
अधूरी मोहब्बत का पूरा वादा
जून 2026 में रिलीज हुई ‘मैं वापस आऊँगा’ फिल्म अपने सिनेमाई अन्दाज के चलते दर्शकों द्वारा खासी पसन्द की गयी l अपने करियर की शुरुआत से ही फिल्म-निर्देशक इम्तियाज़ अली प्रेम जैसे खूबसूरत विषय को अलग शैली में परदे पर दिखाने के कारण चर्चा में रहे हैं l दरअसल इम्तियाज की फ़िल्में प्रेम करने के साथ-साथ जिन्दगी जीने का फलसफा भी सिखाती हैं l ‘जब वी मेट’, ‘लव आज कल’, रॉक स्टार’ जैसी फिल्मों की सफलता ने यह साबित भी किया है कि प्रेम जैसे ‘पॉपुलर’ विषय को प्रचलित ढर्रे से हटकर फिल्माने को दर्शक हाथों-हाथ लेते हैं l ‘मैं वापस आऊँगा’ भी इसी कड़ी में इम्तियाज के निर्देशन तले प्रदर्शित एक बेहतरीन फिल्म है l इस फिल्म का मुख्य आधार 1947 में हुआ भारत और पाकिस्तान का बँटवारा है जिसमें एक खूबसूरत-सी प्रेम-कथा को बेहतरीन ढंग से गूँथा गया है l
फिल्म की शुरुआत में ही पेन हाथ में लिये, अतीत में खोये-से, किसी ‘अजीज’ की याद में डूबे-से नसीरुद्दीन शाह उर्दू में कुछ लिखते दिखाई पड़ते हैं l इसके बाद समानान्तर रूप से दो अलग-अलग कालखण्डों की कहानियाँ – फ्लैश-बैक और वर्तमान में चलती हैं l दो-दो कहानियों को एक-साथ लेकर चलते हुए दर्शकों को भावनात्मक स्तर पर बाँधे रखना अपने-आप में चुनौतीपूर्ण होता है – लेकिन इम्तियाज इन्हें सम्भालने में कामयाब रहे हैं l
भारत-पाकिस्तान का विभाजन भौगोलिक सीमाओं के बँटवारे से कहीं अधिक ‘गंगा-जमुनी’ तहज़ीब का बँटवारा था l दक्षिण एशिया की इस ऐतिहासिक ‘दुर्घटना’ ने दोनों देशों के लाखों लोगों की जिन्दगी को रातों-रात ‘कभी न भूल सकने वाली त्रासदी’ में बदल डाला l ‘मैं वापस आऊँगा’ इतिहास की भूलों, राजनीतिक नारेबाजी या साम्प्रदायिक उन्माद से अलग विभाजन के मानवीय पहलुओं को, बँटवारे से उपजी गहरी पीड़ा और बेशुमार दर्द के बीच धड़कते ‘प्रेम’ को मार्मिकता के साथ दिखाती है l
लकवे के शिकार, धीरे-धीरे याद्दाश्त खोते जा रहे 95 वर्षीय वृद्ध इशर सिंह (नसीरुद्दीन शाह) 78 साल से दिल के किसी कोने में दबे पड़े प्रेम भाव के वशीभूत अपने दिल की बात कहने, अचानक सीमापार स्थित सरगोधा शहर जाने को उतारू हो जाते हैं l इसी जिद में उन्हें दिल का दौरा पड़ता है l इंग्लैंड में रहने वाला पोता निर्वैर (दिलजीत दोसांझ) अपने मरणासन्न दादा से मिलने भारत आता है l दादा की कुछ खोयी, कुछ बिखरी, कुछ असंगत लेकिन गहरी और आत्मीय यादों की संगति समझने की कोशिश में निर्वैर, उनकी जिन्दगी के उन पलों से रू-ब-रू होता है जो विभाजन-पूर्व के पंजाब और वर्तमान पाकिस्तान के सरगोधा शहर से जुड़े हैं l 78 साल पहले के अविभाजित पंजाब में कॉलेज में पढ़ने वाले नौजवान इशर उर्फ़ कीनू (वेदांग रैना) को हमउम्र जिया उर्फ़ अफ़साना (शर्वरी) से प्यार हो जाता है l ‘हमन है इश्क मस्ताना हम को होशियारी क्या!’ का भाव लेकर जीने वाले इन अल्हड़ और मासूम प्रेमीजनों का प्यार परवान चढ़ना शुरू हुआ था कि भारत-पाक विभाजन की घोषणा हो जाती है l मजबूरन हुए पलायन से दोनों का अलगाव हो जाता है l वे अलग-अलग मुल्कों में बँट जाते हैं l कीनू अपने परिवार के पुरुषों के साथ भारत आ जाता है l उसके परिवार की सारी महिलाएँ पाकिस्तान में अनाचार का शिकार होकर असमय मर जाती हैं l
विस्थापन के झटके के बाद, अपनों को खो देने और पाकिस्तान में रहने वाली जिया के निकाह की खबर जान लेने के बाद ‘यह दुनिया अब ख़त्म हो चुकी है, अब मुड़ कर नहीं देखना’ माननेवाले कीनू की जिन्दगी पुनः ‘बसने’, व्यवसाय चलाने, शादी, बच्चों की जिम्मेदारियाँ निभाने के साथ-ही-साथ कागज़ पर उर्दू ज़बान में दिल की बात उतारते-उतारते चलती रही l लेकिन अब, 2026 में, 95 साल की उम्र में, भारत-पाक विभाजन को स्मृतियों से खो चुके उनके प्राण अटके पड़े हैं – अपने बचपन के शहर सरगोधा जाने के लिए – जवानी में अधूरे छूटे एक प्यार के ‘वापस लौट कर आने’ के वादे को पूरा करने के लिए !
निर्वैर अपने असहाय और विवश दादा की यादों के टूटे-फूटे तारों को जोड़ते हुए और उनकी अन्तिम व उत्कट इच्छा पूरी करने के लिए सरगोधा की उन्हीं गलियों, चौराहों और हवेलियों में पहुँच जाता है जहाँ उसके दादा ने अपने वे कुछ मधुर और सुन्दर दिन बिताये थे l झटका तब लगता है, जब पता चलता है कि दुनियादारी की जिम्मेदारी निभाते हुए, भीतर-ही-भीतर इशर उर्फ़ कीनू का इन्तजार करती जिया उर्फ़ अफ़साना तो 10 साल पहले ही इस संसार से विदा हो चुकी हैं l लेकिन, जाने से पहले वह अपनी युवा छवि (केवल एक कान में चाँदबाली पहने) की एक तस्वीर यह कहकर दीवार पर टँगवा जाती हैं कि एक दिन ‘वो’ अपना वादा पूरा करने वापस लौटकर जरूर आएगा l वीडियो कॉल के दौरान उसी तस्वीर को हकीक़त समझकर इशर शायराना अन्दाज में जिया से इस दुनिया से विदा होने की ‘अनुमति’ माँगते हैं l इस दृश्य में जिया की तस्वीर को देखकर मरणासन्न इशर सिंह बने नसीरुद्दीन शाह के तड़पते चेहरे और तरसती आँखों के गहरे सुकून-भरे, तसल्ली के भाव बहुत प्रभावशाली बन पड़े हैं – जैसे सदियों के प्यासे को अमृत मिल जाय या गर्मी से तपते शरीर को शीतल हवा का झोंका मिल जाय l
‘मैं वापस आऊँगा’ विभाजन के दौरान उपजे सशंकित माहौल, साम्प्रदायिक दंगों, हिंसा, औरतों के साथ हुए दुर्व्यवहार की दिल दहला देने वाली घटनाओं की हल्की-सी झलक भी दिखलाती है l (दो-तीन सेकेण्ड के इन दृश्यों को देखकर कमज़ोर दिल वालों को ‘पैनिक’ अटैक पड़ सकता है l) फिल्म यह भी दिखाती है कि वहशीपना किसी धर्म-विशेष से ताल्लुक नहीं रखता l और, यह भी कि बँटवारे की विभीषिका का दंश दोनों तरफ ही, औरतों ने अपेक्षाकृत अधिक झेला जबकि उस समय के पंजाब की औरतों के बाहरी व्यक्तित्व से ‘हिन्दू-मुस्लिम होने का पता नहीं चलता’ था l (फिल्म का एक संवाद) l
भारत-पाक विभाजन की उस भयानक त्रासदी को देखने और झेलने वाली पूरी पीढ़ी अब खत्म होने वाली है l वे लोग अपने गहरे दर्द को दिल में दबाये जीवन को ‘बनाने’ में लगे रहे – क्यों ? – इसीलिए कि मौत के तमाम कारनामों के बाद भी ‘जीवन’ ही जरूरी है l लेकिन आज, तुच्छ स्वार्थों के वशीभूत हम इसी ‘जीवन’ की कीमत भूलकर ‘जीवन’ को ही दाँव पर लगा देने से नहीं हिचकते l दिलजीत दोसांझ की आवाज़ में फिल्म का समापन-गीत ‘क्या कमाल है!’ महत्त्वाकांक्षाओं और स्वार्थों के टकरावों के चलते पैदा होती नफ़रत, निरर्थक युद्धों में जल रही दुनिया, विस्थापन के कारण संघर्ष करते मासूम इंसानों की पीड़ा को डाक्यूमेंट्रीनुमा शैली की तरह दिखाता है और सोचने को मजबूर करता है कि कीमती क्या है – लड़ाई या इंसान, प्यार या दुश्मनी ? – दुनिया का सबसे समझदार प्राणी कहा जाने वाला इंसान इतिहास की विनाशकारी घटनाओं से सबक बिल्कुल भी नहीं लेता – ‘क्या कमाल है!’ फिल्म ख़त्म होने के बाद दर्शक चुपचाप अपने स्थान से उठता है और अपने भीतर ‘कुछ’ गहरा लेकर निकल जाता है l नफरतों से दुनिया नहीं चलती l मोहब्बतें ही हमेशा याद की जाती हैं l प्यार करने वाले भले ही संख्या में कम हों लेकिन ये दुनिया उन्हीं से चल रही है – ‘क्या कमाल है!’
‘मैं वापस आऊँगा’ में कलाकारों के शानदार अभिनय और चुस्त पटकथा ने फिल्म की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को बढ़ाया है l बुजुर्ग इशर सिंह के रूप में नसीरुद्दीन शाह ने अपनी भूमिका को बहुत ही संजीदगी से निभाया है l युवा इशर सिंह उर्फ़ कीनू बने वेदांग रैना और जिया उर्फ़ अफ़साना बनी शर्वरी जवानी के विशुद्ध प्यार की अल्हड़ता और मासूमियत को बखूबी दिखाते हैं l निर्वैर के रूप में दिलजीत दोसांझ आज की युवा पीढ़ी को जीते नज़र आते हैं l दूसरे कलाकारों ने भी अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है l ए. आर. रहमान के दिल छू लेने वाले संगीत के साथ संजीदा गीतों ने फिल्मांकन की संवेदनशीलता को बढ़ाया है l यह फिल्म दर्शकों से अतिरिक्त सब्र की माँग करती है और धीरे-धीरे खुलकर धीमी गति से भावनात्मक चरम पर पहुँचती है l फिल्म के कुछ दृश्य बहुत ही ख़ास हैं जो बार-बार जहन में आकर कौंध जाते हैं l ये दृश्य आपके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान और आपके भीतर एक खूबसूरत अहसास भरकर तिरोहित हो जाते हैं l
‘मैं वापस आऊँगा’ का एक महत्त्वपूर्ण पहलू और भी है – अपने दादा की प्रेम कहानी से जुड़ते-जुड़ते निर्वैर भागमभाग-भरी, ‘शॉर्ट कट’ ढूँढने वाली अपनी पीढ़ी की ‘लग्जुरियस लाइफ’ के बावजूद ‘चैन’ न मिल पाने के बारे में बरबस सोचने लगता है l ऐशो-आराम के तमाम साधनों के बाद आज ‘खुलकर हँसना’ नसीब नहीं है l आज ‘प्यार’ करने का दिखावा करने के तरीके बहुत हैं लेकिन उसके सही मायने कोई नहीं समझता l प्रेम-प्रसंगों में कई-कई बार ब्रेक-अप करने वाले, ‘ना’ कहने पर तेज़ाब फेंककर चेहरा झुलसा देनेवालों, निदर्यता से अपने साथी की हत्या तक कर देने वालों को यह फिल्म प्यार का असली अर्थ समझाती नज़र आती है – ‘विरह प्रेम का चरम’ होता है l और, सच्चे प्यार की यादों को जमीनी सरहदें नहीं मिटा पाती l कीनू और जिया के अफ़साने के जरिये गहरे प्रेम को बड़े ही खूबसूरत अन्दाज में यहाँ दिखाया गया है l इस रूप में यह फिल्म जीवन और उम्मीद से भरपूर है l फिल्म का सन्देश साफ़ है – मानवीयता और प्रेम की कीमत के आगे कुछ नहीं है – वह अनमोल है l










