Tag: रुस-यूक्रेन युद्ध दो देशों तक सीमित नहीं

तीसरा विश्व युद्ध
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क्या तीसरा विश्व युद्ध अवश्यम्भावी है?

 

24 फरवरी को यूक्रेन पर रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन द्वारा की गयी एक ‘विशेष सैन्य कार्रवाई’ कुछ समय बाद ही युद्ध का रूप ग्रहण कर चुकी है। पुतिन की आशा के विपरीत यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदीमिर जेलेंस्की युद्ध में पूरे दम-खम के साथ डटे हैं और रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है। यह युद्ध तीसरे महीने में प्रवेश कर चुका और ऐसा अनुमान किया जाता है कि 9 मई के विजय दिवस (विक्ट्री डे) के पहले रुस युद्ध विराम कर दे। राजनीतिक रूप से यूक्रेन के प्रमुख शहर मारियुपोल पर रूस का कब्जा हो चुका है। मारियुपोल स्टील बनाने का हब है। रूस- यूक्रेन युद्ध के इस दौर में बार-बार तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाएँ प्रकट की गयी हैं क्योंकि पुतिन ने साफ शब्दों में कई बार अमेरिका और यूरोपीय देशों को इस युद्ध में शामिल होने की गम्भीर चेतावनियाँ दी हैं और वैसे नतीजों को भुगतने को कहा है, जिसका उन्होंने कभी अनुमान तक नहीं किया होगा।

अब रुस-यूक्रेन युद्ध केवल दो देशों तक सीमित नहीं है। वह कई नये रूपाकार ग्रहण कर रहा है। रूस द्वारा एक अन्तरद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल ‘सरमत’ के परीक्षण के बाद विश्व युद्ध की आहट सुनी जा सकती है। रूस की वास्तविक लड़ाई अमेरिका एवं नाटो देशों से है। यूक्रेन को बिलियन डॉलर की सैन्य सामग्री अमेरिका मुहैया करा रहा है। नाटो देश भी उसकी सहायता कर रहे हैं। रुस के नौसैनिक पोत ‘मस्क्वा’ के डूबने या डुबो दिये जाने बाद तीसरे विश्व युद्ध की आशंका प्रकट की जा रही है। क्रेमलिन के मुख पत्र रुस 1 ने नाटो के बुनियादी ढाँचे के खिलाफ लड़ने की बात कही है। अन्तरद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल ‘सरमत’ का सफलतापूर्वक परीक्षण, जिसे स्वयं पुतिन ने देखा है, सामान्य घटना नहीं है।

इस मिसाइल को दुनिया का सर्वाधिक शक्तिशाली मिसाइल कहा जाता है। पुतिन ने कहा है कि दुनिया में ऐसी मिसाइल किसी के पास नहीं है और इस पर आँख उठाने से पहले किसी को भी दो बार सोचना पड़ेगा। इस मिसाइल के परीक्षण से रूस ने अमेरिका और नाटो देशों को अपनी सैन्य-क्षमता से अवगत करा दिया है। 115 फुट लम्बी यह मिसाइल महाविनाशक अन्तरमहाद्वीपीय मिसाइल है जिसे कोई भी सुरक्षा-व्यवस्था रोकने में सक्षम नहीं है। इसे ‘अपराजेय’ कहा जाता है। परमाणु बम छोड़ने वाली यह मिसाइल 18 हजार किलोमीटर तक प्रहार कर सकती है। इसकी रफ्तार प्रति घंटा 16 हजार मील है। यह एक साथ 15 परमाणु बम गिरा सकती है। अमेरिका द्वारा जापान और नागासाकी शहरों में गिराये गये एटम बम से इसकी शक्ति हजार गुना अधिक है। 208 टन की इस मिसाइल का नाम पश्चिमी विश्लेषकों ने ‘शैतान–2’ रखा है।

‘सरमत’ मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण का एक स्पष्ट सन्देश है कि रूस विकट स्थिति में इसका इस्तेमाल कर सकता है। यूक्रेन पर पुतिन की ‘विशेष सैन्य कार्रवाई’ नाटो के विस्तार को रोकने के लिए की गयी है। सैन्य कार्रवाई के समय पुतिन ने अपने देशवासियों को टेलीविजन पर दिये अपने सम्बोधन में जो कुछ कहा था, उसे जाने समझे बिना उनके द्वारा की गयी सैन्य कारवाई को नहीं समझा जा सकता। पुतिन ने यूक्रेन का विसैन्यीकरण करना अपना लक्ष्य बताया था और साफ शब्दों में यह कहा था कि यूक्रेन पर कब्जा करने का उनका कोई इरादा नहीं है।

यूक्रेन पर रूसी सैन्य कार्रवाई को उन्होंने 1999 में युगोस्लाविया पर अमेरिका के नेतृत्व वाले युद्ध, 2003 में इराक पर आक्रमण और पिछले दशक में लीबिया और सीरिया में हुए सैन्य हस्तक्षेप से भिन्न माना है। अमेरिका और नाटो देशों ने मनमाने ढंग से यूगोस्लाव युद्ध आरम्भ किया था। पुतिन ने इराक पर हमले को ‘अन्तरराष्ट्रीय कानून का सबसे बड़ा उल्लंघन’ कहा है। पुतिन ने अपने सम्बोधन में इन सबका उल्लेख कर नाटो और अमेरिका द्वारा किये गये युद्ध की सबको याद दिलायी, जिन्हें पश्चिम भूलता रहा है।

“मुझे इन तथ्यों को याद करना होगा क्योंकि कुछ पश्चिमी सहयोगी उन्हें भूलना पसन्द करते हैं और जब हम घटना का उल्लेख करते हैं, तो वे अन्तरराष्ट्रीय कानून के बारे में बोलने से बचना पसन्द करते हैं।” यूक्रेन में रूसी सैन्य कार्रवाई को पुतिन ने अमेरिकी ‘झूठ के साम्राज्य’ के खिलाफ एक हड़ताल कहा है। अपनी सैन्य कार्रवाई को लेकर पुतिन ने जो भी कहा है, उससे पुतिन को ‘आक्रामक’ और ‘बर्बर’ नहीं कहा जा सकता। उनके लिए अपने देश की सुरक्षा महत्वपूर्ण है। रुस की बात अनसुनी की गयी। मास्को के विरोध और चिन्ताओं पर नाटो ने ध्यान नहीं दिया और उसकी सैन्य मशीन रूसी सीमा की ओर बढ़ती गयी। नाटो का विस्तार रूस के लिए ‘जीवन और मरण’ का सवाल था – “यह वह लाल रेखा है, जिसके बारे में मैं कई बार बात कर रहा था।”

 आज का रूस 1980 के दशक का सोवियत संघ नहीं है। उस समय (1980 के दशक में) सोवियत संघ कमजोर था, जिसका पश्चिमी देशों ने लाभ उठाया। यूक्रेन में रूसी सैनिक भेजने की घोषणा करते हुए पुतिन ने कहा “हमने केवल एक पल के लिए विश्वास खो दिया, लेकिन यह दुनिया में बलों के सन्तुलन को बाधित करने के लिए पर्याप्त था।” पुतिन ने यूरोपीय सुरक्षा और नाटो के गैर-विस्तार के सिद्धान्तों पर दिसम्बर 2011 में पश्चिम के साथ एक समझौते पर पहुँचने का प्रयास किया था, जो निष्फल रहा। यूक्रेन पर रूसी सैन्य कार्रवाई को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ‘अकारण’ कहा, पर यूक्रेन के सम्बन्ध में पश्चिमी मीडिया और राजनेताओं का व्यवहार कम ‘उत्तेजक’ नहीं रहा है।

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जर्मनी के एकीकरण और शीत युद्ध को समाप्त करने के लिए अमेरिका ने नाटो के विस्तार न किये जाने की बात कही थी। अमेरिकी विदेश मंत्री जेम्स बेकर ने 9 फरवरी 1990 को (सोवियत रूस के विघटन से पहले) मिखाइल गोर्बाचोव से कहा था कि नाटो ‘एक इंच पूर्व की ओर’ नहीं बढ़ेगा। गोर्बाचोव ने उस समय अमेरिकी, फ्रांसीसी, ब्रिटिश एवं पश्चिमी जर्मनी के नेतृत्व को यह कहा था कि नाटो का विस्तार मास्को के लिए अस्वीकार्य है। बेकर ने तब ‘एक नयी वैध यूरोपीय संरचना का निर्माण’ की बात कही थी, जो समावेशी होगा, अनन्य नहीं। रूस ने विगत दो दशक से यूरोप में एक नये सुरक्षा ढाँचे की मांग की है, जिस पर ध्यान नहीं दिया गया। नाटो (उत्तर अटलान्टिक सन्धि  संगठन) की स्थापना 4 अप्रैल 1949 को हुई, जिस पर बारह देशों- संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, इटली, नीदरलैण्ड, आइसलैण्ड, बेलिज्यम, लक्जमबर्ग, नार्वे, पुर्तगाल और डेनमार्क ने हस्ताक्षर किये थे।

अमेरिका ने पश्चिमी यूरोप में सोवियत संघ के विस्तार को रोकने और सदस्य राष्ट्रों की राजनीतिक स्वतन्त्रता और सैन्य सुरक्षा बनाये रखने के लिए नाटो का गठन किया। इस गठन से पश्चिमी यूरोप के देशों को एक सूत्र में बाँधा गया। नाटो का मुख्य उद्देश्य सोवियत के विरुद्ध विश्व समुदाय को एक गुट करना और अमेरिकी प्रभाव और वर्चस्व को बढ़ाना था। नाटो की स्थापना शीत-युद्ध (कोल्ड वार) के चरम पर पहुँचने के समय की गयी थी। शीतयुद्ध नाजी जर्मनी के आत्म समर्पण के बाद, 1945 में आरम्भ हुआ। उस समय जॉर्ज ऑरवेल ने 1945 में प्रकाशित अपने एक लेख में यह भविष्यवाणी की थी- “दो या तीन राक्षसी सुपर स्टेट्स हैं, प्रत्येक के पास एक हथियार है, जिसके द्वारा कुछ सेकण्ड में लाखों लोगों का सफाया किया जा सकता है।” शीत युद्ध का समय 12 मार्च 1947 से 26 दिसम्बर 1991 (सोवियत संघ के विघटन का समय) तक है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया दो  शिविरों – साम्यवादी और पूँजीवादी में बँट गयी थी। साम्यवादी देशों का नेतृत्व रूस कर रहा था और पूँजीवादी देशों का नेतृत्व अमेरिका। दोनों के बीच बनी तनावपूर्ण स्थिति को शीत युद्ध कहा गया। नेहरु ने इसे दो विचारधाराओं का संघर्ष न मानकर इसे भीमाकार शक्तियों का आपसी संघर्ष कहा था। नाटो के जवाब में सोवियत संघ के नेतृत्व में पूर्वी यूरोपीय देशों ने 1955 में वारसा संधि की, जिसमें सोवियत संघ, पोलैंड, पूर्वी जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी, रोमानिया और बुल्गारिया थे। वारसा पैक्ट 14 मई 1955 को पोलैण्ड की राजधानी वारसा में हुआ था। इसका काम नाटो में शामिल देशों का मुकाबला करना था। 1 जुलाई 1991 को इसे विघटित कर दिया गया। सोवियत रूस के विघटन के बाद नाटो का विघटन नहीं हुआ। इसने कहीं अधिक अपना विस्तार किया और अब इसमें शामिल तीस देश हैं।

रूस की सीमा चौदह देशों- चीन, एस्टोनिया, अजरबैजान, बेलारूस, फिनलैण्ड, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, उत्तर कोरिया, गवियां, लिथुआनिया, मंगोलिया, नार्वे, पोलैण्ड और यूकेन से लगती हैं। समुद्री सीमाएँ संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, स्वीडन और तुर्की से जुड़ी है। रुस दुनिया का सबसे बड़ा देश है, जिसकी भू-सीमा 20 हजार 241 किलोमीटर की है। विश्व के किसी भी देश की इतने अधिक राष्ट्रों से सीमा नहीं जुड़ी है। नार्वे-रूस की भू-सीमा 195.8 और समुद्री सीमा 54 किलोमीटर की है। संयुक्त राज्य अमेरिका से रूस की कोई भू-सीमा नहीं है और समुद्री सीमा मात्र 49 किलोमीटर की है। यूक्रेन से रूस की भू-सीमा 2 हजार 93.6 किलोमीटर की है।

रूस के समक्ष यूक्रेन पर सैनिक कार्रवाई के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं बचा था। नाटो में यूक्रेन के शामिल हो जाने के बाद सभी नाटो देशों की सेनाएँ यूक्रेन में आ सकती थीं जो आज की तुलना में रुस के लिए कहीं अधिक विस्फोटक और अहितकर होता। उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ती। पड़ोसी देशों में दुश्मनों की उपस्थिति किसी भी देश के लिए कहीं अधिक खतरनाक सिद्ध हो सकती है। रूस को आक्रामक, खलनायक आदि सिद्ध करने की कोशिश में अमेरिकी और यूरोपीय सूचना-तन्त्र लगा हुआ है।

सूचना-तन्त्र अमेरिका एवं यूरोपीय देशों के अधीन है। रुस-यूक्रेन युद्ध एक सूचना युद्ध में बदला जा चुका है। यूक्रेन पर रूस की सैन्य कार्रवाई के बाद अमेरिका सहित नाटो देशों ने रूस पर कई बड़े आर्थिक प्रतिबन्ध लगाये हैं, इस आर्थिक प्रतिबन्ध से आर्थिक युद्ध का भी आरम्भ हो सकता है। रूस ने अब कई देश से अपना व्यापार रूसी करेंसी रूबल में ही करने का निश्चय किया है। रूसी करेंसी रूबल और चीनी करेंसी युआन में डॉलर को चुनौती देने और कमजोर करने की शक्ति नहीं है, पर रूबल और यूआन में व्यापार किये जाने के बाद डॉलर निश्चित रूप से कमजोर होगा।

इस समय दुनिया में 185 करेंसी चलन में है, जिनका उपयोग देश के भीतर ही होता है। डॉलर दुनिया की सबसे शक्तिशाली करेंसी है भारत अपना 85 प्रतिशत व्यापार डॉलर में करता है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था डॉलर के कारण कहीं अधिक मजबूत है। डॉलर के मुकाबले यूरोप में यूरो का प्रभाव बढ़ सकता है, जो अमेरिका के लिए नुकसानदेह ही होगा। रूबल डॉलर को चुनौती नहीं दे सकता पर यूआन में डॉलर को चुनौती देने की क्षमता है।

पुतिन चीनी करेंसी युआन को अपनाएंगे क्योंकि चीन का वैश्विक बाजार बड़ा है। रुस ने यूरोपिय देशों को प्राकृतिक गैस का भुगतान डॉलर या यूरो में न कर रूबल में करने को कहा है। आर्थिक युद्ध का एक नया मोर्चा खुल रहा है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अमेरिका की तुलना में रूस में बहुत कम है। चीन भी जीडीपी मामले में अमेरिका से बहुत पीछे है। अमेरिका की जीडीपी लगभग साढ़े इक्कीस ट्रिलियन डॉलर और चीन की चौदह ट्रिलियन डॉलर से कुछ अधिक है, भारत जीडीपी में दुनिया का पाँचवाँ बड़ा देश है- अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद। भारत की जीडीपी लगभग 3 ट्रिलियन है। पिछले वर्ष रुस की जीडीपी 1.71 ट्रिलियन डॉलर थी। इसमें अब ग्यारह प्रतिशत कमी की संभावना है।

यूक्रेन के साथ परोक्ष रूप से अमेरिका और नाटो देश खड़े हैं। पुतिन उनकी और अपनी शक्ति से अवगत है। अमेरिका और नाटो देश ने यूक्रेन के जरिये अपना हित साधा है। नाटो की बढ़ती ताकत और यूक्रेन के उसमें शामिल होने के सबसे बड़े खतरे रूस के सामने हैं। इसी कारण रूस ने बार-बार यह चेतावनी दी है कि वह रूस की सुरक्षा के लिए किसी हद तक जा सकता है। वहाँ का सैन्य विभाग तीसरे विश्व युद्ध के आरम्भ की बात कह चुका है। उत्तर कोरिया द्वारा मध्यम एवं लम्बी दूरी की मिसाइलों का परीक्षण जारी है। 2017 के बाद पहली बार इस वर्ष मार्च के तीसरे सप्ताह में उत्तर कोरिया ने एक अन्तरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (आइ सी वी एम) का परीक्षण लाँच कर एक संदेश दे दिया है।

सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार यह मिसाइल अमेरिका के अधिकांश हिस्सों तक पहुँच सकता है। पश्चिमी मीडिया ने इसे ‘राक्षस मिसाइल’ कहा है। चीन और ताइवान का मामला शान्त होने को नहीं है। चीन ताइवान पर हमला करने की तैयारी में है। आज बड़े-बड़े देश मिसाइल टेस्ट कर रहे हैं । सबको अपनी चिन्ता है। एक छोटी सी चिनगारी दुनिया को मटियामेट कर सकती है। रुस-यूक्रेन युद्ध से सर्वाधिक लाभ अमेरिका को मिला है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद समय-समय पर तीसरे विश्व युद्ध की अटकलें लगायी जाती रही हैं। बड़े देश अपना प्रभाव चाहते हैं। अमेरिका एवं नाटो देशों की जिम्मेदारी आज कहीं अधिक है। कोई नहीं कह सकता कि तीसरा विश्व युद्ध कब होगा? शीत युद्ध के एक नयी दौर का आरम्भ हो रहा है। अमेरिका और नाटो देश द्वारा रुस को बार-बार अपमानित और कमजोर करने की, उसकी सीमाओं को घेरने की अगली कोशिश विश्वयुद्ध को आमन्त्रित करेगी। पुतिन ने यह कहा था कि अगर रूस ही नहीं रहेगा तो इस पृथ्वी के रहने का क्या अर्थ है

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