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शख्सियत

अब्दुल सत्तार ईधी : धरती के एक देवदूत

 

 हमारी धरती पर उपस्थित हर मानव समाज में, समय के हर कालखण्ड में और इस धरती के हर मानव समूह में, दुनियाभर के हरेक देशों में, हर मजहब या धर्म में,  हर जाति और उपजातियों में, हर जगह सर्वत्र अच्छे से अच्छे लोग भी होते हैं और बुरे से बुरे लोग भी होते हैं। परन्तु आजकल इस देश में सत्तारूढ़ सरकार के समर्थक एक खास सोच के समूह के लोगों में यह भावना बहुत प्रबल है कि एक धर्म विशेष के सभी लोग ही बहुत खूँख्वार और हिंसक होते हैं, आतंकवादी होते हैं!

इसी सोच के अंतर्गत इस देश में एक विशेष विचारधारा के हिंसक लोगों के एक समूह के कुछ प्रवक्ताओं, उनके नेताओं, अभिनेताओं तथा अभिनेत्रियों द्वारा समय-समय पर भड़काऊ भाषण देकर, उत्तेजक बयानबाजी करके, सोशल मिडिया पर एक धर्म विशेष के लोगों के विरूद्ध हिंसक और नफरतभरे, भयावह विडियो या संदेश डालकर, एक काल्पनिक भय दिखाकर भारतीय समाज में धार्मिक व जातीय वैमनस्यता के विषबीज बोने का बारंबार कुप्रयास किये जा रहे हैं, जबकि इस लेख के प्रारम्भ में ही इस बात को बताने का प्रयास किया गया है, कि वैज्ञानिकों और मानवीय संवेदनाओं के महान चिंतकों के अनुसार ऐसा कुछ भी नहीं है।

    उक्त वैमनस्यता भरे लोगों को, जो इस देश में नफरत के बीज बोने के लिए लगातार कुप्रचार और कुप्रयास कर रहे हैं, को खूब ठीक से बताने के लिए उदाहरण के तौर पर एक अति मानवीय और अति संवेदनशील व्यक्ति की दया, करूणा,  सहृदयता, मानवीय संवेदना, बिना किसी धार्मिक व जातीय भेदभाव के समदर्शी भाव से हर उस गरीब, नीरीह व जरूरतमंद व्यक्ति को सदा मदद के लिए तत्पर उस व्यक्ति के किए गये सद् कार्यों को इस लेख में सोदाहरण प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है।

ब्रिटिश साम्राज्यवादियों और भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ सत्ता के लोभी, लालायित व उतावले लोगों की वजह से इस दुनिया में मानवकृत सबसे बड़ी हिंसा, हत्या,  बलात्कार आदि त्रासदी को न्योता देनेवाली भारत-पाकिस्तान बंटवारे की अति दुःखद घटना 1947 में घटित हुई। इस भयावहतम् त्रासद समय में भारत और पाकिस्तान से बहुत से हिन्दुओं और मुसलमानों को अपनी जन्मभूमि से उखड़कर एक दूसरे अनजाने देश में बसने को अभिशापित होना पड़ा था!

फोटो क्रेडिट : ASSOCIATED PRESS

भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के उन्हीं अभिशापित दिनों में गुजरात राज्य के काठियावाड़ में स्थित एक छोटे से कस्बे बनतवा में सन् 1928 में जन्में एक 19 वर्षीय किशोर को, जिसे उसके बचपन में स्कूल जाते समय उसकी माँ उसे खर्च के लिए दो पैसे दिया करतीं थीं, वह बालक बचपन से ही उसके दिल में इतनी दया, करूँणा, मानवीयता, गरीबों के प्रति हमदर्दी थी कि वह बालक अपनी माँ द्वारा दिए दो पैसों में से प्रतिदिन केवल एक पैसा स्वयं पर खर्च करता था और बचाया हुआ एक पैसा किसी अत्यंत गरीब अपने सहपाठी को दे दिया करता था, ताकि वह भी कुछ खा-पी ले, को भी अपनी जन्मभूमि से विस्थापित होकर अपने परिवार सहित पाकिस्तानी जमीन पर जाना पड़ा।

उस किशोर ने 1951 में अपनी कुल जमापूंजी से कराची शहर में एक दूकान खोला, अपनी उसी दुकान में एक डॉक्टर की मदद से एक डिस्पेंसरी खोला, संयोग की बात कि उसकी माँ भयंकर बीमार पड़ी, माँ को अस्पताल ले जाने के लिए उसे समय पर एम्बुलेंस नहीं मिली, उन्हें अपनी माँ को मजबूर होकर रिक्शे में बैठाकर अस्पताल ले जाना पड़ा। बाद में उन्हें  पता चला कि पूरे सिन्ध प्रांत में केवल पाँच एम्बुलेंस ही थीं।   

     माँ की बीमारी में एम्बुलेंस न मिलने की टीस ने अब्दुल सत्तार ईधी के दिलो-दिमाग को झकझोर कर रख दिया, उन्होंने अपनी इसी छोटी सी दुकान में ही ईधी फांऊडेशन की स्थापना किया, पाकिस्तान जाने के बाद भी उनके दिल-दिमाग से बचपन से अंकुरित दया, प्रेम, मानवता और गरीब लोगों को मदद करने के जज्बे में जरा भी कमी नहीं आई, अपितु वे मानवीय भावनाएं बढ़कर विशाल बटवृक्ष जैसे अतिविशाल बन गयीं, उनके द्वारा स्थापित ईधी फांऊडेशन दुनियाभर में एक प्राइवेट एम्बुलेंस सेवा की सबसे बड़ी सेवा प्रदाता कंपनी बन गयी।

अब्दुल सत्तार ईधी की एम्बुलेंस सेवा गरीबों, वंचितों, बेसहारा लोगों के लिए बहुत ही कम शुल्क में अपनी सेवाएं देने लगी। वे अनाथालयों,  पशुशालाओं, अस्पतालों, वृद्धाश्रमों आदि की सेवा करने के लिए एक मिशाल थे, उन्होंने ईमानदारीपूर्वक जरूरतमंदों की सेवा कर यह दिखा दिया कि धर्म के ठेकेदारों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए बनाए गये धर्मों यथा इस्लाम, ईसाई, हिन्दू आदि धर्म की व्यर्थ की चोंचलेबाजी है और वे मानवता तथा इंसानियत के ही सबसे बड़े दुश्मन हैं।

गरीबों की नजरों में अब अब्दुल सत्तार ईधी एक पीर, पैगम्बर, भगवान, ईश्वर, गॉड के समतुल्य बन गये थे, सम्पूर्ण मानवता की मदद के लिए इतने समर्पित कि अपने सान्ध्य काल में 88 की उम्र में भी अपने जर्जर हो चुके शरीर के एकमात्र सक्रिय अंग अपनी आँखों को भी मरणोपरांत दान देने की स्वीकृति दे दिए, अपने शरीर के अन्य अंग वे पहले ही दान कर चुके थे।

ऐसे मानवता और इंसानियत को समर्पित इस धरती के देवदूत को दुनियाभर के प्रतिष्ठित संस्थानों की तरफ से अनेकों पुरस्कारों से नवाजा गया, यथा उन्हें 1986 में रमन मैगसेसे पुरस्कार से नवाजा गया, 1988 में उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार से, 1992 में पॉल हेरिस फैलो रोटरी इन्टरनेशनल फाऊंडेशन पुरस्कार से, 1997 में उनकी संस्था गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा ली, तो सन् 2000 में अन्तर्राष्ट्रीय बाल जन पुस्कार से। 26 मार्च 2005 को उन्हें लाईफटाईम टाइम एचीवमेंट पुरस्कार से नवाजा गया, 2007 में उन्हें भारत की तरफ से गाँधी शाँति पुरस्कार और 2009 में अंतरराष्ट्रीय लब्धप्रतिष्ठित संस्था यूनेस्को से रमनजीत सिंह पुरस्कार से सम्मानित किया गया!

इस परम् देवतुल्य धरती के देवदूत ने अपने कर्मों से यह सिद्ध कर दिया कि यह जरूरी नहीं कि हम सिर्फ दिखावे के लिए टोपी लगाकर, भगवा या सफेद वस्त्र पहनकर, अपने पूरे ललाट और माथे पर रंगबिरंगे टीके लगाकर मस्जिदों, मंदिरों और चर्चों में जाएं, अपितु उन्होंने अपने कर्मों से सिद्ध करके यह खूब ठीक से बताया कि मानव का असली धर्म है, पर्यावरण, पशु-पक्षियों व बगैर किसी धर्म, जाति और रंगरूप के भेदभाव के इंसानियत व मनुष्यता की सेवा करना ही सबसे बड़ा मानव का धर्म है 

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