Uncategorized

चेतना और सौन्दर्य-बोध का नया क्षितिज

आधुनिक साहित्य-कला का आधुनिक लोकतन्त्र के साथ सम्बन्ध है, पर प्राचीन या मध्यकालीन कला-साहित्य का लोकतन्त्र के साथ कोई स्पष्ट सम्बन्ध नहीं है। ग्रीस के प्राचीन त्रासदी नाटक और संस्कृत महाकाव्य उन समाजों में रचे गये जहाँ गैरबराबरी की भावना को ही समाज व राज्य की स्वीकृति हासिल थी। कालिदास, भास, शूद्रक की गुप्तकालीन नाट्य रचनाएँ राजतन्त्र की देन हैं। बारहवीं से सोलहवीं सदी तक का भक्तकालीन साहित्य भी उस कालखण्ड का है जब समाज में वर्णव्यवस्था प्रमुख थी और राजाओं की निरंकुशता का युग था। उन्नीसवीं सदी का महान रूसी साहित्य जार की कठोर सत्ता के अधीन समाज में रचा गया। शेक्सपीयर के नाटक उस सोलहवीं सदी में लिखे गये जब इंग्लैण्ड में कोई लोकतन्त्र नहीं था बल्कि महारानी एलिजाबेथ का शासन था। इस प्रकार कई उदाहरण दिये जा सकते हैं जिसमें राजसत्ता की प्रकृति और साहित्य के बीच उस प्रकार का सम्बन्ध नहीं दिखता, जैसा आज हम खोजना चाहते हैं। आधुनिक युग में भी हमारे महान लेखक भारतेन्दु, महावीर प्रसाद द्विवेदी, रबीन्द्रनाथ टैगोर तथा प्रेमचन्द आदि उस कालखण्ड में हुए जब देश में नागरिक अधिकारों व नागरिक स्वतन्त्रता का कोई स्थान नहीं था। जिसे हम लोकतन्त्र कहते हैं, वह एशियाई देशों में अभी सौ वर्ष पहले तक नहीं था। लेकिन तब भी नाटक, संगीत, कला, साहित्य, कविता आदि के क्षेत्र में महान प्रतिभाओं का उदय होता रहा। कई बार राजतंत्रात्मक व्यवस्था ने संगीत-नाटक की विभिन्न शैलियों व प्रतिभाओं को संरक्षण दिया, तो कभी धार्मिक परम्पराओं ने कला-साहित्य के विकास का आधार प्रदान किया। कई बार खानबदोश किस्म के समूहों-समुदायों ने अद्भुत कलाएँ पैदा की हैं। भटकते दरवेशों व घुमन्तू फकीरों ने महान प्रतिभाओं को गढ़ा। तेरहवीं सदी में फारसी भाषा के सूफी कवि रूमी पर उनके गुरु शम्स तबरीजी का असर हो, या भारत में अमीर खुसरो पर निजानमुद्दीन औलिया का। इन सूफियों ने संवेदनाओं से अनाथ प्रतिभाओं को सँवारा और उनका रचा सदियों से अमर है। लोकतन्त्र के बिना जब कला-साहित्य इतना फला-फूला तब यह प्रश्न जायज है कि आखिर हम उस लोकतन्त्र से कलाओं का सम्बन्ध खोजने की कोशिश क्यों करे, जो बहुत अधूरा व दिखावे का भी हो सकता है। आधुनिक आचार्यों ने तो आधुनिकता के विकास को कविता के लिए संकट-काल बताया है। रामचन्द्र शुक्ल ने तो लिखा ही है – ‘ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नये-नये आवरण चढ़ते जाएँगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कवि कर्म कठिन होता जाएगा।’

कोई समाज कितना आधुनिक है, या लोकतान्त्रिक यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि कई बार पिछड़े या बर्बर समझे जाने वाले समाजों में भी अपनी मनुष्यता को खोने की चिन्ता रहती थी और वे इसी चिन्ता के कारण कलाओं की ओर उन्मुख होते थे। वे अपने ह्रदय की अभिव्यक्ति चाहते थे, और इसीलिए कभी नृत्य, कभी गायन, कभी कविता और कभी नाटक का आश्रय लेते थे। कोई समाज नीरसताओं या शुष्क संवेदनाओं को नहीं ढो सकता है। ह्रदय के पक्ष को दबाया जा सकता है, पर उसे नष्ट नहीं किया जा सकता है। लोकतन्त्रपूर्व के समाजों ने भी ह्रदय, बुद्धि, भावुकता, अभिव्यक्ति, मार्मिकता, कोमलता, सहजता, प्रेम, सौन्दर्य आदि के साथ जीवन को जिया है, और जहाँ कविता और कलाएँ प्रस्फुटित हुईं।

इसी प्रकार नैतिक व अनैतिक की चेतना कला-साहित्य के लिए प्रधान होती हैं। हर युग का साहित्य अनैतिकता पर प्रहार करता है और नैतिक मूल्यों के प्रति अपनी चिन्ता व्यक्त करके वह साहित्य का रूप ग्रहण करता है। इसीलिए धार्मिक ग्रन्थों व साहित्य में अंतर होता है। धार्मिक ग्रंथ पुरानी परम्परा व रीतियों का अनुसरण करते हैं। भले ही वे कितने ही मनुष्यविरोधी हो चुके हों। वे मनुष्य से अधिक ईश्वर का पक्ष लेते हैं। पर साहित्य वर्तमान मानवता के बाहरी एवं भीतरी संकट पर विचार करता है और उसकी कसौटी धर्म से भिन्न हो सकती है। उसमें ईश्वर व देवता को निरंकुश होने की अनुमति नहीं है बल्कि उन्हें भी मनुष्य के हित के लिए प्रयास करता दिखाया जाता है। प्राचीन ग्रीक त्रासदियाँ लम्बे समय तक यूरोप को प्रभावित करती रहीं क्योंकि उनमें एक नायक को भी नियति व अतिलौकिक ताकतों के आगे पराजित होते दिखाया जाता था। पर उसकी पराजय ही उसके नायकत्व को और उभारती थी। साहित्य एक अर्थ में ईश्वर, राजाज्ञाओं, महलों, राजपाट आदि से मनुष्य को बचाने में अपनी सफलता देखता था। संघर्षशील के प्रति सहानुभूति से जुड़े जनमानस के इस मनोविज्ञान के कारण हमारे महाकाव्यों के महान नायक जैसे राम-कृष्ण भी राजतन्त्र की साजिशों के शिकार होकर ही भटकते हैं तथा संघर्ष करते हैं।

लेकिन साहित्य-कला से सम्बन्धित इस ऐतिहासिक यथार्थ का तात्पर्य यह नहीं है कि लोकतन्त्र की कोई भूमिका नहीं होती है। आधुनिक लोकतन्त्र ने सामाजिक-आर्थिक सम्बन्धों को बदला है तथा इस बदलाव से कई प्रकार की नयी भावदशाओं का भी विकास हुआ है। सौन्दर्य-दृष्टि बदली है और इसी कारण अब एक नगण्य व्यक्ति, नगण्य प्राकृतिक छटा तथा वंचित वर्गों आदि के सौन्दर्य के प्रति ध्यान गया है। सौन्दर्य का अर्थ केवल उपभोग या निजी ऐश्वर्य तक सीमित नहीं रहा बल्कि सौन्दर्य को सामूहिक हित का अंग बनाया गया। केवल राजा-नवाब के ठाठ-बाट तक ही सौन्दर्य सीमित न रहा बल्कि खेत-खलिहानों की सुन्दरता भी महत्त्वपूर्ण होने लगी। सौन्दर्य को सामन्ती रुचियों की कैद से मुक्त कराया गया। सदियों तक धर्म व परलोक के नाम से पैदा किये गये डर से भी मुक्त हुआ और इस कारण मनुष्य ने अपने जीवन, अपनी देह, अपने परिवार, हाड़-मांस के इंसान को  अधिक सुन्दर पाया। इसी विचार-दृष्टि के परिवर्तन से पुनर्जागरणकालीन मूर्ति व चित्रकला का जन्म हुआ। इसी के साथ ज्ञान व आलोचना का भी नया युग आरम्भ हुआ जिसमें तर्क, विज्ञान, विवेक आदि की खोज भी एक  मानवीय लक्ष्य के रूप में निर्धारित किया गया। परम्परा के कारागार से संघर्ष को सम्मान प्राप्त होने लगा। मनुष्य के दुःख और समझौतों की जंजीरें टूटने की परिस्थितियाँ तैयार की जाने लगीं। चाहे भक्तिकालीन कविता हो, या रीतिकाल का शृंगार, उनमें बहुत जगह बुद्धिमत्तापूर्ण सांसारिक बाते हैं, पर बहुत सारी रचनाओं में मनुष्य की धर्म तथा राजा की शक्ति के आगे इंसान की झुकी टूटी हुई रीढ़ के दर्शन भी होते हैं। ऐसा लगता है जैसे मनुष्य की स्वाधीनता का कोई मूल्य नहीं, वह केवल गुलामी करने के लिए पैदा हुआ है। या देवलोक की गुलामी, या भूलोक की। लेकिन लोकतान्त्रिक चेतना ने तर्क-विज्ञान व विवेकवाद की खोज को भी सौन्दर्यमय बना दिया। वैज्ञानिकों, भूमण्डल की खोज करने निकले साहसी नाविकों व क्रान्तिदर्शियों के जीवनसंघर्ष को भी चाव से पढ़ा व पढ़ाया जाने लगा। यूरोप में गैरीबाल्डी, डार्विन, मार्क्स, न्यूटन व आइंसटीन के जीवन को लोग पढ़ने लगे। भारत में भी लोगों का ध्यान आर्यभट्ट जैसे  वैज्ञानिकों पर गया तथा वेदों में भगवान की महिमा ढूँढने वाले उसमें विज्ञान की उपस्थिति का पता लगाने के लिए विवश हो गये। यानी लोकतन्त्र के विकास ने प्राचीन ग्रन्थों, पुस्तकों में चित्रित किरदारों व कथाओं को नयी दृष्टि से उन्हें पढ़ने का अवसर दिया। एकलव्य, शम्बूक, शबरी, केवट, उर्मिला, अहिल्या, द्रौपदी, शकुन्तला व सीता आदि के चरित्र भी वंचित-वर्गों को लेकर आधुनिक चेतना व आधुनिक स्त्री-दृष्टि से ग्रहण किये जाने लगे। कबीर की क्रान्तिकारिता की खोज शुरू हुई, तुलसी साहित्य की नयी व्याख्या में करुणासम्पन्न व जनवादी राम का भी एक नया रूप निर्मित हो गया। साहित्य में पहले युद्ध व जनसंहार को लेकर आक्रोश के दर्शन नहीं होते थे, पर लोकतन्त्र के विकास के साथ युद्ध-जनसंहार को लेकर आक्रोश में भी विचार का सौन्दर्य देखा जाने लगा।  सैकड़ों वर्षों से युद्धों ने मानवता को अपार क्षति पहुँचायी है। निर्दोष मनुष्यों की हत्या को भी तर्कसंगत ठहराया गया है। पर अब युद्धों को लेकर कोई भी राष्ट्राध्यक्ष पहले की तरह जनता का समर्थन नहीं जुटा सकता है। युद्धकाल में अमेरिका व यूरोप में हजारों लोग सड़कों पर आकर अपनी ही सरकार का विरोध करते हैं। युद्ध विरोधी उनके नारे, जुलूस, प्लेकार्ड, कलात्मक प्रतिरोध यह सब कविताओं को प्रभावित करता है। इसीलिए वॉर लिटरेचर का संकलन किया जाता है जिसमें युद्धों का विरोध करने को मानवता के पक्ष में कविता का नैतिक दायित्व माना जाता है। तानाशाहों का विरोध भी दुनिया के कई साहित्यकारों द्वारा किया गया है। निकारागुआ के महान कवि अर्नेस्टो कार्डिनाल की ‘जीरो आवर’, नेरुदा की ‘आई एक्सप्लेन फ्यू थिंग्स’ तथा एलन गिन्सबर्ग की ‘विचिता वार्टेक्स सूत्रा’ जैसी तानाशाही तथा युद्धविरोधी कविताएँ संसार की कई भाषाओं में अनूदित हुईं एव लोकप्रिय हुईं। मध्यकाल तक युद्ध को बड़ा महत्त्वपूर्णा माना जाता था, पर बीसवीं सदी में युद्ध का विरोध संसार भर के कवियों-कलाकारों ने किया। युद्ध को धर्म, साहस तथा शौर्य के प्रदर्शन के स्थान पर कुरूपता, वीभत्सता और विनाश का प्रतीक बनाया गया। सौन्दर्य-दृष्टि के इसी ऐतिहासिक विकास को देख प्रेमचन्द ने साहित्य की कसौटी बदल जाने के बारे में सजग किया था। इस प्रकार संसार भर में लोकतन्त्र के विकास ने साहित्य-कला को दो प्रकार से प्रभावित किया। पहला, नवीन विषयों व नवीन सौन्दर्य-दृष्टि को पैदा किया। दूसरा, देश के प्राचीन वांगमय व प्राचीन कलाओं के बारे में नयी दृष्टि से विचार किया गया जिससे प्राचीन तथा मध्यकालीन साहित्य में नये अर्थों की उत्पत्ति हुई है। साहित्य-कला को अब केवल पुराने समय की तरह राजसत्ता अथवा विशेषाधिकार सम्पन्न वर्गों का संरक्षण नहीं चाहिए, बल्कि उसके लिए लोकतान्त्रिक परिवेश ही वह आक्सीजन है, जो उसके बहुआयामी रूपों का विकास कर सकता है।

Show More

वैभव सिंह

लेखक हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचक और प्राध्यापक हैं। सम्पर्क +919711312374, vaibhavjnu@gmail.com
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted

Related Articles

Back to top button
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x