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सिनेमा

संगीतमय अहसासों का इंद्रधनुष रचती ’99 सांग्स’

 

{Featured in IMDb Critics Reviews}

 

पटकथा, निर्देशन – विश्वेश कृष्णमूर्ति
कलाकार- एहान भट्ट, एडिल्सी वरगस, तेंज़िन दल्हा, मनीषा कोईराला, राम रहीम, रंजीत बारोट आदि।
लेखक एवं निर्माता- ए आर रहमान

इस दुनिया की सारी बीमारियों में सारे बुरे नशों में सबसे बढ़कर मेरा जय। फ़िल्म का पहला संवाद है लेकिन जब यह खत्म होती है तो इस संवाद को बदलने का मन करता है और दिल कहता है इसमें जय की जगह संगीत रखना चाहिए था। क्योंकि कहानी भी एक म्यूजिशियन की है।

भारतीय सिनेमा को अपने संगीत से एक नई बुलंदी देने वाले म्यूजिशियन ए आर रहमान 99 सांग्स के साथ अब फ़िल्म निर्माता भी बन गये हैं। कोरोना वायरस की दूसरी लहर के बीच फ़िल्म शुक्रवार (16 अप्रैल) को सिनेमाघरों में रिलीज़ होने के बाद अब नेटफ्लिक्स पर भी आई है, जो हिंदी के साथ-साथ फ़िल्म तमिल और तेलुगु में भी रिलीज़ की गयी है।

99 सांग्स फ़िल्म के हरेक फ्रेम में रहमान की संगीतमय मौजूदगी साफ़ महसूसी जा सकती है। संगीत और तकनीकी मोर्चे पर तो 99 सांग्स हिट फ़िल्म है मगर कहानी के मामले में रहमान अपने संगीत जैसा जादू बिखेरने में थोड़ा सा चूकते नजर आते हैं।

हर इंसान की जिन्दगी में वो एक चीज होती है जो किसी वक्त उनकी जिन्दगी का मकसद बन सकती है और अक्सर वो चीज जरूरत नहीं सिर्फ़ एक चाह होती है। कहते हैं एक संत थे उन्हें तवायफ़ से प्यार हो गया। लेकिन तवायफ़ ने उन्हें ठुकरा दिया। कहा वासनाओं के छोटे से पिंजरे में क्या जियोगे तुम चाहो तो खुले आसमान में उड़ सकते हो। उन ऊंचाईयों को छू सकते हो जिनके लिए हम जन्म लेते हैं। वो बहुत रोये उन्होंने अपनी आंखें खोली और उनका प्रेम भक्ति में बदल गया। हजारों गीतों और कविताओं में बदल गया। सच्चाई के रास्तों में सिर्फ ठोकरें हैं। लेकिन यह फ़िल्म अपनी रंगीनियत और संगीतमय कहानी के अहसासों के इंद्रधनुष में हमें इस कदर जकड़ती है कि हम इसमें खो से जाते हैं।

ए आर रहमान की लिखी इस कहानी को सबसे ज्यादा मजबूती प्रदान करता है तो इसका स्क्रीनप्ले। निर्देशक विश्वेश कृष्णमूर्ति का स्क्रीनप्ले असरदार साबित होता है। इसीलिए कहानी के सीधे और सपाट होने के बावजूद फ़िल्म अच्छी लगती है। बीच-बीच में जय के बचपन की कहानी के ज़रिए उसके अतीत को भी दिखाया गया है। कहानी जय की है, मगर उसे सोफी के ज़रिए सुनाया जा रहा है, जो असल में बोल नहीं सकती।फ़िल्म के दृश्य मन को छू जाते हैं। जय की संगीत के लिए बेक़रारी फ़िल्म के अहसास को रंगीन भी बनाती है। संगीत सीखने की चाह नन्हे जय को कभी मंदिर तो कभी मस्जिद तो कभी चर्च और गुरद्वारे, तो कभी पक्षियों की चहचहाट में तक ले जाती है, जहां गूंजने वाली प्रार्थनाएं जय की संगीत का सबक़ बनती हैं। म्यूजिक इस दुनिया का एक बचा हुआ आखरी जादू है जिसे ऑस्कर विजेता ए आर रहमान ने अपनी फिल्म में खूब जिया है। एक गाना जिन्दगी और दुनिया बदल सकता है। जिन्दगी में देखने से ज्यादा जरूरी है महसूस करना और वो हमें म्यूजिक सिखाता है।

फ़िल्म में गानों की कोई कमी नहीं है जितने भी गाने हैं अधिकांश अच्छे हैं और अपने फोन की लाइब्रेरी में सहेज कर बार-बार सुनने लायक भी कुछ एक गाने हैं। फ़िल्म के गीत-संगीत के अलावा इसकी दूसरी सबसे बड़ी ख़ूबी सिनेमैटोग्राफी है। तनय सतम/स्टेम और जेम्स काउली ने कैमरे से जादू जो बिखेरा है वह दर्शनीय बन पड़ा है। फ़िल्म के कुछ दृश्यों में कलर कॉम्बिनेशन एक अलग ही एहसास जगाता है। विजुअल इफैक्ट्स टीम के द्वारा की गई मेहनत भी इसमें झलकती है।

म्यूजिशियन के किरदार में एहान ने अपना बेहतरीन दिया है,उनके अभिनय में एक ठहराव नजर आता है। गूंगी लड़की के किरदार में सोफी के किरदार को एडिल्सी शिद्दत से जीती नजर आती है। दोस्त के किरदार में तेंज़िन दल्हा, सोफी के पिता के रोल में रंजीत बरोट और मुख्यमंत्री के रोल में अश्वथ भट्ट जैसे कलाकार भी अपना भरपूर सहयोग करते हैं। वहीं क्लब सिंगर शीला के किरदार में लीज़ा दिलकश लगी हैं। हालांकि वे ज्यादा समय पर्दे पर नहीं आती। रहमान की यह फ़िल्म संगीत प्रेमियों के लिए बेहतरीन तोहफ़ा है। फिल्म के गानों के हिंदी बोल रहमान की पहली फिल्म ‘रोजा’ की याद भी दिलाते हैं।

फिल्म की कहानी में गरीब हीरो, अमीर हीरोइन और बीच में हीरोइन का खड़ूस बाप वाली ये कहानी पहले भी कई बार देखी-सुनी सी भी लगती है। अपने होने वाले ससुर की पार्टी में पियानो बजाता नायक और उन धुनों पर हवा में चित्रकारी करती नायिका ये सब रहमान जैसा जादूगर ही फ़िल्म की कहानी में रच सकता है। इससे पहले यह फ़िल्म कुछ फ़िल्म फेस्टिवल्स में भी सराही जा चुकी है।

अपनी रेटिंग – 3 स्टार

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