आवरण कथाचर्चा मेंदेशप्रासंगिक

एक बड़े विद्वान सन्त का जाना

यह लेखक अपना सौभाग्य मानता है कि उसे सच्चिदानन्द सिन्हा के साथ कई वर्षों तक निकट रहने, उनके गहरे सम्पर्क में चार दशकों से अधिक समय बिताने, उनके रचनाकर्म, राजनीतिक कर्म और साधु-जैसे जीवन को बहुत पास से देखने–समझने का अवसर मिला। उनका स्नेह मिला, हर प्रश्न पर स्पष्ट उत्तर मिला और उनके आचरण के विविध पक्षों को जानने का अवसर मिला। निश्चय ही यह सौभाग्य केवल इस लेखक तक सीमित नहीं था। अविवाहित सच्चिदा जी का एक बड़ा परिवार था—जिसे उन्होंने अपने राजनीतिक, सामाजिक और लेखकीय कर्मों से और व्यापक बनाया। उनके लेखन औरचिन्तन से लाभान्वित होने वालों की संख्या का अनुमान लगाना कठिन है, क्योंकि पिछले पचास वर्षों से उनका लिखा बड़े अखबारों, पत्रिकाओं और जन आन्दोलनों के माध्यम से व्यापक रूप से पढ़ा और बाँटा गया। हिन्दी पट्टी की कम से कम दो पीढ़ियों के वैचारिक गठन में जिन व्यक्तियों की निर्णायक भूमिका रही है, उनमें सच्चिदानन्द सिन्हा भी अग्रणी रहे हैं।

इस लेखक के मत में बीते लम्बे समय में समाज विज्ञान के क्षेत्रों में उनसे बड़ा विद्वान शायद ही कोई रहा हो। राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, इतिहास, समाजशास्त्र और नृविज्ञान ही नहीं, दर्शन, कला, संस्कृति, मानव मनोविज्ञान, सौंदर्यशास्त्र और धर्म के क्षेत्रों में भी उनका अध्ययन किसी को भी चकित कर सकता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जिस समाजवादी धारा में उन्होंने राजनीति और लेखन किया, उसमें इतने विविध विषयों पर इतनी गम्भीरता से लिखने वाला दूसरा कोई नहीं हुआ। पर वे महज पाठक या पुनरुत्पादक विद्वान नहीं थे। वे एक विचारक थे—जो अध्ययन और सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता से अर्जित अनुभवों के आधार पर जीवन के विविध पक्षों पर लगातार सोचते थे और सिद्धांत तथा व्यवहार के बीच उभरते द्वंद्वों का समाधान खोजते थे। इन्हीं आधारों पर उन्होंने व्यापक और गम्भीर लेखन किया।

बिना किसी अकादमिक संस्था से जुड़े, बिना किसी शोधवृत्ति या अनुदान के उन्होंने जितना अध्ययन और लेखन किया, वह सचमुच आश्चर्यजनक है। उनका सक्रिय और उच्च स्तरीय लेखन पचास वर्षों से अधिक अवधि में फैला हुआ है। उन्होंने अपना पूरा जीवन अध्ययन और सामाजिक-राजनीतिक कार्यों में लगाया। पर सच्चिदानन्द सिन्हा केवल लेखक या चिन्तनशील व्यक्ति ही नहीं थे; वे कर्मशील समाजवादी कार्यकर्ता भी थे। बहुत कम उम्र में समाजवादी आन्दोलन, विशेषकर जयप्रकाश नारायण के प्रभाव में आकर उन्होंने पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता बनने का निर्णय लिया और घर छोड़ दिया। शारीरिक श्रम का अनुभव लेने और आत्मनिर्भर रहने के लिए उन्होंने कोयला-पत्थर तोड़ने और बोझ उठाने जैसे काम किए।

इसी दौर में मजदूर संगठनों और अध्ययन शिविरों के माध्यम से उन्होंने गहन अध्ययन किया। प्रतिद्वंद्वी मजदूर संगठनों के पुस्तकालयों से किताबें लेकर पढ़ना और वैचारिक बहसों में हिस्सा लेना उनके बौद्धिक विकास का अहम हिस्सा रहा। ऐसी ही एक बहस में की गयी अखबारी टिप्पणी पर जब डॉ. राममनोहर लोहिया की नजर पड़ी तो उन्होंने सच्चिदा जी की खोज-खबर ली और सीधे अपनी पत्रिका मैनकाइंड के सम्पादकीय मण्डल में शामिल कर लिया। इसके साथ ही वे मुम्बई से हैदराबाद चले आये। इस टोली के साथ रहना उनके बौद्धिक विकास के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुआ। श्रीलंकाई समाजवादी साथी हेक्टर अभयवर्धने से उनकी विशेष निकटता रही।

कुछ समय बाद खराब स्वास्थ्य, वैचारिक असहमति और पिता के निधन के बाद बहनों की जिम्मेदारी निभाने के लिए वे गाँव लौट आये। फिर 1969 में वे दिल्ली आये और समाजवादी पार्टी, समता संगठन तथा समाजवादी जन परिषद के साथ सक्रिय राजनीति करते हुए मुख्यतः लेखन में लगे रहे। उनका अधिकांश गम्भीर लेखन इसी दौर का है। उन्होंने डॉ. अम्बेडकर के चुनाव प्रभारी के रूप में भी काम किया और आपातकाल के समय बड़ौदा डायनामाइट केस में बन्द जॉर्ज फर्नांडीस के 1977 के मुजफ्फरपुर चुनाव के प्रभारी भी रहे। आपातकाल के दौरान दिल्ली में भूमिगत रहते हुए उन्होंने जितना सम्भव था, उतना राजनीतिक काम किया।

करीब डेढ़ दशक दिल्ली में रहने के बाद जब उन्हें लगा कि बढ़ते खर्च के लिए ऐसे काम करने पड़ेंगे जिनमें समझौते करने होंगे, तो वे अपने गाँव मणिका (मुजफ्फरपुर) लौट गए। गाँव उनके लिए केवल वैचारिक आकर्षण नहीं था, बल्कि व्यवहारिक जीवन का आधार भी था। अत्यन्त समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि होने के बावजूद उन्हें भौतिक साधनों से कोई विशेष लगाव नहीं था। वे व्यवहार में ऋषि-मुनि जैसा जीवन जीते थे—गाँधी की तरह न्यूनतम साधनों में। उन्होंने विवाह नहीं किया, पर परिवार उन्हें प्रिय था। वे स्वयं अपने जीवन से एक आदर्श प्रस्तुत करते थे, लेकिन किसी पर उसे थोपते नहीं थे। वे जो लिखते थे, उसे जीने का प्रयास करते थे। इसी कारण बाद के वर्षों में उनके लेखन में पर्यावरण और प्रदूषण का प्रश्न केन्द्रीय हो गया।

शुरुआत में वे मार्क्सवादी थे और रोरोजा लक्ज़मबर्ग तथा जयप्रकाश नारायण की प्रेरणा को महत्त्व देते थे। धीरे-धीरे उन पर गाँधी का रंग गहराता गया। उनकी किताबों और लेखों से हम जिस सच्चिदानन्द सिन्हा को जानते हैं, वह मुख्यतः लेखक और विचारक हैं। पर उनके राजनीतिक कर्म और साधु जीवन की छवि उतनी ही महत्वपूर्ण है। आश्चर्य यह है कि इतने विविध विषयों पर लिखने के बावजूद उनके लेखन का स्तर कहीं हल्का नहीं पड़ता। जैसे-जैसे पाठक उन्हें पढ़ता जाता है, उनकी समग्र दृष्टि का विस्तार सामने आता जाता है।

उनका प्रारम्भिक लेखन अँग्रेजी में था। बाद में उन्होंने हिन्दी में महत्त्वपूर्ण किताबें लिखीं—जैसे जिन्दगी सभ्यता के हाशिए पर, संस्कृति विमर्श और कैपिटल का चौथा खण्ड। वे फ्रेंच और जर्मन भाषाएँ भी जानते थे। संस्कृत उन्होंने औपचारिक रूप से नहीं पढ़ी थी, फिर भी शब्दकोश के सहारे पाली-प्राकृत और आचार्य नरेन्द्र देव की कठिन भाषा को समझने में उन्हें कठिनाई नहीं हुई।

उनका लेखन केवल अकादमिक नहीं था। वे राजनीतिक टिप्पणीकार, प्रशिक्षक और आन्दोलनकारी लेखक भी थे। समाजवादी कार्यकर्ताओं के लिए उन्होंने प्रशिक्षण सामग्री तैयार की। अखबारी लेखन भी उन्होंने केवल आजीविका के लिए नहीं किया; हर लेख किसी बड़े प्रश्न को उठाने और स्पष्ट करने की कोशिश था। भूमण्डलीकरण पर उनका लेखन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। छोटे गाँव में रहते हुए भी उन्होंने भूमण्डलीकरण की तीखी आलोचना की और उसके विकल्प सुझाए—जो विविधता, टिकाऊपन और विकेन्द्रीकरण पर आधारित थे।

उनके लिए विविधता का सम्मान, केन्द्रीकरण का विरोध और टिकाऊ विकास केवल नीतियाँ नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य थे। समता, स्वतन्त्रता, लोकतन्त्र, मानवाधिकार, अहिंसा, सत्य और निरस्त्रीकरण उनके चिन्तन के केन्द्रीय तत्व थे। कला, संस्कृति और इतिहास पर लिखते समय भी वे इन्हीं मूल्यों को आधार बनाते थे। वे शहरीकरण को केन्द्रीकरण की प्रक्रिया मानते थे और उसके दुष्परिणामों को उजागर करते थे।

उन्होंने जाति व्यवस्था, विकास मॉडल, खेती-किसानी की दुर्दशा, आन्तरिक उपनिवेश, मार्क्सवाद, गठबन्धन की राजनीति और वैश्विक स्वतन्त्रता संघर्षों पर विस्तार से लिखा। इस अर्थ में उन्होंने समाजवादी धारा के भीतर सबसे व्यापक लेखन किया। उनके लेखन में गाँधी-लोहिया की परम्परा आगे बढ़ती है और कई जगह उससे आगे निकलती है।

लगभग पचहत्तर वर्षों के सार्वजनिक जीवन में उन्होंने कोई पद या पुरस्कार स्वीकार नहीं किया। कई बार बिना पूछे घोषित किए गए सम्मान उन्हें असहज करते थे। उनकी किताबों का प्रकाशन भी अनियमित ढंग से हुआ—कभी बड़े प्रकाशकों से, कभी छोटे से। उन्होंने कभी प्रचार या समीक्षा की माँग नहीं की। उनके लेखन में कहीं-कहीं दोहराव मिलता है, जो इतने लम्बे और सक्रिय जीवन में स्वाभाविक है।

सच्चिदानन्द सिन्हा का समकालीन लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों से गहरा संवाद था। रघुवीर सहाय, निर्मल वर्मा, प्रयाग शुक्ल, गिरिधर राठी, राजकिशोर, ओम थानवी जैसे अनेक रचनाकारों से उनका आत्मीय रिश्ता रहा। कला जगत में रामकुमार, कृष्ण खन्ना और स्वामीनाथन जैसे कलाकारों से उनका संवाद रहा। कृष्ण खन्ना के आग्रह पर उन्होंने अरूप और अकार जैसी पुस्तक लिखी, जो कला-चिन्तन का अनोखा उदाहरण है।

सच्चिदानन्द सिन्हा केवल विद्वान नहीं थे, वे सन्त-सरीखे व्यक्ति थे। उनका जीवन सादगी, सत्य और वैचारिक प्रतिबद्धता का उदाहरण था। उन्होंने सत्ता, पद और प्रतिष्ठा से दूरी बनाए रखी और ज्ञान, श्रम और विचार को अपना मार्ग बनाया। उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक पूरे वैचारिक युग की क्षति है। आज के समय में, जब विचार और नैतिकता दोनों संकट में हैं, सच्चिदानन्द सिन्हा का जीवन और लेखन हमें यह याद दिलाता है कि राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि जीवन को अधिक मानवीय बनाने का प्रयास है।

उनकी स्मृति हमें यह सिखाती है कि सच्चा विद्वान वही है जो ज्ञान को जीवन में उतारे और जीवन को विचार में ढाले। सच्चिदानन्द सिन्हा इसी अर्थ में एक बड़े विद्वान ही नहीं, एक सन्त भी थे।

सच्चिदानन्द सिन्हा की वैचारिक यात्रा का आरम्भ कला और संस्कृति से होता है और धीरे-धीरे समाज, राजनीति, राष्ट्रवाद, आरोजादी, कृषि, शहर, जाति और समाजवाद के बुनियादी प्रश्नों तक पहुँचता है। उनकी पहली महत्त्वपूर्ण पुस्तक केयोस एण्ड क्रिएशन  (हिन्दी अनुवाद: अरूप और आकार) आज भी भारत में कला की बुनियादी समझ विकसित करने वाली सबसे प्रभावशाली कृतियों में मानी जाती है। यह पुस्तक समय और भूगोल की सीमाएँ तोड़ते हुए यह स्थापित करती है कि जिस तरह विज्ञान और तकनीक जीवन के लिए आवश्यक हैं, उसी तरह कला भी अनिवार्य है। मनुष्य कला के बिना न रह सकता है, न आगे बढ़ सकता है।

इस पुस्तक में लेखक आदिम मानव की भित्ति चित्रकारी से लेकर आधुनिक चित्रकला तक की यात्रा का विवेचन करता है और विज्ञान के नवीनतम आविष्कारों तथा कला-जगत की सूचनाओं को जोड़ते हुए अत्यन्त रोचक तर्क प्रस्तुत करता है। जैसे ही पाठक को लगता है कि लेखक पश्चिमी कला आन्दोलनों के घटाटोप में उलझ रहा है, वे भारतीय कला की विशिष्टताओं को सामने रखते हैं। सबसे बड़ा अन्तर यह बताया गया है कि पश्चिम में कला का निर्माण दास श्रम से जुड़ा रहा, जबकि भारतीय कलाकार आनन्द और समर्पण से सृजन करते रहे हैं।

उनकी पहली चर्चित हिन्दी पुस्तक संस्कृति विमर्श मनुष्य के जीवन में संस्कृति की भूमिका को वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक आधार पर समझाती है। संस्कृति केवल जीवन-शैली या पहचान नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर मौजूद एक जैविक कमी की पूर्ति भी है। लेखक बताते हैं कि मनुष्य में हिंसा रोकने का कोई प्राकृतिक ‘यन्त्र’ नहीं है। अन्य प्राणी पराजय का संकेत देखकर रुक जाते हैं, लेकिन मनुष्य क्रोध, लोभ और अहंकार में निरपराध लोगों तक का संहार कर देता है। संस्कृति इसी अनियंत्रित हिंसा पर अंकुश लगाने का साधन है।

संस्कृति और समाजवाद में कला और संस्कृति के समाज से द्विपक्षीय सम्बन्धों की पड़ताल है। यह पुस्तक बताती है कि राजनीति और संस्कृति को अलग-अलग देखने की भूल हम करते रहे हैं। किसी भी प्रभावी राजनीतिक विचारधारा को संस्कृति से कटकर नहीं समझा जा सकता। यह सन्तुलन और उसकी अनिवार्यता को रेखांकित करती है।

राष्ट्रवाद पर लिखी गयी उनकी संक्षिप्त लेकिन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक मानव सभ्यता और राष्ट्र-राज्य आज के शोरगुल भरे राष्ट्रवाद को ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में समझाती है। लेखक दिखाते हैं कि यूरोप में राष्ट्र-राज्य की अवधारणा कबीलों के विस्तार और संसाधनों पर कब्जे से जुड़ी रही है। नस्ल, रक्त-शुद्धता और भूगोल के नाम पर संहार हुए। अमेरिका का उदाहरण इससे भी अधिक भयावह है। इसके विपरीत भारत में विविध जातीय समूहों के बावजूद राष्ट्र की भावना सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधार पर बनी रही। काशी और अजमेर शरीफ जाने पर कभी रोक नहीं लगी, राम किसी सीमा में नहीं बंधे। इस तरह वे आज के घृणा-आधारित राष्ट्रवाद को ऐतिहासिक आईना दिखाते हैं।

मानव स्वतन्त्रता की लड़ाई पर आधारित पुस्तक एडवेंचर ऑफ लिबर्टी  यह स्थापित करती है कि इतिहास में आरोजादी सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति रही है। फ्रांसीसी क्रान्ति से पहले भी स्पार्टकस से लेकर भक्ति आन्दोलन तक स्वतन्त्रता के संघर्ष चलते रहे। लेखक बताते हैं कि आजादी किसी सत्ता की कृपा से नहीं, बल्कि आम लोगों के संघर्ष और बलिदान से मिली है। वे इसे हवा, पानी और भोजन जितना आवश्यक मानते हैं।

कृषि संकट पर आधारित पुस्तक बिटर हार्वेस्ट  आधुनिक विकास मॉडल की मूल आलोचना है। लेखक बताते हैं कि यूरोप, अमेरिका, सोवियत संघ या चीन—हर जगह औद्योगीकरण खेती के शोषण पर टिका रहा है। खेतिहर समाज का संकट दरअसल सत्ता के केन्द्रीकरण से जुड़ा है। खेती का चरित्र विकेंद्रित और स्वतन्त्र है, जबकि आधुनिक उद्योग और शहर केन्द्रीकृत सत्ता से संचालित होते हैं। यही कारण है कि खेती का विनाश पूरी सभ्यता के लिए घातक है।

खेती से विस्थापित जनसंख्या के शहरों में फैलने की त्रासदी पर आधारित जिंदगी सभ्यता के हाशिये पर भारतीय शहरी गरीबों पर लिखी गयी सर्वोत्तम पुस्तकों में से एक है। लेखक बताते हैं कि 50,000 से कम आबादी वाले शहर ही टिकाऊ हो सकते हैं। उससे बड़े शहर सत्ता और संसाधनों के केन्द्रीकरण का परिणाम हैं और अन्ततः महामारी, जल संकट और कचरे के कारण ढह जाते हैं।

गाँधी पर लिखी गयी उनकी अनूठी पुस्तक द अनआर्म्ड प्रोफेट गाँधी को राजनेता नहीं, बल्कि नैतिक महापुरुष के रूप में देखती है। लेखक मानते हैं कि गाँधी की विशिष्टता यह है कि उनके विचारों का प्रसार अहिंसा से हुआ, जबकि अन्य महापुरुषों के विचार तलवार के सहारे फैले। वे नैतिक सत्ता के स्रोतों की खोज करते हैं और बताते हैं कि कला, विज्ञान और आध्यात्म—तीनों ने गाँधी की नैतिकता को गढ़ा।

समाजवाद पर उनकी पुस्तिकाएँ लोहिया और जेपी के प्रभाव को रेखांकित करती हैं। वे बताते हैं कि भारतीय समाजवाद का स्वरूप विकेन्द्रीकरण, लोकतन्त्र और असहमति के सम्मान पर आधारित है। इसके विपरीत नक्सलवाद पर लिखी उनकी आलोचनात्मक पुस्तिका हिंसा, संकीर्णता और फासीवादी प्रवृत्तियों को उजागर करती है।

आपातकाल पर लिखी गयी पुस्तक इमरजेंसी इन पर्स्पेक्टिव भारतीय समाज की चुप्पी और सत्ता के केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति का गहन विश्लेषण करती है। इसके बाद जनता पार्टी सरकार पर आधारित परमानेंट क्राइसिस  यह दिखाती है कि व्यवस्था बदलने का साहस न होने से पुरानी बीमारियाँ लौट आईं।

जाति व्यवस्था पर उनका अध्ययन एक नयी दृष्टि प्रस्तुत करता है। वे बताते हैं कि जाति व्यवस्था स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील रही है। कुलदेवता और कुलदेवी के आधार पर समाज को समझने का उनका विश्लेषण समाजशास्त्र में एक नया अध्याय खोलता है।

मार्क्सवाद की समीक्षा करते हुए वे सोशलिज्म एण्ड पॉवर  में बताते हैं कि मार्क्सवाद सत्ता का दर्शन बनते ही विकृत हो गया। किसान, मनोविज्ञान, संस्कृति और नैतिकता की उपेक्षा ने उसे सर्वसत्तावादी बना दिया।

अन्ततः उनकी पुस्तक इण्टरनल कॉलोनी  यह दिखाती है कि राष्ट्र भी अपने भीतर उपनिवेश बनाते हैं। केन्द्रीकरण से असमानता घटती नहीं, बल्कि बढ़ती है।

इस प्रकार सच्चिदानन्द सिन्हा का समग्र लेखन कला से शुरू होकर संस्कृति, समाज, राजनीति, राष्ट्र, जाति, कृषि और सत्ता तक फैला हुआ है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे हर विषय को मनुष्य की स्वतन्त्रता, नैतिकता और विकेन्द्रीकरण के प्रश्न से जोड़ते हैं। उनका लेखन आज के समय में इसलिए और अधिक प्रासंगिक है क्योंकि वह हमें शोर, घृणा और केन्द्रीकरण के बीच विवेक, विविधता और स्वतन्त्रता का रास्ता दिखाता है।

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अरविंद मोहन

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. संपर्क - +91 98118 26111
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