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एतिहासिक

आर्थिक समानता के लिये गाँधी की ट्रस्टीशिप

 

गाँधी के शब्दों में 

मै स्वराज हासिल करने के लिये प्रयासरत हूँ। उन जी-तोड़ मेहनत करने वाले और बेरोजगार लाखों करोड़ों लोगों के लिये, जिन्हे दिन में एकबार भी भरपेट खाना नसीब नही होता और बासी रोटी के एक टुकड़े और चुटकी भर नमक के सहारे जिन्दगी घसीटनी पड़ती है।

आज अमीर और गरीब में जो विषमता है वह दु:खदायी है। गरीब गाँव वालों की एक विदेशी सरकार और स्वयं उनके देशवाले शहर निवासी शोषण करते है। वे अन्न पैदा करते है लेकिन खुद भुखे रहते है। वे दुध पैदा करते है और उनके बच्चों को दूध नसीब नही होता। यह स्थिति शर्मनाक है।

जबतक धनवानों और लाखों करोड़ों भूखे लोगों के बीच की खाई नही पटती तब तक अहिंसक किस्म की सरकार की स्थापना करना नितान्त असम्भव है। नयी दिल्ली के आलीशान भवनों और उनके पास ही मजदूरों की टूंटी फूटी झोपड़ियों का अन्तर स्वतन्त्र भारत में एक दिन भी नही चल सकता, जिसमें देश के गरीब लोगों के हाथों में भी उतनी ही शक्ति होगी जितनी कि सर्वाधिक धनी लोगों के हाथों में। 

मेरे विचार में भारत और भारत ही क्यों सारी दुनिया का आर्थिक गठन ऐसा होना चाहिये कि उसमें किसी को रोटी कपडे की तंगी न रहे। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन निर्वाह के लिये पर्याप्त काम उपलब्ध होना चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति को संतुलित भोजन, रहने को ठीक ठाक मकान, अपने बच्चों की शिक्षा के लिये सुविधाऐं और पर्याप्त चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। कोई देश ठीक से चल रहा है की नही इसकी कसौटी यह नहीं है की, उसमें लखपतियों की संख्या कितनी है बल्कि यह हैं की, वहाँ के लोगों मे भूखमरी नही है।

भारत में मुट्ठीभर लोगों के हाथों में पूँजी के केन्द्रीकरण की जरुरत नही है, बल्कि उसके इस प्रकार के वितरण की जरुरत है कि वह 1900 मील लम्बे और 1500 मील चौड़े इस देश के साढे सात लाख गाँवों को सहज प्राप्य हो सके। अगर धनवानों ने अपनी धन दौलत और उससे प्राप्त शक्ति का स्वेच्छा से त्याग न किया और आम जनता को उसके हित के लिये उसमें साझीदार न बनाया तो निश्चित रुप से एक दिन हिंसक और रक्तरंजित क्रान्ति हो जायेगी।Gandhi and his India

अगर भारत चाहता है की दुनिया के सामने स्वतन्त्र जीवन का ऐसा आदर्श पेश करें, जिससे की सारी दुनिया को इर्ष्या पैदा हो, तो मेहतर, डॉक्टर, वकील, शिक्षक, व्यापारी तथा दूसरें सब लोगों को दिनभर इमानदारी से काम करने के लिये समान वेतन मिलना चाहियें। वकील और नाई दोनों के कामकी कीमत एक सी होनी चाहिये, क्योंकि आजीविका का अधिकार सबको एक समान है और सादा, मेहनत मजदूरी का,किसान का जीवन ही सच्चा जीवन है। शायद इस आदर्श तक पहुँचना भारतीय समाज के लिये कभी भी सम्भव ना हो लेकिन उस दिशा मे जाने के लिये प्रयास करना हर भारतीय व्यक्ति का कर्तव्य है। अगर यह हो सका तो भारत एक सुखी देश बन जायेगा।

आर्थिक समानता की मेरी जो कल्पना है उसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति के पास सचमुच एक बराबर रकम होगी। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक मनुष्य के पास जरुरत भरका पर्याप्त धन होगा। आर्थिक समानता का वास्तविक अर्थ है हर मनुष्य को उसकी जरुरत के अनुसार मिले। बुनियादी आवश्यकताओं के ज्यादा होने पर मै कोई निषेध नही लगाना चाहता, लेकिन जब गरीबों की बुनियादी आवश्यकताऐं पूरी हो जाये, उसके बाद ही और चीजों की बात पैदा होती है। पहली चीज पहले ही आना चाहिये।

मै उन व्यक्तिओं को जो आज अपने आप को मालिक समझ रहे है, न्यासी के रुपमें काम करने के लिये आमन्त्रित कर रहा हूँ अर्थात यह आग्रह कर रहा हूँ कि वे स्वयं को अपने अधिकार के बदौलत मालिक न समझे, बल्कि उनके अधिकार की बदौलत मालिक समझे जिनका उन्होंने शोषण किया है। ट्रस्टी या न्यासी वह है जो ट्रस्ट के अपने दायित्वों को ईमानदारी से और अपने आश्रितों के सर्वोपरि हित के लिये निभाता है।

वर्तमान धनाढ्यों के सामने दो ही रास्ते है। या तो वे वर्ग संघर्ष के लिये तैयार हो और फिर से स्वेच्छा से अपनी सम्पत्ति के ट्रस्टी बन जाये। उन्हे अपनी सम्पत्ति की देखभाल करने का और सम्पत्ति में वृद्धि करने की अपनी प्रतिभा का उपयोग करने की आजादी होगी लेकिन अपनी खातिर नही बल्कि राष्ट्र की खातिर और इसलिये वे शोषण नही कर सकेंगे।

मै अगर दस करोड़ का मालिक हूँ तो जिनकी बदौलत मैने यह दस करोड़ पैदा किये है, उनके लिये मुझे खर्च करना चाहिये, तब ही मै ट्रस्टी कहा जा सकता हूँ। लेकिन अगर मुझे पाँच या पचास रुपयों की जरुरत है और मै एक हजार रुपये लेकर ऐश करता रहूँ तो मै ट्रस्टी नही कहा जा सकता। मै अपने खर्च के लिये और अपने लडके लडकियों के लिये खर्च के लिये भी पैसे ले सकता हूँ। लेकिन ऐसा नही होना चाहिये कि मै अपने लडकों को पाँच दस लाख के शेअर दे दूं और वे भी चार पाँच मोटरें रखे और मौज शौक करे। मेरा आदर्श तो यह है कि धनवान लोग अपनी संतान के लिये धन के रुपमें कुछ न छोड़े। हाँ, उनको अच्छी शिक्षा दे, रोजगार धन्धे के लिये तैयार करे और स्वावलम्बी बना दे।What Gandhi taught business leaders like Tata, Birla, and Bajaj ...

मान लीजिये कि मेरे पास विरासत में या उद्योग व्यापार करके काफि धन इकट्ठा हो गया है तो मुझे यह समझना चाहिये कि यह सारा धन मेरा नही है, मेरा अधिकार तो बस सम्माननीय ढंग से रह सकने का है और इसका स्तर उसके उपर नही होना चाहिये जो लाखों लोगों को प्राप्त है। मेरा शेष धन समुदाय का है और वह उसी के कल्याण में खर्च किया जाना चाहिये। समाज एक बृहद परिवार ही तो है।

न्यासी जो सेवा करेंगे, समाज के लिये उसके मूल्य को देखते हुये उन्हे राज्य की ओरसे उपयुक्त कमीशन दिया जायेगा। उनके बच्चों को प्रबन्धक बने रहने दिया जायेगा बशर्ते कि वे इस कार्य के लिये अपनी योग्यता सिद्ध कर सके। किसी न्यासी का जनता के सिवा कोई और उत्तराधिकारी नही होता। अहिंसा के आधार पर निर्मित राज्य में न्यासियों का कमीशन नियमित होगा। मै इस कमिशन के लिये कोई निश्चित प्रतिशत नही तय कर रहा हूँ, बल्कि उनसे उतनें की ही मांग करने को कहता हूँ जितने का वे अपने आपको पात्र समझते है।

उदाहरण के लिये, जिसके पास सौ रुपये होंगे उससे मै पचास अपने पास रखने और पचास मजदूरों को दे देने के लिये कहुंगा। लेकिन जिसके पास एक करोड़ रुपये होंगे उससे मै, समझ लिजिये, एक प्रतिशत ही रखने को कहूँगा। तो इस तरह आप समझ सकते है कि मेरा कमिशन निश्चित अनुमान में नही होगा, क्योंकि वैसा अनुपात तय करने से कुछ के साथ अन्याय होगा।

मै अहिंसक तरीके से और घृणा के विरुद्ध प्रेम की शक्ति के प्रयोग द्वारा लोगों को अपने दृष्टिकोण से सहमत करके आर्थिक समानता स्थापित करुंगा। मै इस बातकी प्रतीक्षा नही करुंगा कि पहले सब लोग मेरे दृष्टिकोण के समर्थक बन जाये, बल्कि मै तो सीधे अपने साथ ही इसकी शुरुआत कर दूंगा। यह बात साफ है कि यदि मेरे पास पचास मोटरे हो, या दस बीघा जमीन भी हो तो मै अपनी कल्पना की आर्थिक समानता स्थापीत नही कर सकता। इसके लिये मुझे अपने को गरीब से गरीब आदमी के स्तरपर लाना होगा। पिछले पचास साल या उससे भी ज्यादा से मै यही करने की कोशिश कर रहा हूँ।

हमे यह श्रद्धा रखनी चाहिये कि अगर हम अपनी गरीबी में सुखी और आनंदित रहेंगे, तो धनवान लोग भी हमारी नकल करेंगे। सच तो यह है कि गरीबी में धन का दर्शन करनेवाले तो इने गिने ही पाये जाते है। इसलिये हमे अपने जीवन द्वारा यह सिद्ध करके दिखाना होगा असल में धर्म के रुप में स्वीकार की गयी गरीबी ही सच्ची सम्पत्ति है।Gandhi, The Economist | The Indian Express

इस गरीब देश में भी कुछ नये कर लगाने की गुंजाइश है। सम्पत्ति पर अभी काफी कर नही लगा है। संसार के अन्य देशों में जो कुछ भी हो, यहाँ तो व्यक्तियों के पास अत्याधिक सम्पत्ति का होना भारत की मानवता के प्रति एक अपराध ही समझा जाना चाहिये। इसलिये सम्पत्ति की एक निश्चित मर्यादा के बाद जितना भी कर उसे लगाया जाये, थोडा ही होगा। जहाँ तक मुझे पता है, इंग्लैड में व्यक्ति की आय एक निश्चित राशि तक पहुंच जाने के बाद उससे आय का 70 प्रतिशत तक कर लिया जाता है। कोई वजह नही है कि भारत में हम इससे भी अधिक कर क्यों न लगायें।

मृत्यु कर भी क्यों न लगाया जाये? करोड़पतियों के लडके जो बालिग होने पर भी विरासत में पैतृक सम्पत्ति पाते है, परन्तु इस विरासत के कारण ही नुकसान भी उठाते है और राष्ट्र की तो दुहरी हानी होती है। क्योंकि जो विरासत असल में राष्ट्र की होनी चाहिये, वह उसे नही मिलती और दूसरे, राष्ट्र का इस तरह भी नुकसान होता है कि सम्पत्ति के बोझ के कारण वारिसों के सम्पूर्ण गुणों का विकास भी नही हो पाता।

न्यासिता समाज की वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था को समतावादी व्यवस्था में रूपान्तरित करने का एक साधन है। न्यासिता पूँजीवाद को बख्शती नही है, पर वह वर्तमान मालिक वर्ग को सुधार का एक अवसर प्रदान करती है। यह इस विश्वास पर आधारित है कि मानव प्रकृति कभी सुधार से परे नही होती। वह सम्पत्ति के व्यक्तिगत स्वामित्व का कोई अधिकार स्वीकार नही करती; हाँ, उसमें समाज स्वयं अपनी भलाई के लिये किसी हद तक इसकी इजाजत दे सकता है। उसमें धन के स्वामित्व और उपयोग के कानूनी नियमन की मनाही नही है।

इस प्रकार राज्य द्वारा नियन्त्रित न्यासिता में कोई व्यक्ति अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये या समाज के हित के विरुद्ध सम्पत्ति पर अधिकार रखने या उसका उपभोग करने के लिये स्वतन्त्र नही होगा। न्यूनतम जीवन वेतन तय करने की जैसे योजना है, वैसे समाज मे किसी भी व्यक्ति को ज्यादा से ज्यादा कितना मिले इसकी मर्यादा तय करना भी जरुरी है। इस न्यूनतम और अधिकतम के बीच का अन्तर उचित तथा न्यायसंगत होना चाहिये और इस तरह बदलते रहना चाहिये जिससे वह आखिर खत्म ही हो जाय। 

अधिकतम प्रयास के बावजूद अगर धनवान सही अर्थों में गरीबों के अभिभावक बनने को तैयार नही होते और गरीबों को अधिकाधिक कुचला जाता है और वे भुखमरी के शिकार बनते है तो क्या करना होगा? इस पहेली को सुलझाने की कोशिश करते करते मुझे दो सही और अचूक उपाय सूझे है और ये है अहिंसक असहयोग तथा सविनय अवज्ञा। हमारा हथियार सत्याग्रह होगा।

(सम्पूर्ण गाँधी वाङ्मय से, शब्द गाँधी के है, विषयवस्तु स्पष्ट करने हेतु सुविधानुसार क्रमबद्ध किये है।)