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हास्य व्यंग्य

क्षितिज पर बातचीत

 

  • अनीता यादव

 

दूर क्षितिज से फूटती सूर्य की किरणों ने  धरती पर झाँका। दुनिया का ‘सबसे बड़ा लोकतन्त्र’ कहा जाने वाला भारत का ‘लोक’ आज राशन की लाइन छोड़ ये किस दुकान पर खड़ा है? आज सुबह-सुबह ही कैसी जुटान है ये? लोग लगातार बढ़कर भीड़ में बदल चुके हैं। यह कारवाँ कई किलोमीटर लम्बा हो गया! सब एक दूसरे के ऊपर चढ़ने की मुद्रा अख्तियार कर चुके! सूर्यदेव को कुछ समझ नहीं आया! उसने आँख मलते हुए देखा तो छाया देवी धीरे-धीरे कदम उठाए उसी ओर चली आ रही थी! सूर्य को अचम्भित देख छाया ने कहा -क्या हुआ देव? आप परेशान क्यों लग रहे हैं? ‘ यह भीड़ कैसी है छाया? ‘सूर्यदेव ने पूछा तो छाया ने नहीं जवाब दिया – ‘क्या आपको मालूम नहीं कि धरती के इस टुकड़े पर लोक डाउन का चौथा चरण शुरू हो चुका’ ‘हाँ, मैं जानता हूँ।

पिछले डेढ़ महीने से मेरी सारी किरणों का वार खाली जाता रहा है। सब घरों में बन्द थे। लेकिन इन दिनों सड़क पर भारी भीड़ देख अचम्भित हूँ देवी! सूर्य ने अपनी भोंह को तनिक तिरछा करते हुए कहा। ‘अर्थ की कमी से अनर्थ न हो इसलिए वहाँ की तन्त्र व्यवस्था ने हाला की शाला खोल दी है देव! यह जो आप धक्का मुक्की और कई किलोमीटर लम्बी कतार देख रहे हो न! ये सभी पियक्कड़ है जो शाम होते ही ग्लास में केवल बर्फ टनकाते रहे है! हाला से हलक गीला किए इनको पूरा डेढ़ महीना बीत चुका। अभी तक व्यवस्था को पानी पी-पी कर कोस रहे थे। अब दारू पीकर कोसेंगे। आखिर कोसना भी तो राष्ट्रीय दायित्व है।

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हालाँकि इनके ‘कोसना-कोसने’ से व्यवस्था के मस्त हाथी पर कोई फर्क नहीं पड़ना! लेकिन छाया क्या यह दुर्बुद्धि प्राणी नहीं जानता कि दुकान के सामने जमीन पर बनाए गये ये गोले जिन्हें ये कांटे समझ नकार रहे हैं – के बीच खड़े होना इनके लिए आवश्यक है? सोशल डिस्टेंसिंग को ये नागफनी कैसे समझ सकते हैं!… क्या ये नहीं समझते कि इनके जीवन के लिए एक निश्चित दूरी कितनी जरूरी हैं! इन गोल बिंदुओं से परहेज़ इनके जीवन पर अर्धविराम या कोमा नहीं बल्कि पूर्णविराम लगा सकता है?  कहते हुए सूर्य छाया की ओर देखने लगे। ‘हे देव यह बेचारे बड़े दुख के मारे हुए लोग हैं।

पिछले डेढ़ महीने से पत्नी की बोतल में जिन्न की भांति कैद होकर घर में झाड़ू, पोछा, बर्तन और हलवाई गिरी तक करते रहे हैं। ये शतरंज के पैदल सिपाही हैं। यही लूडो में पिटी और साँप सीढ़ी के साँप द्वारा डसी गोटियाँ भी है। उसी हार के गम को भुलाने के लिए आज हाला पाने को थोड़े पगला गये है। इस शुभ दिन के लिए ये कब से प्रतीक्षारत थे!’ छाया पूरी बात समाप्त भी न कर पाई थी कि सूर्य बोल उठे ‘लेकिन इस कदर पगलाना! क्या यह कोरोना जैसी वैश्विक महामारी की भयावहता को नहीं जानते’? कहते हुए सूर्य ने छाया को प्रश्नवाचक नजरों से देखा। ‘जानते हैं देव! यह सब जानते हैं लेकिन आदत से मजबूर हैं!

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इन्हें न पीने का सलीका है ना ढंग से जीने की आदत! अब देखिये हाल की ही बात है! लालपरी कई दिन में हलक से उतरी थी कि महोदय अवेंजर्स फिल्म के कैरेक्टर ‘हल्क’ बन उठे! नशे में गाड़ी को कुतुबमीनार की दीवार से ही टकरा कर दम न लिया बल्कि घर की दीवार तोड़ते हुए गाड़ी बेडरूम का पलंग तक तोड़ आई!… कारण पूछा गया तो बंदे ने ट्वेंटी फोर इन टू सेवन पत्नी के साथ रहने की एंजाइटी करार दिया’!  कहते हुए छाया ने मुँह बिचकाया। ‘क्या प्रशासन को मालूम नहीं था कि उसका ‘लोक’ मूढ़मती हैं? फिर यह हाला की शाला खोली ही क्यों?’ सूर्य ने एक प्रश्न पर दूसरा प्रश्न मारते हुए पूछा!’सरकार को अर्थव्यवस्था की टूटती कमर की चिन्ता थी देव!

इनकी चिन्ता कितने दिन करती आखिर? फिर उसने तो कोरोना टैक्स भी लगा दिया!  ‘लेकिन उनके पास तो खाने के लिए भी पैसे नहीं है! मैंने देखा “रोज खाना बटने और राशन की दुकानों पर जो लोग खड़े थे”, वे भी इस धक्का-मुक्की में फंसे हैं! इसके लिए इनके पास पैसा कहाँ से आया? ‘कहते हुए सूर्य ने आश्चर्य से मुँह चौड़ा किया! ‘हे सूर्य क्या आप वाकई नहीं जानते? इन्हें पीने का भले ही सलीका ना हो लेकिन जुगाड़ में अति माहिर हैं! इन्हें पूरा विश्व ‘जुगाड़ी’ के नाम से जानता है! अब देखना यह है कि हाला की शाला खुलने से अर्थव्यवस्था की कमर टूटने से बचती है या इस ‘लोक’ की कमर टूटती है’! …और इस तरह छाया और सूर्यदेव क्षितिज से ही एक साथ धरती के उस टुकड़े को निहारने लगे जिसे दुनियावाले भारत कहते हैं।

anita yadav

लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

सम्पर्क- +918920225355

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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