तालीम अख्तर
किसी भी लोकतान्त्रिक और प्रगतिशील राष्ट्र की नींव उसके नागरिकों को मिलने वाले न्याय पर टिकी होती है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी ‘सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय’ को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गयी है। समकालीन भारत में, जहाँ एक ओर हम तेज आर्थिक विकास की ओर अग्रसर हैं, वहीं दूसरी ओर समाज के भीतर व्याप्त असमानता की खाइयाँ आज भी एक गम्भीर चुनौती हैं। इसी सन्दर्भ में सामाजिक न्याय की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।
व्यापक अर्थों में सामाजिक न्याय का उद्देश्य ऐसी संस्थागत व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना है जो प्रत्येक व्यक्ति को समाज के हित में अपना पूर्ण योगदान देने में सक्षम बनाएं। मिलर (1999) के अनुसार सामाजिक न्याय सामाजिक संस्थाओं द्वारा उत्पन्न लाभ और हानि के वितरण से सम्बन्धित है, क्योंकि उनका आवंटन प्रमुख सामाजिक संस्थाओं के संचालन पर निर्भर करता है। सामाजिक न्याय केवल सुख या कल्याण बाँटने का नाम नहीं है, बल्कि संसाधनों और अवसरों के न्यायसंगत सामाजिक मूल्यांकन के माध्यम से लोककल्याण का एक साधन है। इसे केवल राज्य की कार्रवाई के रूप में नहीं, बल्कि विभिन्न संस्थाओं और सामाजिक प्रथाओं की पारस्परिक क्रियाओं के परिणाम के रूप में समझा जाना चाहिए।
भारत में सामाजिक अन्याय मुख्यतः जाति व्यवस्था और उस सामाजिक संरचना की उपज है जो भेदभाव की नींव रखती है। इसलिए भारतीय समाज में सामाजिक न्याय ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों—जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, विकलांग व्यक्ति और महिलाओं—के लिए ‘क्षतिपूर्ति न्याय’ के रूप में सामने आया है। इसका उद्देश्य समान अवसर उपलब्ध कराना और एक समावेशी समाज का निर्माण करना है।
गोपाल गुरु (2009) के अनुसार सामाजिक न्याय को दलितों द्वारा सहे गये अपमान और बहिष्कार के वास्तविक अनुभवों को सम्बोधित करना चाहिए। ऐतिहासिक रूप से इसे भारतीय संविधान के माध्यम से संस्थागत रूप दिया गया है, जिसमें मौलिक अधिकारों, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों और सकारात्मक कार्रवाई (आरक्षण) के प्रावधान शामिल हैं। क्रिस्टोफ़ जाफरलॉट अपनी पुस्तक इण्डियाज साइलेंट रेवोल्यूशन में तर्क देते हैं कि आरक्षण नीतियों और लोकतान्त्रिक लामबन्दी ने निचली जातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त करने और पारम्परिक सत्ता संरचनाओं को चुनौती देने में सक्षम बनाया। यह परिवर्तन दर्शाता है कि संवैधानिक लोकतन्त्र कैसे हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए अधिकार प्राप्ति का माध्यम बना।
भारतीय संविधान विभिन्न सामाजिक असमानताओं को दूर करने का लक्ष्य रखता है और अपने नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है। इनमें अस्पृश्यता का उन्मूलन, शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण तथा धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकार शामिल हैं। ये उपाय केवल कल्याणकारी नीतियाँ नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्यायों को सुधारने और हाशिए के समुदायों की सार्वजनिक जीवन में भागीदारी सुनिश्चित करने के साधन हैं।
इन संवैधानिक आश्वासनों के बावजूद सामाजिक अन्याय की प्रक्रियाएँ आज भी विभिन्न रूपों में जारी हैं, जैसे जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता और आर्थिक विषमताएँ। गेल ओमवेट के अनुसार भारत में सामाजिक न्याय को शोषित समुदायों द्वारा राजनीतिक प्रतिनिधित्व, भूमि अधिकार, शिक्षा और गरिमा प्राप्त करने के ऐतिहासिक संघर्ष के रूप में समझा जाना चाहिए। संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान भी हैं, जैसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989।
सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम जैसी नीतियों को लागू किया गया है, जिसे अब विकसित भारत—ग्रामीण रोजगार और आजीविका मिशन गारंटी अधिनियम, 2025 के रूप में पुनर्गठित किया गया है।
इन मौलिक अधिकारों की व्याख्या और उनके प्रभावी उपयोग में न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका ने सामाजिक न्याय के प्रश्नों को व्यापक स्तर पर उठाने में योगदान दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती मामले (1973) में यह स्थापित किया कि सामाजिक न्याय भारतीय संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा है। इसी प्रकार एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में सामाजिक न्याय और न्यायिक पुनरावलोकन को संविधान की मूल विशेषताओं में माना गया।
भारतीय संविधान सामाजिक न्याय के आर्थिक आयाम पर भी जोर देता है। उदाहरण के लिए, संविधान के 103वें संशोधन (2019) के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान किया गया। सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए संसाधनों तक पहुँच, समानता, भागीदारी, विविधता और मानवाधिकारों जैसे सिद्धांतों को प्रभावी बनाना आवश्यक है। इसका एक हालिया उदाहरण पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह (2024) का फैसला है। इसमें सात जजों की संविधान पीठ ने कहा कि राज्य सरकारों के पास सार्वजनिक रोजगार और शिक्षा में आरक्षण के लिए अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण करने का अधिकार है। न्यायालय ने माना कि अनुसूचित जातियाँ एक ‘विषम वर्ग’ हैं, इसलिए वास्तविक समानता स्थापित करने के लिए उप-वर्गीकरण आवश्यक हो सकता है।
न्यायपालिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि समानता का अर्थ सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करना नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक और संरचनात्मक असमानताओं को दूर करना है। इसी सन्दर्भ में जेल मैनुअल में सुधार, भेदभावपूर्ण कारावास प्रथाओं की समाप्ति तथा विकलांग व्यक्तियों के लिए सुगमता सुनिश्चित करने की सिफारिशें भी की गयी हैं।
प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन बनाम महाराष्ट्र राज्य (2024) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 39(b) के अन्तर्गत “समुदाय के भौतिक संसाधनों” की व्याख्या स्पष्ट की। अदालत ने कल्याणकारी उद्देश्यों और व्यक्तिगत अन्त अधिकारों के बीच संतुलन पर बल दिया तथा कहा कि सभी निजी अन्तयाँ स्वतः “समुदाय के भौतिक संसाधन” नहीं मानी जा सकतीं। आलोचकों का मानना है कि ऐसी व्याख्या भविष्य की पुनर्वितरणकारी नीतियों को सीमित कर सकती है।
इन न्यायिक विकासों से स्पष्ट होता है कि समकालीन भारत में कानून और सामाजिक न्याय का संबंध जटिल है। अदालतें समानता, संघवाद और प्रशासनिक दक्षता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करती हैं, लेकिन उनकी व्याख्याएँ कभी-कभी इस बहस को जन्म देती हैं कि क्या वे संविधान की परिवर्तनकारी दृष्टि को आगे बढ़ा रही हैं या उसे सीमित कर रही हैं।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर के अनुसार सामाजिक न्याय की अवधारणा समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित है। उनकी दृष्टि में सामाजिक अन्याय का मूल कारण जाति व्यवस्था है, जिसकी जड़ वर्णाश्रम आधारित सामाजिक संरचना में निहित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वास्तविक लोकतन्त्र तभी सम्भव है जब सामाजिक लोकतन्त्र स्थापित हो। अंबेडकर के लिए तर्क सामाजिक न्याय स्थापित करने का महत्त्वपूर्ण साधन है, किन्तु “तर्क तब तक काम करता है जब तक वह व्यक्ति के निहित स्वार्थों से नहीं टकराता।”
अंबेडकर का विश्वास था कि राजनीतिक लोकतन्त्र तब तक अधूरा रहेगा जब तक सामाजिक और आर्थिक लोकतन्त्र स्थापित न हो। तेलतुंबड़े का सुझाव है कि सामाजिक न्याय के लिए केवल कानूनी उपाय पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था और समाज में गहरे संरचनात्मक परिवर्तन आवश्यक हैं। जातिगत उत्पीड़न केवल आर्थिक वंचना तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजमर्रा के अपमान और प्रतीकात्मक बहिष्कार के माध्यम से भी संचालित होता है। इसलिए सामाजिक न्याय को संसाधनों के पुनर्वितरण के साथ-साथ गरिमा और सम्मान के प्रश्नों को भी सम्बोधित करना होगा। आधुनिकीकरण के बावजूद जाति व्यवस्था नए रूपों में बनी हुई है और हाशिए के समुदायों को शिक्षा, रोजगार और सांस्कृतिक पूँजी तक पहुँच में बाधाएँ आती रहती हैं।
समकालीन भारत में सामाजिक न्याय की बहसें प्रायः आरक्षण, जातिगत भेदभाव, शिक्षा तक पहुँच और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्नों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। संविधान एक मजबूत आदर्शवादी ढाँचा प्रदान करता है, फिर भी सामाजिक मान्यताओं, आर्थिक असमानताओं और संस्थागत बाधाओं के कारण संरचनात्मक विषमताएँ बनी हुई हैं। इसलिए अंबेडकर की समानता और गरिमा पर आधारित समाज की कल्पना को साकार करने के लिए निरंतर सामाजिक आंदोलनों, लोकतान्त्रिक भागीदारी और संवैधानिक मूल्यों की सक्रिय पुनर्व्याख्या आवश्यक है।
समकालीन भारत में सामाजिक न्याय केवल एक संवैधानिक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक सतत बौद्धिक और राजनीतिक संघर्ष है। यह संघर्ष केवल नीतियों और न्यायिक फैसलों के स्तर पर ही नहीं, बल्कि समाज की चेतना, सांस्कृतिक व्यवहार और संस्थागत संरचनाओं के भीतर भी जारी है। संविधान ने समानता, गरिमा और अवसर की जो रूपरेखा प्रस्तुत की है, उसे वास्तविक जीवन में लागू करना राज्य, समाज और नागरिक—तीनों की साझा जिम्मेदारी है। सामाजिक न्याय की प्रक्रिया तभी सार्थक हो सकती है जब शिक्षा, भूमि, रोजगार और प्रतिनिधित्व जैसे क्षेत्रों में वंचित समुदायों की भागीदारी वास्तविक रूप से सुनिश्चित की जाए। इसके साथ ही सामाजिक पूर्वाग्रहों, जातिगत पदानुक्रम और सांस्कृतिक बहिष्कार की प्रवृत्तियों को भी चुनौती देना आवश्यक है। लोकतन्त्र की स्थिरता और विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के अधिकारों की कितनी प्रभावी रक्षा करता है। इसलिए सामाजिक न्याय का प्रश्न केवल नीति या कानून का विषय नहीं, बल्कि लोकतान्त्रिक नैतिकता का भी प्रश्न है। इस संघर्ष में अंबेडकर का ‘तर्क’, संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और सामाजिक आंदोलनों की ऊर्जा ही एक वास्तविक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज की दिशा तय करेगी।

लेखक हिन्दू कॉलेज, दिल्ली में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।
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