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लोकतन्त्र है तो आजादी है

 

भारत की आजादी के 75वें साल में दो सवाल सबसे ज्वलंत हैं। पहला कि भारत को आजादी किससे मिली थी और दूसरा कि भारत कौन है। ये दो सवाल वैसे तो किसी भी देश की आजादी को महफूज रखने के लिए जरूरी हैं, मगर भारत में यह सवाल भारतवासियों ने आज खुद से नहीं पूछे तो आजादी की विरासत को संभालने में फिर शायद बहुत देर हो जाएगी।

भारत को आजादी किससे मिली थी का सरल उत्तर है अंग्रेजों से। मगर क्या वाकई भारत को आजादी सिर्फ अंग्रेजों से मिली थी? या फिर उसे अंग्रेजों से आजादी मिलने के साथ ही राजतन्त्र से भी आजादी मिली थी? इंग्लैंड की महारानी से ही नहीं, बल्कि सैंकड़ों राजा, महाराजाओं, बादशाहों, जमींदारों से भी आजादी मिली थी?

भारतवासियों को क्या राजाओं, बादशाहों की मनमर्जी और इंसान को इंसान नहीं मानने वाली बहुत सी रूढ़ियों और कम से कम राजनीतिक विषमता से भी आजादी नहीं मिली थी? आजादी की सबसे बड़ी देन थी एक व्यक्ति- एक वोट का सिद्धांत, चाहे वह व्यक्ति कितना भी अमीर या गरीब हो, चाहे किसी भी धार्मिक, जातिगत, लैंगिक, भाषायी समुदाय का सदस्य हो। उसके साथ ही मिला था संविधान सम्मत कानून का राज्य और हर भारतवासी को नागरिक के तौर पर में बहुत से अधिकार।

और अगर भारत को राजतन्त्र से आजादी नहीं मिली थी तो क्यों आजाद होने के बाद ही एक राजनीतिक प्रणाली के तौर पर राजतन्त्र की जगह पूरी तरह से लोकतन्त्र ने ले ली थी? क्यों हम तब से ही राजनीतिक रूप से जनता के, जनता के लिए और जनता के द्वारा लोकतन्त्र के रूप में खुद को जानने लगे? आजादी की बेला में क्या यह कोई पुराना ही भारत था, जिसे अंग्रेजों ने गुलाम बनाया था या फिर यह भारत द्वारा अंग्रेजों से और आत्म-संघर्ष करते हुए अपनी एक नई खोज थी और खुद की यात्रा का एक नया मुकाम था?

 

यह सवाल इसलिए पूछना जरूरी है कि कुछ सामाजिक-राजनीतिक धाराओं व लोगों को लगता है कि भारत का संविधान हमारे सैंकड़ों सालों के स्वतन्त्रता संग्राम से पैदा हुए मूल्यों से नहीं निकला है, बल्कि उसे नेताओं व बुद्धिजीवियों ने ऊपर से थोप दिया। आज यह दोहराना जरूरी है कि भारत के महान स्वतन्त्रता आंदोलन से जो सामंतवाद विरोधी और साम्राज्यवाद विरोधी मूल्य उपजे, उनको ही संविधान सभा ने गहन विचार-विमर्श कर संविधान के मूल्यों व अनुच्छेदों के रूप में रूपायित किया।

यह सवाल इसलिए भी अहम है कि भारत की आजादी में लोकतन्त्र का हासिल सिर्फ एक संयोग नहीं, बल्कि वह आजादी का इतना अनिवार्य हिस्सा है कि उसके बगैर भारत की आजादी रह ही नहीं जाएगी। यहीं दूसरा सवाल आ जुड़ता है कि भारत कौन है? भारत अगर महज जमीन का टुकड़ा नहीं है तो स्वाभाविक रूप से उत्तर है कि भारतवासी ही भारत है। भारत की आजादी भारतवासियों की आजादी है और भारतवासियों की आजादी की गारंटी लोकतन्त्र है।

इसलिए भारत में यदि लोकतन्त्र कमजोर होता है तो हमारी आजादी कमजोर होती है। आजादी और लोकतन्त्र इस अर्थ में दो अलग शै न होकर, एक ही बात के दो पहलू हैं। भारत ही नहीं, औपनिवेशिक जुए से आजाद होने वाले और भी बहुत से देशों ने आजादी के साथ ही जनता के अपने शासन यानी लोकतन्त्र को भी पाया था। फिर आजादी कोई एक बार मिल जाने वाली चीज नहीं है, जनता को इसे संभाले रखना होता है। वैश्विक कॉरपोरेट से बंधी कोई नितांत देसी तानाशाही इस आजादी को जनता से फिर छीन सकती है। श्रीलंका इतना दूर नहीं है कि यह सब हम नहीं देख पाएं।

यहाँ मैंने जानबूझकर तानाशाह की जगह तानाशाही कहा है। यदि लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर होती हैं तो तानाशाही की स्थिति बनती है। दुनिया में एक चलन बड़ी तेजी से उभरा है कि बहुसंख्यकवाद आजादी व उसे महफूज व स्थिर रखने वाली लोकतांत्रिक संस्थाओं को निगलने लगता है। सिंहली बहुसंख्यकवाद ने यह श्रीलंका में किया, तो इस्लामिक बहुसंख्यकवाद ने टर्की में। भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं भी हिंदू बहुसंख्यकवाद से जूझ रही हैं।

इन सब देशों में जातीयता या धर्म के नाम पर लोकतन्त्र के पूर्व की परंपराओं को बहुत उभारा जाता है, चाहे वे सामंतवादी परंपराएं हों या जाति वर्चस्व की अन्य रूढ़िवादी परंपराएं। इस विचार-रणनीति में लोकतन्त्र पूर्व के राजतन्त्र की खूबियों को उभारा जाता है, लोकतन्त्र पूर्व के इतिहास में पहुंच कर पक्ष और विपक्ष खड़े किए जाते हैं। मेरा राजा और तेरा बादशाह की लड़ाई में शामिल कर राजा या बादशाह की पालकी लोकतन्त्र में पले-बढ़े व्यक्ति के सिर पर रख दी जाती है। समता, न्याय और स्वतन्त्रता के लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति संदेह खड़ा करने के लिए यह बताया जाता है कि इनके चलते ही फलाने समुदाय को दबाने-कुचलने का काम नहीं हो पा रहा।

अपने ही देश के कुछ समुदायों के प्रति नफरत इस पैमाने पर उठा दी जाती है कि बहुसंख्यकों को लगने लगता है कि कानून का निष्पक्ष राज्य, नागरिक अधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता व कानून-सम्मतता ही खलनायक हैं। इसके भी अगले चरण में लगने लगता है कि इंसानियत, उदारता, सहिष्णुता, संवाद, सच्चाई जैसे मूल्य हमारी लड़ाई को कमजोर कर रहे हैं। तब आसानी से हुक्मरानों को लोकतन्त्र को कमजोर करने का लाइसेंस जनता से ही मिल जाता है। जैसा कि पिछले दशक में श्रीलंका में तमिलों के खिलाफ सिंहली बहुसंख्यक जनता के हाथों हुआ।

आज जनता को जनतन्त्र व संविधान की स्वतन्त्रता संग्राम की धरोहरों के प्रति शंकालु बनाने के लिए यह तर्क भी दिया जाता है कि पहले ही कौन सा कारगर लोकतन्त्र था। यह सही है कि भारत में बराबरी, स्वतन्त्रता व न्याय के मूल्य समाज के धरातल पर उतने मजबूत नहीं हो पाए, जितने कि वे संविधान के पन्नों पर हैं। इसलिए संविधान का सामाजिक- राजनीतिक धरातल पर अमल उतना लोकतांत्रिक नहीं हो पाया। मगर उस अमल को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने की जगह यह तर्क बहला-फुसला कर जनता को लोकतन्त्र से मुंह फेरने को उकसाता है। भारत में अपने सामंती अतीत के प्रति गैर-आलोचनात्मक अनुराग, एक तानाशाह द्वारा सबको डरा-धमका कर ठीक कर देने की सांस्कृतिक फंतासी आदि के चलते भी ऐसे तमाम लोकतन्त्र विरोधी तर्क काम करते हैं।

यह आजादी झूठी है, जैसा तथाकथित परिवर्तनवादी कोरस भी लोकतन्त्र के दावे को कमजोर करते रहे हैं। इसमें कोई शक होना ही नहीं चाहिए कि 1947 में हमें राजनीतिक आजादी मिली, जिससे एक व्यक्ति एक वोट का सिद्धांत, नागरिक अधिकार, संविधान सम्मत कानून का राज्य, टकराव की स्थिति में संवाद व समझौते का महत्त्व जैसे मूल्य उभरे। आजादी के आंदोलन की तार्किक निष्पत्ति भारतीय व्यक्ति की आजादी थी, जिसका वादा भारत का संविधान करता है। कोई प्रगतिशील संविधान एक गैर-बराबर, रूढिवादी समाज से खुद नहीं लड़ सकता। उसे इसके लिए राजनीतिक ताकतों का समर्थन चाहिए होता है। मगर हमें स्वीकार करना चाहिए कि भारत में संवैधानिक चेतना को जनता तक पहुंचाने के काम के लिए संविधान से सहमत राजनीतिक दलों तक का भरोसेमंद साथ नहीं मिला या आज भी नहीं मिल पा रहा है। कुछ लोगों ने इसे टेकन-फॉर-ग्रांटेड लिया तो कुछ की क्रांतिकारी फंतासियां 1947 और उसके बाद के सामाजिक-सांस्कृतिक धरातल का पर्याप्त विश्लेषण नहीं कर सकीं।

यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि ‘यह आजादी- यह लोकतन्त्र’ अगर सामाजिक धरातल पर भी मजबूत बनता, जिसके प्रति अंबेडकर ने आगाह किया था, तो देशवासियों को आर्थिक आजादी यानी सबका समतापरक विकास भी कुछ ज्यादा मिलता। तब शायद नेता- पूँजीपति- नौकरशाह गठजोड़ पर भी कुछ ज्यादा अंकुश होता। मगर भारत में सामंती, राजतंत्रीय, विषमतावादी मूल्यों के समाज व संस्कृति के स्तर पर कमजोर न हो पाने के कारण आर्थिक आजादी का पहलू नीति निर्देशक सिद्धांत, कल्याणकारी राज्य के वायदों, राजनीतिक तकाजों से उठाए गए लोक-लुभावन कदमों और जनता द्वारा लड़ कर लिए गए कुछ हासिलों के रूप में सिमट कर रह गया। पूंजी और रूढ़ि का सह-अस्तित्व मजबूत होता गया।

आज यह बार-बार दोहराना जरूरी है कि भारतवासियों को अंग्रेजों से आजादी तो 1947 में मिल गई, मगर इस आजादी की निरंतरता को सिर्फ और सिर्फ उदारवादी लोकतन्त्र ही सुनिश्चित कर सकता था। इसलिए 1947 के भारतवासियों ने भविष्य के भारतवासियों की आजादी के लिए उदारवादी लोकतन्त्र को चुना। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में यह आत्म चेतना बीसवीं सदी के शुरु में ही आ गई थी कि भारत को अपने सामंती अतीत और रुढियों से भी आजाद होना है। इसलिए भारत का स्वाधीनता संग्राम भारत के साभ्यतिक पुनराविष्कार का संग्राम था। यह था भारत की चेतना को झकझोरने का आंदोलन। एक लंबी नींद से जगाने की जद्दोजहद।

अपने हाथ में तिरंगा लेते हुए हमें दोहराना चाहिए कि भारतीय संविधान की सफलता ही भारतीय आजादी की सफलता होगी। हर तिरंगा लहराते हाथ से आंगिक रूप से जुड़े माथे पर संविधान के मूल्यों की इबारत जब तक नहीं उभरेगी, जब तक संविधान का दर्शन भारतवासियों का मानस नहीं बनेगा, तब तक भारतीय आजादी महफूज नहीं होगी।

हमें याद रखना चाहिए और नियम से अपने रिश्तेदारों, साथी-संगियों को याद दिलाना चाहिए कि अंग्रेजों से आजादी आधा सच है। राजतन्त्र और सामंतवाद से आजादी पूरा सच है, जिसे संविधान के स्तर से आगे बढ़ सामाजिक- सांस्कृतिक धरातल पर भी पूरी तरह साकार करना होगा

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