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चर्चा में

अदालतों के आत्मचिन्तन का समय

 

  • विश्वजीत राहा

 

सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने अपने विदाई भाषण में कहा था कि सिस्टम का काम करना अमीरों और शक्तिशाली लोगों के पक्ष में अधिक लगता है। यदि एक अमीर व्यक्ति सलाखों के पीछे है, तो सिस्टम तेजी से काम करता है। जस्टिस गुप्ता के बयान के बाद यह बात जोरों पर चर्चा में है कि क्या सच में भारतीय न्यायालय में अमीर गरीब में भेदभाव किया जाता है?

बहरहाल हाल ही में यह चर्चा तब भी उठी थी जब रिपब्लिक टीवी के अर्णव गोस्वामी पर सोनिया गाँधी पर विवादास्पद टिप्पणी के बाद देश के कई राज्यों में एफआईआर दर्ज हुई थी। इस कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए अर्नब ने अदालत से 23 अप्रैल की शाम को अपील की और सुनवाई के लिए अगली सुबह 10:30 बजे का समय दे दिया गया। अर्नब की अपील पर सुनवाई की तारीख तब तय हुई, जब अदालत में कई महत्त्वपूर्ण याचिकाएँ लम्बित थीं जो उस से भी पहले दायर हुई थीं। इनमें से प्रवासी मजदूरों का मामला भी था। कोर्ट के इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट के जाने माने वकील प्रशांत भूषण ने ट्वीट कर इस सुनवाई पर तंज करते हुए लिखा कि कोर्ट के लिए मजदूरों के घर जाने से जरूरी मुद्दा अर्णव का मामला लगा।

जर्मनी के अंतर्राष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर डीडब्ल्यू से बात करते हुए प्रवासी मजदूरों के याचिकाकर्ता प्रोफेसर जगदीप छोकर ने कहा कि उनकी याचिका 15 अप्रैल को दायर की गयी थी और उसके साथ साथ अर्जेंसी या अत्यावश्यकता का अनुरोध भी किया गया था। लेकिन उनकी याचिका को तुरन्त सुनवाई नहीं मिली याचिका पर पहली सुनवाई सोमवार 27 अप्रैल को हुई। छोकर कहते हैं, ‘‘ऐसा लगता है कि क्या अत्यावश्यक है और क्या नहीं, यह आकलन करने में सुप्रीम कोर्ट एक व्यक्ति के ऊँचे दर्जे से प्रभावित हो गया।‘‘ अर्नब गोस्वामी की याचिका को तरजीह देने के खिलाफ 24 अप्रैल को एक वकील वकील दीपक कंसल ने भी सुप्रीम कोर्ट के महासचिव को चिट्ठी लिख कर शिकायत की थी।

गौरतलब है कि हाल के वर्षों में अदालतों के कई निर्णय लोगों के आलोचना के शिकार हुए। इनमें सर्वाधिक चर्चित मामलों में से एक अभिनेता सलखान खान के हिट एँड रन के मामले भी था जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट ने सलमान को आखिरकार सभी आरोपों से बरी कर ही दिया। सलमान पर आरोप था कि 28 सितम्बर 2002 को देर रात उसने शराब पीकर अपनी टोयोटा लैंड क्रूजर गाड़ी से मुंबई के बांद्रा इलाके में एक बेकरी के बाहर सो रहे लोगों को कुचल दिया जिसमें 4 लोग जख्मी हुए और नुरुल्लाह शेख शरीफ नामक एक आदमी की मौत हो गयी। लगभग 13 साल तक चले इस मामले में सत्र न्यायालय ने मई 2015 में सलमान को पाँच साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी जिसे मुंबई हाईकोर्ट ने पलट दिया था।

दरअसल भारत में बड़े और रसूखदार लोगों के कानूनी प्रक्रिया से बचने का यह कोई पहला मामला नहीं था। इससे पहले आरूषि हत्याकांड में भी तलवार दंपति ने भी अपने आपको बचाने के लिए कानूनी प्रक्रियाओं का भरपूर दुरूपयोग किया था। मई 2008 नोएडा की आरूषि और उसके घरेलू नौकर के हत्याकांड के मामले में आरूषि के माता-पिता ने एक प्रकार से कानूनी प्रक्रियाओं को मजाक बना दिया था। अंततः परिस्थितियों के आधार पर सीबीआई कोर्ट ने तलवार दंपति को ही दोषी करार दिया। इसी प्रकार साल 2014 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मरहूम नारायण दत्त तिवारी ने भी तमाम कानूनी प्रक्रियाओं को अपनाने के बाद रोहित शेखर को अपना बेटा माना।

कई अनसुलझे सवाल तब भी उठे थे क्या कोई रसूखदार आदमी अपने आपको बचाने के लिए कानूनी प्रक्रियाओं का इतना दुरूपयोग कर सकता है? इसी तरह का एक मामला संजय दत्त के पैरोल से भी जुड़ा था कि कैसे एक रसूखदार सजायाफ्ता शख्स कानून का दुरूपयोग कर बारम्बार पैरोल पर रिहा हो जाता है। इन मामलों की फेहरिस्त में भोपाल गैस त्रासदी और उपहार सिनेमा का मामला भी शामिल है।

बहरहाल ऊपर जितने मामलों का जिक्र है सभी धनाढ्य वर्गों के हैं जो बड़ी रकम खर्च कर ‘न्याय पाने’ में सफल हो जाते हैं। क्या एक आम एक आम भारतीय इस तरह का इतना तड़ित न्याय सुलभ हो पाता है? एनसीबी के आँकड़े बताते हैं कि साल 2016 तक हमारे देश के 1412 जेलों में 4 लाख से अधिक कैदी हैं जिनमें से 68 प्रतिशत कैदी जमानत राशि न दे सकने के वजह से वर्षों से बन्द है। क्या देश के विभिन्न जेलों में बन्द हजारों ऐसे कैदियों के बारे में ऐसा कोई निर्णय कभी आ पायेगा ताकि ये अंडरट्रायल कैदी खुली हवा में साँस ले सकें जिसके ये हकदार हैं? इन अंडरट्रायल कैदियों में कई कैदी ऐसे भी जिनको यदि सजा होती भी है तो वे जेल से छूट जायेंगे क्योंकि सजा से अधिक दिनों तक ये जेल में जीवन काट चुकें हैं।

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बहरहाल बात करें तो गाहे बगाहे देश के अदालतों द्वारा दिये गये निर्णयों पर असहमति के स्वर सुनने को मिल ही जाते हैं। अदालती प्रक्रियाओं को लेकर लोगों के मन में सवाल बहुतेरे है। मसलन क्या भारत में न्याय पाने के मामले में धनाढ्यों व रसूखदारों का दबदबा रहता है? क्या कानून के मंदिर में न्याय अमीरों के लिए सुलभ है? सवाल यह कि क्या भारतीय न्यायिक व्यवस्था की कमजोरियों का फायदा कुछेक ताकतवर लोग उठाते हैं? युगों पहले रामचरित मानस में तुलसीदास ने लिखा था ‘समरथ को नहिं दोस गोसाईं’। क्या भारतीय न्यायिक प्रक्रिया का फायदा रसूखदारों के द्वारा उठाये जाना इस उक्ति को चरितार्थ नहीं करता है? यह समय अदालतों के आत्मचिन्तन का है कि कैसे न्याय पाने में अमीरी गरीबी के दिखने वाले भेदभाव समाप्त हो सके और लोगों का अदालतों पर भरोसा और गहरा हो सके।

लेखक स्वतन्त्र टिप्पणीकार हैं|

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