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लाल बहादुर शास्त्री का भारत
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लाल बहादुर शास्त्री के सपनों का भारत

 

आज़ादी के बाद भारत के सामाजिक-आर्थिक पुनर्निर्माण और भारत की राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सुदृढ़ बनाने में जिन राजनेताओं ने उल्लेखनीय योगदान दिया, उनमें भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का योगदान अग्रणी है। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद प्रधानमंत्री पद संभालने वाले लाल बहादुर शास्त्री नेहरू सरकार में गृह मंत्री और रेल मंत्री जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर रह चुके थे। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के विचारों से गहरे प्रभावित रहे लाल बहादुर शास्त्री अपनी सादगी और ईमानदारी के लिए आज भी भारत के आम लोगों द्वारा याद किए जाते हैं।

लाल बहादुर शास्त्री कैसे भारत का सपना देखते थे, इसकी एक झलक राष्ट्र के नाम उनके उस पहले सम्बोधन में मिलती है, जो उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद 11 जून, 1964 को दिया था। अपने इस सम्बोधन में जहाँ एक ओर शास्त्रीजी ने दिवंगत प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को मार्मिक ढंग से याद किया। वहीं उन्होंने उस दुःख की घड़ी में देश की जनता को ढाँढस बँधाते हुए देश के आर्थिक-सामाजिक पुनर्निर्माण का आह्वान किया। अपने इस आह्वान में उन्होंने देश के सभी राजनीतिक दलों को भी सम्मिलित किया। भारत के पुनर्निर्माण का रास्ता बताते हुए उन्होंने समाजवादी लोकतंत्र के विचार पर ज़ोर दिया और कहा :

हर राष्ट्र के जीवन में एक वक़्त आता है जब वह इतिहास के चौराहे पर खड़ा होता है और उसे अपनी दिशा का चुनाव करना होता है। लेकिन हमारे सामने इसे लेकर कोई दुविधा या परेशानी नहीं है। हमारी राह सीधी और स्पष्ट है – हमें देश में समाजवादी लोकतंत्र की स्थापना करते हुए हरेक की आज़ादी और समृद्धि को सुनिश्चित करना है और दुनिया के सभी देशों के साथ मित्रता और विश्वशांति को बढ़ावा देना है।[1]

देश की एकता और लोगों के बीच भाईचारे की भावना को शास्त्रीजी ने सर्वोपरि स्थान दिया और सेवा, सहानुभूति और मानवता पर बल दिया। इसी व्याख्यान में जवाहरलाल नेहरू की याद दिलाते हुए उन्होंने साम्प्रदायिक सौहार्द और सहिष्णुता के भाव को भी रेखांकित किया। अपने इस व्याख्यान में उन्होंने भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक संरचना को लेकर अपने विचारों को जनता के सामने रखा। आर्थिक विकास और सामाजिक पुनर्निर्माण के लिए शास्त्रीजी ने प्रशासनिक ढाँचे में व्यापक बदलाव को ज़रूरी बताया। जहाँ एक ओर वे अपने वक्तव्यों में प्रशासनिक अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों से अधिक दक्षता के साथ काम करने का आह्वान करते थे। वहीं उनसे यह अपेक्षा भी करते कि वे ग़रीब और कमज़ोर लोगों को तवज्जो देंगे और उनकी अनदेखी नहीं करेंगे। 

अक्टूबर 1965 में राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक को सम्बोधित करते हुए भी शास्त्रीजी ने प्रशासनिक सुधारों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उनका कहना था कि ‘प्रशासन को सुधारना बहुत ज़रूरी है। बिना इसे सुधारे अर्थव्यवस्था स्थिर नहीं हो सकती। प्रशासन के सुधारने से ही सरकारी योजनाएँ तेज़ी से पूरी की जा सकती हैं और निजी क्षेत्र में भी ज़िम्मेदारी से काम हो सकता है।’ ज़िले के विभिन्न सरकारी महकमों के बीच समन्वय बनाने और सरकारी योजनाओं और विभागों की कार्यपद्धति को किसानों और गाँवों के लिए सुविधाजनक बनाने पर भी शास्त्री जी ने ज़ोर दिया।

जय जवान, जय किसान 

लाल बहादुर शास्त्री ने सीमा पर चाकचौबंद सुरक्षा और देश के भीतर कृषि सुधारों पर बल दिया। उन्होंने सीमा पर तैनात जवानों और खेत में काम कर रहे किसानों को भारतीय लोकतंत्र के प्रहरी और निर्माता के रूप में देखा। अकारण नहीं कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कृषि ऐसे मसले थे, जो उनके भाषणों में बार-बार आते हैं। उनका कहना था कि ‘राष्ट्र की आय बढ़ाने और देश को समृद्ध बनाने का दायित्व प्रत्येक कृषिप्रधान देश में किसानों के विशाल कंधों का ही आश्रय लेता है।’

भारत आत्मनिर्भर बने और रक्षा और कृषि दोनों ही क्षेत्रों में भारत की शक्ति बढ़े, इस बात पर शास्त्रीजी ज़ोर देते रहे। इसी संदर्भ में 20 अक्टूबर, 1965 को राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर राष्ट्र के नाम अपने संदेश में आत्मनिर्भरता के विचार को रेखांकित करते हुए शास्त्रीजी ने कहा कि ‘आत्मनिर्भरता का मतलब यह है कि हमारे पास जो कुछ भी है उसका हम अधिक अच्छा इस्तेमाल करें और जो कुछ नहीं है, उसके बिना काम चलाने का हौसला रखें…जो लोग हमारी मदद के लिए आगे आते हैं, उनके हम कृतज्ञ हैं, शुक्रगुज़ार हैं। लेकिन हमें अपने ही पाँवों पर मज़बूती से खड़े होने के लिए भी तैयार रहना है और यह काम आज और अभी करना है।’

वर्ष 1964 में गांधी जयंती की पूर्व संध्या पर आकाशवाणी से प्रसारित एक ऐसे ही संदेश में किसानों से पैदावार बढ़ाने और खाद्यान्न के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान करते हुए शास्त्रीजी ने कहा :

मैं, भारत के तीस करोड़ काश्तकारों से जो लगभग छह लाख गाँवों में रहकर, पैंतीस करोड़ एकड़ भूमि में कृषि उत्पादन करते हैं, इस संदेश द्वारा अपील कर रहा हूं कि वे देश की इस संकटकालीन स्थिति में खेतों की पैदावार अधिक-से-अधिक बढ़ाकर मातृभूमि की सेवा करें। अपने कुटुम्ब, समाज और देश के हित के लिए आज इससे बढ़कर कोई दूसरा कर्त्तव्य आपके सामने नहीं हो सकता।[2]

योजनाओं का निर्माण हिंदुस्तान के ग़रीब और कमजोर लोगों को ध्यान में रखकर हो, जिससे उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पहले से कुछ बेहतर हो सके, इस बात पर शास्त्री जी का ज़ोर था। खाद्यान्न के आयात से भारतीय अर्थव्यवस्था और भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर जो बोझ पड़ रहा था, वह भी शास्त्रीजी के लिए चिंता का विषय थी। अकारण नहीं कि अपने इस संदेश में शास्त्रीजी ने जहाँ एक ओर पंचवर्षीय योजनाओं को सफल बनाने में कृषि की महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। किसानों को उनकी मेहनत की वाजिब क़ीमत मिले, इसके लिए भी शास्त्रीजी सदैव चिंतित रहे।

इसी क्रम में उन्होंने व्यापारियों का भी आह्वान किया कि वे देश को इस संकट से उबारने में अपनी भूमिका निभाएँ और कालाबाज़ारी या जमाख़ोरी की प्रवृत्ति से बचें। हरित क्रांति की बुनियाद लाल बहादुर शास्त्री ने अपने इन्हीं प्रयासों से रखी थी। शास्त्रीजी ने पंचायती राज और सामुदायिक विकास की योजना की सफलता की कसौटी खेती को ही माना। और कहा कि :

पंचायती राज का सबसे ज़रूरी काम ज्यादा-से-ज्यादा कृषि उत्पादन कर देश की माली हालत सुधारनी है। खेती की पैदावार का विषय इतना महत्त्वपूर्ण है कि यही आजकल सामुदायिक विकास आंदोलन की सफलता की मुख्य कसौटी है। अगर लोगों के खाने के लिए अनाज बाहर से मंगाना पड़े और अपने उद्योगों के लिए ज़रूरी कच्चे सामान के वास्ते हमें दूसरे देशों का मुँह ताकना पड़े, तो देश की अर्थव्यवस्था की नींव कैसे मज़बूत बन सकती है और जनता के रहन-सहन का स्तर कैसे ऊपर उठ सकता है।[3] 

युद्ध नहीं, सृजन

ऐसे समय में जब दुनिया भर के शक्तिशाली देशों के बीच अणु बम बनाने या उसका परीक्षण करने के लिए एक होड़-सी लगी हुई थी। यहाँ तक कि पड़ोसी देश चीन भी अणु बम का परीक्षण कर चुका था। तब लाल बहादुर शास्त्री ने अणु बम की इस प्रतिस्पर्धा की आलोचना की। जमनालाल बजाज की जन्मस्थली बजाज ग्राम में दिए अपने एक भाषण में लाल बहादुर शास्त्री ने अणु बमों की संस्कृति को नकारते हुए सृजन और निर्माण का आह्वान किया। उन्होंने कहा :

आज हम एक नया समाज बनाना चाहते हैं, एक नया भारत बनाना चाहते हैं, हँसता खेलता हुआ देश देखना चाहते हैं, हम दुनिया में लड़ाई नहीं चाहते, हम एटम बम को नहीं चाहते इसलिए अणुबम या किसी तरह की लड़ाई, समर-महासमर यह हम नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि शांति के साथ देश का विकास करें। देश को बढ़ाएँ, ग़रीबी को मिटाएँ, बेरोज़गारी को दूर करें। लोगों को काम मिले और हमारे बच्चे नौजवान थोड़ा सुख सुविधा से रह सके। इस तरह के समाज की हमारी कल्पना है।[4]  

विदेश नीति

राष्ट्र के नाम अपने पहले ही सम्बोधन में शास्त्रीजी ने स्पष्ट कहा था कि विदेश मामलों की जहाँ तक बात है, सभी देशों के साथ मित्रता और सम्बन्ध स्थापित करना हमारी प्राथमिकता होगी। गुट निरपेक्षता की नीति को उन्होंने भारत की विदेश नीति का बुनियादी विचार माना। पाकिस्तान के संदर्भ में अपनी बात रखते समय भी शास्त्रीजी ने कहा कि भारत और पाकिस्तान साझे अतीत और साझी परम्परा से जुड़े हुए हैं। इसलिए उन्होंने इन दोनों देशों के बीच सौहार्द, मित्रता और परस्पर सहयोग पर ज़ोर दिया।

कोसीजिन के पहल पर जनवरी 1966 में हुए ताशकंद के ऐतिहासिक सम्मेलन के आरम्भ में 4 जनवरी को दिए गए अपने भाषण में भी शास्त्री जी ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर ज़ोर दिया था। उनका कहना था कि शांति की राह का अनुसरण करते हुए ही भारत और पाकिस्तान अपनी आर्थिक प्रगति सुनिश्चित कर सकेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रों के बीच मतभेद और जटिल समस्याओं को शक्ति प्रयोग या हथियारों के बल पर नहीं बल्कि बातचीत और समझौते से ही हल किया जा सकता है। क्योंकि सशस्त्र संघर्ष या युद्ध समस्या को सुलझाने की बजाय और बढ़ा ही देता है। इन्हीं बातों को चिह्नित करते हुए शास्त्री जी ने कहा :

हमारे कंधों पर एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। हमारे उस महाद्वीप में 60 करोड़ जनता बसती है। यह पूरी मानव-जाति का पाँचवाँ भाग है। यदि संघर्ष और बैर बना रहेगा, तो हमारे लोग और बड़ी-बड़ी मुसीबतों में फँसते जाएँगे। इसके बजाय कि हम आपस में लड़ें, हमें आज ग़रीबी, बीमारी और युद्ध के विरुद्ध युद्ध छेड़ना है। दोनों देशों के जनसाधारण की समस्याएँ, आशाएँ तथा सपने एक हैं। वे संघर्ष और युद्ध नहीं, शांति और प्रगति चाहते हैं। उन्हें अस्त्र-शस्त्र की नहीं, भोजन की आवश्यकता है, वस्त्र और घर की ज़रूरत है। यदि हमें अपनी जनता को इन आवश्यकताओं को पूरा करना है तो हमें इस सम्मेलन में कुछ ठोस और विशिष्ट उपलब्धि के लिए प्रयत्नशील होना होगा।[5]

शास्त्रीजी उसी दिशा में प्रयत्नशील भी थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद समझौते के मसौदे पर शास्त्रीजी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब खाँ के साथ हस्ताक्षर किए। मगर उसी रात हृदयाघात हो जाने से लाल बहादुर शास्त्री का आकस्मिक निधन हो गया। इस तरह उस क़द्दावर और दूरदर्शी नेता के असमय मृत्यु के साथ भारतीय राजनीति के एक सुनहरे अध्याय का पटाक्षेप हो गया। बतौर प्रधानमंत्री शास्त्री जी ने देश की प्रतिरक्षा, कृषि और आर्थिक सुधार, निःशस्त्रीकरण, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, भाषा के जटिल प्रश्न आदि के संदर्भ में जो विचार प्रकट किए थे, वे मौजूदा दौर में और भी प्रासंगिक हो चले हैं। वर्ष 2022 में जब हम आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, तो हमारा यह कर्त्तव्य हो जाता है कि हम शास्त्री जी के उन सपनों को साकार करें

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[1] सेलेक्टेड स्पीचेज़ ऑफ़ लाल बहादुर शास्त्री (नई दिल्ली : प्रकाशन विभाग, 1974), पृ. 4

[2] कृष्णबिहारी सहल (संपा.), लालबहादुर शास्त्री व्यक्तित्व और विचार (जयपुर : चिन्मय प्रकाशन, 1967), पृ. 480.

[3] वही, पृ. 482.

[4] वही, पृ. 493.

[5] वही, पृ. 576.