परती परिकथा

फासिज्म का आरोप और भारतीय लोकतन्त्र

हितेन्द्र पटेल

भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यहाँ वैचारिक संघर्ष हमेशा बहुस्तरीय रहे हैं। स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय से ही राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, सांस्कृतिक पहचान और लोकतन्त्र की विभिन्न अवधारणाएँ एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करती रही हैं। लेकिन लम्बे समय तक एक वैचारिक सहमति यह बनी रही कि हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति को मुख्यधारा से अलग रखकर ही भारतीय लोकतन्त्र की रक्षा की जा सकती है। बाद के दशकों में यही प्रश्न भारतीय राजनीति के सबसे बड़े विवादों में बदल गया।

रवीश कुमार ने एक बार अमित शाह के घर पर रहकर 2007 में रिपोर्टिंग की थी। 2019 में उस इण्टरव्यू को उन्होंने फिर दिखाया और कहा था कि नेताओं का जीवन बहुत दिलचस्प होता है। वह कब किताब बन जाता है और कब किताब का फुटनोट, यह कोई नहीं जानता।
2007 में अमित शाह, नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात में चुनाव लड़ रहे थे और उस समय उनके घर में एक धार्मिक माहौल था। देवी-देवताओं की तस्वीरों के बीच गाँधीजी की तस्वीर भी लगी थी। उस समय केन्द्र में मनमोहन सिंह प्रधानमन्त्री थे और उनका पहला कार्यकाल चल रहा था।

उस समय बहुत कम लोगों ने कल्पना की होगी कि गुजरात की राजनीति का यह प्रयोग आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदल देगा। भारतीय राजनीति में अक्सर क्षेत्रीय घटनाएँ बाद में राष्ट्रीय विमर्श का आधार बनती रही हैं। गुजरात का दौर भी कुछ वैसा ही था। वहाँ प्रशासन, हिन्दू पहचान, विकास और संगठन — इन चारों को एक साथ जोड़ने की जो कोशिश दिखाई दी, उसने धीरे-धीरे एक वैकल्पिक राजनीतिक मॉडल का रूप ले लिया। उस समय तक दिल्ली की राजनीति में यह विश्वास बना हुआ था कि राष्ट्रीय स्तर पर वही दल स्थायी रूप से प्रभावशाली रह सकते हैं जो नेहरूवादी सहमति के भीतर अपनी जगह बनाए रखें। भाजपा का उभार इस सहमति को चुनौती देने वाला था।

2007 से लेकर 2019 के बीच भारतीय राजनीति का परिदृश्य बहुत बदल चुका था। भाजपा केन्द्र में मजबूत हो चुकी थी और बाद के चुनावों में उसे और अधिक सीटें जीतने की उम्मीद थी। उसे आशातीत सफलता मिली भी।
इस कहानी को अगर आज तक खींचकर लाया जाए तो कहा जा सकता है कि भाजपा लगातार मजबूत होती गयी है। उसके विरोध में खड़ी राजनीतिक शक्तियाँ भी अब व्यापक मोर्चा बनाने की बात कर रही हैं। लगभग बीस वर्षों के इस कालखण्ड की राजनीति पर कुछ बातें करने की कोशिश यहाँ की गयी है।

भारतीय राजनीतिक इतिहास का विश्लेषण यह बताता है कि भारतीय राजनीति की पाँच धाराएँ पिछले सौ वर्षों में सक्रिय रही हैं — राष्ट्रीय कॉंग्रेस, वामपन्थी विचारधारा, समाजवादी विचारधारा, क्षेत्रीय पार्टियों की स्थानीयता लिए हुए राजनीति और हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा। इनमें से पहली चार धाराएँ मोटे तौर पर भारतीय विचारधारा के भीतर मानी जाती थीं। वे एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा में रहते हुए भी एक-दूसरे की वैधता को स्वीकार करती थीं। इन चारों से इतर एक शक्ति थी हिन्दू राष्ट्रीय विचारधारा को लेकर चलने वाली धारा। चारों का आपस में संघर्ष था, लेकिन चारों पाँचवें को विजातीय विचारधारा के रूप में ही देखते रहे।

क्या हिन्दू राष्ट्रवाद एक विजातीय राजनीतिक विचारधारा है? क्या सावरकर का चिन्तन देश की एकता के लिए खतरा था? क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हिन्दू और मुसलमानों के बीच विभाजन की बुनियाद रखी? क्या हिन्दू महासभा राष्ट्र को भीतर से बाँटने वाली विचारधारा थी? क्या इन सबने मिलकर भारत में फासिस्ट शक्तियों को बढ़ावा दिया?

इन प्रश्नों का उत्तर 1947 से लेकर 1989 तक प्रभावशाली राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग प्रायः ‘हाँ’ में देता रहा। उनके लिए जो भी हिन्दू राजनीतिक हित की बात करेगा, वह राष्ट्रहित के विरुद्ध माना जाएगा। इस मामले में कॉंग्रेस, वामपन्थ, समाजवादी और क्षेत्रीय राजनीति के प्रभावशाली हिस्से एक मत दिखाई देते थे। पाँचवीं धारा हाशिए पर थी। 1948 से 1989 के बीच इन्दिरा गाँधी ने संसद में अटल बिहारी वाजपेयी को फासिस्ट कहा था।

इण्डियन आइडियोलॉजी का वर्चस्व 2007 तक किसी न किसी रूप में बना रहा। 1977-79 और 1999-2004 के बीच कुछ समय ऐसा अवश्य आया जब इसे चुनौती मिलती दिखाई पड़ी। इस विचारधारा के समर्थकों को लगता है कि कुछ नेताओं ने ‘फासिस्ट शक्तियों’ को भारतीय राजनीति में जगह दिलायी। इनमें सबसे पहले राममनोहर लोहिया का नाम लिया जाता है, जिन्होंने गैर-कॉंग्रेसवाद की राजनीति को आगे बढ़ाया। उसके बाद जयप्रकाश नारायण का नाम आता है। उनके नेतृत्व में जनता पार्टी बनी जिसका उद्देश्य था किसी भी तरह इन्दिरा गाँधी को सत्ता से हटाना।
इण्डियन आइडियोलॉजी के समर्थकों को यह लगता है कि जयप्रकाश नारायण के कारण जनसंघ पहली बार मुख्यधारा राजनीति में वैध सहयोगी के रूप में स्वीकार किया गया।

तीसरे खलनायक के रूप में जॉर्ज फर्नांडिस का नाम लिया जाता है। जनता पार्टी के बिखराव के बाद उन्होंने भाजपा के साथ गठबन्धन राजनीति की और बाद में एनडीए के महत्त्वपूर्ण नेता बने। इसके बाद ममता बनर्जी का नाम आता है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की शुरुआती राजनीतिक उपस्थिति के लिए वामपन्थी लम्बे समय तक उन्हें जिम्मेदार मानते रहे। पाँचवें उदाहरण के रूप में नीतीश कुमार का उल्लेख किया जा सकता है।
दो अन्य नेताओं — कर्पूरी ठाकुर और मायावती — के बारे में भी समय-समय पर यह धारणा बनाई गयी कि उन्होंने जनसंघ या भाजपा को वैधता दी।

लेकिन यहाँ रुककर एक बुनियादी प्रश्न पर विचार करना चाहिए कि क्या कॉंग्रेस और हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों के बीच सम्बन्ध शुरू से ही शत्रुतापूर्ण थे? ईमानदार उत्तर होगा — नहीं। हिन्दू महासभा 1927 तक कॉंग्रेस के साथ ही अपना अधिवेशन करती रही। सामान्यतः एक संगठन का अध्यक्ष दूसरे मंच पर भी सम्मानित होता था। तीस के दशक में सावरकर के प्रभाव से हिन्दू महासभा अधिक स्वतन्त्र रेखा पर गयी, लेकिन बाद में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कॉंग्रेस नेतृत्व से संवाद बनाए रखा। गाँधीजी और मुखर्जी के सम्बन्ध भी सामान्यतः सौहार्दपूर्ण रहे। मदन मोहन मालवीय के बारे में तो कहने की आवश्यकता ही नहीं।

कॉंग्रेस के भीतर भी कई बड़े नेताओं का हिन्दू राष्ट्रवादी नेताओं से सम्पर्क था। सरदार पटेल, राजगोपालाचारी, राजेंद्र प्रसाद, गोविंद वल्लभ पंत, कन्हैयालाल मुंशी और बिधानचंद्र राय जैसे नेताओं के नाम सहज ही याद आते हैं। 1946 से 1950 के बीच बनी अन्तरिम सरकार में श्यामा प्रसाद मुखर्जी मन्त्री भी रहे।

वास्तविक अलगाव गाँधीजी की हत्या के बाद तेज हुआ। उसके बाद हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक ही तराजू पर रखकर देखा जाने लगा। यह कहा गया कि ये संगठन हिन्दू साम्प्रदायिक राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं और राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा हैं। यहीं से हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति को ‘फासिस्ट’ कहने की परम्परा अधिक आक्रामक हुई।

आलोचक नामवर सिंह ने कहा था कि इतिहास के साथ शब्दों के अर्थ भी बदलते हैं। ‘फासिस्ट’ शब्द का अर्थ भी समय के साथ बदलता रहा है। एक समय मोहम्मद अली जिन्ना ने नेहरू को भी फासिस्ट कहा था। 1940 के दशक में विशेष रूप से कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े लोगों ने हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को फासिस्ट कहना शुरू किया। गाँधीजी की हत्या के बाद यह आरोप और तीखा हो गया।

इस तरह के राजनीतिक विभाजन के कारणों पर भी विचार की आवश्यकता है। कॉंग्रेस के भीतर 1934 के बाद से ही दक्षिणपन्थी और नेहरूवादी धारा का अन्तर्विरोध बना हुआ था। दक्षिणपन्थी कॉंग्रेस नेता हिन्दू राष्ट्रवादियों के प्रति अपेाकृत नरम थे। गाँधी हत्या के बाद नेहरू के निकट समूह ने दक्षिणपन्थियों पर भी दबाव बनाया। यहाँ तक कि सरदार पटेल को भी गाँधी हत्या के लिए नैतिक रूप से जिम्मेदार ठहराकर उनसे इस्तीफे की माँग की गयी। गाँधीजी की हत्या से आहत पटेल के लिए यह अत्यन्त पीड़ादायक था।

उस समय हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों की स्थिति बहुत कमजोर थी। गाँधीजी की हत्या से पूरा देश भावनात्मक रूप से विचलित था और जिसे भी गाँधी हत्या से जोड़ दिया गया, उसके लिए अपना बचाव करना कठिन हो गया। अनेक हिन्दू राष्ट्रवादियों को जेल में डाला गया। इसके बाद लम्बे समय तक उन्हें नीचा दिखाने के लिए गाँधी हत्या का प्रसंग पर्याप्त माना जाता रहा।

लेकिन यह प्रश्न आज भी बना हुआ है कि जनसंघ या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को वैधानिक रूप से किस आधार पर फासिस्ट सिद्ध किया जा सकता है। उन्हें लोकतन्त्र-विरोधी और संविधान-विरोधी कहा गया, लेकिन यह आरोप विधिक रूप से कभी निर्णायक ढंग से सिद्ध नहीं हो पाया।

1977 से 1989 के बीच गठबन्धन राजनीति के उभार ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। एक समय ऐसा आया जब विश्वनाथ प्रताप सिंह के समर्थन में एक ओर अटल बिहारी वाजपेयी थे तो दूसरी ओर ज्योति बसु। यह स्पष्ट होने लगा कि कॉंग्रेस के बाद भाजपा ही सबसे संगठित राजनीतिक शक्ति है। जिस चुनाव में भाजपा को केवल चार सीटें मिलीं, उसमें भी उसका वोट प्रतिशत उल्लेखनीय था। बाद में उसकी सीटें और शक्ति दोनों बढ़ती गयीं।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक लाभ रामजन्मभूमि आन्दोलन से मिला। इस आन्दोलन को किसी भी रूप में देखा जाए, लेकिन उसे सीधे फासिस्ट राजनीति कहना सरल निष्कर्ष होगा। यह धर्म आधारित राजनीति का उदाहरण हो सकता है, लेकिन फासिज्म का प्रश्न अधिक जटिल है। अगर हर सांस्कृतिक आग्रह को फासिस्ट कहा जाएगा, तो फिर 1975-77 के आपातकाल की प्रकृति पर भी वही प्रश्न उठेगा।

भाजपा लगातार लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के माध्यम से अपनी शक्ति बढ़ाती रही। 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी और उसने सफलतापूर्वक पाँच वर्ष पूरे किए। उसके बाद हार होने पर भाजपा ने विपक्ष की भूमिका भी स्वीकार की। वाजपेयी शासन को सामान्यतः फासिस्ट शासन नहीं कहा जाता।

इस पूरे दौर में गुजरात दंगों का प्रश्न लगातार उठता रहा। नरेन्द्र मोदी की भूमिका को लेकर गम्भीर आरोप लगाए गये। कहा गया कि राज्य सरकार ने राजधर्म का पालन नहीं किया। यह भी कहा गया कि वाजपेयी मोदी को हटाना चाहते थे लेकिन आडवाणी ने उनकी रक्षा की।
फिर भी यह भी सच है कि लम्बे न्यायिक और संवैधानिक परीक्षणों के बाद मोदी को प्रत्यक्ष आपराधिक आरोपों से मुक्त कर दिया गया।

2007 से 2014 के बीच भारतीय राजनीति में गुणात्मक परिवर्तन आया। गुजरात मॉडल के माध्यम से भाजपा ने विकास, प्रशासनिक दक्षता और हिन्दू पहचान — तीनों को एक साथ जोड़ने की कोशिश की। पार्टी ने गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों तक अपना सांगठनिक विस्तार बढ़ाया। राम मन्दिर आन्दोलन, सांस्कृतिक प्रतीकों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से उसने अपना वैचारिक आधार मजबूत किया।

गोधरा और गुजरात की कहानी दो रूपों में जनता के सामने आयी। एक पक्ष ने मोदी और शाह को अपराधी कहा, दूसरे पक्ष ने उन्हें हिन्दू हितों का रक्षक बताया। पहली बार बड़ी संख्या में लोगों ने यह महसूस किया कि हिन्दू अस्मिता का प्रश्न भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया जा सकता है।

इण्डियन आइडियोलॉजी की शक्ति ऐतिहासिक और बौद्धिक स्मृति पर आधारित थी, लेकिन उदारीकरण और इण्टरनेट के दौर में लोगों के अनुभव बदलने लगे। अब जनता केवल अखबारों और विश्वविद्यालयों से राय नहीं बना रही थी। वह अपने अनुभवों, मीडिया और डिजिटल संसार से भी राजनीति को समझ रही थी। हिन्दू राष्ट्रवादियों ने इस नये स्पेस में संगठित हस्तक्षेप किया।

पूँजीपति वर्ग भी हमेशा राजनीतिक हवा का रुख देखकर चलता है। अँग्रेजों के समय जब कॉंग्रेस का प्रभाव बढ़ा तो उद्योगपति उसके निकट गये। नेहरू का प्रभाव बढ़ा तो वे उनके साथ खड़े हुए। लम्बे समय तक उनका दिल हिन्दू राष्ट्रवादियों के साथ और दिमाग़ इण्डियन आइडियोलॉजी के साथ माना जाता था। लेकिन धीरे-धीरे ऐसा समय आया जब दोनों एक दिशा में बढ़ने लगे। युवाओं के बीच हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों की पैठ ने इस परिवर्तन को और तेज किया।

इण्डियन आइडियोलॉजी के वैचारिक कठमुल्लेपन पर सबसे तीखी टिप्पणी किसी दक्षिणपन्थी ने नहीं, बल्कि वामपन्थी विचारक पेरी एंडरसन ने 2012 में की थी। लेकिन उस आलोचना पर गम्भीर ध्यान नहीं दिया गया।

धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा कि राजनीतिक शक्ति सन्तुलन बदल सकता है। लेकिन इसके बावजूद इण्डियन आइडियोलॉजी का बड़ा हिस्सा लगातार गाँधी हत्या, संघ के कथित फासिस्ट चरित्र और गुजरात दंगों के आरोपों को ही मुख्य राजनीतिक हथियार बनाए रहा। जनता का एक बड़ा वर्ग इन आरोपों को पर्याप्त नहीं मान रहा था। उसे दिखाई दे रहा था कि अदालतों ने मोदी को दोषमुक्त किया है और भाजपा उन प्रश्नों को उठा रही है जिन्हें बड़ी संख्या में लोग अपने अनुभव से महसूस कर रहे थे।

भाजपा ने जातीय समीकरणों को भी अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास किया। उसने हिन्दू पहचान को एक व्यापक राजनीतिक फ्रेम के रूप में प्रस्तुत किया। परिणाम यह हुआ कि 2014 में केन्द्र की सत्ता पर उसका निर्णायक अधिकार स्थापित हो गया और उसके बाद से भारतीय राजनीति का केन्द्रीय सन्तुलन बदल गया।

यह सब लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के भीतर हुआ। चुनाव हुए, जनता ने मतदान किया और सत्ता परिवर्तन हुआ। लोकतन्त्र में राजनीतिक ताकतें बदलती रहती हैं। एक पक्ष जीतता है, दूसरा हारता है और फिर परिस्थितियाँ बदलती हैं। लेकिन हर असहमति को फासिज्म कहना या हर विरोधी को राष्ट्रविरोधी बताना लोकतान्त्रिक राजनीति को अधिक कट्टर बनाता है।

संघ या भाजपा भारतीय संविधान और चुनावी लोकतन्त्र को औपचारिक रूप से अस्वीकार नहीं करते। उनके भीतर अनेक वैचारिक और नीतिगत समस्याएँ हो सकती हैं। मुस्लिम तुष्टिकरण के विरोध से मुस्लिम-विरोध तक पहुँच जाने की प्रवृत्ति, संस्थाओं पर प्रभाव बढ़ाने की कोशिश और सांस्कृतिक विविधता के प्रश्नों पर संकीर्णता — इन सबकी आलोचना लोकतान्त्रिक अधिकार और कर्तव्य दोनों है। लेकिन केवल इसलिए किसी दल या उसके समर्थकों को फासिस्ट घोषित कर देना कि उसे लम्बे समय तक जनता का समर्थन मिला है, राजनीतिक विश्लेषण को कमजोर करता है।

इतिहास को इस तरह प्रस्तुत करना कि एक पक्ष पूरी तरह काला और दूसरा पूरी तरह उजला दिखाई दे, अब प्रभावी नहीं रह गया है। भारतीय राजनीति का अनुभव अधिक जटिल है। अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर और नरसिंह राव जैसे नेता वैचारिक संघर्ष करते थे, लेकिन राष्ट्रीय प्रश्नों पर संवाद बनाए रखते थे। वाजपेयी को कश्मीर पर भारत का पक्ष रखने के लिए अन्तरराष्ट्रीय मंच पर भेजा जा सकता था क्योंकि राजनीतिक असहमति को राष्ट्रीय शत्रुता में नहीं बदला गया था।

आज की राजनीति में सबसे बड़ी आवश्यकता इसी संवादशीलता को बचाए रखने की है। लोकतन्त्र केवल चुनाव जीतने की व्यवस्था नहीं, बल्कि विरोधी विचारों के साथ सह-अस्तित्व की संस्कृति भी है। यदि हर वैचारिक प्रतिद्वंद्वी को देशद्रोही, फासिस्ट या साम्प्रदायिक घोषित कर दिया जाएगा, तो लोकतान्त्रिक समाज की बुनियाद कमजोर होगी। भारत जैसा बहुवर्णी समाज राजनीतिक सहमति से नहीं, बल्कि असहमति के भीतर सन्तुलन बनाए रखने से चलता है। यही कारण है कि भारतीय राजनीति की विभिन्न धाराओं को यह समझना होगा कि स्थायी ध्रुवीकरण अन्ततः सभी पक्षों को नुकसान पहुँचाता है।

भारतीय लोकतन्त्र की शक्ति इसी में रही है कि उसने समय-समय पर वैचारिक अतियों को भी अपने भीतर समाहित कर लिया। यहाँ मतभेद स्थायी हैं, लेकिन राजनीतिक प्रक्रिया उन्हें हिंसक संघर्ष में बदलने से रोकती रही है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक विरोध को नैतिक शत्रुता में न बदला जाए। लोकतन्त्र में जनता का निर्णय अन्तिम आधार होता है और लम्बे समय तक जनता का समर्थन पाने वाली किसी भी राजनीतिक धारा को केवल नारेबाजी के आधार पर खारिज कर देना अन्ततः लोकतान्त्रिक विवेक को ही कमजोर करता है।

 

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सबलोग

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी
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