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एतिहासिक

दास्तान-ए-दंगल सिंह (38)

  • पवन कुमार सिंह
 8 अप्रैल 1975 को कुर्सेला के साथियों ने सत्याग्रह से जेपी को लाचार करके ऐतिहासिक सभा की थी। पर उन्हें सुनने के लिए जुटी अपार भीड़ को देखकर वे खुश हो गए थे। वापसी में मैं उनके साथ चल रहा था। मेरी छाती पर ‘छात्र युवा संघर्ष वाहिनी, (स0 सं0 1) का बिल्ला देख उन्होंने मेरा कंधा थपथपाकर पूछा था — प्रशिक्षण मिला है क्या? मेरे नहीं कहने पर उन्होंने प्रशिक्षक भेजने का वचन दिया था। श्री राधे श्याम योगी के छद्म नामधारी राजस्थान के एक प्रोफेसर साहब ने मेरे घर पर रहकर मेरे गाँव में एक पखवाड़े का प्रशिक्षण शिविर लगाया था। 
        उस शिविर में एक बात पर विशेष जोर था कि हम दमन और अत्याचार का सामना कैसे करें। भूमिगत रहकर गतिविधियों के संचालन का प्रशिक्षण हमें खास तौर पर दिया गया था। लगता है कि जेपी को इमरजेंसी लगने का पूर्वाभास था। हमारा वह शिविर मई महीने में लगा था। उस समय आंदोलन लगातार विशाल होता जा रहा था। बिहार के बाहर बड़े शहरों में जेपी की बड़ी-बड़ी सभाएँ हो रही थीं। बिना विश्राम किये बूढ़ा सेनापति रैलियों पर रैलियां किए जा रहा था। जेपी के एक आह्वान पर सम्पूर्ण देश का चक्का जाम कर देने की स्थिति बन गई थी।
          उसी समय एक नाटकीय घटनाक्रम में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रायबरेली से अपने चुनाव के खिलाफ समाजवादी नेता राज नारायण से मुकदमा हार गयीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले ने आग में घी का काम किया। सम्पूर्ण देश से इंदिरा जी के इस्तीफे की मांग होने लगी। उस समय इंदिरा जी के सभी फैसलों में संजय गांधी का हस्तक्षेप होने लगा था। वस्तुतः सत्ता के ड्राइविंग सीट पर संजय गांधी पूरी तरह काबिज हो चुके थे। नामी गिरामी कांग्रेसी मुख्यमंत्री उनकी चरण पादुका उठाकर अपने को धन्य-धन्य मान रहे थे। इंदिरा जी पुत्रमोह में कमजोर हो गई थीं। राज नारायण से केस हार जाने के बाद बचाव का एकमात्र विकल्प इंदिरा जी को इमरजेंसी ही लगा। फिर आ गई 25-26 जून 1975 की वह काली रात जो भारत के लोकतंत्र के इतिहास के एक काले अध्याय की शुरुआत थी। आपातकाल की घोषणा से हर खासोआम हैरान था। यह क्या हो गया! अचानक पूरा परिदृश्य बदल गया। आंदोलन के शीर्ष नेतृत्व को रातोंरात कारागार में डाल दिया गया। जो गिरफ्तारी से बच गए, उन्हें भूमिगत हो जाना पड़ा। लोकतंत्र की जगह तानाशाही आ गई। प्रशासन बेलगाम होकर दमनकारी गतिविधियों में संलग्न हो गया। ‘मीसा’ और ‘डीआईआर’ ऐक्ट के बहाने मनमानी गिरफ्तारियाँ और प्रताड़ना होने लगीं। पुलिस लाइसेंसी गुंडा की भूमिका में उतर आई।
     हमारे कुर्सेला संगठन के भी आधे दर्जन वरिष्ठ साथी गिरफ्तार कर लिये गए। पाँच-सात दिनों तक तो सभी साथी हतप्रभ रहे। धीरे-धीरे स्थिति समझ में आने लगी। हाल ही में ऐसी स्थिति में अपने को ढालने और संघर्ष को जारी रखने का प्रशिक्षण हमने प्राप्त किया था। उस ट्रेनिंग के अनुसार ही हमने भूमिगत रहकर आंदोलन की गतिविधियां चालू कर दीं। बहुत दिनों तक तो कुर्सेला में अखबार ही नहीं मिले, जब मिले भी तो पूरी तरह सेंसर्ड। आंदोलन या उसके दमन से सम्बंधित खबरों का नामोनिशान भी नहीं। केवल सरकार के गुणगान और तुगलकी फरमान से पटे अखबारों के पन्ने। ”अनुशासन ही देश को महान बनाता है” , “आपातकाल अनुशासनपर्व है” , “इंदिरा इज इंडिया” आदि जुमले जनता की जुबान पर नाच रहे थे। रेडियो और अखबार दोनों पर सेंसरशिप का पहरा था। जनता वही जान पा रही थी जो सरकार उसे बता रही थी। सच्ची और जरूरी खबरें आम लोगों तक नहीं पहुँच पा रही थीं।
          भूमिगत रहकर जनसरोकार से जुड़ी खबरें अधिक- से- अधिक लोगों तक पहुँचाने का बीड़ा हम साथियों ने उठाया। लिखित रूप में प्रतिलिपि बनाने का एकमात्र साधन उस समय कार्बन पेपर था। पटना से प्राप्त संदेशों और स्थानीय घटनाओं से सम्बंधित खबरों को हम ‘संघर्ष बुलेटिन’ नाम से एक पृष्ठ के हस्तलिखित अखबार में छापने लगे। एक पन्ने की केवल दो कार्बन कॉपी बन पाती थी। अच्छी लिखावट वाले साथियों का काम बहुत बढ़ गया था। कुछ साथियों की लिखावट ठोक-पीटकर सुधारी गई थी।
       इमरजेंसी की घोषणा के एक महीने बाद ही बाढ़ का मौसम शुरू हो गया था। उस समय मेरा गाँव चारों ओर से पानी से घिर जाता था और आजादी के 72 वर्षों बाद अब भी घिर जाता है। आवागमन का एकमात्र साधन नाव। साल के चार महीने गाँव देश के मुख्य भूभाग से अलग रहता है। मकई और अरहर के घने खेतों से घिरे गाँव में पुलिस की दबिश की आशंका न्यूनतम थी, इसीलिए इमरजेंसी में भूमिगत गतिविधियाँ चालू रखने के लिए मेरा गाँव संघर्ष मुख्यालय बन गया। मकई के खेतों की जानवरों से रखवाली के लिए कोसी क्षेत्र में बाँस का अठगोरवा मचान बनाया जाता है। उस समय यह प्रायः सभी खेतों में होता था, अब चलन कम हो गया है। उन्हीं मचानों में अलग अलग दो या तीन साथियों के दल बनाकर लालटेन की रोशनी में, थककर निढाल हो जाने तक, हम अखबार लिखते थे। सौ-सवा-सौ अखबार रोज लिखकर दोपहर होने तक गाँव और बाजार के प्रमुख लोगों तक पहुँचाने का काम हम इमरजेंसी खत्म होने तक सफलता के साथ करते रहे। लगभग दस हजार लोग हमारा संघर्ष बुलेटिन रोज पढ़ते थे। स्टेशनरी की आपूर्ति समर्थकों द्वारा की जाती थी। हमारे अखबार से प्रशासन की नाक में दम था। किन्तु लाख कोशिशों के बावजूद पुलिस कभी अखबार लिखने वाले हम एक दर्जन साथियों को गिरफ्तार नहीं कर सकी।
           तानाशाही के उस ‘अनुशासन पर्व’ में इंदिरा जी ने बीस सूत्री और संजय गांधी ने पाँच सूत्री कार्यक्रम लागू करके देशवासियों को राष्ट्र की तरक्की में जुट जाने का आह्वान किया। ‘हम दो हमारे दो’ के नारे के साथ संजय गांधी का परिवार नियोजन का जोरदार अभियान भले ही अफसरशाही के भंवरजाल में भटककर बदनाम हो गया, किन्तु मेरी नजर में वह भारत के इतिहास में सत्ता द्वारा राष्ट्रहित में लिया गया सबसे बड़ा और साहसिक फैसला था। जबसे होश संभाला है, जनसंख्या की अनियंत्रित वृद्धि को मैं अपने देश की इकलौती समस्या मानता हूँ जो अन्य सभी समस्याओं की जननी है। जनसंख्या-विस्फोट पर काबू पाने के लिए संजय जी के उस प्रयास की मैं प्रशंसा करता हूँ। आज वोट बैंक के चक्कर में इस गम्भीर संकट पर कोई नेतृत्व मुँह खोलने की भी हिम्मत नहीं करता है। इमरजेंसी में मुझे एक और बात बहुत अच्छी लगी थी। लतखोरी की हद तक संवेदनहीन और घूसखोर सरकारी तन्त्र का उन दिनों कायाकल्प-सा हो गया था। घड़ी की सुइयों के साथ रेलगाड़ियाँ, बसें और सरकारी संचिकाएँ चलने लगी थीं। स्वतंत्रता और लोकतंत्र का पक्षधर बुद्धिजीवी वर्ग भले ही बेचैन और परेशान था, निरक्षर और अबोध जनता सरकारी काम-काज और नीतियों से आम तौर पर खुश थी। इमरजेंसी का स्याह पक्ष भले ही बहुत स्याह है, किन्तु उसके इकलौते स्वेत पन्ने पर एक इश्तेहार मुझे अब और भी चमकता हुआ नजर आता है—“लातों के भूत बातों से नहीं मानते।”
मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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