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आवरण कथाशख्सियत

लोहिया की प्रासंगिकता

 

डॉ. राममनोहर लोहिया ( 23 मार्च 1910 – 12 अक्टूबर 1967) की 57 बरस की जीवन-यात्रा देश और दुनिया में स्वतन्त्रता, न्याय, लोकतन्त्र, समता और सम्पन्नता की एकजुटता के लिए सम्पूर्ण समर्पण की रोमांचक महागाथा है। उनका जीवन निराशा के कर्तव्य के दर्शन, इतिहास-चक्र के सिद्धांत और सप्त-क्रान्ति के कार्यक्रमों से प्रेरित था। लेकिन 1967 में देहांत समाजवादी पार्टी के 1977 में विसर्जन के अनेकों दशकों बाद लोहिया की प्रासंगिकता के क्या कारण हैं ? आइये इस पर चर्चा करें।

लोहिया की दृष्टि और समाजविज्ञान:

लोहिया विचार का दार्शनिक आधार उन्हें ईशावास्योपनिषद, अस्तित्ववाद  और गाँधी के कर्तव्य-केन्द्रित (न कि फल और अधिकार-उन्मुख) जीवन दर्शन से अनेक स्तरों पर जोड़ता है।लोहिया की जातिव्यवस्था की व्याख्या और भारत के सामाजिक परिवर्तन की कुछ गूँज साठोत्तरी भारतीय समाज-वैज्ञानिकों के अध्ययनों में सुनाई पड़ती है। नयी दुनिया बनाने में घटती प्रतिबद्धता, राष्ट्रीय एकता की जरूरतों की उपेक्षा, खेती की बजाय उद्योगीकरण को प्राथामिकत का रहस्य, नियोजन के बावजूद दरिद्रता की व्यापकता, शिक्षा में समानता के अभाव का कारण, सामान नागरिक अधिकारों के बावजूद सभी महिलाओं का दोयम स्तर का जीवन, भाषा की राजनीति, अंग्रेजी के ज़रिये एक विशिष्ट वर्ग के वर्चस्व की निरन्तरता, ग्रामीण समाज में प्रभु जातियों का बढ़ता महत्व, लोकतन्त्र के बावजूद साम्प्रदायिकता का राजनीतिकरण, सतही आधुनिकीकरण और उत्तर-औपनिवेशिक राज्यसत्ता के प्रति अत्यधिक लगाव जैसे प्रसंगों में लोहिया ने ध्यान आकर्षित किया है।

यह भी दिलचस्प रहा कि सत्तर के दशक में नव-वामपन्थी रुझहान वाले आंद्रे गुन्नर फ्रैंक की लैटिन अमरिका पर केन्द्रित किताबें (अंडर-डेवलपमेंट ऑफ़ डेवलपमेंट (1974), समीर अमीन द्वारा विश्व-पूँजी संचय का अध्ययन (एक्यूम्लेशन ऑन वर्ल्ड स्केल (1970) और जिओवानी आरिघी की साम्राज्यवाद की समीक्षा (ज्योमेट्री ऑफ़ इम्पेरियलिज्म (1978) ने लोहिया द्वारा मार्क्स की मुख्य स्थापनाओं पर उठाई शंकाओं की अनजाने में ही पुष्टि कर दी थी।

इसी तरह मार्क्सवादी इतिहासकार एरिक हाब्सबाम की 19वीं शताब्दी पर लिखी तीनो किताबों – एज ऑफ़ रिवोलूशन(1962), एज ऑफ़ कैपिटल (1978) और एज ऑफ़ एम्पायर (1987) का भी उल्लेख जरुरी है। क्योंकि इस धारा के कुछ इतिहासकारों द्वारा भी लोहिया के विश्लेषण में पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के बारे में प्रस्तुत निष्कर्षों की दिशा में कदम उठाने का संकेत मिलता है।

‘विश्व-व्यवस्था विमर्श’ (‘वर्ल्ड-सिस्टम अप्रोच’) के सिद्धांतकार इमानुएल वालर्स्ताइन द्वारा1974 और 1989 के बीच चार खण्डों में प्रस्तुत समकालीन पूँजीवादी खेती के जरिये एक नयी विश्व-व्यवस्था के निर्माण और परिवर्तन की महाकथा सामने लायी गयी। इसके मूल में एक वैश्विक श्रम-विभाजन के जरिये 16 वीं शताब्दी से बन रहे साम्राज्यवाद आधारित शोषण-तन्त्र और समूची दुनिया में यूरोप के ‘विस्तार’ का सच था।

जब यह सब पूरे विस्तार से सामने आया तो लोहिया द्वारा ‘इतिहास-चक्र’ पुस्तक में प्रस्तुत सभ्यताओं के उत्थान-पतन के विश्लेषण को नयी प्रासंगिकता मिली है। ‘यूरोप-केन्द्रित’ समाज-विज्ञान बेपरदा हो गया। ‘प्रगति’ का यूरोप आधारित विमर्श अर्ध-सत्य सिद्ध हुआ है। सभी यूरोप-केन्द्रित विचारधाराओं का मोह घटना शुरू हो गया है। ‘केंद्र’ और ‘परिधि’ के रूप में संगठित विषमतापूर्ण विश्वव्यवस्था और यूरोपीय केंद्र (पहले पुर्तगाल-स्पेन फिर ब्रिटेन-फ़्रांस) और अमरीकी (संयुक्त राज्य अमरीका) – एशियाई (चीन) परिधि के बीच स्थानों के अदल-बदल के रहस्यमय संसार का भेद खुला।

लोहिया की भाषानीति और उत्तर-औपनिवेशिक अस्मिता विमर्श:

इसीके समांतर भाषा अध्ययन और साहित्य-संसार में ‘उत्तर-उपनिवेशवाद’ पुष्पित-पल्लवित होने लगा। इसमें फ्रान्ज़ फैनन (अल्जीरिया) और सी। एल। आर। जेम्स (केरीबियन द्वीप समूह) से लेकर चिनुआ अचेबे (नाईजेरिया) और नूगी वा थिओंगो (केनिया) ने अलग अलग प्रकार का योगदान किया। अंतोनियो ग्राम्सी (इटली), मिशेल फूको (फ़्रांस) और एडवर्ड सईद (फिलिस्तीन) द्वारा क्रमश: ‘वर्चस्व और प्रभुत्व’ के सांस्कृतिक आधारों, ज्ञान-विमर्श में निहित शक्ति , और ‘प्राच्यवाद’ (‘ओरिएन्टलिज्म’) के यूरोपकेंद्रित निहितार्थ को पहले ही दो-टूक शैली में सामने रखा जा चुका था। भारत में भी भाषा-स्वराज के अधूरेपन के भयानक सच को गणेश देवी जैसे विशेषज्ञों ने रेखांकित किया।

‘60 के दशक में डॉ. लोहिया द्वारा प्रवर्तित भाषा-विमर्शदेशी साहित्यकारों के बीच राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान गाँधी द्वारा प्रवाहित स्वराज-धारा की नयी लहर के रूप में पहचाना जा चुका था। अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन में विद्यार्थियों और शिक्षकों के साथ ही साहित्यकार भी उतरे। लेकिन अब अफ्रिका से ‘नव-उपनिवेशवाद’ और ‘मानसिक गुलामी’ के खिलाफ आ रही आवाज का तकाज़ा है कि लोहिया को स्वतन्त्र भारत के ‘विऔपनिवेशीकरण’ के प्रथम नायक के रूप में भी पहचाना जाए। यह काम लोहिया की किताब ‘भाषा’(1963) के नए संस्करण और विश्लेषण से शुरू होना ही चाहिए।

दूसरे शब्दों में, बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लोहिया द्वारा प्रस्तुत ‘इतिहास चक्र’, ‘मार्क्स, गाँधी एंड सोशलिज्म’,’भारत, चीन और उत्तरी सीमाएं’, ‘जाति-प्रथा’, भाषा आदि से जुड़े दृष्टिकोण को इक्कीसवीं सदी के उत्तरार्ध में नयी महत्ता मिली है। लोहिया के पुनर्पाठ का सिलसिला बनाने का समय आ गया है।

लोहिया के चिन्तन में निहित क्रान्तिकारिता :

लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा 1975-’77 के जन-आन्दोलन में यह समझाना कि ‘मेरी सम्पूर्ण-क्रान्ति और लोहिया की सप्त-क्रान्ति एक ही हैं’ लोहिया के सपनों की प्रासंगिकता का एक प्रबल प्रमाण माना जाता है। दरिद्रता, अभाव व विषमता की एकजुटता और मानवता के बीच के परस्पर-विरोधी रिश्तों को ही लोहिया ने पूँजीवाद-साम्राज्यवाद के जुड़वांपन का महादोष माना था। अब यही बात प्रकारांतर से अमर्त्य सेन, ज्यां द्रेज और जोसेफ स्तिग्लित्ज़ से लेकर अभिजीत बनर्जी और इश्तर दुफ्लो ने अपने आर्थिक शोधकार्य से समझाया है।

इस प्रकार लोहिया की विचार-यात्रा के यह तीनों पहलू समय की कसौटी पर अभी भी नि:संदेह खरे हैं। इस सन्दर्भ में भारत समेत संयुक्त राष्ट्रसंघ के सभी सदस्य-राष्ट्रों द्वारा 1915 – ’30 की अवधि के लिए अपनाए गये 17 सूत्रीय ‘टिकाऊ प्रगति’ (सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स) के लक्ष्यों और लोहिया के सपनों की तुलना भी अप्रासंगिक नहीं होगी।

उन्होंने अपनी समूची ज़िन्दगी अन्याय के निरन्तर प्रतिकार के लिए लगाई। उनकी दृष्टि में दुनिया को स्थायी तौर पर बेहतर बनाने के लिए फावड़ा (रचनात्मक कार्यक्रम), जेल (अहिंसक आन्दोलन) और वोट (लोकतांत्रिक सत्ता-व्यवस्था) का देश-काल-पात्र अनुकूल समन्वय सही पद्धति होनी चाहिए। देश से दरिद्रता उन्मूलन, वंचनाओं की समाप्ति, और भेदभाव पर लगाम उनका सपना था। इसके लिए उन्होंने लोकतांत्रीकरण, विकास और विऔपनिवेशीकरण की त्रिवेणी को प्रवाहमान करने के लिए जन-राजनीति का मार्ग चुना। उनका मानना था कि ‘ज़िंदा कौमें पाँच साल इंतज़ार नहीं करतीं’। वह भारत के अतीत के प्रति आदर और आलोचना दोनों भाव रखते थे। दुनिया और देश के भविष्य को स्वतन्त्रता, न्याय और प्रगति के जरिये बेहतर बनाने के लिए तो प्रतिबद्ध ही थे।

लोहिया का विश्व-बंधुत्व:

लोहिया को देश और दुनिया के हर हिस्से में हो रहे अन्यायों से पीड़ा होती थी। उनके जीवन का अधिकाँश भाग पहले भारत को स्वराज दिलाने फिर भारत के नवनिर्माण के लिए सही नीतियों को अपनाने से जुड़े आन्दोलनों और संघर्षों में लगा। इसके बावजूद उन्होंने तिब्बत की कम्युनिष्ट चीन से आज़ादी और नेपाल की राणाशाही से मुक्ति से लेकर अमरीका की रंगभेद से मुक्ति और जर्मनी, कोरिया, वियतनाम और हिन्दुस्तान के बंटवारे के खात्मे के लिए ठोस योगदान किये।

एक भारतीय के रूप में उनकी यहप्रार्थना थी कि ‘ हे भारतमाता! हमें राम की मर्यादा, कृष्ण का उन्मुक्त ह्रदय और शिव का मस्तिष्क प्रदान करो।’। इसी क्रम में उन्होंने भारत के स्त्री-पुरुषों से सावित्री की बजाय द्रौपदी को आदर्श मानने की भी आशा की। उन्होंने ‘मार्क्स, गाँधी और समाजवाद’ के त्रिकोण को बुनियादी महत्त्व का बताया था और 21वीं में संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा घोषित 17 सूत्री ‘स्थायी विकास कार्यक्रम’ में मार्क्स और गाँधी के सूत्रों की प्रतिध्वनियाँ हैं। वैसे भी ‘भोगवादी भूमंडलीकरण’ और लंगोटिया पूँजीवाद (‘क्रोनी कैपिटलिज्म’) की चौतरफा विफलता के बाद मार्क्स, गाँधी और समाजवाद के संबंधों की नयी समझ की जरूरत हो गयी है। इसीलिए लोहिया के कई तात्कालिक कार्यक्रमों और सुझावों को किनारे रखते हुए उनके दीर्घकालीन सूत्रों और सुझावों को जानने – जीने की जरूरत है।

भारत के बारे में लोहिया की समझ:

डॉ. लोहिया की भारत के अतीत और वर्तमान की अलग समझ थी। वह भारत को दुनिया के सबसे अन्यायग्रस्त और उदास लोगों का देश बताते थे और इस दशा को बदलने के लिए सबमें बेचैनी का फैलाव चाहते थे। उनका मानना था कि मानव सभ्यता की अबतक की कथा में भारत कम से कम दो बार विश्व में सर्वश्रेष्ठता का सम्मान प्राप्त कर चुका है। लेकिन उन्होंने भारत के इतिहास में पिछले 8 सौ बरसों में हुए विदेशी हमलों के आगे कई बार पराजित होने के शर्मनाक सच को भी बराबर अपने सामने रखा और इसके लिए शासक वर्ग की फूट की बजाय जातिप्रथा के कारण देश में फैली व्यापक उदासीनता को समाज का मूल दोष मानते थे।

स्त्री पर लगाई गयी बंदिशों और जातिगत विषमता के दो कटघरों में कैद समाज-व्यवस्था को नर-नारी समता और जाति-तोड़ो के दुहरे आन्दोलनों से दुरुस्त करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने राष्ट्र-निर्माण की बुनियादी जरूरत के रूप में ‘जाति-तोड़ो’ का अभियान चलाया। इसके लिए ‘पिछड़ों को विशेष अवसर’ के सिद्धांत का प्रचार किया। इसका एक अंश दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए शिक्षा, सरकारी नौकरी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण के रूप में प्रचलित भी हुआ है। लोहिया ने राजनीतिक स्वराज के बाद देश में नवजीवन के उल्लास के लिए दलितों, आदिवासियों, पिछड़ी जातियों और मुसलमानों के पसमांदा समुदायों के साथ पूरे भारत की सभी महिलाओं को विशेष अवसर का अधिकारी बताया। इस मायने में लोहिया का सामाजिक नव-निर्माण का सपना अभी तक अधूरा है। इसे पूरा करना नयी पीढ़ी के युवक-युवतियों की जिम्मेदारी है।

लोहिया को हमारे सामाजिक मनोविज्ञान के बारे में इस बात का अफ़सोस था कि भारतीय समाज में जिनको अन्यायों से मुक्ति के लिए लड़ना चाहिए उन स्त्री-पुरुषों में चौतरफा निराशा के कारण इसकी क्षमता नहीं बची है। दूसरी ओर, जिनमें प्रतिरोध और परिवर्तन की शक्ति है उन वर्गों में बदलाव के आन्दोलनों के प्रति दिलचस्पी नहीं है। लेकिन वह इस सच  को भी फैलाते रहे कि बीसवीं सदी में क्रूरता और बेरहमी के बावजूद पहली बार एक साथ सात क्रान्तियों का फैलाव हो रहा है। इसलिए मानव समाज में न्याय और समता के सूरज के उदय को रोकना परिवर्तन-विरोधी ताकतों के बूते की बात नहीं होगी।

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यह याद रखना जरुरी है कि डॉ. राममनोहर लोहिया की स्वाधीनोत्तर राजनीति राष्ट्रनिर्माण की नीतियों से बने एक चतुर्भुज पर आधारित थी – जाति नीति (जाति तोड़ो और नर-नारी समता हो), भाषा नीति (अंग्रेजी हटाओ, देशी भाषा चलाओ), दाम नीति (दाम बांधो, खर्च पर सीमा हो) और रक्षा नीति (हिमालय बचाओ व् हिन्द-पाक महासंघ बनाओ)। मानसिक स्वराज के लिए लार्ड मैकाले के समय से कायम अंग्रेजी के वर्चस्व को चुनौती देते हुए भारत की सभी देशी भाषाओँ को विधायिका, प्रशासन, न्यायपालिका, शिक्षा और संचार-तन्त्र में प्रमुखता के लिए सत्याग्रह और आन्दोलन चलाया। लोकसभा में स्वयं कभी अंग्रेजी का उपयोग नहीं किया। हिन्दी में बोले। एकबार बांगला का इस्तेमाल किया। अपने सहयोगी जे. एच. पटेल के जरिये कन्नड़ में पहला भाषण कराकर संसद में देशी भाषाओं के उपयोग की व्यवस्था शुरू कराई।

हिन्दू-मुसलमान सद्भाव को भारतीयता की मुख्य कसौटी मानते हुए मुसलामानों में देशी-विदेशी के अंतर की पहचान के आग्रही थे। वह रज़िया, शेरशाह, जायसी और रसखान को अपना पुरखा मानते थे और बाबर, गज़नी और गोरी को विदेशी लुटेरे के रूप में पहचानने पर जोर देते थे। लोहिया को भारत के साम्राज्यवादी विभाजन का गहरा अफ़सोस था और वह हिन्दू-मुसलमान संबंधों में बेहतरी के ज़रिये भारत-पाक महासंघ का सपना देखते थे।

वह साम्यवादी चीन के विस्तारवाद के प्रबल  आलोचक और हिमालय बचाओ आन्दोलन के प्रवर्तक तथा तिब्बत की आज़ादी के समर्थक थे। एक समाजवादी के रूप में उन्होंने सोवियत संघ में स्टालिन और जर्मनी में हिटलर के लोकतन्त्र-विरोधी सत्ता-सञ्चालन और अत्याचारों की निंदा की। अमरीकी पूँजीवाद और रुसी साम्यवाद को एक ही सिक्के का दो पहलू बताया और दोनों को समूची स्वाधीनोत्तर दुनिया के लिए गलत बताया।

विदेशी शासन और स्वदेशी शासकों के दोषों के खिलाफ लगातार जूझते हुए उन्होंने स्वाधीन भारत के लोक-मानस के स्मृति-संसार में अनूठा स्थान बनाया है। फिर भी उनके बारे में देश-विदेश में आधी-अधूरी जानकारियों का बोलबाला रहा है। इसलिए लोहिया-कथा की परत-दर-परत स्पष्टता की जरुरत है।

लोहिया की जीवनयात्रा के कुछ ख़ास पहलू:

डॉ. लोहिया के चिन्तन और कर्म में स्वराज, लोकतन्त्र, समता और प्रगतिशील परिवर्तनों का संगम था। वह अपने दौर के सर्वाधिक सुशिक्षित व्यक्ति थे। संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, बांगला, मराठी, गुजराती, और तेलुगु जैसी देशी भाषाओं और अंग्रेजी, जर्मन और फ्रेंच जैसी विदेशी भाषाओं के जानकार थे। अर्थशास्त्र, दर्शन, इतिहास, पारंपरिक और आधुनिक साहित्य, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और राजनीतिशास्त्र का देश-विदेश के श्रेष्ठ विद्या-संस्थानों में उच्च अध्ययन किया था।वह राष्ट्रीय आन्दोलन की गाँधी-नेहरु-सुभाष परम्परा से जुड़ी काँग्रेस समाजवादी धारा के नायक मण्डल के सबसे कम उम्र के सदस्य थे। उन्हें अपने सपनों के लिए ब्रिटिश राज, पुर्तगाली शासन, नेपाली राणाशाही, अमरीकी सरकार, और काँग्रेस सरकार द्वारा गिरफ्तारी झेलनी पड़ी।

फिर भी उनको अपने जीवनकाल मे कई प्रकार के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा :
1) विदेशी और देशी सत्ता-व्यवस्था
2) पूँजीवादी और साम्यवादी विचार अनुयायियों
3) समाजवादी आन्दोलन और संगठन के परम्परावादी तत्व
4) पश्चिम-उन्मुख विद्या-प्रतिष्ठान
5) अंग्रेजी वर्चस्व से उपजे मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों
 6) साम्प्रदायिक और जातिवादी तत्वों ने हमेशा असुविधाजनक माना। खतरा महसूस किया। लगातार निशाने पर रखा। अफवाहों का शिकार बनाया।

सिर्फ यही संतोष की बात कही जा सकती है कि देशभर में अनेकों  सृजनशील साहित्यकारों और समाजसुधारकों ने उनको प्रेरणा स्त्रोत के रूप में स्वीकारा। इसीलिए कन्नड़ के यू। आर। अनंतमूर्ति और असमिया के बीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य से लेकर हिन्दी के विजयदेव नारायण साही, लक्ष्मीकाँत वर्मा, रघुवीर सहाय और कमलेश तक लोहिया के सोच और सपनों से अनुप्राणित हुए। इसी प्रकार आज़ादी के बाद के किसान आन्दोलन, श्रमिक आन्दोलन, महिला आन्दोलन, विद्यार्थी आन्दोलन, दलित आन्दोलन, आदिवासी आन्दोलन, भाषा आन्दोलन, नागरिक अधिकार आन्दोलन और हिमालय बचाओ आन्दोलन की नींव में लोहिया का बौद्धिक और राजनैतिक योगदान उल्लेखनीय है। वह गाँधी और जयप्रकाश के साथ जोड़ के याद किये जाते हैं। चिन्तन, संगठन और कर्म की गाँधी-लोहिया-जयप्रकाश की एक धारा बन गयी है।

लोहिया के बारे में ऐसी अंतर्विरोधी प्रवृत्ति क्यों कायम हुई है? उनके अग्रज-तुल्य लोकनायक जयप्रकाश नारायण के अनुसार लोहिया की मौलिकता और कर्मठता बहुत आकर्षक थी। वह दूरदृष्टि सम्पन्न चिन्तक थे। लेकिन स्पष्टवादिता, साहस और अधीरता के कारण उनके बारे में आसानी से गलतफहमियां हो जाती थीं। उनके अनुज-तुल्य समाजवादी सहकर्मी मधु लिमये ने लिखा है कि लोहिया बहुत कोमल मन के व्यक्ति थे। लेकिन सार्वजनिक जीवन में कथनी-करनी में अंतर के प्रति गहरी वितृष्णा थी।राजनीतिक स्वार्थों के लिए सिद्धांतों की तोड़-मरोड़ करनेवालों के बारे में वह कोई नरमी नहीं बरतते थे। सभी रिश्ते हमेशा के लिए तोड़ देते थे। इस प्रवृत्ति से उनके परिचितों में प्रशंसकों से जादा आलोचक बनते चले गये। हाल में प्रकाशित ‘लोहिया के पत्र रमामित्र के नाम’ पुस्तक में 100 से जादा आत्मीय चिट्ठियों में लोहिया के मन-दर्पण की ऐसी ही झलक सामने भी आई है।

लोहिया बनाम लोहिया:

इस बारे में डॉ. लोहिया ने भी पाँच प्रकार का योगदान किया था। एक तो उन्होने बौद्धिक ईमानदारी के तकाज़े के तौर पर उन्होंने कार्ल मार्क्स को यूरोप का महान ऋषि बताया। उनके अनुसार मार्क्सवाद में बदलाव के लिए उत्साह पैदा करने की क्षमता है। इसी तरह उनकी दृष्टि में परमाणु बम और महात्मा गाँधी आधुनिक दुनिया में सामान महत्त्व की घटना मानते थे। गाँधी ने मानवता को सत्याग्रह के रूप में परमाणु बम के मुकाबले का अस्त्र दिया है। लेकिन फिर भी स्वयं को ‘न मार्क्सवादी, न मार्क्स-विरोधी और न गाँधीवादी न गाँधी-विरोधी’ घोषित किया। इसलिए मार्क्सवादी और मार्क्स-विरोधी तथा गाँधीवादी और गाँधी-विरोधी के रूप में अस्तित्वमान कई प्रबल विचार–समूहों, आन्दोलनों और संगठनों ने अपने अनुयायियों को लोहिया से अपरिचित रखा।

दूसरे, विदेशी शासन से मुक्ति का नेतृत्व करने के बावजूद स्वराज के बाद  को देश को ‘मिश्रित अर्थ-व्यवस्था’ की गलत दिशा में ले जाने के लिए नेहरु शासन की डॉ. लोहिया द्वारा लगातार आलोचना के कारण नेहरु-भक्तों ने उन्हें मरने के बाद भी निंदा का निशाना बनाया।

तीसरे, देश में मानसिक स्वराज की स्थापना के लिए भाषा का प्रश्न उठाया। इससे भारतीय शासक वर्ग ने उन्हें ‘अंग्रेजी विरोधी’ और दक्षिण भारत के क्षेत्रीय दलों ने ‘हिन्दी साम्राज्यवाद का नायक’ कर्रार दिया।

चौथे, उन्होंने ‘जाति तोड़ो’ के कार्यक्रम चलाकर समूचे प्रभुजाति तन्त्र को अपना दुश्मन बना लिया। आज भी अनेकों कोनों में लोहिया को भारत में ‘जाति का जहर’ फैलाने का दोषी बताया जाता है।

पाँचवा तथ्य देश की महिलाओं के साथ जारी अन्यायों के खिलाफ उनकी दृष्टि से जुड़ा था। वह वायदाखिलाफी और बलात्कार के सिवाय मर्द-औरत के बीच के हर रिश्ते को जायज मानते थे। पुरुषों ने इसे स्त्रियों के स्वेछाचार की वकालत बताया। उन्होंने सभी के लिए सामान नागरिक संहिता की माँग की जिससे बहुपत्नी प्रथा की स्त्री-विरोधी परम्परा ख़तम हो। इसे कुछ कट्टरपन्थी मुसलमानों ने कुरआन-विरोधी और इस्लाम विरोधी बताकर चुनाव तक में लोहिया का विरोध किया। इससे न सिर्फ समाजवादी उम्मीदवारों के वोट कम हुए बल्कि स्वयं डॉ. लोहिया 1967 में लोकसभा का चुनाव हारते-हारते बचे।

छठें, भारत की बढती दुर्दशा और चौतरफा खतरों से रक्षा के लिए लोहिया ने 1964-67 में गैर-काँग्रेसवाद की रणनीति प्रस्तुत की। इससे 1967 के आम-चुनाव में ‘काँग्रेस-हटाओ देश-बचाओ’ की लहर चली और काँग्रेस का सत्ता-एकाधिकार समाप्त हुआ। नेहरु भक्तों और काँग्रेस समर्थकों की निगाह में यह लोहिया का ‘अक्षम्य अपराध’ था। काँग्रेस और कम्युनिस्ट समूहों में उनको भारत में परिवर्तन की राजनीति के बहाने साम्प्रदायिकता की राजनीति को पनपाने का दोषी बताया जाता है।

लोहिया की पीड़ा :

यह सब अर्धसत्य आधारित प्रचार था। फिर भी इस सबसे लोहिया का कम नुकसान नहीं हुआ। उनके बारे में गलतफहमियाँ फैलाई गयी। उनकी अनसुनी की गयी। उनका अकेलापन और उतावलापन बढ़ा। उनको इसका बेहद अफ़सोस भी था। इसीलिए उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन को ‘असफलताओं का सिलसिला’ कहा। उनकी यह आत्मस्वीकृति तो बेहद दु:खद थी कि ‘लोग मेरी बात सुनेंगे ज़रूर, लेकिन शायद मेरे मरने के बाद!’।

लोहिया जैसे दूरदर्शी और नि:स्वार्थ समाजहित-साधक की अनसुनी करने के नफा-नुकसान का हिसाब भविष्य के इतिहासकार ही करेंगे। लेकिन यह स्पष्ट है कि मार्क्सवादी, मार्क्सविरोधी, गाँधीवादी और गाँधीविरोधी समूहों में कार्यरत व्यक्तियों को लोहिया से दूरी बनाने से कोई लाभ नहीं हुआ है। यह सभी नर-नारी समता की चुनौती, जाति-विमर्श, विश्वव्यापी पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के प्रतिरोध, भाषा स्वराज, राष्ट्रीय नव-निर्माण और दुनिया की न्यायपूर्ण नव-रचना के सन्दर्भों में लोहिया-दृष्टि में निहित प्रकाश से वंचित रहे।

लोहिया का ‘विजय-पर्व’ :

फिर भी यह कम महत्व की बात नहीं है कि ऐसे लोहिया-विरोधी कोलाहल के बीच भी लोहिया की दृष्टि और दिशा के प्रति रुझहान क्रमश: बढ़ा। इसमें उनके दौरों, आन्दोलनों और गिरफ्तारियों का योगदान था। देश भर में फैले उनके सैकड़ों साहसी सहयोगियों का संबल था। वैचारिक स्तर पर बद्रीविशाल पित्ती द्वारा प्रकाशित लोहिया साहित्य मददगार रहा। अपने कुल 57 बरस की जीवनयात्रा के अन्तिम वर्षों में 53 से  57 बरस की उम्र के बीच बेहद प्रभावशाली सिद्ध हुए।

1963 में लोहिया काँग्रेस की किलेबन्दी को ढहाकर नेहरु जी के जीवनकाल में ही जनता के बहुमत की पसन्द बनकर संसद में पहुंचे और कुछ ही महीनों में परिवर्तन की राजनीति के सूत्रधार बने। पुराने सम्बन्धों के टूटे तार जोड़ने में जुटे। पटना में जयप्रकाश नारायण और चेन्नई में राजगोपालाचारी से लेकर काँग्रेस के भोला पासवान शास्त्री और केशवदेव मालवीय, भारत सुरक्षा अधिनियम में बन्दी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट नेता ए. के. गोपालन, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के एस. एम. जोशी और कर्पूरी ठाकुर, भारतीय जनसंघ के दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख और गोहत्या के लिए आमरण अनशन कर रहे प्रभुदत्त ब्रह्मचारी से बातचीत की।

तिब्बती स्वराज संघर्ष, नेपाली लोकतांत्रिक आन्दोलन, पख्तूनिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान की अस्मिता की लड़ाई, अमरीका में रंगभेद विरोध, रूस के महानायक स्टालिन की बेटी स्वेतलाना के लिए मदद के लिए देश की संसद के मंच को सुलभ कराया। स्वयं काबुल जाकर देश के बंटवारे के बाद से लगातार नजरबन्दी और निर्वासन का कष्ट सह रहे खान अब्दुल गफ्फार खान से भेंट की। सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप की यात्रा की।

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यह सब विस्तार से ‘लोकसभा में लोहिया’ के 16 खण्डों में प्रकाशित हो चुका है। उनसे परिचित होने में इंदुमती केलकर रचित लोहिया-जीवनी बेहद उपयोगी रचना सिद्ध हुई है। इसी प्रकार उनके निधन के तीन दशक बाद ही सही, लेकिन समाजवादी विचारक  मस्तराम कपूर द्वारा हिन्दी और अंग्रेजी में 9 खण्डों में संपादित लोहिया रचनावली भी एक स्थायी स्त्रोत के रूप में उपलब्ध है।  हिन्दी रचनाकार गिरिराज किशोर द्वारा संपादित ‘लोहिया के सौ बरस’ और के. विक्रम राव और प्रदीप सिंह द्वारा संयोजित ‘लोहिया संचयिता’ लोहिया की दुनिया में प्रवेश के लिए उपयोगी संकलन हैं। इससे लोहिया को समझने के लिए ‘लोहियावादियों’ के चश्मों की अनिवार्यता नहीं रही। लोहिया को अपने अनुयायियों के पाप-पुन्य से छुटकारा मिला है।

हर मौलिक चिन्तक और क्रान्तिकारी समाज नायक की तरह लोहिया की विरासत के भी अबतक की आधी शताब्दी में कई दावेदार हुए। लोहियावादियों ने उनके दर्शन, सिद्धान्तों और कार्यक्रमों का अपनी-अपनी सुविधा से आधा-अधूरा अनुकरण किया। नि:स्संदेह इससे लोहिया की छबि धुंधली हुई है। लेकिन लोहिया की स्मृति की निरन्तरता के पीछे उनके विचारों, संघर्षों और सपनों का योगदान है। उनके अधिकाँश विचार और आन्दोलन देश-दुनिया की कई मूल समस्याओं और दीर्घकालीन चुनौतियों से जुड़े थे। इसलिए देश-काल-व्यक्ति की सीमाओं के आगे भी उनकी आभा बनी हुई है।

बनारस, मुम्बई, कोलकाता और बर्लिन में सुशिक्षित डॉ. लोहिया ने कंचन-कामिनी-कुर्सी-कामयाबी के मायावी चतुर्भुज से निर्लिप्त कर्मयोगी का जीवन अपनाया था। इसीलिए देश-दुनिया की बेहतरी के लिए मौलिक चिन्तन और अनूठे आन्दोलनोंका आकर्षक संगमबनकर जिए लोहिया के बारे में कई विशेषणों का इस्तेमाल किया जाता है : तेजस्वी स्वतन्त्रता सेनानी; ‘भारत छोडो आन्दोलन’ के साहसी नायक; ‘गोवा के गाँधी’; नेपाली लोकतन्त्र के मन्त्रदाता; सिक्किम सहयोगी; मणिपुर मित्र; ‘हिमालय बचाओ-तिब्बत बचाओ’ के आवाहक; ‘अंग्रेजी हटाओ’ के नायक; ‘जाति-तोड़ो’ के सिद्धांतकार; नर-नारी समता के पक्षधर; ‘दाम-बांधो’ के अर्थशास्त्री; हिन्द-पाक महासंघ के पथ-प्रदर्शक; रामायण मेला के आयोजक; ‘काँग्रेस हटाओ’ के रणनीतिकार; सत्याग्रही समाजवाद के महासाधक;भारतमाता के पुजारी; धरतीमाता के सुपुत्र; वसुधैव कुटुम्बकम के प्रकाश-स्तम्भ!

बेहतर दुनिया के लिए लोहिया सूत्र – सप्तक्रान्ति :

कई कारणों से अब 21वीं सदी आधे अधूरे वैश्वीकरण के दलदल में फंस गयी है। आर्थिक राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक असहिष्णुता, धार्मिक कट्टरता, राजनीतिक दबंगई और असुरक्षित भविष्य ने मिलकर वैश्वीकरण की चमक ख़तम कर दी है। वैश्वीकरण की नांव बाजारीकरण और भोगवाद की दो पतवारों के जरिये तैर रही थी और लेकिन बढती गैर-बराबरी और नाइंसाफी के थपेड़ों से दोनों पतवारें टूट गयी हैं। इसलिए वैश्वीकरण की नैया जन-असंतोष के तूफ़ान में फंसती जा रही है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के विशेषज्ञों से लेकर पर्यावरण आन्दोलन के संगठनों के बीच यह निराशाजनक सहमति बन रही है कि बिना बुनियादी बदलावों के शीघ्र ही इस धरती पर मानव-समाज का कोई भविष्य नहीं रहेगा।

इस चिंताजनक सन्दर्भ में देश-दुनिया की बेहतरी के लिए लोहिया के बताये कई समाधानों में से सप्तक्रान्ति की प्रासंगिकता लगातार बढ़ती जा रही है। उनकी दृष्टि में संसार में सात क्रान्तियाँ एकसाथ चल रही हैं और अपने देश में भी उनके एकसाथ चलने की कोशिश करनी चाहिए। जितने लोगों को भी क्रान्ति पकड़ आई हो उसके पीछे पद जाना चाहिए और बढ़ाना चाहिए:
1. नर-नारी की समानता के लिए;

  1. चमड़ी के रंग पर रची राजकीय, आर्थिक और दिमागी असमानता के विरुद्ध;
  2. जन्म-आधारित गैरबराबरियों से बनी जातिप्रथा के खिलाफ और पिछड़ों को विशेष अवसर के लिए;
  3. परदेसी गुलामी के खिलाफ और स्वतन्त्रता तथा विश्व-लोकराज्य के लिए;
  4. निजी पूँजी की विषमताओं के खिलाफ और आर्थिक समानता के लिए तथा योजना के द्वारा पैदावार बढ़ने के लिए;
  5. निजी जीवन में अन्यायी हस्तक्षेप के खिलाफ और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए; तथा
  6. हथियारों के खिलाफ और सत्याग्रह के लिए।

अन्तिम प्रश्न :

यह महामन्त्र दुनिया को सँभालने–संवारने के लिए उपयोगी दीखता है। क्योंकि इससे विविधतापूर्ण मनुष्य-परिवार के सरोकारी स्त्री-पुरुषों की उद्देश्यपूर्ण एकजुटता का जनपथ बनाना कठिन नहीं होगा। इसीलिए लोहिया की गाँधी और जे. पी. के साथ सिद्धांतो और कार्यपद्धति की एकजुटता स्वीकारी जा चुकी है। इससे मार्टिन लूथर किंग से लेकर नेल्सन मंडेला और दलाई लामा के अपनाए मूल्यों और आदर्शों के प्रति आकर्षित व्यक्तियों और आन्दोलनों से संवाद भी सहज होगा। लेकिन यह जरुर देखना होगा कि लोहिया और इक्कीसवीं सदी की दुनिया की, विशेषकर नयी पीढ़ी की, निकटता कैसे पैदा होती है? क्योंकि सत्ता की राजनीति में लोहिया अपने जीवन-काल में भी सीमित उपयोग के साबित हुए थे और सत्याग्रह के जरिये बेहतर दुनिया बनाने की राह मेहनत, त्याग और धीरज माँगती है।

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