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मुद्दा

भारतीय समाज और गोरापन

 

द वर्ल्ड इज नॉट फेयर, यू बी फेयर

कुछ डेढ़ दशक पहले अंग्रेजी अखबार में छपी एक फेयरनेस क्रीम के विज्ञापन की यह टैगलाइन थी कि इस अनफेयर दुनिया में कम से कम आपकी त्वचा तो फेयर हो ही सकती है।

हाल में दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में काले व्यक्ति जार्ज फ्लॉयड पुलिस हिरासत में हुई मौत ने दुनिया भर में नस्लभेद और रंगभेद के तांडव को उजागर किया हालांकि पहले ब्लैक अमेरिकन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा “अमेरिका कॉन्ट ब्रेथ” दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के पूर्व राष्ट्रपति का बयानयह बताता है अभी भी काले लोग अमेरिकी समाज की मुख्य धारा सेकोसों दूर है।

उपभोक्ता मार्केट की जानी मानी एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स कम्पनी) युनिलीवर ने गोरेपन को बढ़ावा देने वाली फेस क्रीम का नाम बदलने की सिफारिश की है इतना ही नहीं कम्पनी के मुताबिक गोरेपन जैसे शब्दों का इस्तेमाल अपने उत्पादन और विज्ञापनों में नहीं करेगी।कम्पनी के ब्यूटी और पर्सनल केयर डिवीजन के प्रेसिडेंट सनी जैन ने कहा कि “अपने स्किन केयर ब्राण्ड के ग्लोबल पोर्टफोलियो को लेकर हम पूरी तरह समर्पित हैये सभी रंगों और तरह के स्किन टोंस का ख्याल रखेगी।हम यह समझते हैं कि फेयर‘ ‘वाइटऔर लाइटजैसे शब्द खूबसूरती के एक तरफा नजरिये को बयान करते हैं हमें नहीं लगता कि यह सही है। पर हम उस पर ध्यान देना चाहते हैं।”

अमेरिका में जार्ज फ्लॉयड की मौत के बाद शुरू हुए ‘ब्लैक लाइफ मैटर’ मुहिम के दौरान हाल के हफ्तों में कम्पनी के इस तरह के उत्पादों की कड़ी आलोचना हुई है।

सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के खिलाफ प्रदर्शन, सेक्स के प्रतिक के रूप में महिलाओं का उयोग और नारी शरीर का उपभोक्ता सामग्री समान माना जाना पश्चिमी देशों के नारी आन्दोलन की यही मूलाधार रहा है। पश्चात नारीवादियों को इस बात का एहसास हुआ कि मीडिया के जरिए प्रदर्शन के कारण सौन्दर्य प्रतियोगिताएँ नारी को शारीरिक मानसिक और भावनात्मक रूप से क्षति पहुँचा सकती है। अफसोस की बात यह है कि पश्चिम की नारी द्वारा सौन्दर्य के इन तथाकथित प्रतिमानों को ठुकरा दिए जाने बाद हम भारत मेंसौन्दर्य प्रतियोगिताओं के इस पश्चिमी बुखार से ग्रस्त होते जा रहे हैं।

जिसमें मिस इण्डिया प्रतियोगिता एक महत्त्वपूर्ण घटना बनती जा रही है अगर कोई व्यक्ति सुन्दर प्रतियोगिता के प्रति अपनी अरुचि दिखाता है तो यह मान लिया जाता है कि उसका जीवन आत्म दमन का शिकार हो गया है। यह बात समझी जानी चाहिए कि सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के विरुद्ध होने का मतलब कतई यह नहीं कि नारी केसुन्दर दिखने या श्रृंगार से विरोध है। नारी की शुरू से ही सौन्दर्य चेतना रही है और वह अपने आस-पास के तकरीबन हर चीज से अपने आप को अलंकृत करती रही है। इस क्षेत्र में भारतीय महिलाएँ खासतौर से रचनाशील रही हैं।

‘भारतीय सौन्दर्य’

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श्रृंगार भारत की सदियों पुरानी परम्परा रही है जिसमें स्त्रियाँ विशेष प्रकार के गहने पहनती हैं सजती-सँवरतीहै और पूरे शरीर को अलंकृत करती हैं।सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के साथ सौन्दर्य का जो प्रतिमान पश्चिम देशों से हमारे यहाँआया उसका सौन्दर्य से कोई लेना देना नहीं है वह तो नारी द्वारा खुद को बाजार में मानवीयकृत्य उत्पाद की तरह पेश करने का एक तरीका जिसमें कोई मानवीय पक्ष नहीं होता एक ग्लैमरस गुड़िया की तरह अपने आपकोपरोसकर कर नारी खुद ही घृणा का पात्र  बन जाती है।

स्त्री कीसुन्दरता की हमारी अवधारणा का सबसे अस्वस्थकर पहलू यह है कि हम काली चमड़ी को कुरूपता का प्रतीक मानते हैं इसलिएगोरी स्त्रियों को खासी अहमियत दी जाती है।(भारत में भी काले व्यक्ति के साथ भेदभाव पश्चिम से कम नहीं।)

संस्कृत के विद्वान सुरभि सेठ बताती हैंकि गोरी चमड़ी के प्रति पक्षपात भारतीय साहित्य में भरा पड़ा है। गौर वर्ण प्रकाश और सुन्दर से जुड़ा माना जाता है जातिगत वरीयता भी है। प्राचीन साहित्य में कहा गया है कि ब्राह्मणों की त्वचा गोरी, क्षत्रियों की त्वचा लाल,वैश्यों की पीततथा शूद्रों की काली होती है। गोरा रंग पारम्परिक रूप में सुन्दरता से जुड़ा हुआ तो था ही उपनिवेशवादी शासन के दौरान यहसत्ता का प्रतीक भी बन गया। भारतीय नेहरू परिवार के प्रति इतने मन्त्र मुग्ध क्यों थे इस प्रश्न का उत्तर शायद इसी मानसिकता में है।

परिवार में काली लडकियों की उपेक्षा की जाती है यहाँतक कि उनको कईप्रकार के नामोंसे पुकार कर उनका मजाक बनाया जाता है,विवाह के बाजार में काले चेहरे को कई तरह के अपमान झेलने पड़ते हैं।हमारे समाज में चमड़ी को गोरा बनाने की क्रीम ठीक वैसे ही बिकती है जैसे पश्चिमी देशों में झुर्रियां वाली क्रीम। हम में से अधिकांश काले या सावले हैं इसे देखते हुए भारतीय नारी के गोरेपन का मोल बढ़जाता है।

‘फेयर बट नॉट लवली’

सतर के दशक में हिंदुस्तान युनिलीवर पहली बार काली लड़कियों को गोरा बनाने वाला लेप ‘फेयर एंड लवली’ नाम की क्रीम बाजार में उतारी तब से लेकर अब तक औरतों की न जाने कितनी पीढीयाँ यह क्रीम लगाते हुए जवान हुईं और उम्रढलान की ओर बढ़ती चली गयीं लेकिन उनका सावला रंग नहीं बदला और ना गोरा होने की उम्मीद।

इस गोरेपन की माया से पुरुष वर्ग भी अछूता नहीं रहा है मर्दों वाली क्रीम के नाम से ‘फेयर एंड हैंडसम’ जिसका प्रचार शाहरुख खान, जॉन इब्राहिम जैसे बड़े कलाकार कर चुके हैं वैसे लड़कों को तो बस चेहरा तक गोरा करना है वहीं लड़कियों के शरीर अंग विशेष तक के लिए कई क्रीम बाजार में उपलब्ध हैं।

देर से ही सही कम्पनी को यह एहसास हुआ की गोरेपन का धन्धा ज्यादा दिन तकचलने वाला नहीं और उन्होंनेयह समझा। यह सकारात्मकता को दर्शाता है। जैसे-जैसे लड़कियों की सम्पत्ति का अधिकार, विशाखा गाइडलाइन, सेना के क्षेत्र में, समान कार्य समान वेतन जैसी चीजों पर अधिकार मिलने लगा उनमें आत्मनिर्भरता का संचार हमें देखने को मिल रहा है।

हालांकि शादी के बाजार में आज भी गोरी लड़कियों की मांग शीर्ष पर है अखबारों तथा  मैट्रिमोनियल आदि के विज्ञापन में कुछ भी चाहने से पहले गोरी सुन्दर लड़की चाह रहे हैं कुछ लडकियाँ आज भी हैं जो ऐसे मर्दों को आईना दिखाने का काम कर रही हैं। इस प्रकार का बदलाव जब समाज में दृष्टिगोचर हो रहा है तो कम्पनी इतना तो बदलावकर ही सकती है कि अपने क्रीम से ‘फेयर’ जैसे ‘अनफेयर’ शब्द हटा दें। पता नहीं यह समझना कितना आसान है कि बाजार लड़कियों को बदल रहा है या लडकियाँ बाजार को।

कार्ल मार्क्स ने लिखा है कि “अगर आप किसी पूँजीपति को लटकाना चाहें तो वह आपको रस्सी बेच देगा”।

अगर गोरेपन की संस्कृति भारत में अपनी जड़ें जमाती रहीं तो वह पारम्परिक रूप से भारतीय नारी को मिली शक्ति के ही कुछ क्षेत्रों पर आघात करेगी। यह संस्कृति नारी के बीच के दूषित प्रतिद्वन्द्विता पैदा करती है और इसमें आत्मकेंद्रित होते जाने तथा अन्य स्त्रियों का प्रतिद्वन्दी मानने के कारण खुद के खिलाफ ही एक घृणा को जन्म देती है। वह एक ऐसी नारी को जन्म देती है जो पुरुष का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने को आतुर है वह नारी को निरन्तर एक आयामी जीव बदलती चला जाता है जिसे पुरुष आसानी से बरगला सकता है क्योंकि वह खुद को पुरुष की ही आँखों में देखना चाहती है अन्ततः विकास और आत्मनिर्भरता की इस आँधी में जहाँ एक ओर महिलाएँ गोरेपन से जूझ रही हैं वहीं दूसरी ओर पुरुष गंजेपन का शिकार होता जा रहा है।

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