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पॉल रिचर्ड ब्रास
शख्सियत

पॉल रिचर्ड ब्रास: भारतीय राजनीति के विपुल एवं बहुकृतिक विद्वान

 

अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक पॉल रिचर्ड ब्रास की एक लंबी बीमारी के बाद 85 वर्ष की आयु में 31 मई, 2022 को मृत्यु हो गई। वह उन अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिकों में एक थे जिन्होंने भारत को वृहत रूप में समझा, इसीलिए ब्रास भारतीय राजनीति पर अपने व्यापक शोध के लिए जाने जाते हैं। इन्होंने भारतीय राजनीति के दशा एवं दिशा दोनों को समझने का प्रयास किया। ब्रास एक विपुल एवं बहुकृतिक विद्वान थे जिन्होंने ना केवल तुलनात्मक अध्ययन किया, अपितु दक्षिण एशियाई राजनीति, जातीय राजनीति, राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता एवं सामूहिक हिंसा के क्षेत्र में अग्रणी थे। उनकी विद्वता का दायरा किसान आंदोलन से लेकर सांप्रदायिकता तक विस्तारित है।

उन्होंने हावर्ड एवं शिकागो विश्वविद्यालय से शासन एवं राजनीति में प्रशिक्षण लिया तत्पश्चात अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन व राजनीति विज्ञान के अध्ययन के लिए वाशिंगटन विश्वविद्यालय, सिएटेल में प्रवेश लिया। ब्रास की रुचि फील्ड वर्क अनुसंधान में अधिक थी जिसको उन्होंने प्रसिद्ध राजनीतिक विचारक मायरन वीनर से सीखा। इस बात को वह अपनी मुख्य पुस्तक ‘द प्रॉडक्सन ऑफ ऑफ हिन्दू-मुस्लिम वॉइलेन्स इन कंटेम्पररी इंडिया’(2003) की प्रस्तावना में लिखते हैं। वह कहते हैं कि मैंने पहली बार फील्ड रिसर्च 1961-62 में अलीगढ़ और उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में मायरन वीनर के देख-रेख में किया।

ब्रास ने भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता के व्यापक विश्लेषण के अलावा चौधरी चरण सिंह की जीवनी का सुंदर वर्णन किया। उनके आरंभिक उल्लेखनीय कार्यों में ‘फैक्शनल पॉलिटिक्स इन एन इंडियन स्टेट : द काँग्रेस पार्टी इन उत्तर प्रदेश’ (1965) था। यह पहला एक ऐसा अध्ययन था जिसने उन पारंपरिक तथा आधुनिक तथ्यों को उजागर करने का प्रयास किया जो उत्तर प्रदेश के राजनीतिक भाग्य को आकार दे रही थी। इस शोधकार्य के माध्यम से उन्होंने उत्तर प्रदेश के चुनावी राजनीति तथा गुटबंद के विविध आयामों को विश्लेषित किया। इस शोधकार्य को करते समय उनके द्वारा दो सौ से अधिक स्थानीय व राज्य स्तरीय नेताओं के साक्षात्कार भी लिए गए। इस प्रकार इस पुस्तक में तथ्य व कथ्य द्वारा ब्रास ने तुलनात्मक अध्ययन के प्रविधि का प्रयोग करते हुए उत्तर प्रदेश की परिवर्तनीय राजनीतिक परिदृश्य का वर्णन किया।

उनकी दूसरी महत्वपूर्ण कृति “रैडिकल पॉलिटिक्स इन साउथ एशिया” (1973) थी। इसके अंतर्गत ब्रास भारत, बांग्लादेश एवं सीलोन में क्षेत्रीय कट्टरपंथी आंदोलनों का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं। इसमें कुल सात निबंध हैं जिसमें प्रत्येक क्षेत्र के भीतर व्याप्त उन स्वदेशी कारकों पर ध्यान केंद्रित किया गया है जो कट्टरपंथी आंदोलनों के लिए उत्तरदाई थे। ब्रास द्वारा दक्षिण एशिया में कट्टर वामपंथी राजनीतिक दलों के इतिहास, संगठन, विचारधारा एवं प्रभाव का भी व्यापक विश्लेषण किया गया है।

उनकी तीसरी व सबसे प्रमुख कृति, “लैंग्वेज, रिलीजन एंड पॉलिटिक्स इन नॉर्थ इंडिया”(1974) थी। इस पुस्तक को एक ‘स्मरणार्थक कार्य’ के रूप में जाना जाता है, जिसमें भाषा, धर्म, जातीय समूहों तथा राष्ट्रवाद का एक उत्कृष्ट विश्लेषण है। इसमें ब्रास ने उत्तर भारत की भाषाई राजनीति के विविध आयामों को देखा। इसके द्वारा उन्होंने यह बताया कि क्यों कुछ भाषाई आंदोलन शक्तिशाली राजनीतिक आंदोलन में परिवर्तित हो जाते हैं जबकि वहीं कुछ नहीं परिवर्तित हो पाते हैं। इसका अध्ययन करने के लिए ब्रास उत्तर प्रदेश, बिहार एवं पंजाब में चले भाषाई आंदोलनों का परीक्षण किया। इस कृति को भारत में भाषा एवं धर्म की राजनीति तथा जातीय व राष्ट्रवादी आंदोलनों दोनों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह एक ऐसी पुस्तक है जिसका मूल्य व महत्व शायद ही कभी कम हो।

इसी क्रम में जब भी भारतीय राजनीति को समझने की बात आती है, तो हर विद्यार्थी व शोधार्थी के लिए ब्रास की पुस्तक “द पॉलिटिक्स ऑफ इंडिया सिंस इंडिपेंडेंस”(1990) को पढ़ना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। उनके इस संश्लेषण को कई बार पुनःमुद्रित किया गया। भारतीय विश्वविद्यालयों में तथा परीक्षा की तैयारियों में इस पुस्तक की भूमिका मुख्य होती है जो भाषा, धर्म, व जाति की राजनीति पर विशेष रूप से ध्यान देती है। भारतीय राजनीति को बिना रजनी कोठारी की कृति “पॉलिटिक्स इन इंडिया” को पढ़े नहीं समझा जा सकता, उसी शृंखला में पॉल आर ब्रास की द पॉलिटिक्स इन इंडिया सिंस इंडिपेंडेंस को भी बिना पढ़े भारतीय राजनीति को नहीं समझा जा सकता है। इस पुस्तक में उन्होंने स्वातंत्रयोत्तर भारत में आए राजनीतिक पृष्ठभूमि में परिवर्तन, राज्य तथा स्थानीय राजनीति के परिवर्तनीय संबंध, विस्तृत राजनीतिक संरचना तथा शासन के कार्यों का विश्लेषण किया। इसके साथ ही भारतीय राजनीति के व्यवहार एवं नीतियों में निरंतरता तथा परिवर्तनीयता के तत्वों को भी निर्दिष्ट किया।

भारतीय राजनीति में जातीय समूहों तथा राज्य के संबंधों का विश्लेषण ब्रास ने अपनी पुस्तक “एथनीसिटी एंड नैशनलिज़म : थ्योरी एंड कॉम्परीजन” (1991) में किया, जिसमें जातीय समूह की संगठनाओं, तथा जातीय अस्मिताओं की संरचनाओं का विवेचन किया। यह पुस्तक जातीय पहचान तथा आधुनिक राष्ट्रवाद के उद्भव से संबंधित एक विशिष्ट सिद्धांत प्रस्तुत करती है। यह सिद्धांत दो मुख्य तर्कों पर आधारित है, पहला, जातीयता व राष्ट्रवाद कोई ‘देन’ नहीं है, अपितु समाज व राजनीति द्वारा निर्मित है। दूसरा, जातीयता एवं राष्ट्रवाद आधुनिक परिघटनाएं हैं जो आधुनिक केन्द्रीकृत राज्य की गतिविधियों अविभाज्य रूप में जुड़ी हुई है। यह पुस्तक इन्हीं सिद्धांतों का परीक्षण करती है, तथा केस स्टडी के मध्यम से जातीय लामबंदी एवं राष्ट्र निर्माण के विभिन्न क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करती है।

इसके अलावा ब्रास सांप्रदायिक दंगों की भी बात करते हैं। अपनी पुस्तक फॉर्म्स ऑफ कॉलेक्टिव वॉइलेंस (2006) में लिखते हैं कि दंगें अपने आप उत्पन्न नहीं होते, अपितु यह सुनियोजित तथा संगठित तरीके से निर्मित किए जाते हैं। इसको निर्मित करने में पुलिस, प्रशासन तथा पोलिटिकल पार्टीज़ की मुख्य भूमिका होती है। इनके द्वारा ही दंगों को ‘संस्थाबद्ध प्रणाली’ के रूप में प्रयोग किया जाता है। इतना ही नहीं ब्रास का यह भी मानना है कि दंगों में मीडिया की भी भूमिका यहां होती है, जो तथ्यों को तोर-मरोड़ कर प्रस्तुत करती है जिसके कारण दंगे और भी तीव्र होने लगते हैं।

सांप्रदायिक हिंसा एवं हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष के कारणों को लेकर ब्रास द्वारा व्यापक परीक्षण किया गया। इससे संबंधित उनकी अन्य पुस्तकें जैसे थेफ्ट ऑफ एन आइडल : टेक्स्ट एंड कांटेक्स्ट इन द रिप्रजनटेशन ऑफ कॉलेक्टिव वॉइलेंस (1997), द प्रोडक्शन ऑफ हिन्दू-मुस्लिम वॉइलेंस इन कॉनटेम्परोरी इंडिया (2003) इत्यादि है, जिसके अंतर्गत वह सांप्रदायिक हिंसा के इतिहास व वर्तमान को बताते हुए उनके कारणों पर भी ध्यान केंद्रित करते हैं।

वर्तमान समय में सांप्रदायिकता से जूझते भारत में पॉल आर ब्रास के लेखन कार्यों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि ब्रास ने स्वतंत्र भारत के परिवर्तनीय राजनीतिक परिदृश्य के साथ साथ भारतीय लोकतंत्र के विविध आयामों का भी विश्लेषण किया है। इसलिए उन्हें भारतीय राजनीति का विपुल व बहुकृतिक विद्वान कहा जा सकता है। जिन्होंने भारतीय राजनीति के प्रत्येक उन पहलुओं का विश्लेषण किया जिससे भारतीय राजनीति प्रभावित होती है। यद्यपि उन्होंने अपने जीवन काल में अनगिनत लेख व पुस्तकें लिखी जिनका विवरण एक लेख में देना संभव नहीं है, फिर भी उनके कुछ महत्वपूर्ण कृतियों को ध्यान में रखते हुए उनके विपुल स्वभाव व बहुकृतिक व्यक्तित्व का परीक्षण किया जाना आवश्यक है। भले ही ब्रास आज हमारे बीच नहीं हैं परंतु उनके कार्यों की प्रासंगिकता सदैव हमारे बीच बनी रहेगी।  हर उस राजनीतिक विज्ञानिक में उनकी स्मृतियाँ जीवंत रहेंगी जिन्होंने उनको पढ़ा है

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