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पुस्तक-समीक्षा

कविता का जनपक्ष : समकालीन कविता पर सार्थक विमर्श

 

शैलेंद्र चौहान मूलतः कवि हैं। उन्होंने कुछ कहानियाँ और एक संस्मरणात्मक उपन्यास भी लिखा है। लघु पत्रिका ‘धरती’ का एक लम्बे अरसे तक सम्पादन भी किया है। आलोचनात्मक आलेख और किताबों की समीक्षा गाहे-बगाहे लिखते रहे हैं। आठवे दशक से शैलेंद्र चौहान ने कविता लिखने का सिलसिला शुरू किया था। इस लिहाज से देखें, तो उन्होंने हिन्दी साहित्य में चार दशक का लम्बा सफर तय कर लिया है। चालीस साल एक लम्बा समय होता है, लेकिन इस दौरान उनके सिर्फ चार कविता संग्रह आए हैं।

शैलेंद्र चौहान की यह रफ्तार देखकर कहा जा सकता है कि वे सिर्फ लिखने के लिए नहीं लिखते। कोई खयाल जब तक उन्हें अंदर से लिखने के लिए मजबूर न करे, तब तक वे अपनी कलम नहीं उठाते। इस मामले में वे बेहद मितव्ययी हैं। हाल ही में मोनिका प्रकाशन से प्रकाशित किताब ‘कविता का जनपक्ष’ शैलेंद्र चौहान के आलोचनात्मक आलेखों और निबंधों का संकलन है। जिसमें दो किताबों की समीक्षा भी शामिल है। अपने नाम के ही मुताबिक इस किताब में कवि, कविता और उसके जनपक्ष पर ही चर्चा है।

हिन्दी साहित्य में जब जनपक्षधरता की बात आती है। खास तौर पर आधुनिक काल में, तो प्रगतिशील-जनवादी धारा से जुड़े रचनाकारों के नाम शीर्ष पर नजर आते हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शील, मुक्तिबोध, त्रिलोचन शास्त्री, रघुवीर सहाय, कुमार विकल और शिवराम किस परम्परा और विचारधारा के झंडाबरदार हैं, इसे किसी को बतलाने की जरूरत नहीं। सब उनके बारे में अच्छी तरह से जानते हैं। लेखक ने किताब में इन कवियों के ऊपर लिखे निबंधों में उनकी कविता के विविध पहलुओं और जनपक्षधरता को रेखांकित करने की कोशिश की है। लेखों को पढ़ने से लेखक की आलोचनात्मक दृष्टि का अहसास होता है।

हिन्दी के नामवर कवियों पर उनकी तमाम टिप्पढ़ियाँ सटीक जान पड़ती हैं। मिसाल के तौर पर ‘निराला की कविता के अंतर्तत्व’ लेख में वे निराला का मूल्यांकन करते हुए लिखते हैं,‘‘गतानुगतिकता के प्रति तीव्र विद्रोह उनकी कविताओं में आदि से अंत तक बना रहा।’’ (पेज-41) वहीं ‘शमशेर की कविताई’ लेख में शमशेर बहादुर सिंह पर उनका कहना है, ‘‘शमशेर बहादुर सिंह प्रगतिशील और प्रयोगशील कवि हैं। बौद्धिक स्तर पर वे मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद से प्रभावित हैं तथा अनुभवों में वे रूमानी एवं व्यक्तिवादी जान पड़ते हैं।’’ (पेज-51)

कवि केदारनाथ अग्रवाल के बारे में उनका खयाल है,‘‘केदारनाथ अग्रवाल ग्रामीण परिवेश एवं लोक संवेदना के कवि हैं। उनके मन में सामान्यजन के मंगल की भावना विधमान है। उनकी रचना का केन्द्र बिंदु सर्वहारा किसान और मजदूर है।’’ (पेज-62) कवि नागार्जुन के बारे में उनकी सारगर्भित टिप्पणी है,‘‘बाबा नागार्जुन कई अर्थों में एक साथ सरल और बीहड़ दोनों तरह के कवि हैं।’’ (पेज-67) वहीं मुक्तिबोध के सम्बन्ध में उनकी बेबाक राय है,‘‘मुक्तिबोध मध्यवर्ग के अपने निजी कवि हैं। मध्यवर्गीय संघर्ष और विषमताओं को वे अपनी ताकत बनाते हैं।’’ (पेज-80)

शैलेंद्र चौहान ने हालांकि ‘कविता का जनपक्ष’ को अलग-अलग खंडों में नहीं बांटा है। लेकिन यह किताब तीन हिस्सों में दिखलाई देती है। पहला हिस्सा, जिसमें हिन्दी आलोचना और आलोचकों के रचनाकर्म पर बात है। तो कविता, नई कविता की प्रमुख प्रवृतियों कविता की जनपक्षधरता, प्रयोगवाद और प्रगतिवाद आदि पर लेख हैं। इस खंड के एक लेख ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी आलोचना : एक अवलोकन’ में वे शुक्लोत्तर पीढ़ी के बाद के प्रमुख आलोचकों पर संक्षिप्त टिप्पणी करते हैं, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि डॉ. नामवर सिंह उनकी नजर से छूट जाते हैं या यूं कहिए उन्होंने नामवर सिंह को जानबूझकर छोड़ दिया है।

अलबत्ता अपने दूसरे लेख ‘जनपक्षीय आलोचना का विचलन’ लेख में वे जरूर नामवर सिंह को याद करते हैं, लेकिन आलोचनात्मक दृष्टि से। नामवर सिंह की प्रसिद्ध किताब ‘कविता के नए प्रतिमान’ के बहाने वे उनकी तमाम मान्यताओं और स्थापनाओं की धज्जियाँ उड़ाते हुए लिखते हैं,‘‘‘कविता के प्रतिमान’ पुस्तक में नामवर जी ने अपनी उत्कृष्ट कल्पनाशक्ति और मेधा से प्रयोगवाद और नई कविता को प्रगतिशील कविता के बरक्स रखकर एक ऐसा सशक्त भ्रम पैदा कर दिया कि प्रगतिशील कविता एक अवांछित घपलेबाजी का शिकार हो गई।’’ (पेज-33) ‘लोक परम्परा और समकालीन कविता’ लेख में लेखक ने लोक परम्परा और समकालीन कविता के अंतर्संबंधों को जांचा है। समकालीन कविता, लोक के कितने पास और कितनी दूर है।

किताब का तीसरा हिस्सा, बाकी दो हिस्सों से काफी दिलचस्प है। इस हिस्से में लेखक ने विचारधारा के दो अलग-अलग छोर पर खड़े चर्चित कवि आलोक धन्वा और अशोक वाजपेयी के कविता संग्रह क्रमशः ‘दुनिया रोज बनती है’ और ‘जो नहीं है’ के बहाने इन कवियों की कविता पर तीखी टिप्पणी की है। आलोक धन्वा की कविता के बारे में लेखक का मानना है,‘‘आलोक की कविताओं का कंटेंट निर्बल वर्ग के प्रति सहानुभूति लिए हुए तो है, पर भाषा और शैली अभिजात्य कलावादी प्रभावों से निर्देशित होती है।’’ (पेज-120)

वहीं अशोक वाजपेयी की कई कविताओं की तार्किक विवेचना करते हुए वे निर्मम टिप्पणी करते हैं,‘‘लगता है कविताएं लिखना कवि के लिए विवेक विराम का घर है और शायद मानसिक आराम का भी। आराम से कुछ औचक कुछ अकबक शब्दों को वाक्यों में पिरो दिया जाए, कुछ तत्सम पांडित्यपूर्ण शब्दों को सलमे सितारों की तरह टांक दिया जाए, कुछ जुगुप्सा उसमें ठूंस दी जाए। फिर होगा जो ढांचा तैयार वही कविता है, अशोक वाजपेयी की कविता।’’ (पेज-126) आलोचक, जो खुद भी एक कवि है। अपने से वरिष्ठ कवियों जो हिन्दी साहित्य में स्थापित भी हैं, के ऊपर तीखी टिप्पणियाँ वाकई साहसिक कार्य है।

‘कविता का जनपक्ष’ न सिर्फ अपनी विषयवस्तु बल्कि भाषा के स्तर पर भी प्रभावित करती है। वाक्यांश सुगठित और भाषा में एक प्रवाह है। लेखक कई जगह अपनी मौलिक प्रस्थापनाओं से पाठकों को चौंकाता है। किताब में जो कवि शामिल हैं, इन लेखों से उस कवि के बारे में पाठक एक मुख्तसर सी राय बना सकते हैं। आलोचना के क्षेत्र में शैलेन्द्र की पकड़ अच्छी है। लेखक इस विधा पर ही खुद को एकाग्र करे, तो हिन्दी साहित्य में अपनी एक अलग पहचान बना सकता है। क्योंकि आलोचना के लिए जो भाषायी सामर्थ्य, वैचारिक दृष्टि और अध्यवसाय चाहिए, यह सभी खासियत शैलेंद्र चौहान के अंदर हैं।

पुस्तक समीक्षा : ‘कविता का जनपक्ष’ (आलोचना)

लेखक : शैलेंद्र चौहान

मूल्य : 290 (पेपरबैक संस्करण)

प्रकाशक : मोनिका प्रकाशन, जयपुर 302033

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