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द्रौपदी मुर्मू की जीत
चतुर्दिक

द्रौपदी मुर्मू की जीत सुनिश्चित है

 

पन्द्रहवें राष्ट्रपति चुनाव के लिए दायर 115 नामांकन पत्रों में से केवल दो उम्मीदवार – जनतांत्रिक गठबंधन की द्रौपदी मुर्मू और विपक्ष के उम्मीदवार यशवन्त सिन्हा के नामांकन पत्र सही हैं, पहले विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गाँधी, राकांपा के शरद पवार और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अबदुल्ला के नाम आए थे, पर इनमे से किसी ने भी अपनी सहमति नहीं दी। बाद में राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के लिए संयुक्त विपक्ष की पसन्द यशवन्त सिन्हा बने। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने भाजपा अध्यक्ष नड्डा के अनुसार बीस नामों पर विस्तृत चर्चा के बाद सर्वसम्मति से राष्ट्रपति पद के लिए द्रौपदी मुर्मू को अपना प्रत्याशी चुना।

भारतीय राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक है। वह देश की सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च ‘सेना नायक’ भी है। राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है। वह राष्ट्र पर शासन नहीं कर सकता। भारतीय संविधान ने उसे संविधान और उसके कानून के शासन की रक्षा करने की जिम्मेदारी के साथ उसे अधिकार भी प्रदान किये हैं। राष्ट्रपति की सहमति के बिना कोई कानून नहीं बन सकता। वह संविधान का सबसे प्रमुख, सबसे सशक्त और त्वरित रक्षक है। अनुच्छेद 53 के अनुसार उसमें संघ की कार्यपालक शक्ति निहित है। राष्ट्रपति के पास पर्याप्त अधिकार है, पर वे अधिकार प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद के द्वारा ही उपयोग में लाये जाते हैं। राष्ट्रपति कार्यपालिका का नाम मात्र का प्रमुख है। वह प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् की सलाह पर कार्य करने को बाध्य है। प्रशासन में उसका स्थान ‘मुहर पर एक औपचारिक उपकरण’ का है। वह सभी स्वतंत्र सवैधानिक संस्थाओं का सामान्य प्रमुख है। लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था को मात्र कायम रखने में नहीं, उसे सुदृढ़ बनाने में भी उसकी बड़ी भूमिका है और आज ये दोनो खतरे में हैं।

राष्ट्रपति चुनाव एक गुप्त मतदान प्रक्रिया से सम्पन्न होता है, जिसमें लोकसभा, राज्यसभा और राज्य विधान सभाओं के सदस्य मतदान करते हैं। प्रत्येक सांसद के वोट का मूल्य निश्चित है, पर विधायकों का वोट-मूल्य (वैल्यू) उनके राज्यों की जनसंख्या पर निर्भर है- उत्तर प्रदेश के विधायक का वोट-मूल्य 208 हैं, जो सर्वाधिक है। अन्य राज्यों के विधायक का वोट-मूल्य इससे कम है सिक्किम के विधायक का वोट-मूल्य मात्र 7 है। संविधान के अनुच्छेद 55 में राष्ट्रपति चुनाव में सदस्य के वोट मूल्यों का जिक्र है, देश के निर्वाचित विधायक का वोट-मूल्य लोक सभा और राज्यसभा सांसदों की कुछ संख्या से विभाजित किये जाने के बाद जो मूल्य होता है, वही एक सांसद का वोट-मूल्य है। राज्य की जनसंख्या को वहाँ के विधानसभा की सदस्य संख्या से विभाजित कर आने वाली संख्या पुनः एक हजार से विभाजित की जाती है। इसके बाद के प्राप्त अंक से ही प्रदेश के एक विधायक के वोट का अनुपात निकलता है।

अभी लोकसभा के 543 और राज्यसभा के कुल 245 सांसद हैं। सांसदों की कुछ सुख्या 788 है। लोकसभा में राजग के 334 और विपक्ष के 206 सांसद हैं। तीन स्थान रिक्त हैं। राज्यसभा में राजग के सांसदों की संख्या 118 और विपक्ष के सांसदों की संख्या 123 है। चार स्थान रिक्त है। राज्यसभा और लोकसभा के कुल 776 सांसदों का वोट-मूल्य 5 लाख 49 हजार 408 है। पहले प्रत्येक सांसद का वोट-मूल्य घटता-बढ़ता रहा है। 1952 के पहले राष्ट्रपति चुनाव में एक सांसद का वोट-मूल्य 494 था, जो 1957 में 496, 1962 में 493, 1967 और 1969 में 576, 1974 में 723 और 1977 से 1992 तक 702 था। पिछले चुनाव में प्रत्येक सांसद का वोट-मूल्य 708 था, जो इस बार जम्मू-कश्मीर में विधानसभा का चुनाव न होने के कारण घटकर 700 हो गया है। जम्मू-कश्मीर के विधायकों का वोट-मूल्य इस चुनाव में निर्धारित नहीं हो सकेगा, जम्मू कश्मीर में पहले विधानसभा की 83 सीट थी। अब यह राज्य तीन हिस्सों में विभाजित होकर केन्द्र शासित है।

विधायकों के वोट-मूल्य से सांसदों का वोट-मूल्य निर्धारित होता है। उत्तर प्रदेश में एक विधायक के पास सबसे अधिक 208 वोट-मूल्य है और वहाँ 403 विधायकों का वोट-मूल्य 83 हजार 824 है। भारत की 31 विधान सभाओं में कुल विधायकों की सीट 4 हजार 153 है (उत्तर प्रदेश 403, बिहार 243, मध्य प्रदेश 230, पश्चिम बंगाल 295 महाराष्ट्र 288, तामिलनाडु 234, कर्नाटक 224, राजस्थान 200, गुजरात 182, आंध्र प्रदेश 175, तेलंगाना 119, ओडिशा 147, केरल 140, असम 126, पंजाब 117, छत्तीसगढ़ 90, हरियाणा 90, झारखंड 81, उत्तराखंड 70, दिल्ली 70, हिमाचल प्रदेश 68, अरुणाचल प्रदेश 60, मणिपुर 60, मेघालय 60, नागालैण्ड 60, त्रिपुरा 60, गोवा 40, मिजोरम 40, सिक्किम 32, पुडुचेरी 30। पहले जम्मू कश्मीर में 114 विधान सभा सीट थी। राष्ट्रपति चुनाव की वर्तमान व्यवस्था 1974 से जारी है, जो 2026 तक कायम रहेगी। राष्ट्रपति चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होता है और चुनाव में वैलेट पेपर का ही इस्तेमाल होता है।

 भारत के छठे राष्ट्रपति नीलम संजीव रेडी निर्विरोध निर्वाचित होने वाले एक मात्र राष्ट्रपति हैं। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद 26 जनवरी 1950 से 13 मई 1962 तक कुल 12 वर्ष 107 दिन भारत के पहले राष्ट्रपति थे। 1950 से 1952 तक वे निर्विरोध चुने गये थे, पर 1952 के राष्ट्रपति चुनाव में उनके प्रतिद्वन्द्वी निर्दलीय के. टी. शाह थे। 1957 के दूसरे राष्ट्रपति चुनाव में उनके विरोधी प्रत्याशी चौधरी हरी राम और नागेन्द्र नारायण दास थे। चौधरी हरीराम को 2 हजार 672 वोट मिले थे और नागेन्द्र नारायण दास को 2 हजार, चौधरी हरी राम अकेले ऐसे प्रत्याशी रहे, जिन्होंने 1957 और 1962 का राष्ट्रपति चुनाव लड़ा था। दूसरे राष्ट्रपति चुनाव में वे सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन के विरुद्ध खड़े हुए थे उन्हें 6 हजार 341 वोट प्राप्त हुए थे और तीसरे प्रत्याशी यमुना प्रसाद त्रिसुलिया को हजार 537 वोट मिले थे। अब तक तीन कार्यकारी/ स्थानापन्न राष्ट्रपति रहे हैं – वी. वी. गिरी 3 मई 1969 से 20 जुलाई 1969 तक 78 दिन, मोहमद हिदायतुल्लाह 20 जुलाई 1969 से 24 अगस्त 1969 तक कुल 35 दिन और बी.डी. जत्ती 11 फरवरी 1977 से 25 जुलाई 1977 तक कुल 164 दिन।

Rajendra Prasad

राजेन्द्र प्रसाद

सबसे अधिक समय तक 12 वर्ष 107 दिन (26 जनवरी 1950 से 13 मई 1962) राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति थे और सबसे कम दिन मात्र 1 वर्ष 355 दिन 13 मई 1967 से 3 मई 1969 तक जाकिर हुसैन राष्ट्रपति थे। उनके बाद फखरुद्दीन अली अहमद दूसरे राष्ट्रपति हैं, जिनका कार्यकाल 2 वर्ष 171 दिन था – 24 अगस्त 1974 से 11 फरवरी 1977 तक। राष्ट्रपति चुनाव में अब तक सर्वाधिक मत दूसरे चुनाव 1957 में राजेन्द्र प्रसाद को प्राप्त हुए थे – 98.99 प्रतिशत और सबसे कम वोट रामनाथ कोविन्द को मिले – 66 प्रतिशत 10 लाख 98 हजार 903 मूल्य के वोटों में से उन्हें 7 लाख 2 हजार 44 वोट प्राप्त हुए थे और उनके विरोधी प्रत्याशी मीरा कुमार को 3 लाख 67 हजार 314 मत प्राप्त हुए थे। अब तक के राष्ट्रपति चुनाव में सशक्त विरोधी उम्मीदवार कई रहे हैं। वी.वी. गिरी के खिलाफ नीलम संजीव रेड्डी, फखरुद्दीन अली अहमद के विरुद्ध त्रिदिव चौधरी, जैल सिंह के विरुद्ध हंस राज खन्ना, रामास्वामी वेंकट रमण के विरुद्ध बी. आर कृष्ण अय्यर, के. आर. नारायणन के खिलाफ टी. एन. शेषन, ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के विरुद्ध लक्ष्मी सहगल, प्रतिभा पाटिल के विरुद्ध भैरोसिंह शेखावत, प्रणब मुखर्जी के विरुद्ध पी. ए. संगमा और रामनाथ कोविंद के विरुद्ध मीरा कुमार ने राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा था। शंकर दयाल शर्मा के खिलाफ संयुक्त विपक्षी उम्मीस्तार की हैसियत से जॉर्ज गिल्बर्ट स्वेल (5.8. 1923 -25.1.1999) ने 1992 का राष्ट्रपति चुनाव लड़ा था। वे लोकसभा के 5वें उपाध्यक्ष (9 दिसम्बर 1960 – 18 जनवरी 1977) थे। 1962 से 1977 तक लोकसभा के सदस्य थे। वे रवासी थे और मेघालय से थे।

राष्ट्रपति चुनाव में पहली बार इस चुनाव को दो व्यक्तियों के बीच की लड़ाई न मानकर दो विचारधाराओं की लड़ाई की बात विपक्ष के उम्मीदवार यशवन्त सिन्हा ने कही है। चौरासी वर्षीय यशवन्त सिन्हा (6.11.1937) राजग प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू (20.6.1958) से बीस वर्ष बड़े हैं, मुर्मू के गाँव ऊपर बेड़ा (ओडिशा के मयूगंज निर्गत) के दो टोलों बड़ा शाही और डूंगरी शाही में से केवल एक टोला बड़ाशाही में बिजली उपलब्ध है, डूंगरी शाही में नहीं। अब इस गाँव के दिन बदल रहे हैं क्योंकि यह द्रौपदी मुर्मू का गाँव है। भाजपा अध्यक्ष जे. पी. नड्डा ने कुछ समय तक इनके शिक्षिका रहने के कारण इनकी तुलना डॉ. राधाकृष्णन से भी कर दी है। इनके साथ डॉ राधाकृष्णन का नामोल्लेख कर द्रौपदी मुर्मू की राजनीतिक यात्रा फर्श से अर्श तक की है। वे संताल हैं। उनका वयक्तिगत जीवन त्रासदीपूर्ण रहा है। पति श्यामा चरण मुर्मू और दो बेटों की मृत्यु के बाद भी उन्होंने साहस कायम रखा। रमादेवी वूमंस कॉलेज से वे स्नातक हैं। रायरंगपुर के अरविन्दो इंटीग्रल एजुकेशन सेंटर में कुछ वर्ष तक उन्होंने पढ़ाया। 1979 से 1983 तक सिंचाई और बिजली विभाग में कनिष्ठ सहायक थी। वे दो बार विधायक रही है – रायरंगपुर से – 2000 और 2004 के बीच और 2004 से 2009 तक। 2007 में ओडिशा विधान सभा द्वारा वर्ष के सर्वश्रेष्ठ विधायक के रूप में उन्हें नीलकंठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है, ओडिशा सरकार में वे परिवहन, वाणिज्य, मत्स्य पालन और पशुपालन मंत्री रही हैं। वे ओडिशा इकाई के अनुसूचित जनजाति मोर्चा की उपाध्यक्ष रही हैं। 2013 में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारणी (एस. टी. मोर्चा) के सदस्य के रूप में वे नामित हुई थीं। 18. 5. 2015 से 12.7.2021 तक वे झारखण्ड की राज्यपाल थी। परिवार में अब उनकी बेटी इतिश्री और दामाद गणेश हेम्ब्रम हैं।

यशवन्त सिन्हा और द्रौपदी मुर्मू में कोई तुलना नहीं है। यशवन्त सिन्हा भारतीय प्रशासक और राजनीतिज्ञ है। राजनीति शास्त्र में पटना विश्वविद्यालय से 1958 में उन्होंने एम. ए. किया। वहाँ वे 1962 तक अध्यापक रहे थे। 1960 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में आए और चौबीस वर्ष तक वे कई प्रमुख पदों पर रहे हैं। 1984 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई ए एस) से उन्होंने त्याग पत्र दिया, सक्रिय राजनीति में आए और जनता पार्टी के सदस्य बने। दो वर्ष बाद 1986 में जनता पार्टी के अखिल भारतीय महासचिव बने। 1988 में राज्यसभा में आए। 1989 में जनता दल की स्थापना के बाद इस दल के महासचिव बने। चन्द्रशेखर के मंत्रिमण्डल में 10 नवम्बर 1990 से 5 जून 1991 तक वित्त मंत्री रहे। 5 दिसम्बर 1998 से 1 जुलाई 2002 तक वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वित्त मंत्री और 1 जुलाई 2002 से 22 मई 2004 तक विदेश मंत्री थे। जून 1996 में वे भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता बने थे। 1998, 1999 और 2009 में भाजपा प्रत्याशी के रूप में हजारीबाग की संसदीर सीट से उन्होंने जीत हासिल की।

यशवन्त सिन्हा लोकसभा और राज्यसभा दोनों में सांसद रहे हैं। उनकी राजनीतिक यात्रा जनता पार्टी, जनता दल, भाजपा और तृणमूल कांग्रेस तक की है। भाजपा के उपाध्यक्ष पद से उन्होंने 13 जून 2009 को त्यागपत्र दे दिया था। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के चार वर्ष बाद उन्होंने भाजपा से यह कहकर त्यागपत्र दे दिया कि लोकतंत्र खतरे में है। पश्चिम बंगाल विभानस‌भा चुनाव के कुछ पहले 13 मार्च 2021 को वे तृणमूल कांग्रेस में आए और दो दिन बाद 15 मार्च को ममता बनर्जी ने उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया। इस पद पर 21 जून 2022 तक रहे। उनकी आत्मकथा – ‘द्रोहकाल का पथिक’ (2013) है। यशवन्त सिन्हा पर कुछ आरोप भी लगे हैं। पूर्व सांसद पप्पू यादव ने उन पर यह आरोप मढ़ा था कि 2001 में, जब वे वित्त मंत्री थे, उन्होंने इंडियन फेडरल डेमोक्रेटिक पार्टी के तीन सांसदों को राजग में शामिल होने के लिए रुपये दिये थे। यूटीआई घोटाले में शामिल होने का भी उन पर आरोप लगा था। नामांकन पत्र दाखिल करने के समय यशवन्त सिन्हा के साथ राहुल गांधी, अखिलेश यादव सहित कई अन्य प्रमुख विपक्षी नेता थे। द्रौपदी मुर्मू के नामांकन के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष सहित कई प्रमुख नेता थे।

यशवन्त सिन्हा को सभी विपक्षी दलों का समर्थन नहीं है। राष्ट्रपति पद के चुनाव में विपक्ष एकजुट नहीं है। बसपा, ए आई एम आई एम, झामुमो, पीडीपी, आप, बीजद और वाई एस आर काँग्रेस पार्टी ने उन्हें समर्थन नहीं दिया है। द्रौपदी मुर्मू ओडिशा की हैं और बीजद का उन्हें समर्थन है। 24 जून को द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन किया था और 27 जून को यशवन्त सिन्हा ने। यशवन्त सिन्हा ने राष्ट्रपति के पद को मर्यादा का पद कहा है। इन्दिरा गाँधी ने 1969 के राष्ट्रपति चुनाव के समय जो कुछ किया था उस समय से इस पद की मर्यादा पहले की तरह नहीं। पद को गौण या महत्वपूर्ण, सार्थक या निरर्थक, मर्यादापूर्ण और मर्यादारहित उस पद पर विराजमान व्यक्ति बनाते हैं। के. आर. नारायणन पहले दलित राष्ट्रपति थे, पर उनमें और रामनाथ कोविंद में साम्य के चिन्ह कम हैं। यशवन्त सिन्हा ने राष्ट्रपति चुनाव को ‘एक बड़ी लड़ाई’ कहा है। उनके नाम की घोषणा के बाद राजग की दौपदी मुर्मू के नाम की घोषणा हुई। भारतीय राजनीति फिसलकर आज जहाँ पहुँच चुकी है, वहाँ कोई भी पद पहले की तरह नहीं रहने दिया गया है। राष्ट्रपति की एक सीमा है। वह एक सीमा तक ही ‘चेक एण्ड बैलेंस’ कर सकता है।

फखरुद्दीन अली अहमद

रबरस्टैम्प बनने का सबसे बड़ा उदाहरण फखरुद्दीन अली अहमद हैं, जिन्होंने अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया था। नरेन्द्र मोदी की सबसे बड़ी खूबी एक तीर से कई निशाने साधने की है। द्रौपदी मुर्मू को प्रत्याशी घोषित करने के पीछे कई उद्देश्य हैं, यह एक साथ आदिवासी और महिला कार्ड खेलना है। राज्यपालों की नियुक्तियाँ दशकों से जिन मापदण्डों के आधार पर की जाती रही हैं, उन सब पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। आदिवासी समाज खुश है कि उनके बीच की एक महिला पहली बार देश की राष्ट्रपति होगी। बीजू जनता दल का वोट इनके पक्ष में है और झामुमो की विवशता यह है कि उसे द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करना पड़ेगा। भाजपा ने ए. पी. जे. अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाया। रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति बने। मुसलमान, दलित और आदिवासी इतने भर से संतुष्ट नहीं होंगे कि उनके बीच का वयक्ति सर्वोच्च पद पर है। मुसलमान, दलित और आदिवासी के प्रति भाजपा की क्या सचमुच कोई सही, मंगलकारी दृष्टि है। माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने इस राष्ट्रपति चुनाव को भारत के धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक चरित्र की रक्षा के लिए प्रमुख माना है। क्यों राष्ट्रपति चुनाव से सभी समस्याओं का हल निकलेगा? भाजपा को सर्वत्र अपना व्यक्ति चाहिए। सभी दलों के साथ लगभग यही स्थिति है। यशवन्त सिन्हा जो सब कह रहे हैं, उन सबसे हम अवगत हैं। देश के राजनीतिक दलों के लिए आज विचारधारा का प्रश्न प्रमुख नहीं है। यशवन्त सिन्हा ने हिन्दुत्व की विचारधारा का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है। सरकार के कब्जे में अब सब कुछ है। यशवन्त सिन्हा के साथ सभी विपक्षी दल नहीं है। राष्ट्रपति चुनाव में भारतीय लोकतंत्र और सुविधा को बचाने के लिए वे सब एकजुट शायद ही होंगे। दूसरी ओर भाजपा विरोधी दलों में से कई दल राजग प्रत्याशी को अपना मत देकर उनकी जीत सुनिश्चित करेंगे। निश्चय ही यह विपक्षी दलों के एकजुट होने का अवसर है। अवसर से लाभ लेने की कला उन्हें नहीं आयी है। यशवन्त सिद्धा ने वोट की संख्या को अपने लिए बेमानी कहा है।
वोट संख्या से ही राष्ट्रपति पद पर कोई विराजमान होगा। राष्ट्रपति पद के इस चुनाव में द्रौपदी मुर्मू की जीत सुनिश्चित है। उन्हें साठ प्रतिशत से अधिक वोट मिलने की संभावना है। बीजद का 43 हजार, झामुमो का 6 हजार 6 सौ 80, बसपा का 8 हजार 238 वोट-मूल्य है। भाजपा और राजग में शायद ही सेंधमारी हो। दोपदी मुर्मू भारत की अगली राष्ट्रपति होंगी।

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