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मोदी की नादानियाँ और चीनी सामान विरोध की नाटक-नौटंकियाँ 

 

इस समय भारत और चीन के रिश्तों को लेकर देश में चिन्ता का माहौल जारी है, ऐसे में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ पर आरोप लग रहे हैं कि वह भारतीय जनमानस की भावनाओं के साथ शोषण करने की नीति को तरजीह दे रहा है। भाजपा और स्वदेशी जागरण मंच दोनों आरएसएस के अनुषांगिक संगठन है। एक तरफ भाजपा शासित दल के प्रधानमन्त्री चीन को 20 लाख करोड़ से ज्यादा का आयात कर फायदा पहुँचा चुके हैं वहीं जन भावनाओं के साथ खेल खेलने के लिए संघ का ही स्वदेशी जागरण मंच ने चीनी वस्तुओं का बहिष्कार करने के लिए हस्ताक्षर अभियान छेड़ रखा है।

क्या आरएसएस को यह नही मालूम है कि किसी भी विदेशी सामान का आयात केन्द्र की सरकार की सहमति के बिना देश में नही पहुँचता है या वह जानबुझ कर उस नीति को अंजाम दे रही है कि चोर को कहो चोरी करते रहे और साहूकार को कहो जागते रहे।

आपको ध्यान हो कि सत्ता में आने के बाद प्रधानमन्त्री मोदी और उनकी सरकार ने अपनी छवि राष्ट्रवादियों की बनाई थी। भाजपा ही नही बल्कि स्वदेशी जागरण मंच के कई नेता अक्सर चीन के खिलाफ बयान देते हुए और ट्विटर पर लिखते हुए भी पाये गये हैं। लेकिन असल में राष्ट्रवाद का छलावा ही सामने आया। अब जनता चाहती है कि चीन के खिलाफ सरकार और उसके नेताओं की बातें भाषणों और सोशल मीडिया से आगे बढक़र हकीकत का का अमली जामा पहनें। लेकिन क्या ये होना सम्भव है।

दरअसल, मामला सब साख का ही है। जब से नरेन्द्र मोदी ने चीन के सामने हथियार ड़ाल दिये है तब से देश में भाजपा और आरएसएस के विरोध में एक लहर सी दौड़ पड़ी है। गलवान घाटी में चीनी सेना द्वारा किए गये हमले के बाद से भारतीयों के मन में रोष का माहौल है। इसके लिए आमजन नरेन्द्र मोदी की ढूलमूल विदेशी नीति को भी दोषी मान रहे हैं। मतलब साफ है कि जो लोग खुद को राष्ट्रवादी बताते नही थकते थे आज उनके राष्ट्रवाद पर सवाल खड़े होने लगे है। अब सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति में साख को कैसे बचाया जाए।

इसीलिए स्वदेशी जागरण मंच द्वारा स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने व उसे प्रयोग करने एवं चीनी वस्तुओं का बहिष्कार करने के लिए हस्ताक्षर अभियान छेड़ दिया। इस सम्बन्ध में स्वदेशी जागरण मंच के सह संयोजक अश्विनी महाजन द्वारा दावा किया जा रहा है कि ‘स्वदेशी सामान अपनाने वाले इस अभियान से अभी तक 20 देशों के लोग जुड़ चुके हैं। इसमें अमेरिका, फ़्रांस, जर्मनी, जापान और नेपाल जैसे देशों में रहने वाले भारतीय लोग भी शामिल हैं। वे इसके साथ ही दावा करते हैं कि अभी तक इस अभियान से करीब 6 लाख लोग जुड़ चुके हैं। यह अभियान सफल बने इसके लिए भी विशेष पहल की गयी है। इसके तहत स्वदेशी एजुकेटर बच्चों व युवाओं के मन में अलख जगाएगें। स्वदेशी एजुकेटर स्कूलों और कॉलेजों में जाकर बच्चों-युवाओं और अलग अलग मंचों से लोगों से स्वदेशी को अपनाने के लिए प्रेरित करेगें और इसके फायदे समझाएँगे।

स्वदेशी एजुकेटर के लिए किसी विशेषता की जरूरत नहीं है, कोई भी अपनी स्वेच्छा से बन सकता है। इस के साथ ही ‘ज्वाइन स्वदेशी’ से नये वालंटियर्स की टीम भी तैयार की जाएगी। इसमें युवा ही शामिल होंगे। बताते चलूं कि संगठन ने ये अभियान गूगल के माध्यम से चलाया है। इसमें फिलहाल चीन के सामान का बहिष्कार करने और भविष्य में आत्मनिर्भर होकर विदेशी सामान नहीं खरीदने के लिए जागरुकता फैलाई जाएगी। हालाँकि यह अभियान अभी कुछ दिनों तक जारी रहने की बात की जा रही है और बताया जा रहा है कि करीब 100 से अधिक अन्य संगठन भी इस अभियान में सहयोग दे रहे हैं।

इस अभियान में स्वदेशी जागरण के मंच के साथ ही विश्व हिन्दू परिषद भी मैदान में उतर गया है। वीएचपी और उसकी युवाएँ शाखाएँ बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी के कार्यकर्ता भी घर-घर जाकर लोगों से स्वदेशी वस्तुएँ अपनाने के लिए जागरुक कर रहे हैं। सनद रहे कि इसके पहले कन्फेडेरशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने चीनी वस्तुओं के बहिष्कार करने का निर्णय लिया था। कैट ने ‘भारतीय सामान-हमारा अभिमान’ नाम से अभियान की शुरूआत की। भारतीय व्यापारी संघ ने चीन से आने वाले कॉस्मेटिक, बैग, खिलौने, फर्निचर, जूते-चप्पल सहित ऐसे करीब 500 सामानों की लिस्ट तैयार की है जो अब भारत नहीं लेगा और चीनी सामानों का बायकॉट भी करेगा।

मतलब नाटक-नौटंकी पूरे सबाब पर है। असल में होना तो यह चाहिए था कि इन सबको केन्द्र में बैठी भाजपा शासित नरेन्द्र मोदी सरकार पर दबाव बनाकर चीन के आयात पर अंकुश लगाने का अभियान चलाना था लेकिन इसके उलट जनता को मुर्ख समझ बेवकुफ बनाने का काम शुरू कर दिया है। मोदी का चीन रिलेशन जगजाहिर है। सत्ता में आने के बाद अब तक चीन को बीस लाख करोड़ का फायदा पहुँचाया जा चुका है। तब से अब तक आरएसएस और स्वदेशी जागरण मंच क्या कुम्भकरण की नींद सो रहे थे या जानबुझ कर चुप थे।

असल में अब इनको इस बात का विश्लेषण करना चाहिए कि आखिर चीनी सामान का विरोध कर दिया तो देश में किस स्तर तक बेरोजगारी फैलेगी और उस पर अंकुश कैसे लगाया जाएगा। इसके साथ ही इस बाद का भी विश्लेषण होना चाहिए कि नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद अब तक के कार्यकाल में चीन का भारत की ओर से कितना नुकसान किया है या लाभ पहुँचाया है।

इस बात को कोई नकार नही सकता है कि चीन वर्तमान में दुनिया की उभरती आर्थिक शक्ति के तौर पर सामने आया है। इसलिए उसको नुकसान भी उसी तरीके से पहुँचाया जा सकता था लेकिन मोदी ने इसके उलट उसे फायदा ही फायदा दिया। हम सबसे पहले मोदी के करीबी चीन के निवेशकों के सम्बन्ध में बात करते हैं। ये जान लें कि मोदी सरकार का सोलर मिशन चीन के भरोसे ही टिका है। वर्ष 2015 में मोदी सरकार ने 2022 तक 1 लाख मेगावाट सोलर पावर उत्पादन क्षमता हासिल करने की महत्वाकांक्षी योजना प्रस्तावित की है लेकिन यह योजना भी चीन के भरोसे ही कर दी गयी है। बता दें कि इस सोलर मिशन के लिए 84 फीसदी उपकरण चीन से आयत किये गये हैं।

आप सब गुजरात मॉडल और चीनी कम्पनियों के मोदी प्रेम से तो वकिब ही होगें। इसी चीन प्रेम के चलते मोदी भारत में अब तक के ऐसे प्रधानमन्त्री बन गये हैं जिनने सबसे अधिक चीन की यात्राएँ की है। वे पाँच बार पीएम के रूप में चीन गये और चार बार गुजरात के सीएम रहते समय गये। ये भी जान ले कि भारत में अब तक किसी भी राज्य के सीएम ने चीन के प्रति इतनी रूचि नहीं दिखाई जितनी मोदी ने दिखाई थी। चाहे पीएम रहे या सीएम अभी भी इनका चीन प्रेम सबके सामने है।

जाहिर है कि कोई भी सीएम विदेश नीति का निर्धारक नहीं होता है। वो आर्थिक कारणों से ही विदेश यात्राएँ करता है। इससे भी साफ है कि गुजरात का सीएम रहते मोदी का उद्देश्य आर्थिक लाभ अर्जित करना ही था। आपको यह भी जान लेना चाहिए कि गुजरात मॉडल के चर्चित इंवेट बाईब्रेंट गुजरात में भी चीनी कम्पनियों की खासी भूमिका रही है।

वैसे निवेश बुरी बात नही है। अच्छी ही पहल कही जा सकती है, फिर निवेश चाहे देशी हो या। फिर सवाल खड़ा होता है कि आखिर चीनी सामान का बॉयकाट करने और स्वदेशी अपनाने की इस तरह की फर्जी मुहिमों पर अंकुश क्यूं नही लगना चाहिए। स्वदेशी अपनाओं के नाप पर क्यूं दीवाली के सीजन में स्वदेशी जागरण मंच-भाजपा और उसके सहयोगी उग्रवादी संगठन हर साल छोटे-छोटे व्यापारियों का धंधा चौपट करते है। क्यूं ये संगठन अपनी तानाशाही का परिचय देकर चीन के सामान की सडक़ पर होली जला कर छोटे व्यापारियों को तबाह करते है। क्या ये मोदी से अनुशंसा कर चीनी सामान के आयात पर प्रतिबन्ध नही लगवा सकते है। लेकिन इनका असल मकसद चीनी सामान पर प्रतिबन्ध लगाना नही है बल्कि इनका मकसद तो फर्जी राष्ट्रवाद का ज्वार पैदा कर लोगों की भावनाएँ भडक़ाना और छोटे-छोटे रेहड़ी पटरी वाले व्यापारियों को तबाह करना है।

असल में इन दोगलों को मोदी से सवाल यह करना चाहिए कि वित्तीय वर्ष 2015-16 में भारत ने चीन से 4. 43 लाख करोड़ का सालाना सामान आयात क्यों किया था। नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में यह आँकड़ा साल दर साल बढता ही गया। मसलन वर्ष 2016-17 में 4. 6 लाख करोड़ था तो 2017-18 में 5. 6 लाख करोड़। चीन से आयात का यह आँकड़ा वर्ष 2019 में बढक़र 6.18 लाख करोड़ तक पहुँच गया। सबको अच्छे से ध्यान होगा कि मोदी ने सत्ता में आते ही ‘मेक इन इंडिया’ का नारा दिया था। इस लक्ष्य को समय पर प्राप्त करने के लिए वर्ष 2015-18 के बीच 35,580 करोड़ रुपए की बजटीय सहायता की जरूरत बतायी गयी थी। मेक इन इंडिय़ा के तहत भी एक बड़ी रकम 84 फीसदी चीन के खाते में गया है।

देश की सुरक्षा के नाम पर भी चीन को खूब माल लूटाया। चीन की एक मशहूर टेलिकॉम कम्पनी हुआवै है। यह कम्पनी ड़ाटा चोरी के मामले में विश्व में बदनाम है। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा को ताक पर रखते हुए और तमाम नियम कायदों को दरकिनार करते हुए मोदी सरकार ने 2019 में हुआवै कम्पनी को भारत में टेलिकॉम क्षेत्र में बिना किसी सीमा के काम करने की अनुमति दे दी। ये फैसला इसलिए भी आचम्भित करने वाला है कि भारत के सभी करीबी देशों जापान, ऑस्ट्रिया और अमेरिका ने हुआवै पर डाटा चोरी का आरोप प्रतिबन्ध लगाने की बात की थी।

इन आरोपों के चलते कई देशों ने हुआवै को प्रतिबन्ध कर दिया है। जैसे न्यूजीलैण्ड, जापान, नॉर्वे। स्वेडन ने भी हुआवै की जगह 5 जी नेटवर्क विकसित करने का कार्य किसी अन्य कम्पनी को दे दिया। ब्रिटेन ने 5 जी नेटवर्क के विकास के लिए हुआवै की भूमिका को सीमित कर दिया लेकिन मादी ने खुली छूट दे दी।

पीएम मोदी की चीन पर महरबानियों की कहानी यहीं खत्म नहीं हो जाती हैं। वे हर क्षेत्र में चीनी कम्पनियों को काम करने के अवसर देते है। सरदार पटेल के नाम पर लौह पुरुष का नारा लगाने वाली कथित राष्ट्रवादी मोदी सरकार ने उनकी मूर्ति यानि स्टेचू ऑफ यूनिटी का ठेका भी चीन की एक कम्पनी को ही दिया था। 522 फीट की इस मूर्ति को बनाने में 3000 करोड़ का खर्चा आया था। यह फैसला ‘मेक इन इंडिया’ नीति और स्वयं सरदार पटेल के सिद्धान्तों के खिलाफ था। सरदार खुद चीन के घोर विरोधी थे। 7 नवम्बर, 1950 को अपने निधन के महज एक महीने पहले लिखे एक पत्र में नेहरु से उनने कहा था कि चीन से चाहे जितनी भी दोस्ती कर ली जाए लेकिन अन्दर से वो हमें अपना दोस्त नहीं मानता है और ना ही कभी मानेगा।

इतने बड़े देश के प्रधानमन्त्री होने के नाते मोदी को इस बात की जानकारी नही थी क्या। या वे जानबुझ कर चीन का फायदा पहुँचाने की नीति पर काम कर रहे थे। सवाल तो यहा उस स्वदेशी जागरण मंच से भी है कि जब इतने करोड़ों के ठेके चीन को दिये जा रहे थे तब वह कौन सी कुम्भकरणीय नींद सो रहा था। हद तो तब हो जाती है कि मोदी सरकार ने संसदीय समीति की उस सिफारिश को भी नजरअंदाज कर चीन को लाभ देने की नीति को जारी रखा जिसमें साफ कहा गया था कि चीन और भारत के बीच जो व्यापार हो रहा है वो कभी भी भारत के हक में नही रहा है।

संसदीय समीति ने सिफारिश रिर्पोट में स्पष्ट कहा कि इस व्यापर में भारत हमेशा घाटे में रहा है। वर्ष 2019 में चीन से व्यापर करने में भारत को 56. 77 बिलियन डॉलर का घाटा हुआ था। इसके अलावा भारत के उद्यमियों को भी इस से नुकसान हुआ था क्योंकि चीन के सस्ते सामान के आगे उनका सामान बाजार में बिक ही नही रहा था। इन सबके चलते जुलाई, 2018 में संसद की स्टैंडिंग समीति ने भी ये सिफारिश की थी कि चीन से आयात किए जाने वाले सामान पर एँटी-डंपिंग शुल्क लगाया जाए। ताकि भारत को हो रहे व्यापर घाटे को इस शुल्क से एडजस्ट किया जा सके और भारतीय उद्यमियों को इससे लाभ हो सके लेकिन मोदी सरकार ने संसदीय समीति की इस सिफारिश को भी नजरअंदाज करते हुए कोई कदम नहीं उठाया।

क्या, स्वदेशी अपनाओं की नाटक-नौटंकी करने वाले संगठनों को इस बढ़ते आकड़े के बारे में मोदी से सवाल-जवाब नही करना चाहिए था। इन तमाम आकडों को जोडा जाए तो भारत ने चीन से लाखों करोड़ रुपए के उत्पाद लिए है। वर्ष 2016 से 2019 तक मोदी ने चीन को 3. 20 लाख करोड़ का अतिरिक्त लाभ पहुँचाया है। इससे ये साफ नही हो जाता है कि स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठन स्वदेशी को अपनाने के लिए प्रेरित नही बल्कि स्वदेशी के नाम पर राजनीति कर रहे हैं और एक दल विशेष को राजनीतिक फायदा पहुँचा रहे हैं।