मोहन राकेश
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सामयिक
मोहन राकेश की ‘सावित्री’ और समकालीन स्त्री विमर्श
भारतीय समाज की कल्पना स्त्री और पुरूष की स्थापना के साथ ही होता है, जहाँ पितृसत्ता का वर्चस्व प्रारम्भ से अब तक बना रहा है। पुरूषों की पितृसत्तात्मक सोच आज भी कई मामलों में वैसी ही दिखाई पड़ती है…
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तीसरी घंटी
दलित रंगमंच का आदर्श वर्णवादी-व्यवस्था नहीं
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र मे कहा गया है कि प्रेक्षागृह में यदि चारों वर्ण मसलन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र उपस्थित न हों तो नाट्य की प्राथमिक शर्त पूरी नहीं होगी। नाटक में वर्णवादी व्यवस्था के इस स्वरुप को हिन्दी…
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मुद्दा
सत्ता की पक्षधरता और साहित्यकारों के लेखन पर अविश्वास का संकट
यह कथन आमतौर पर प्रचलित है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और वह हर काल में राजनीति को दिशा प्रदान करता है| राजनीति को दिशा प्रदान करने का आशय ही यही है कि जहाँ भी राजनीति लोकहित…
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