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शख्सियतसिनेमा

एक तंगदिल शहंशाह मौत से ज़्यादा किसी को दे भी क्या सकता है।

 

एक्टिंग युनिवर्सिटी
यूसुफ़ ख़ान उर्फ़ दिलीप कुमार का निधन
(11 दिसम्बर 1922 – 7 जुलाई 2021)

कई बार उनकी मौत की झूठी ख़बरें आती रहीं लेकिन आख़िरकार 98 साल की उम्र में आज आप इस जहान ए फ़ानी से कूच कर ही गये। इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहि राजेऊन। अल्लाह पाक आप की मग़फ़िरत फ़रमाए और जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फरमाए।

हिन्दी सिनेमा का इतिहास उनके पहले और उनके बाद लिखा जाएगा। भारतीय सिनेमा का ‘मुग़ल ए आज़म’ आज चला गया। हिन्दी सिनेमा के ‘कोहिनूर’ की चमक आज ख़ामोश हो गयी। जाते-जाते ‘देवदास’ अपने चाहने वालों को रुला गया।

हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्धतम और सर्वप्रिय महानायक जो भारतीय संसद के उच्च सदन राज्य सभा के सदस्य रह चुके थे आज इंतक़ाल कर गये। लिज़ेंड दिलीप कुमार को उनके दौर का सबसे बेहतरीन अभिनेता माना जाता है। त्रासद या दु:खद भूमिकाओं के लिए मशहूर होने के कारण उन्हे ‘ट्रेजिडी किंग’ कहा जाता था। उन्हें भारतीय फ़िल्मों के सर्वोच्च सम्मान “दादा साहब फाल्के” पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। फिल्म फेयर और पद्मभूषण जैसा सम्मान भी उन्हें मिला। इसके अलावा दिलीप कुमार को पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ से भी सम्मानित किया गया था।


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एक महान कलाकार के साथ दिलीप साहब उर्दू के लाजवाब शायर भी थे। लाजवाब संवाद अदायगी और अपनी गंभीर अदाकारी से लोगों को रुलाने वाले दिलीप कुमार का नाम महज़ एक अभिनेता का नाम नहीं बल्कि एक दौर का नाम था। आठ दशक तक की अदाकारी के उस दौर का आज अंत हो गया।

मौत से बचने का सबसे शानदार तरीक़ा है कि दूसरों के दिलों में रहना सीख लिया जाए। ये कफ़न, ये जनाज़े, ये क़ब्र, सिर्फ़ बातें हैं मेरे दोस्त। दरअसल इंसान तब मर जाता है जब उसे याद करने वाला कोई नही रहता। दिलीप कुमार दुनिया भर के लोगों के दिलों में हमेशा जिन्दा रहेंगे। अमिताभ बच्चन से शाहरुख़ ख़ान तक जिन्हें फॉलो करते हुए फ़ख़्र महसूस करते हैं अभिनेता उसे कहते हैं।

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