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दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (101)

 

  बेटे का विवाह निर्विघ्न तय कराने में विधाता का एक और उपकरण बनी थी हमारे विस्तृत परिजन की एक कन्या प्रेरणा। वह मेरी सीनियर विभागीय प्रोफेसर डॉ0 उमा कुमारी मंडल और श्री विश्वनाथ मंडल की बेटी है। उमा दी ने एक दिन पूछा, “पवन सर, बेटे के लिए राँची से प्रस्ताव आया है?…लड़की का नाम सौम्या है? अपनी प्रेरणा उसे जानती है। साथ में काम किया है दोनों ने।” उनसे प्रेरणा का फोन नम्बर लेकर मैंने प्रेरणा से बात की थी। बात की शुरूआत में ही उसने कहा, “अंकल सौम्या बहुत अच्छी लड़की है। बिल्कुल आपके परिवार में घुल जाने वाली। ऑन्टी के जैसा ही मन है उसका। कर लीजिये रिश्ता!”

“सहेली की तरफदारी करती हो! एक उदाहरण देकर बताओ कि वह कितनी अच्छी है?”

“पिछली जॉब में हम दोनों साथ थीं। वह मेरी एचआर थी। एक दिन ऑफिस में मैं बीमार हो गयी। वह मुझे अपनी कार में लेकर पीजी छोड़ गयी, फिर दवा ले आयी। छुट्टी की बात पर उसने कहा कि ‘यह मेरा जॉब है। तुम्हारा काम अभी आराम करना और समय पर दवा खाना है’। और कुछ बताऊँ अंकल?”

“नहीं, बस।”

और बातें तो पीछे बता चुका हूँ। बिना किसी हील-हुज्जत और भीड़-भड़क्का के शादी तय हो गयी। ‘चट मँगनी, पट ब्याह’ का प्रबल समर्थक मैं बच्चों की छुट्टियों और मौसम की अनुकूलता के मद्देनजर नवम्बर में मुहूर्त देखने लगा। नया पञ्चाङ्ग होली के बाद आने वाला था सो तिथि तय करने की बात तबतक टाल दी गयी।

         स्नेह टेक महिन्द्रा में जॉब शुरू कर चुका था। नोएडा सेक्टर 62 में उसका ऑफिस और सेक्टर 49 के ढींगरा हाउस में डेरा था। बिटिया प्रीति भैया के साथ रहकर नेट आदि की तैयारी कर रही थी। वह थी, तो डेरे में किचन आबाद था। घर भी सुविधा सम्पन्न था। शादी की तैयारियों के सिलसिले में हम दोनों दो बार जाकर ढींगरा हाउस में दोनों बच्चों के साथ रह आये थे। सौम्या का जॉब 99एकर्स डॉट कॉम में था और ऑफिस के पास ही पीजी में रहती थी। शादी की खरीदारी में हमने दो दिन सौम्या को साथ ले लिया था।

         छेका, मंगनी या सगाई जो कहिए, 5 मई की तिथि तय हुई थी। हमें राँची जाकर यह रस्म निभाना था। वनांचल एक्सप्रेस कहलगाँव होते राँची जाती है। अब मैं उस गाड़ी को ‘समधियारा एक्सप्रेस’ कहता हूँ। समधी जी लोग सड़क यात्रा पसन्द करते हैं, पर मैं ट्रेन यात्रा को अच्छा मानता हूँ। तो उसी समधियारा एक्सप्रेस से हम 5 मई की सुबह राँची पहुँचे थे। मैं एक दशक पहले राँची आया था। इस बार बहुत बदलाव नजर आ रहा था। शहर से दूर नये इलाके में होटलों की कतार है। कहते हैं, मधु कोड़ा के राज में यह विकास हुआ है। उन्हीं में से एक होटल में बेटे की सगाई सम्पन्न हुई थी।

        अच्छी पार्टी हुई थी। हम 21 लोग और समधी जी के लगभग 400 लोग घन्टों मिले थे। शराबबंदी मेरी अनिवार्य शर्त थी सो उस समारोह में शराब नहीं चली थी। दोनों पक्ष ने मेरी शर्त में सहयोग किया था। पहले परंपरागत तरीके से छेका हुआ फिर बच्चों के मनोनुकूल रिंग सेरेमनी। जोड़ी की सबने तारीफ की थी। अगले दिन अपराह्न उसी ट्रेन से वापसी के लिए चले थे। तभी तय हो गया था कि बारात लेकर इसी गाड़ी से राँची आना है।

         यदि बहुत निकट न हो और रेल मार्ग का विकल्प उपलब्ध हो तो मैं बारात के लिए ट्रेन को निरापद मानता हूँ। सड़क मार्ग में जोखिम अत्यधिक है। मजबूरी हो तो बस ज्यादा उपयुक्त सवारी है बारात के लिए। छोटी गाड़ियों से बारात लेकर चलना अव्यवस्था और खतरे को न्योता देना है। कोई कहीं तो कोई और कहीं और, तिसपर ‘बैठकी’ लग जाने की आशंका। कुछ लोग बारात का मतलब ही स्वेच्छाचारिता और दारूबाजी समझते हैं। विडम्बना यह कि बारात का मुखिया सबसे निरीह प्राणी होता है। उसे सबका मन रखना और ‘मुँहपोछि’ करना पड़ता है।

            शादी की तिथि 12 दिसम्बर तय हुई थी। वनांचल एक्सप्रेस से जाना-आना लेकर दो दिन और तीन रात की बारात होने वाली थी, जो मेरे लिए बड़ी चुनौती थी। राजपूत की बारात को साठ घण्टों से अधिक समय तक सँभाल कर रखने की मशक्कत और होशियारी से वाकिफ रहते हुए भी मैं बहुत सशंकित था। इसी दबाव में यह निर्णय लिया था कि एक एसी थ्री कोच रिजर्व करके पूरी टीम को एक साथ ले जाऊँगा। एसी फर्स्ट उस ट्रेन में नहीं था। दूल्हे को कुछ बहनोई और फूफा लोगों के साथ एसी टू में ले जाना था।

       भारतीय रेलवे के जानकार हितैषियों की सलाह के मुताबिक मैंने बोगी रिजर्व कराने के लिए पूर्व रेलवे मुख्यालय हावड़ा को तीन महीने पहले चिट्ठी लिख दी थी। लगभग पन्द्रह दिनों के बाद वहाँ से फोन पर बताया गया कि एसी थ्री कोच उपलब्ध नहीं है अतः यदि चाहिए तो स्लीपर कोच के लिए पुनः पत्र लिखें। मैंने अविलम्ब तत्सम्बन्धी चिट्ठी लिख दी। एक सप्ताह बाद फिर फोन करके बताया गया कि पत्र में ट्रेन का नम्बर गलत है। जो गाड़ी भागलपुर से वाया किउल राँची जाती है, मैंने उसका नम्बर डाला है। मैंने उसे ठीक कर देने का आग्रह किया तो इन्कार कर दिया गया। फिर चिट्ठी भेजनी पड़ी और इस तरह एक महीना बर्बाद हो गया। इसके बाद एक लम्बी चुप्पी छा गयी थी। हेल्पलाइन या पीआरओ के लैंडलाइन फोन पर रिंग होता रहता। कोई फोन नहीं उठाता था। रेलवे के मित्रों ने सलाह दी कि एसी टू के टिकटों के साथ छः छः के समूह में स्लीपर के 72 टिकट बनवा लूँ। विपरीत स्थिति से बचने के लिए मैंने यह काम कर लिया। दो बोगियों में दोनों ओर से 72 बर्थ बुक हो भी गया था। इसी बीच कहलगाँव से एक बारात राँची गयी थी राजपूत की ही। आसनसोल पहुँचने से पहले ही बारातियों ने सहयात्रियों के साथ दंगा कर डाला था। इस प्रकरण ने मेरे आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया था। अब तो हर हाल में रिजर्व बोगी चाहिए थी हमें।

          इधर हम रिजर्व बोगी के लिए जितना व्यग्र थे, उधर रेलवे के क्षेत्रीय मुख्यालय में टालमटोल की नीति पर अमल किया जा रहा था। अथक प्रयासों के बाद एक दिन सक्षम पदाधिकारी फोन पर मिले तो बताया कि आसनसोल में गाड़ी का इंजन पलटी होता है, इस कारण वहाँ एनओसी के लिए लिखा गया है, पर जवाब नहीं आया है। वहाँ पदस्थापित एक मित्र से जुगाड़ लगाकर दो दिन में एनओसी भिजवाया गया। शादी को पन्द्रह दिन बचे थे तब कहा गया कि शादी का कार्ड भेजिए। मैंने लाख समझाने की कोशिश की कि हमारे यहाँ कार्ड पहले कुल देवता और ग्राम देवी को अर्पित किया जाता है तब कहीं और भेज सकते हैं। किन्तु विघ्नकर्ता ने जिद पकड़ ली। मजबूरन मुझे कार्ड स्पीड पोस्ट से वहाँ भेजना पड़ा था। इसपर भी अपनी ‘चाकरी’ के दुश्मनों को संतोष नहीं हुआ था। शादी के पाँच दिन पहले फोन पर एक अधिकारी ने कहा कि बोगी नहीं मिल पायेगी। कारण पूछने पर बताया, “अरे प्रोफेसर सिंग शाब, आप नेई समझेगा! टेक्निकाल परोबलेम है। उहाँ आसोनसोल में पावर पलटी होने वाला प्लेटफॉर्म छोटा पड़ता है। एक्सट्रा बोगी लगाने से गाड़ी को दो बेर आगू-पीछू कोरना पोड़ेगा। कन्फ्यूजन में पसिंजर दौड़ा-दौड़ी कोरके दुर्घटना हो जाएगा। अउर दो बार शंटिंग वास्ते आपको एक्सट्रा चार्ज साढ़े पाँच हजार सेक्युरिटी मनी के साथ जमा कोरना पोड़ेगा।” फिर जले पर नमक, “आप बाराती के लिए बस का ऑप्शन क्यों नहीं ले लेता है?”

मेरे बर्दाश्त की सीमा खत्म हो गयी और मैंने उन्हें हाईकोर्ट में घसीटकर नौकरी खा जाने की धमकी दे डाली। फोन काटने के साथ मैं अत्यधिक चिंतित हो उठा था। सुनील बाबू ने रेलवे बोर्ड के एक अधिकारी के पास पैरवी भिड़ाई और मैंने fb फ्रेंड (मुख्यालय की पीआरओ) से गुहार लगायी तब जाकर यात्रा के तीन दिन पहले रिजर्वेशन कन्फर्म हुआ और अन्ततः घृतढारी के बाद यात्रा निषिद्ध होने के बावजूद मुझे सशरीर भागलपुर जाकर सिक्योरिटी मनी और इंजन पलटी का शुल्क जमा करना पड़ा था।

         इस दरम्यान बेटे का यज्ञोपवीत संस्कार और तिलक की रीत विधि-विधान के साथ 8 दिसम्बर को सम्पन्न हुई थी। यज्ञोपवीत के लिए परिवार के लोग दो-तीन दिन पहले जुट गये थे। तिलक के लिए राँची से दो दर्जन लोग आये थे। उस रात मध्यम आकार का भोज हो गया था।

            जाड़े का मौसम था, सो प्रत्येक व्यक्ति को एक चादर, तकिया और कम्बल देकर स्लीपर क्लास में एसी कोच की सुविधा दी जा सकती थी। मैंने टेंट हाउस वाले को अपना दो आदमी और 72 बेड रोल गाड़ी में उपलब्ध कराने का आदेश दे दिया था। 11दिसम्बर को ट्रेन में हमारी बोगी जोड़कर हस्तगत करा दी गयी। मालदा डिवीजन वालों ने फेवर करके एकदम फर्स्ट हैंड नयी बोगी दिलवायी। उसका उद्घाटन इसी वरयात्रा से होना था। कहलगाँव में भी जुगाड़ से ठहराव का अतिरिक्त समय मिल गया था। एसी टू में दूल्हे के साथ कुल 23 जिम्मेदार लोग थे इसलिए उधर से मैं निश्चिंत था। स्वयं मुख्य बारात के साथ इस कोच में सवार हुआ था।

             मैंने अपने अनुभव से यह निष्कर्ष निकाला है कि विवाह समारोह में विघ्न या दुर्घटना के मुख्य पाँच ही कारण होते हैं– सड़क यात्रा, दारूबाजी, आतिशबाजी, हर्ष फायरिंग और डीजे बाजा। इस कारण मैं इन पाँचों के सख्त खिलाफ हूँ। इनको लेकर दूसरों के समारोहों में भी हल्ला-गुल्ला मचा देता हूँ। यहाँ तो मैं खुद निर्णायक भूमिका में था। अतः कहलगाँव से राँची तक इन पाँचों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। सुनील बाबू ने भी इस बात में सहयोग और समर्थन किया था। फलतः शौकीन दोस्तों-रिश्तेदारों और युवाओं की एक नहीं चली। सभी मन मसोसकर रह गये थे।

          अपने चाल-चलन से समारोहों की शोभा बिगाड़ने वाले लोगों को मैंने निर्ममतापूर्वक बारात की सूची से छाँट दिया था। कोई चिंता नहीं कि लोग क्या कहेंगे! इसका बड़ा सुखद परिणाम मिला था। यात्रा में यदि किसी ने नजर बचाकर अपने जुगाड़ से कुछ ले भी लिया तो मुझपर नजर पड़ते ही उसका नशा उतर जाता था। ‘पूंजी डूब गयी होगी उनकी!’ मुझे खबर मिली थी कि राँची के होटल में मेरे चार मित्र ‘बैठ’ गये हैं। मैंने उन्हें कुछ भी नहीं कहा; केवल यह किया कि बारात मिलन के समय नहीं बुलाया और ‘बैठा’ ही छोड़ दिया था। बाद में उन्हें बहुत पछतावा हुआ था।

      इस वरयात्रा का सही मजा लिया था मेरे साथ स्लीपर कोच में चल रहे 69 लोगों ने। एसी टू वाले कई लोगों ने रास्ते में गाड़ी रुकने पर जगह बदलने का ऑफर दिया था, पर कोई तैयार नहीं हुआ। जनबासा वाले होटल में कुल 25 कमरे थे। इधर-उधर से आने वाले हितैषियों को मिलाकर हम कुल सौ बाराती सुबह 9 बजे तक जुट गये थे। सुनील बाबू ने एक एक कमरे में तीन बेड लगवाये थे तथा 25 बेड की एक डोरमेट्री थी। मैंने चार-चार लोगों की मैचिंग टीम बनाकर कमरों में ठहरा दिया था। डोरमेट्री लगभग खाली रह गया था। मध्यम श्रेणी के उस अच्छे होटल में बार भी थी, जो मेरी शराबबंदी का सत्यानाश कर सकती थी। मैंने मैनेजर से बार लॉक करने को कहा तो उसने डेली कस्टमर्स का हवाला दिया। मैंने कहा कि ऐसे कस्टमर्स का फोन नम्बर जरूर होगा, उन्हें बता दें कि बारात मालिक ने बार लॉक कर दिया है। घूमने-फिरने के लिए उपलब्ध कुछ गाड़ियाँ शौकीनों को अवसर मुहैया करा रही थीं। कुछ लोगों ने उस सुविधा का लाभ उठा लिया, किन्तु मेरी नजरें बचाकर ही।

पवन कुमार सिंह, नेह सागर और अन्य

         बारात मिलन और वरमाला की रस्म होटल के विस्तृत लॉन में होनी थी तथा विवाह का मण्डप समधी के घर पर बना था। दोनों स्थानों की दूरी लगभग 15 किलोमीटर थी। मैंने सुनील बाबू से आग्रह किया था कि शाम के 7 बजे मिलन समारोह शुरू हो जाये तो सबकुछ सही समय पर सम्पन्न हो जायेगा। पर उन्होंने अपने अतिथियों के पहुँच पाने की सुविधा की दृष्टि से साढ़े आठ बजे का समय निश्चित किया था। उस समय का पालन दोनों ओर से हुआ भी था। होटल से तैयार होकर हम निकले और एक फर्लांग दूर स्थित एक मंदिर से वापस लौटे थे। दूल्हे को खुली जीप पर बिठाकर परंपरागत बैण्ड बाजे के साथ बारात दरवाजे लगी और समधी मिलन हुआ। दोनों ओर से दर्जनों समधी मिले। फिर मुक्ताकाश मंच पर वरमाला की रस्म पूरी हुई। घरातियों की सारी व्यवस्था बहुत उत्तम थी, जिसकी प्रशंसा बारातियों ने विशेष रूप से की।

        मैं काफी थक गया था और नींद हावी थी। चुपचाप खिसककर मैं डोरमेट्री में सो गया था, किन्तु भोर में घूँघट/मझक्का की रस्म के लिए लोगों ने खोजकर जगा दिया। बिना कपड़ा बदले नाईट ड्रेस में ही हड़बड़ाकर मैं वहाँ चला गया था। सुबह का नाश्ता होटल में था और दिन में भतखई/भतमान मण्डप पर। तत्पश्चात भावुकतापूर्ण विदाई की रीत पूरी करके हम रेलवे स्टेशन आ गये थे। हमारी बोगी सबसे पीछे लगी थी जो कहलगाँव में सबसे आगे हो गयी थी। सूर्योदय से पहले दुल्हन का गृह प्रवेश भी हो गया था, वरना पारिवारिक प्रथा के अनुसार सूर्यास्त तक इंतजार करना पड़ता। महिलाएँ दुल्हन में व्यस्त हो गयी थीं, बाराती स्वागत व व्यवस्था से खुश थे; जो राँची नहीं गये थे वे जाने वालों से किस्सा सुन रहे थे और मैं इस बात से प्रसन्न व संतुष्ट था कि सबकुछ निर्विघ्न और निरापद सम्पन्न हो गया था। अपने जीवन में पहली बार राजपूत की बारात बिना किसी दुर्घटना, चूँ-चपड़, थुक्कम-फजीहत के वापस लौट आयी थी। इस ऐतिहासिक बारात का कर्ता मैं था जो मेरे लिए गौरव की बात थी।

          दो दिन बाद वर-वधू स्वागत समारोह एनटीपीसी के सामुदायिक भवन आम्रपाली में आयोजित था, जिसमें ध्यान देकर हमने किसी राजनेता को आमंत्रित नहीं किया था। मेरी मान्यता है कि “राजनेता को बुलाओ, अपना भोज-भंडोल करो!”  मुझे खुशी इस बात की है कि राजा-रंक जिसे भी हमने बुलाया था, सबका स्वागत प्रवेश द्वार पर स्वयं हाथ जोड़कर किया था। अगली सुबह से अतिथियों के विदा होने का सिलसिला जारी हो गया। लगभग दस दिनों की गहमागहमी का सुखद अन्त हो गया था।

         विधाता की असीम कृपा हमारे इस यज्ञ पर रही थी। इसके पहले भी कई बहनों और भाइयों के विवाह और बाबूजी के श्राद्धकर्म में मैं मुख्य भूमिका में रहा था, किन्तु डिस्टिंक्शन मार्क्स से पहली बार पास हुआ था। विघ्नकर्ता ‘शुभचिंतकों’ का षड्यंत्र हरेक बार आंशिक रूप से सफल हो ही जाता था। इसबार उनकी रत्ती भर भी नहीं चली, जबकि प्रयास सबसे अधिक किया गया था। इति शुभम!

(क्रमशः)