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संस्कृति

भौतिक चेतना का अकाल

 

  • भरत प्रसाद

 

‘संस्कृति’ के प्रति साहसिक, स्वस्थ और परिवर्तनकामी संकल्प का घोर अकाल रहा है- हमारे देश में। हम उसे कभी देवी की तरह देखते हैं, कभी पवित्र आदर्श की तरह तो कभी आदरणीय सत्ता की तरह। इन तीनों रूपों में संस्कृति एक अमूर्त मायावी शासक ही होती है, हमारे सहज विकास की पोषक नहीं। प्रायः हमारे भीतर संस्कृति को उच्च और उदार भावना के साथ देखने की प्रवृत्ति सक्रिय रही है, लेकिन अब उसे निरपेक्ष, तटस्थ और तर्कपूर्ण नजरिये से जाँचने, परखने एवं तौलने की जरूरत है। पृथ्वी पर जितने प्रकार के मानव समुदाय हैं, उतनी प्रकार की संस्कृतियाँ हैं और कहने-सुनने के लिए मामूली समानताओं के अलावा उनमें पर्याप्त भेद बना हुआ है। लाख कोशिशों के बावजूद दो भिन्न संस्कृतियों के मनुष्यों को एकाकार कर पाना, एकता की मानसिकता में बाँध पाना असम्भव है। हम बाहर क्यों जाएं?

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कोई उत्तर प्रदेश या बिहार के लोगों को दक्षिण भारत के निवासियों के साथ एक महीना मिल-जुलकर रहने को कह दे? पूर्वोत्तर या उत्तरांचल का जनसमूह मैदानी भारत में सहजतापूर्वक जी सकता है? कहना पड़ेगा कि मनुष्य मनुष्य के बीच भेद, अलगाव और वैमनस्य सिर्फ विकृत मानसिकता के कारण ही नहीं पैदा होते, वह जड़, सिद्धान्तबद्ध ओर परिवर्तनशून्य संस्कृति के कारण भी पैदा होते हैं। यह संस्कृति निष्क्रिय होकर जीवन की पृष्ठभूमि में नहीं रहती, बल्कि हमारे मन, बुद्धि, स्वभाव और व्यवहार सबको अपने अनुसार ढालकर बहुत गहराई तक संस्कार के रूप में सक्रिय रहती है। धर्म और संप्रदाय की विकृतियाँ भयानक होते हुए भी उससे एक हद तक छुटकारा पाया जा सकता है, लेकिन विकृत संस्कृति से लगभग असम्भव। इसलिए वर्तमान मानव के समक्ष संस्कृति के पुनर्निर्माण, उसके नवविकास का सवाल अन्य किसी भी सवाल से बड़ा, अनिवार्य किन्तु चुनौतिपूर्ण है।

जिस तरह हम इतिहास को देखते हैं, अतीत को परखते हैं, उसी तरह संस्कृति को भी जाचें, उसका सब कुछ उत्तम मान लेने वाली कुंद मानसिकता से मुक्त होकर। वस्तुतः अपनी संस्कृति को देखने की अब भौतिक प्रेमी अन्तर्दृष्टि विकसित हो, जो कि अपने देश में अभी जन्म नहीं ले पायी है। भौतिक दृष्टिकोण विकसित करने का मूलमंत्र है- पृथ्वी की समस्त भौतिक सत्ता को किसी जीवित अस्तित्व की तरह महत्व देना, उसकी असाधारण कीमत को जीवन में बहुत बढ़-चढ़कर आंकना और किसी के भी मुकाबले उसकी अहमियत को कम न होने देना। भारत में एक पुरानी और पुराणपंथी सोच रही है कि भौतिक दुनिया तो नश्वर है, परिवर्तनशील है, आज नहीं तो कल, नहीं तो परसों हमसे छूट जाने वाली है, इसलिए इससे मोह या लगाव क्या रखना, क्यों इसके पीछे भागना।

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यदि नश्वरता ही भौतिकता से आसक्ति न रखने का मूल कारण है तो यह अस्थि-मज्जा का साढ़े तीन हाथ वाला शरीर भी तो नाशवान है, पूरा जीवन ही तयपूर्वक दाँव पर लगा हुआ है। फिर त्याग दो न खाना-पीना, व्यायाम करना, साबुन तेल लगाना, साफ-सुंदर कपड़े पहनना। तर्क यदि खटक रहा हो, तो खटके, है यह तर्कसंगत। हमें भौतिक दुनिया से विरक्ति का पाठ सिर्फ पढ़ाया ही नहीं गया, घोल-पीसकर इतना ज्यादा पिला दिया गया कि अब वह बाहर निकलने का नाम ही नहीं लेता। अभी तक हम संसार के प्रति धार्मिक और आध्यात्मिक सोच में जीते रहे, अब जरूरत है उसके साथ वैज्ञानिक तरीके से जीने की। जरा सोच जिंदा कीजिए-पानी आपके लिए कितना त्याग करता है? हवा आपके लिए कितना अथक परिश्रम करती है? धरती आपके लिए अपनी दौलत को किस कदर लुटा डालती है? पेड़-पौधे और मामूली वनस्पतियाँ आपके बाहरी और भीतरी व्यक्तित्व को कितना स्वस्थ रखती हैं? क्या पर्वत यूं ही खड़े हो गये?समय के साये में: सामाजिक अस्तित्व और ... क्या तरंगों में चमकती हुई नदियाँ ऐसे ही बह निकलीं? सम्पूर्ण पृथ्वी को अथाह रस से पूर्ण रखने वाले समुद्र क्या यूं ही विस्मयकारी विस्तार वाले बन बैठे? नहीं, हरगिज नहीं। बड़े असम्भव हालातों से गुजरकर पृथ्वी ने करोड़ों करोड़ वर्षों की असम्भव मेहनत के फलस्वरूप पर्वतों, नदियों और नयनाभिराम घाटियों का सृजन किया है। बड़ी-बड़ी तकलीफें झेली हैं पृथ्वी ने अपने सृष्टिदायी समुद्रों को पैदा करने में। कल्पना करें कि आप ऐसी धरती पर रह रहे हैं, जहाँ सांस लेने के लिए हवा तो है, खाने-पीने के लिए अन्न-पानी तो है, लेकिन अपरंपार हरियाली से कसे पड़े पर्वत गायब हैं, असीम शक्ति के साथ तरंग फेंकते समुद्र दूर-दूर तक दिखायी नहीं देते, न तो वहाँ पक्षियों के दूरंदेश उड़ने के अलौकिक दृश्यों से सुबहें होती हैं, न ही उनकी वापसी के दृश्यों से शाम। भिड़ाइए दिमाग, कैसा होगा वह जीवन?

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न जाने कितने दुर्लभ संयोग से हमने इस अनंत क्षमता संपन्न पृथ्वी पर जन्म लिया, बिल्कुल अतुलनीय है- इसकी ममता। जब तक हमारे पास पृथ्वी की सत्ता का विविध खजाना मौजूद है, तब तक हम गरीब नहीं रहेंगे, हम नष्ट नहीं होंगे, हमारा अस्तित्व सदियों-शताब्दियों तक पृथ्वी पर लहराता रहेगा। हाँ, कुयोगवश इनमें से किसी एक के भी नष्ट हो जाने पर अपने बेहिसाब सर्वनाश की भी कल्पना नहीं की जा सकती। हवा, ‘हवा’ न रही ; पानी, ‘पानी’ न रहा ; अन्न, ‘अन्न’ न रहा ; मिट्टी ‘मिट्टी’ न रही ; तो न राम रहेंगे, न रहीम। फिर तो गांठ बाँध लीजिए कि ये लाखों देवी-देवता किसी भी काम न आयेंगे। इस जीवन में आकाश से बड़ा कोई ईश्वर नहीं, पृथ्वी से बड़ी कोई देवी नहीं और भौतिक प्रकृति से बढ़कर कोई सत्ता नहीं। लेकिन हमें आकाश को ‘आकाश’ ही रहने देना है, पृथ्वी को ‘पृथ्वी’ बनाये रखना है। देवी-देवता या ईश्वर के रूप में इसे मान्यता देना एक और अंधी सभ्यता को बुलावा देना है।

भौतिक सत्ता के इन तमाम रूपों के प्रति हमारे भीतर ज्यों ही पूजा-भाव, भक्तिभाव या आराधना का भाव जागृत हुआ, हम अपने प्रति और उस प्रकृति-सत्ता के प्रति भी दृष्टिशून्य हो जायेंगे, क्योंकि पूजा या भक्ति में अनिवार्यतः बुद्धि, अन्तर्दृष्टि और तर्कशक्ति को कुंद एवं निष्क्रिय बना देने की क्षमता होती है। किसी सत्ता की अतिशय पूजा या आराधना करने वाला बुद्धिरहित नहीं हो जाता, न ही तर्क करने का मूलभूत स्वभाव छोड़ देता है ; बल्कि उसकी बुद्धि और तर्कशक्ति पूजनीय के रंग में विधिवत् रंग उठती है और यह तर्क क्षमता तटस्थ या विशुद्ध स्वतंत्र न रहकर हमेशा-हमेशा के लिए पूजनीय के प्रति घुटने टेक देती है। भक्ति करना, श्रद्धा रखना और समर्पित हो जाना मनुष्य के असाधारण-उद्दाम गुण हैं। इनसे मनुष्य महामानव भी बन सकता है और निरर्थक मनुष्य भी। इसीलिए अपने भीतर प्रबल उथल-पुथल मचाते ऐसे भावों को संयमित करना, परिष्कृत बनाये रखना और विनाशक रूप न धारण करने देना चैतन्य मनुष्य के ही वश की बात है। श्रद्धा, समर्पण और भक्ति की शक्ति का मनमाना, बेहिसाब और बिना सोचे-समझे दुरूपयोग करते रहने से ही भारत के कोने-कोने में साक्षात् धार्मिक पतन की त्राहि-त्राहि मची हुई है।

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तब प्रश्न यह उठता है कि भौतिक सत्ता के प्रति सर्वोच्च सम्मान, स्नेह और समर्पण का भाव रखने के बावजूद उसके प्रति स्वसथ दृष्टिकोण क्या हो? क्या बिना पूजा किये परम सम्मान नहीं प्रकट किया जा सकता? इन सभी प्रश्नों का दृढ़तापूर्वक एक ही उत्तर है- हाँ, अवश्य। तो आइए, चलिए मथते हैं दिमाग को, कि भौतिक सत्ता के प्रति हमारा स्वस्थ दृष्टिकोण क्या हो? सर्वप्रथम तो यह कि हम उसके सम्पूर्ण आंतरिक और बाह्य महत्व को पूरी आत्मीयता से समझें, उसके प्राचीनतम इतिहास और नवीनतम रूप-स्थिति से परिचित हों, अर्थात् उसके विविध पहलुओं की अक्षय कीमत का ज्ञान हमें विधिवत् रहना चाहिए, तभी उसके प्रति चिर-स्थायी सम्मान भाव पैदा कर पायेंगे। दूसरे यह कि हमारे और आपके सामने जो भौतिक सत्ता जैसे भी है, जिस भी रूप में है, जगह दीजिए। उस पर किसी देवी-देवता या ईश्वर का रहस्यमय आवरण मत चढ़ाइए। ये प्रकृति की मूलभूत पहचान हैं। प्रकृति इन्हीं से ही सुवासित होती है। प्रकृति को अपने नजरिये से नहीं, बल्कि अपने को प्रकृति के नजरिये से देखने की जरूरत है। अपने भीतर यह सहर्ष स्वीकार की क्षमता विकसित कीजिए कि सृष्टि में मानव मूल्य ही सर्वश्रेष्ठ नहीं हैं, उससे भी ऊपर है- इस भौतिक प्रकृति का मूल्य, क्योंकि इसी महानतम प्रकृति ने हमें पाला-पोसा बड़ा किया है।के बीच मानव चेतना और क्वांटम भौतिकी ...

इस अद्वितीय प्रकृति की उपेक्षा करके मानव मूल्यों की श्रेष्ठता कैसे कायम रख सकते हैं? किसी अस्तित्व के आमूल-चूल महत्व का एहसास रखना ही उसके प्रति सर्वोच्च सम्मान प्रकट करना है। भौतिक प्रकृति की कमजोरियों और दोषों को भी जानना उतना ही जरूरी है जितना कि उसके गुणों को। ईश्वर में आज तक हमें कोई दोष नहीं दिखे, उसका सब कुछ उत्तम ही उत्तम है, इसीलिए समस्या और भी भयंकर और जटिल बनी हुई है। हमें भौतिक सत्ता की भक्ति या पूजा बिल्कुल नहीं करनी है। बस, उसको उसकी सम्पूर्ण विशेषताओं और कमियों के साथ जानना, मानना और आत्मवत् स्वीकार करना है। कमियाँ जानकर भी किसी से प्रेम करना, प्रेम का बड़ा ऊँचा आदर्श होता है।

तीसरी बात यह कि सिर्फ महत्व और ग़ैर महत्व के तराजू पर ही किसी को सम्मान देने की संकीर्ण बुद्धि से मुक्त होइए। कोई हमारे काम न आकर भी, हमारे लिए उपयोगी न रहकर भी, हमसे कोई ताल्लुक न रखकर भी हमारे भरपूर आदर और प्रेम का हकदार बन सकता है। प्रकृति या भौतिक दुनिया के ही ऐसे तमाम अस्तित्व जिनकी हमारे जीवन में रत्तीभर भी उपयोगिता नहीं। वे बस हैं तो हैं, लेकिन इससे उनकी इज्जत कम नहीं हो जाती। हम क्यों अपनी ही कसौटी पर जड़-चेतन के महत्व का आकलन करते हैं? हमारे बारे में प्रकृति की क्या कसौटी है, इसका निर्धारण कौन करेगा? हमेशा खुद को केंद्रीय मानने की आत्ममुग्ध जड़ता से मुक्त होइए, तब जाकर कुछ हद तक भौतिक प्रकृति के प्रति प्रखर, विमल चेतना का विकास हो सकेगा।

लेखक पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय, शिलांग (हिन्दी विभाग) के अध्यक्ष और प्रोफेसर हैं|

सम्पर्क- +919863076138, deshdhar@gmail.com

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