
सामाजिक न्याय की अवधारणा बेहद विवादास्पद अवधारणाओं में से एक है किन्तु जान राल्स(1971) की पुस्तक, ‘थ्योरी ऑफ जस्टिस’ के प्रकाशन के बाद से समाज-राजनीतिक चिन्तन के केन्द्र में आ गयी है, जब वह कहता है कि “न्याय सामाजिक संस्थाओं का प्रथम गुण है, और यदि कानून तथा संस्थाएँ अन्यायपूर्ण हों तो वे चाहे कितनी ही कुशल और सुव्यवस्थित क्यों न हों, उन्हें सुधारना या समाप्त कर देना चाहिए।” परिणाम स्वरूप इस विषय पर एक विशद साहित्य सामने आया जिसने सामाजिक न्याय के विभिन्न आयामों को खोल दिया। इस लेख में हमारा उद्देश्य उन सैद्धांतिक स्थापनाओं/मतभेदों की चर्चा करना न होकर भारतीय सन्दर्भ में उन पर आधारित आन्दोलनों के वैचारिक पक्ष को उजागर करना है। इसके लिए हमने विशेष रूप से अम्बेडकर और लोहिया को चुना है। यह समझने का प्रयास किया है कि दोनों में क्या असमानताएँ और मतभेद हैं और उनके द्वारा प्रेरित आन्दोलन अपना लक्ष्य पाने में कितना सफल हो सके हैं। फिर भी अपने विमर्श को एक सैद्धांतिक आधार प्रदान करने के लिए मोटे तौर पर मैंने नैंसी फ्रेजर के त्रिआयामी वैचारिक ढांचे को अपनाया है। ये है पुनर्विभाजन, मान्यता और भागीदारी; जिसके द्वारा समानता के आधार पर सहभागिता सुनिश्चित हो सके। अन्याय, शोषण और हाशियाकरण से संघर्ष के लिए आर्थिक समानता, सांस्कृतिक सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व तीनों जरूरी हैं। इस त्रिआयामी दृष्टि की विशेषता यह है कि यह पहचान की राजनीति के प्रति आलोचनात्मक है जो सांस्कृतिक सम्मान पर अधिक जोर देने के कारण आर्थिक/राजनीतिक गैर-बराबरी की अवहेलना करती है। उनके अनुसार अन्याय एक साथ ही दोनों प्रकार का हो सकता है जैसे स्त्री और नस्ल/समूहों पर अन्याय। इसलिए एक पक्ष को दूसरे में विघटित करने के स्थान पर हमें एक साथ ही दोनों मोर्चों पर संघर्ष करना चाहिए। हम यह देखने का प्रयास करेंगे कि किस तरह अम्बेडकर और लोहिया की विचारधारा को इस त्रिआयामी सिद्धांत के आधार पर अच्छी तरह समझ सकते हैं। इसके लिए पहले हम दोनों की मुख्य स्थापनाओं की चर्चा करेंगे फिर उनकी समानताओं/असमानताओं पर दृष्टि डालेंगे और अन्त में सामाजिक आन्दोलनों में उनकी सफलता/असफलता का मूल्यांकन करेंगे।

आजीवन अपने विचार और कर्म से सामाजिक न्याय (दलित और स्त्रियों ) के लिए संघर्षरत डॉ. भीमराव अम्बेडकर का उद्देश्य एक ऐसा समतावादी समाज बनाना था जिसके आधार मूल्य स्वतन्त्रता, समता और भाईचारा हैं। निश्चय ही इन आदर्शों पर पश्चिमी ज्ञानोदय की छाप है जो बाद में कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रसिद्ध दार्शनिक और उनके गुरु जान ड्यूई के सम्पर्क से और विकसित होती गयी। उसी समझ का सहारा लेकर उन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापनाओं में से कुछ को अपनाया और कुछ को अप्रासंगिक जानकर छोड़ दिया। अतः उनके समाज दर्शन को समझने के लिए उक्त तीनों आधारों पर ध्यान देना जरूरी है। यह उनके द्वारा उठाए गये कानूनी कदमों, संविधान निर्माण और सामाजिक आन्दोलनों में साफ दिखाई देता है। संक्षेप में सामाजिक न्याय की उनकी दृष्टि के मुख्य बिंदु निम्न हैं-
जाति का विनाश – अम्बेडकर के अनुसार जाति व्यवस्था भारतीय समाज में गैर-बराबरी का मूल कारण है अतः इसके विनाश के बिना समतामूलक समाज की स्थापना नहीं हो सकती। उनकी महत्त्वपूर्ण अन्तर्दृष्टि यह है कि यह असमानता सामान्य नहीं, श्रेणीबद्ध है जिसे सीढ़ीनुमा रूप से लागू किया जाता है। इसमें हर वर्ग अपने से नीचे वाले से बेहतर और ऊपर वाले से बदतर स्थिति में होता है। यह केवल आर्थिक विभाजन नहीं है बल्कि दर्ज और अधिकारों का पदानुक्रम है। यह समाज की एकता को तोड़ देता है और किसी सामूहिक एकजुटता की सम्भावना ही नहीं बचती क्योंकि यह श्रम विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है।
संवैधानिक लोकतन्त्र – सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए अम्बेडकर संवैधानिक लोकतन्त्र के पक्षधर हैं और इसी कारण संविधान निर्माण में अपनी प्रमुख भूमिका निभाते हुए उन्होंने उसकी उद्द्येशिका, नीति निदेशक सिद्धांतों और क़ानूनों में स्पष्ट व्यवस्था की। लेकिन भारतीय संविधान को देश को समर्पित करते समय अपने भाषण में यह चेतावनी भी दी कि सामाजिक-आर्थिक लोकतन्त्र के अभाव में राजनीतिक लोकतन्त्र अकेले सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता।
मौलिक अधिकार और सकारात्मक कार्यवाही – उपरोक्त उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने संविधान में अस्पृश्यता विरोधी कानून (आर्टिकल 17) और अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए शिक्षा और नौकरी में आरक्षण के लिए क़ानूनों की व्यवस्था कराई।
लैंगिक समानता – डॉ अम्बेडकर लैंगिक समानता के जबरदस्त हिमायती थे। कम भारतीय महिलाओं को इसकी जानकारी है कि हिन्दू कोड बिल का मसौदा तैयार करने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी जिसने हिन्दू स्त्रियों को शिक्षा, विवाह और सम्पत्ति आदि के अधिकार प्रदान किये। यद्यपि चुनाव (1952) और कॉंग्रेस के अंदर विरोध की सम्भावना से नेहरू ने उसे समय लोकसभा में लाने से इनकार कर दिया और विरोध में अम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। बाद में टुकड़ों में यह बिल पास हुआ किन्तु इससे डॉ. अम्बेडकर का अवदान कम नहीं हो जाता है।
आर्थिक समाजवाद – डॉ अम्बेडकर राज्य द्वारा प्रमुख उद्योगों के राष्ट्रीयकरण और कृषि योग्य जमीनों में सामूहिक खेती के पक्षधर थे जिससे सम्पत्ति का न्यायपूर्ण बटवारा हो और एकाधिकार को रोका जा सके।
व्यक्ति की गरिमा और स्वतन्त्रता – डॉ अम्बेडकर व्यक्ति की गरिमा के हिमायती थे। उनके अनुसार हर मनुष्य अपने में एक साध्य है; साधन नहीं। समाज को उसकी गरिमा की रक्षा करनी चाहिए और उसके विकास में सहयोग देना चाहिए।
बौद्ध धर्म में धर्म परिवर्तन – अम्बेडकर की मान्यता थी कि बिना जाति व्यवस्था के हिन्दू धर्म सम्भव नहीं है और इसी कारण जीवन के अन्तिम वर्ष में उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया, जो जन्म आधारित जाति प्रथा का विरोधी है।
आइए अब देखें कि डॉ राम मनोहर लोहिया के सामाजिक न्याय के बारे में क्या विचार हैं-
सप्तक्रान्ति – लोहिया का सामाजिक न्याय का दर्शन मुख्य रूप से सप्तक्रान्ति का दर्शन है। यह जाति, लिंग, नस्लऔर आर्थिक असमानताओं को एक साथ उखाड़ फेंकने का मौलिक प्रयास है; उसके परिणामस्वरुप ही एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण सम्भव है। इसके मुख्य तत्त्व हैं- जाति भेद के आधार पर भेदभाव,लैंगिक असमानता, नस्ल/रंग के आधार पर भेदभाव,औपनिवेशिक दासता के कारण भेदभाव,आर्थिक असमानता,नागरिक अधिकारों की रक्षा और हथियारों के स्थान पर सत्याग्रह।
पिछड़ा वर्ग आरक्षण – सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए लोहिया ने हाशिये पर स्थित वर्गों (पिछड़ा, अनुसूचित जाति, जनजाति और स्त्रियों) के लिए 60% आरक्षण की मांग की। उनका नारा ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’ आगे चलकर मंडल कमीशन के लिए आन्दोलन का आधार बना।
चौखम्बा राज्य – सामाजिक न्याय को जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए लोहिया ने चौखम्बा राज्य का विकेंद्रीकृत समाजवाद का मॉडल (गाँव, जिला, राज्य और केंद्रीय सत्ता) प्रस्तुत किया जिसमें राज्य एक साधारण व्यक्ति की पहुंच में बना रहे।
स्वदेशी तकनीक और नया समाजवाद – लोहिया साम्यवाद और पूँजीवाद दोनों के विरोधी थे और भारतीय परिस्थितियों के सन्दर्भ में नये समाजवाद का निर्माण करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने श्रम बहुल उपयुक्त स्वदेशी तकनीक की वकालत की और पूँजी बहुल तकनीक की खिलाफत की। समाजवाद की स्थापना के लिए उन्होंने अहिंसक सत्याग्रह को अपनाया और सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर जोर दिया।
अँग्रेजी भाषा और समानता – उनकी स्पष्ट मान्यता थी की अँग्रेजी भाषा में पढ़े-लिखे वर्ग और देशीभाषा में पढ़े-लिखे सामान्य वर्ग के बीच एक खाई है जो असमानता को बढ़ावा देती है। इसलिए भाषा को सामाजिक न्याय का हथियार बनाने के लिए उन्होंने शिक्षा और राज्य प्रबन्धन में अँग्रेजी के स्थान पर क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल की वकालत की। 1957 में उन्होंने अँग्रेजी हटाओ आन्दोलन भी चलाया।
अन्तर्सम्बन्धता – लोहिया इस बात से सहमत नहीं है कि वर्ग से जाति की उत्पत्ति होती है। वे जातीय उत्पीड़न में अन्तर्सम्बन्धता देखते हैं। एक गरीब दलित स्त्री, वर्ग, जाति, लिंग सभी से एक साथ ही पीड़ित होती है, किसी एक के आधार पर उसके शोषण को समझा नहीं जा सकता। इसी कारण वे मार्क्सवादियों के वर्ग आधारित यूरोपीय चिन्तन से प्रभावित नहीं होते।
जब हम सामाजिक न्याय के दोनों योद्धाओं के विचारों की तुलना करते हैं तो कई समानताएँ और भिन्नताएँ दिखाई देती हैं। दोनों ही अर्थशास्त्र में विदेश से पीएचडी थे। दोनों ही जाति व्यवस्था जनित असमानता से परिचित थे और एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए जाति व्यवस्था का विनाश करना चाहते थे; लेकिन दोनों के तरीके और नीतियों में अन्तर था।
दोनों के बीच पहला अन्तर तो इस बात से था कि चूंकि अम्बेडकर स्वयं दलित जाति से आते थे अतः जातिगत अवमानना का कड़वा अनुभव उन्होंने अपने जीवन में किया था। विदेश से उच्च शिक्षा पाकर लौटने के बाद भी उन्हें अपने ऑफिस के चपरासी द्वारा छुआछूत का सामना करना पड़ा था। डॉ लोहिया चूंकि व्यावसायिक वर्ग से आते थे, इसलिए उन्हें अपने व्यक्तिगत जीवन में जाति व्यवस्था की कठोरता का अनुभव नहीं करना पड़ा था। दोनों ही समाजवादी विचारधारा के समर्थक थे किन्तु फिर भी उनकी विचारधाराओं में अन्तर था। अम्बेडकर कुछ हद तक मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित थे लेकिन बाद में उन पर जॉन ड्यूई और बुद्ध के विचारों का भी प्रभाव पड़ा जिसके चलते वे प्रकार के संवैधानिक समाजवाद की ओर मुड़ गये और उन्होंने संविधान की उद्द्येशिका और नीति निर्देशक तत्त्व में समाजवाद के आदर्श की स्थापना की। उनका कानून की ताकत में बहुत विश्वास था जिसके कारण उन्होंने जातिगत आरक्षण और स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून बनाये। उन्होंने जाति की उत्पत्ति के बारे में भी चिन्तन किया जो लोहिया ने नहीं किया, उन्होंने अपने समाज में जाति व्यवस्था के स्वरूप को अपना लिया और इस बात पर फोकस किया कि जातियों का समीकरण बनाकर किस प्रकार सम्पन्न जातियों का वर्चस्व खत्म किया जाए। मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि जाति व्यवस्था का नाश कैसे हो इस पर लोहिया ने कोई मौलिक चिन्तन नहीं किया, लेकिन पीड़ित और सताई गयी जातियों को इकट्ठा करके कैसे उनकी ताकत का राजनीतिक इस्तेमाल किया जाए इसकी कोशिश की। उन्होंने अम्बेडकर के सामने भी यह प्रस्ताव रखा कि यदि दलित और पिछली जातियों में एकता हो जाए तो उनकी अधिक जनसंख्या के आधार पर देश के संसाधनों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है। अम्बेडकर ने यह सोचकर शायद इनकार कर दिया कि दलितों के लिए ऊंची जाति और पिछली जाति दोनों बराबर हैं; ऐसा उनके जीवन का अनुभव था। दोनों के बीच यही मूलभूत असमानता है जिस कारण वह सहमत नहीं हो सके। आज भी यह विरोधाभास मायावती और अखिलेश यादव के बीच टकराव के रूप में देखा जा सकता है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते हैं कि अम्बेडकर और लोहिया दोनों ही महान विचारक योद्धा थे जिन्होंने जाति प्रथा के उन्मूलन के लिए अपने-अपने ढंग से प्रयास किया किन्तु विडम्बना यह है कि जाति प्रथा आज भी कायम है। पिछले दिनों विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव दूर करने के लिए लाए गये सरकारी कानून के खिलाफ अगड़ी जातियों का आन्दोलन इसका गवाह है। आरक्षण की राजनीति से जाति प्रथा नष्ट नहीं होती बल्कि और संगठित होकर पहचान की राजनीति का अंग बन जाती है जिसमें दलित/पिछड़े वर्गों को कुछ लाभ अवश्य होता है किन्तु समाज में वैमनस्य में बढ़ोतरी होती है। यह मानना कि आपस में शादी-विवाह और खान-पान से जाति प्रथा टूट रही है, अपने को भ्रम में रखना है। जाति है की जाती नहीं। अम्बेडकर, लोहिया और ऐसे अनेक विचारक-समाज सुधारकों के प्रयत्न के बावजूद जाति व्यवस्था का कोढ़ भारतीय समाज में आज भी कायम है। हम क्या करें, किसी के पास इसका कोई समुचित उत्तर नहीं है। हम धीरे-धीरे समाजवाद के नाम पर जातिवादी पहचान की राजनीति के शिकार होते जा रहे हैं। सामाजिक न्याय का सवाल खटाई में पड़ गया है। क्या दोनों विचारक एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं? शायद अम्बेडकर के संविधानवादऔर लोहिया के राजनीतिक कर्म के मिलन से कोई रास्ता निकले।
अम्बेडकर और लोहिया के विचारों में सामंजस्य की खोज करने वालों के लिए उनके बीच वैचारिक मतभेद से निपटना होगा। स्वतन्त्रता से पहले राष्ट्रीय आन्दोलन में और बाद में भी अम्बेडकर और लोहिया दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े दिखाई देते हैं। अम्बेडकरवाद और समाजवादियों के बीच एक दूरी बनी रही। जातिगत न्याय और व्यापक सामाजिक न्याय के बीच क्या सम्बन्ध हो, यह भी मतभेद का विषय है। अम्बेडकर में गहराई ज्यादा है, लोहिया में व्यापकता अधिक है। एक बड़ा मतभेद जाति व्यवस्था और हिन्दू धर्म के सम्बन्ध को लेकर भी है। अम्बेडकर जाति को हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग मानते थे जबकि लोहिया इस विषय पर मौन साधे रहे। इसीलिए हिन्दू धर्म में सुधार की कोई सम्भावना न पाकर अम्बेडकर ने जीवन के अन्तिम समय में बौद्ध धर्म को अपना लिया। अम्बेडकर गैर दलितों के नेता नहीं बनना चाहते थे और उन्होंने सामाजिक परिवर्तन को लोहिया के मुकाबले ज्यादा महत्त्व दिया।
हमें यह मानना पड़ेगा कि राजनीतिक परिवर्तन को प्राथमिकता देने से कुछ दलित-पिछड़ी जातियों को तो लाभ हुआ किन्तु उनमें भी सभी को नहीं और इसमें उनके बीच भी गैर बराबरी और एक अभिजात वर्ग का जन्म हुआ। इस तरह आरक्षण की भूल-भुलैया में सामाजिक न्याय का सपना टूटकर बिखर गया। राजनीतिक सत्ता प्राप्ति के लिए किए गये अवसरवादी गठबन्धन से सामाजिक परिवर्तन की धार कुंद हो गयी। जाति विनाश का दोनों का सपना चूर-चूर हो गया। आज विचारणीय प्रश्न यही है कि क्या भारत में सामाजिक न्याय बिना जाति विनाश किए केवल जाति की पहचान की राजनीति से सम्भव है?










