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मुद्दा

‘कैलिफोर्निया में कोरोना’ : पुत्री से गले मिलते हुए

 

कोरोना महामारी ने लगभग एक वर्ष से पूरे विश्व को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। विज्ञान और तकनीक के बूते तेज गति से आगे बढ़ रही दुनिया को कोरोना वायरस जैसे अतिसूक्ष्म विषाणु ने भयंकर झटका दिया है। जीवन की क्षणभंगुरता की नये सिरे से व्याख्या होने लगी है। आम जन-जीवन की बेतरह तबाही के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गयी है। हालांकि इन स्थितियों के समानांतर जीवन और प्रकृति की ‘प्रकृति’ को समझने वाले सुखद-सृजनात्मक पहलू भी सामने आए हैं। इसी क्रम में हिन्दी जगत में आई है डॉ। वीरेंद्र भारद्वाज की रचना – ‘कैलिफोर्निया में कोरोना’, जिसमें एक पुत्री द्वारा दूर देश में अकेले भोगा गया यथार्थ पिता की अभिव्यक्ति में साकार होता दिखा है। ऐसा प्रयोग हिन्दी में संभवतः पहली बार हुआ है। “बेटी पिता की आत्मा का उज्ज्वल पक्ष होती है।” के सूत्र-वाक्य को जैसे पूरी रचना निहायत आत्मीयता के साथ व्याख्यायित करती चली है। पिता-पुत्री के सम्बन्ध पर लिखी गयी इस मर्मस्पर्शी रचना में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए कैलिफोर्निया गयी पुत्री और भारत की राजधानी दिल्ली में परिवार के साथ मौजूद पिता की स्नेहिल प्रगाढ़ता और विश्वव्यापी कोरोना महामारी से अचानक उपजी अभूतपूर्व स्थितियों के बीच उन स्वभोगे क्षणों को समेटा है जो बेहद अपरिचित, अटपटे और संत्रासदायक रहे।

लेखक ने बड़ी ईमानदारी के साथ ‘मनोभूमि’ में कह दिया है कि “पहली रचना पहले प्यार जैसी होती है जिसमें प्रौढ़ता, परिपक्वता भले ही न हो पर अल्हड़ता और उद्दाम वेग वाली निश्छलता जरूर होती है। कहने की बेचैनी असमर्थता से जूझती है और अपने सौ जतन के बावजूद भी ‘कुछ और था वो’ की कशमकश से बाहर नहीं निकल पाती!” विशेष परिस्थितियों में उमड़े उद्दाम वेग के प्रतिफलन-स्वरूप रची गयी यह कृति चिंता, शंका, अज्ञात के प्रति भय के बावजूद अंततः जीवन में अदम्य आस्था को जिलाए रखती है। ‘कैलिफोर्निया में कोरोना’ में आलोचकों को ‘तथाकथित’ साहित्य-शास्त्रीय गुण भले ही न मिले, लेकिन कोरोना-काल की विभिन्न त्रासदियों के अलग-अलग रूपों को भोगने-देखने-सुनने-पढ़ने वाले पाठक अनन्य गहराई के साथ इससे अनायास जुड़ जाएंगे – ऐसा पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है। और, इसीलिए अपनी व्यापकता में यह रचना पिता-पुत्री के स्तर पर न रहकर ऐसे हज़ारों-लाखों लोगों की भावाभिव्यक्ति बन जाती है जो इस दुरूह काल में अपने ‘अपनों’ से दूर रहे।

इस उपन्यासनुमा कृति को सात खंडों में बाँटा गया है। ‘वो सपनों की उड़ान’ में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के ‘कन्वोकेशन समारोह’ की मुख्य अतिथि अन्विता शर्मा समारोह से वापसी के समय 13 साल पहले के जीवन की उन स्मृतियों को जीने लगती है जब वह भारत से सपनों की ऊँची उड़ान भरकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने कैलिफोर्निया पहुँची थी। इस खण्ड में विदेशी धरती की भिन्न संस्कृति, अमेरिकी यूनिवर्सिटी का कैम्पस और शिक्षा पद्धति, चाल-चलन, खान-पान को – कुछ सीखने की जिज्ञासा से भरे उत्साही युवा-मन के दृष्टिकोण से बड़ी सूक्ष्मता से दर्शाया गया है जिसमें कहीं आश्चर्य का भाव है तो कहीं उत्सुकता का – अपने देश और अपनी संस्कृति से तुलना तो मन के भीतरी स्तर पर चलती ही रहती है। यूनिवर्सिटी कैम्पस के आस-पास के इलाके में अमेरिका में एशियाई लोगों के प्रति नस्ल-भेद के वाकये, बसों की कमी, कैलिफोर्निया के जंगलों में लगी आग से उत्पन्न असामान्य स्थिति – 24-24 घंटे बिजली कटना, इन्टरनेट कनेक्शन की दिक्कत एक अकेला भारतीय युवा जो दिल्ली जैसे शहर में पला बढ़ा – उसकी मन:स्थिति और मौजूँ परिस्थिति से जूझने के द्वंद्व में ‘सपनों के देश’ अमेरिका के वास्तविक रूप का अनुभव बहुत विश्वसनीय बन पड़ा है।

“नॉस्टेल्जिया के प्रभाव में मैं आज अपने अमेरिका आने संबंधी निर्णय को लेकर पहली बार सशंकित हो उठी।” – कुछ कड़वे अनुभवों के बीच अमेरिका में अन्विता और भारत में पापा द्वारा नए घर की खोज और उसमें ‘शिफ्ट’ होने का प्रसंग काफ़ी दिलचस्प बन पड़ा है। देश-दुनिया की हदों के बावजूद स्नेही मित्र कहीं भी मिल सकते है। ऐसे ही, अमेरिकन पिता और इजिप्शियन माता की एकलौती संतान ‘रोज़’ अन्विता की अमेरिका में गर्व करने लायक पहली पॉजिटिव उपलब्धि सिद्ध हुई। रोज़ के विषय में अन्विता का ये कहना कि – “हर व्यक्ति में दिव्यता का गुण होता है। वह शिक्षा और सत्संगति से धुलकर उजला हो जाता है। रोज़ सच में ही ‘प्योर हार्टेड’ एवं ‘हेल्पफुल नेचर’ की निर्भीक लड़की थी।” – वास्तव में स्वयं अन्विता के चरित्र की ओर भी संकेत करता है।

‘कोरोना का कहर’ में अन्विता का आत्मविश्वास अभी मजबूत होने की दिशा में बढ़ा ही था कि वर्तमान दौर के भयानक हादसे – ‘कोरोना’ ने नयी मुश्किलें खड़ी कर दीं। अन्विता की पीढ़ी के लिए यह बिलकुल नया और वह भी विदेशी धरती पर, परिवार से दूर – निपट अकेले एक अटपटा अनुभव था – “हमारी पीढ़ी ने वर्ल्डवार नहीं देखा था। आज़ादी की लड़ाई या विभाजन की विभीषिका भी नहीं देखी थी। भारत-पाकिस्तान युद्ध भी नहीं देखा था, यहाँ तक कि इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी या कारगिल युद्ध भी नहीं देखा था। किसी भी बड़ी सामाजिक, प्राकृतिक आपदा से भी वास्ता नहीं पड़ा था।” – कोरोना बहुत तेजी से पूरी दुनिया में फैलता जा रहा था और कोरोना से भी तेज गति से वैश्विक स्तर पर टेलीविज़न, इन्टरनेट, सोशल मीडिया पर घूम रही खबरें, वायरल हो रहे वीडियो आतंक फैला रहे थे।

इस पूरे प्रकरण में चीन की वुहान लैब, डब्ल्यू.एच.ओ. की भूमिका, अमेरिका व उसके राष्ट्रपति ट्रंप की बयानबाजी, अमेरिकी लोगों का कोरोना को हल्के में लेना, भारत में प्रधानमंत्री का आह्वान, मजदूरों का पलायन, शराब की दुकानें खुलते ही भीड़ का टूट पड़ना, दिल्ली में तेजी से फैलते कोरोना के साथ ही दक्षिण कोरिया, जापान, इटली, स्पेन जैसे देशों के बिगड़ते हालात, अंतर्राष्ट्रीय हवाई सेवाएं स्थगित होने का उल्लेख करते हुए लेखक ने उस अफरा-तफरी, भय और आंतक के माहौल को चित्रित किया है जो अभी हाल ही में बहुत निकटता से गुजरा है (अभी पूरी तरह गुजरा भी नहीं है)। अनजाने-अपरिचित-अपूर्व माहौल में सुदूर अमेरिका में अन्विता और भारत में परिवार, विशेष रूप से पापा (जिन्होंने अन्विता को इबादतों से पाया था) की बेबसी और लाचारी के मर्मान्तक क्षण पाठक को भाव-विभोर कर देने वाले हैं।

‘गुफाओं के अँधेरे’ में अचानक शुरू हुई ‘ऑनलाइन’ पढाई में डूबती-उतराती अन्विता की मनःस्थिति को बहुत संजीदगी से चित्रित किया गया है। कोरोना ने पूरी दुनिया के स्वभाव, जीवन-शैली को बदल दिया। पहले-पहल ‘एकांतवास’ के सकारात्मक नजरिये ढूंढे और बताये गये। लेकिन मनुष्य अंततः सामाजिक प्राणी है और अपने परिवार, समाज से अधिक दूर रहते ही अकेलापन उसे घेर ही लेता है। दुनिया के अनेक लोगों के साथ ऐसा हुआ। कुछ के लिए अकेलापन ‘स्वयं की खोज’ लेकर आया तो कुछ के लिए ऊब और उकताहट के बरक्स झल्लाहट। ऐसे क्षणों में निराश होती अन्विता का संबल बने पापा – बड़े धैर्य के साथ दिन-रात इस चिंता में लगे रहे कि अन्विता इस अटपटे और अयाचित माहौल में अपने लक्ष्य से न हट जाए। “अकेलापन नासमझ को चिड़चिड़ा बना देता है और समझदार को दार्शनिक”। ऐसे क्षणों में वरिष्ठ गुरुजनों के जिक्र में भारतीय चिंतन ‘ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या’, ‘सर्वेभवन्तु सुखिन:’ जैसे भावों और संस्कारों का आदान-प्रदान पिता-पुत्री के ‘सारस्वत सम्बन्ध’ को पुख्ता करता है। अन्विता द्वारा देखा गया सपना पाठक को भी बुरी तरह झिंझोड़ देता है – क्योंकि ऐसे अनेक डरावने सपने उस समय न जाने कितनी आँखों ने देखे थे और न जाने कितनों ने इस भय को साक्षात झेला भी।

‘ढलती सांझ की उदासी’ में अकेलेपन का तनाव और अधिक घनीभूत होकर ढीला होता है अपनी जड़ों में – चाहे वे हमें जन्म देने वाले माता-पिता हों या समूचे संसार की जननी प्रकृति। “प्रकृति, प्रेम और सौन्दर्य की जननी है। प्रकृति को जीने से पहले उसका होना पड़ता है। उसके साथ चलना ही नहीं होता, हवाओं की तरह बहना होता है।” प्रकृति का हर रूप मनुष्य को कुछ न कुछ सिखा जाता है। कोरोना-काल में प्रकृति की ‘सुनने’ वालों ने इसे बखूबी समझा। ‘मौत के साये में रोशनी की झलक’ में अन्विता के निजी अनुभवों के माध्यम से उस दबाव की झलक मिलती है जिससे जाने-अनजाने सारी दुनिया ग्रस्त थी। एक ऐसा दबाव – जिसे हम स्पष्ट रूप से परिभाषित भी नहीं कर पाते – एक अनजाना किन्तु बहुत गहरा डर सभी महसूस कर रहे थे और भय-तनाव-कशमकश में घिरी अन्विता सुदूर अमेरिका में इस डर से रू-ब-रू हो रही थी – “उन दिनों जीवन में घटने वाली हर घटना के मूल में मुझे हमेशा लगता था कि – ‘यहाँ मैं निपट अकेली हूँ और अपने देश से बहुत दूर हूँ।”

“लेकिन चुनौतियों से डरकर रास्ते बदलना मेरी फितरत नहीं थी। लौट जाने की कोई सूरत नहीं थी और समस्याएँ खत्म हो जाएँ – ऐसी किस्मत नहीं थी।”

“बस एक पापा थे जो आज भी मुझे जैसे उंगली पकड़कर चलना सिखा रहे थे।”

भूकंप के झटके, भारत सहित पूरी दुनिया में बढ़ते कोरोना के मरीज़, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चिल्ल-पौं के बीच अन्विता ने आत्म-संघर्ष से अपनी रूठी हुई किस्मत से फाइनल परीक्षा में गोल्ड मैडल छीन ही लिया। ‘घर लौटते परिंदे’ में अन्विता के सैटाक्रूज से सेन फ्रांसिस्को और सेन फ्रांसिस्को से भारत लौटने के अनुभवों – ‘ग्रेजुएशन से पोस्ट ग्रेजुएशन’ होकर लौटने में अन्विता के सहभागी बने दत्ता और लक्ष्मण अंकल के साथ बिताये गये समय, डॉ। नीतू गुप्ता से हुई बातचीत को बहुत ख़ूबसूरती से संयोजित किया गया है। ‘बावरे बादलों का नदी हो जाना’ अमेरिका से अन्विता के उखड़े मन और भारत में अपने घर लौटने के क्षणों का भी मर्मस्पर्शी वर्णन पाठक को बांधे रखता है।

बीच-बीच में आये छोटे-छोटे प्रसंगों, विशेषकर युवाओं की जीवन-शैली – अमेरिका में ‘गे’ रिश्ते, प्रेमी से शादी करने के लिए पढ़ाई के ‘वीज़ा’ का इस्तेमाल, बर्थ दे पार्टी में अपने खाने का खर्च स्वयं करना आदि के साथ भारत में लॉकडाउन के किस्से भी रोचक लगे हैं। अमेरिकन और भारतीय संस्कृति की तुलना तो अन्विता के मन में अनायास ही होती रही है चाहे वह यातायात नियमों का सख्ती से पालन हो, विकास मॉडल हो, लॉकडाउन के प्रति नजरिया हो या दूसरी छोटी-छोटी बातें हों – ‘अगर मैंने भारत में किसी मदद करने वाले को उसके जूस के पैसे ऑफर किए होते तो वह निश्चित नाराज़ हो जाता। किन्तु यह सांस्कृतिक मूल्यों का वैविध्य था कि उन्होंने इसे सहज रूप से लिया और ‘इट्स ओके’ कहा।’ बेशक इस रचना के केंद्र में अन्विता और पापा का कोरोना-काल में भोगा गया यथार्थ है किन्तु इसके साथ ही अमेरिका में बसे भारतीयों – लक्ष्मण दादा, दत्ता अंकल और यहाँ भारत में रहने वाले ‘अपनों’ का सम्मिलित स्नेह और दुआएं अंततः अन्विता के सफल होने में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में भागीदार बनते हैं, जिन्हें अन्विता बारम्बार महसूस भी करती है।

‘कैलिफोर्निया में कोरोना’ की भाषा में अचूक पकड़ है जो आज के पाठक को अपने साथ आसानी से बहा ले जाती है। घोर अकेलेपन की खीज और निराशा भरे क्षणों को उनकी पूरी गंभीरता के साथ भाषा ने साधा है। प्रकृति के सौन्दर्य को अभिव्यक्त करने में लेखक का मन विशेष रूप से रमा है। ‘उत्कृष्ट मनुष्यों को उनका असाधारण चरित्र प्रतिष्ठा देता है, उनका कुल या परंपरा नहीं।’ ‘मैंने कहीं पढ़ा था कि ज्यादा बोझ वाले हमेशा परेशान होते हैं। यह बोझ चाहे सामान का हो या अभिमान का।’ ‘जीवन में कुछ निश्चित हो न हो, केवल एक चीज जरूर निश्चित होती है और वह है – अनिश्चितता’ – जैसे वाक्य लेखक के साहित्यिक-सांस्कृतिक सरोकारों और भारतीय मूल्यों में अटूट आस्था को प्रमाणित करते चले हैं। कुछेक प्रसंगों में व्यंग्य की धार भी सटीक बन पड़ी है। पुस्तक में हर खण्ड से पहले बनाये गये ‘स्केच’ ‘कैलिफोर्निया में कोरोना’ में आयी विभिन्न स्थितियों-मनःस्थितियों के अनुरूप सटीक बन पड़े हैं। ‘फ्लैशबैक’ तकनीक और ‘मैं’ शैली में लिखी गयी यह रचना एक साथ उपन्यास, आत्मकथा, यात्रा वृत्तांत, डायरी और संस्मरण का आस्वाद देती है। बतौर लेखक, यह रचना “जीवन की चुनौतियों को नयी आवाज देती एक युवा मन की स्वप्निल उड़ान है जो जीवन के राग-विराग में संघर्षरत है।” वस्तुतः ‘कैलिफोर्निया में कोरोना’ नॉस्टेल्जिया की श्रुत परम्परा का नवीन प्रयोग है जिसमें संवेदनात्मक धरातल पर पिता-पुत्री की अनुभूति और अभिव्यक्ति ऐकमैक हो गयी है।

हिन्दी साहित्य में पिता-पुत्री के संबंधों पर बहुत कम लिखा गया है। जवाहर लाल नेहरू कृत ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’, छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की लम्बी कविता ‘सरोज स्मृति’, माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘बेटी की बिदा’, सुभद्रा कुमारी चौहान के ‘मेरा नया बचपन’ इस सन्दर्भ में क्लासिक रचनाएँ है। कुछेक और रचनाएं भी जरूर होंगी। वरना तो ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘भ्रूण-हत्या’ जैसे जन-जागरूकता के विषय ही अधिक छाये रहते हैं। ऐसी स्थिति में ‘कैलिफोर्निया में कोरोना’ पिता-पुत्री के स्नेहमय बंधन की एक नयी दिशा को टटोलती दिखती है। अन्विता के घोर तनाव के क्षणों में पापा एक ऐसे अविचलित, विशाल और छायादार वृक्ष की भाँति खड़े नज़र आते हैं जो अपने कोटरों, शाखों, पत्तों में न जाने कितनी भावों-द्वंद्वों को थामे रखता है। पापा जैसे अदृश्य रूप में अन्विता की उंगली थामे रहते हैं। ‘कैलिफोर्निया में कोरोना’ के अंतिम पन्ने पढ़ते हुए अनायास कवि कुँवर नारायण की प्रसिद्ध कविता ‘पिता से गले मिलते’ का स्मरण हो आता है –

“पिता से गले मिलते

आश्वस्त होता नचिकेता कि

उनका संसार अभी जीवित है।

उसकी इच्छा होती

कि यात्राओं के लिए

असंख्य जगहें और अनन्त समय हो

और लौटने के लिए

हर समय हर जगह अपना एक घर”

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