समाज में समान रूप से स्वीकार करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। डॉ. वीरेंद्र मिश्रा ने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर बताया कि ट्रांसजेण्डर समुदाय में मौजूद कौशल और विद्वता को समझा एवं स्वीकार किया जाना चाहिए। उनके अनुसार जिस तरह पुरूष और स्त्री दो अलग-अलग लिंग हैं, अन्य लिंग को स्वीकार करना ट्रांसजेण्डर समुदाय को मुख्य धारा में लाने की कुंजी है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने समावेशीकरण सुनिश्चित करने के लिए ट्रांसजेण्डर समुदाय के लिए शौचालय तक पहुंच जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराये जाने की आवश्यकता की वकालत की।

तमिलनाडु के गांधीग्राम ग्रामीण संस्थान के जीवनपर्यंत अध्ययन और विस्तार विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर एल. राजा ने इस विषय पर अपने अनुभवों को व्यक्त करते हुए कहा कि गैर-मान्यता प्राप्त व्यक्तियों के विकास के लिए काम करना एक राष्ट्र के समग्र विकास के लिए अन्यंत महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने दावा किया कि मान्यता प्राप्त होना ट्रांसजेण्डर समुदाय के लिए आवश्यक है क्योंकि इससे शैक्षणिक सशक्तीकरण से पहले ही सामाजिक सशक्तिकरण हो जाता है। प्रोफेसर एल. राजा ने ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों की समग्र जनसंख्या से सम्बन्धित कुछ संख्यात्मक तथ्यों को बताया, जिनमें आयु एवं जाति के अनुसार विवरण शामिल किये जाने की और संकेत किया। उन्होंने ट्रांसजेण्डर के कल्याण के लिए कार्यक्रमों को विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें व्यावसायिक कौशल और दूरस्थ शिक्षा व्यवस्थाके माध्यम से सीखना शामिल है। उन्होंने कहा कि ट्रांसजेण्डर समुदाय को आईसीटी उपकरण प्रशिक्षण प्रदान करना उनकी सीखने की आवश्यकताओं के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

अंत में, उन्होंने शिक्षा के नियमित, ऑनलाइन और दूरस्थ मोड के माध्यम से ट्रांसजेण्डर समुदाय के लिए अध्ययन के मॉड्यूल प्रदान करने हेतु विभिन्न केंद्रों एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के साथ एनआईएसडी द्वारा सांझा कार्यक्रमों एवं गतिविधियों के प्रति अपनी लिए रुचि व्यक्त की।

प्रख्यात वक्ता, अमृता सरकार (सलाहकार : ट्रांसजेण्डर वेलबिंग एंड एडवोकेसी फॉर एलायंस इंडिया) ने उच्च शिक्षा में ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों को सम्मिलित  करने के हेतु सर्वप्रथम ट्रांसजेण्डर समुदाय के लिए प्राथमिक स्कूली शिक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने  कहा कि ‘परिवर्तन के अलावा कुछ भी स्थायी नहीं है’। समाज को समझाने कि आवश्यकता है ताकि ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों या ट्रांसफोबिया का डर समाप्त हो जाए। अमृता सरकार के अनुसार, प्राथमिक विद्यालय में उच्च ड्रॉप आउट दरों और ट्रांसजेण्डर समुदाय द्वारा सामना किए जाने वाले उत्पीड़न से पता चलता है कि समाज ट्रांसफ़ोबिया से ग्रस्त है। अमृता सरकार द्वारा तीसरे लिंग की उपस्थिति को स्वीकार करने की आवश्यकता के बारे में प्रतिभागियों को संवेदनशील बनाने के लिए यूनेस्को आधारित केस स्टडी के माध्यम से उसके (प्राथमिक, मध्य और उच्च विद्यालयों में) ट्रांसजेण्डर व्यवक्तियों के साथ होने वाले दुर्व्यवहारों के विभिन्न रूपों पर प्रकाश डाला गया। अमृता सरकार के अनुसार, यहां तक ​​कि विभिन्न संस्थानों के प्रशासनिक कर्मचारियों को भी ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों के शारीरिक, सामाजिक और मानसिक कल्याण के लिए समान रूप से जागरूक करने की आवश्यकता है।

कार्यक्रम के अगले  वक्ता, रोमिर एस. गोयल (वकील: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय) ने ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों की शिक्षा से सम्बन्धित कानूनों के बारे में विस्तार से बात की, जो उन्हें उच्च शिक्षा द्वारा मुख्यधारा में लाने के सम्बन्ध में थे। उन्होंने कानून के अनुसार एक ट्रांसजेण्डर को परिभाषित करते हुए ट्रांसजेण्डर के अलावा अन्य प्रकार के लिंग को स्वीकार करने की आवश्यकता पर बल दिया। रोमिर ने कानून के विभिन्न धाराओं का जिक्र किया जो समावेशी शिक्षा और सभी व्यक्तियों को एक समान अधिकार प्रदान करते हैं। उन्होंने एक पाठ्यक्रम ढांचे के सम्बन्ध में अपनी चिंताओं को व्यक्त किया। उन्होंने विभिन्न प्रकार के लिंग की पहचान और स्वीकार्यता के लिए पुरुष और महिला को शिक्षित करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया, जिससे हमारे समाज में ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों को मुख्यधारा में समावेशन हेतु आसानी हो। अंत में, उन्होंने मीडिया में दिखाए गये ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों के नकारात्मक चित्रण की निंदा करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला क्योंकि इससे विभिन्न लिंग की गैर-स्वीकृति होती है।

कार्यक्रम में उपस्थित एक अन्य वक्ता राकेश कुमार परमार (प्रोफेसर:शासकीय कला, विज्ञान और वाणिज्य महाविद्यालय, नागदा, मध्य प्रदेश) ने दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्या विस्तर योजना के तहत प्रौढ़, सतत शिक्षा और विस्तार के साथ स्थापित शैक्षणिक साझेदारी के लिए अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करते हुए शुरुआत की। उन्होंने ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों के लगातार बहिष्करण एवं घटनाओं के आधार पर अपने विचार साझा किए। लैंगिक भेदभाव की बात केवल दो लिंगों तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार, किसी ने भी तीसरे लिंग की व्यापकता और उससे जुड़े भेदभाव का उल्लेख नहीं है। प्रोफेसर राकेश ने आगे ‘प्रकृति बनाम पोषण’ की बहस का उल्लेख किया जिसमें माता-पिता को अपने बच्चों के साथ व्यवहार करते समय ऐसे मुद्दों पर जागरूक और संवेदनशील नहीं बनाया जाता है। इसके कारण छोटे बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है, जो सामना करने में असमर्थ होते हैं और लिंग अनुरूपता के विचार का सहारा लेने के लिए मजबूर होते हैं। उन्होंने आगे कहा कि ट्रांसजेण्डर समुदाय की न्यून साक्षरता का स्तर जो ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों के मुख्यधारा में समावेशन को और अधिक चुनौतीपूर्ण बनाता है।

मुख्य धारा की ओर एक कदम के रूप में, प्रोफेसर राकेश ने प्रतिभागियों को ‘किन्नरा अखाड़ा’ की उपस्थिति की याद दिलाई, जिसने पहले 2016 के उज्जैन कुंभ मेले में भाग लिया था। अन्त में, उन्होंने उल्लेख किया कि राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद (NAAC) के नियमों के अनुसार, पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग शौचालय होना आवश्यक है जो अभी भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद नहीं है। इसलिए, ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों के मुख्यधारा में समावेशनहेतु उन्हें शौचालय आदि जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करना निश्चित रूप से एक क्रांतिकारी कदम होगा।

वेबिनार के अंत में, सभी प्रतिभागियों को विषय से सम्बन्धित खुली चर्चा हेतु आमंत्रित किया गया। वेबिनार में  ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों को भी ट्रांसजेण्डर समुदाय की बेहतरी और समग्र कल्याण के लिए उपलब्ध कानूनों और नीतियों के सम्बन्ध में संवेदनशील बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के समापन में संयोजक प्रोफेसर राजेश एवं सह संयोजक डॉ. गीता मिश्रा द्वारा विशिष्ट अतिथियों, प्रख्यात वक्ताओं और सभी प्रतिभागियो को उनके बहुमूल्य समय और विचारपूर्ण अंतर्दृष्टि के लिए आभार व्यक्त किया गया। 

  • अनुशंसाएँ
  1. दिल्ली विश्वविध्यालय के आगामी शैक्षणिक सत्र 2021-2022 के लिए ‘ट्रांसजेण्डर छात्रों के लिए नीति’ की कार्ययोजना तैयार करना।
  2. ट्रांसजेण्डर रिसोर्स सेंटर दिल्ली विश्वविद्यालय एवं भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय सामाजिक रक्षा संस्थान (NSID) के साँझा प्रयासों द्वारा निम्नलिखित संदर्भ में काम करना।
  • विभिन्न लक्षित आबादी, अर्थात् शिक्षक, छात्र, गैर-शिक्षण कर्मचारी और कॉलेज के प्राचार्यों और विश्वविद्यालय के अधिकारियों के लिए संवेदीकरण कार्यक्रम का संचालन करना।
  • ट्रांसजेण्डर के गुरुओं और विभिन्न ट्रांसजेण्डर नेताओं को शिक्षा और सामाजिक समावेश की ओर उन्मुख करना।
  • स्नातक छात्रों के लिए कॉलेज परिसर में प्रशिक्षण, संवेदीकरण कार्यक्रम संचालित करना।
  • स्कूली बच्चों और शिक्षकों के साथ-साथ गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए संवेदीकरण कार्यक्रम संचालित करना।
  • स्वैच्छिक संगठन के लिए संवेदीकरण कार्यक्रम संचालित करना।
  • विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय परिसर में और स्नातक / स्नातकोत्तर प्रवेश पर एवं समुदाय के बीच संवेदीकरण कार्यक्रम का संचालन करना।
  • ट्रांसजेंडर्स कौशल वृद्धि के लिए पाठ्यक्रम निर्माण एवं सर्टिफिकेट कोर्स शुरू करना।
  • दिल्ली सरकार, राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन, दिल्ली स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटी और सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार के मध्य एक ब्रिज के रूप में कार्य करते हुए ट्रांसजेण्डर समुदाय के कल्याण कार्यो में प्रोत्साहन एवं योगदान देना।

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लेखक प्रौढ़ सतत शिक्षा एवं विस्तार विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं। सम्पर्क +919716124147, vishaldujnu@gmail.com

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