
इकोसोशलिज्म: ए रेडिकल अल्टरनेटिव टू कैपिटलिस्ट कैटस्ट्रॉफ़ी
डूम्सडे क्लॉक या अंतिम समय की घड़ी, जो हमें यह संकेत देती है कि मानवता अपनी समाप्ति के कितने नज़दीक है, अब केवल परमाणु युद्ध के खतरे तक सीमित नहीं रही। आज, यह घड़ी न केवल न्यूक्लियर युद्ध के खतरे को, बल्कि जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक शोषण, और सामाजिक असमानताएँ जैसी समस्याओं को भी ध्यान में रखते हुए यह आगे बढ़ रही है। इसके साथ ही, नॉन-न्यूक्लियर युद्ध जैसे क्षेत्रीय संघर्ष भी एक नया डर उत्पन्न कर रहे हैं, जिनसे वैश्विक शांति पर असर पड़ सकता है। यह सभी कारक हमें एक ऐसे मोड़ पर ले आए हैं, जहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या हम एक बेहतर और अधिक टिकाऊ दुनिया का निर्माण कर सकते हैं, या क्या हम खुद ही अपनी तबाही की दिशा में बढ़ रहे हैं?
माइकल लोवी की पुस्तक जो कि इकोसोशलिज्म पर उनके अलग-अलग लेखों का संकलन है, “इकोसोशलिज्म: अ रेडिकल अल्टरनेटिव टू कैपिटलिस्ट कैटस्ट्रॉफ़ी” इसी प्रकार के सवालों से जूझती है। यह केवल पर्यावरण संकट की चर्चा नहीं करती, बल्कि यह भी समझने की कोशिश करती है कि कैसे पूँजीवादी व्यवस्था और प्राकृतिक संसाधनों का शोषण जलवायु संकट को और बढ़ा रहे हैं। लोवी का इकोसोशलिज्म हमें एक वैकल्पिक रास्ता दिखाता है, एक ऐसी दुनिया की कल्पना, जहाँ पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय एक साथ चलते हैं।
इसी विचार को ध्यान में रखते हुए, मैं इस पुस्तक की समीक्षा करुँगी कि क्या इकोसोशलिज्म एक वास्तविक समाधान हो सकता है? क्या यह जलवायु परिवर्तन और युद्ध जैसी वैश्विक आपदाओं को रोकने में समर्थ हो सकता है, या यह केवल एक आदर्शवादी कल्पनामात्र है?
अगर कहीं उम्मीद या समाधान की झलक दिखे और वो कोरी कल्पना भी लगे तो उसे लेकर वाद-विवाद होते रहना चाहिए और यह उस विकल्प की तलाश में पहली सीढ़ी बन सकती है।
माइकल लोवी के अनुसार इकोसोशलिज्म का मुख्य विचार समाजवाद की पुरानी समझ से भिन्न है क्योंकि पर्यावरण की परवाह किये बिना समाजवाद असफल है और समाज की समस्याओं को नज़रअंदाज़ करके पर्यावरणवाद वर्तमान के पर्यावरणीय संकट का हल नहीं निकाल सकता यानि दोनों अन्योन्याश्रित है। यह “लाल” (मार्क्सवादी विचार जो पूँजीवाद की आलोचना करता है और एक वैकल्पिक समाज का हिमायती है) और “हरा” (पर्यावरणीय विचार जो ज़रूरत से अधिक उत्पादन की आलोचना करता है) को मिलकर अपने असल अर्थ को साकार करता है किन्तु यह सोशल डेमोक्रेट्स और ग्रीन पार्टीज के राजनीतिक गठबंधनों से पूर्णतः भिन्न है, जो कहीं न कहीं पूँजीवादी तरीकों पर निर्भर या एक तरह से विकल्प के नाम पर पूँजीवाद के लिए बचाव का रास्ता प्रदान करता है। यहाँ ग़ौर करने वाली बात यह है कि लोवी उत्पादन में मध्यम मार्ग की बात करते हैं यानि न तो देखूआसों या डिग्रोथ जो कहीं न कहीं इकोलॉजिकल डिकटेटरशिप का रूप लेने लगता है और न ही समाजवाद की आशावादी सोच जो अत्यधिक और अनियंत्रित उत्पादन पर बल देती है। इकोसोशलिज्म का पूँजीवाद के साथ समझौते से कोई सरोकार नहीं है। उससे भी अधिक इकोसोशलिज्म आधुनिक पश्चिमी पूँजीवादी या औद्योगिक सभ्यता की नींव से ख़ुद को पूरी तरह अलग कर, एक नई जीवनशैली बनाने की बात करता है।
पूँजीवादी व्यवस्था असफल हो चुकी है, इस बात को लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर गहन चर्चा हो रही है। इकोफेमिनिस्ट वंदना शिवा ने कई दफ़ा इस बात पर ज़ोर दिया है कि जिस पूँजीवादी व्यवस्था को आज हम देख रहे हैं, उसका बीज सैकड़ो साल पहले रेने देकार्त और फ्रैंसिस बेकन की फालसफ़ा में ही पड़ चुका था। रेने देकार्त और फ्रांसिस बेकन दोनों ही आधुनिक दर्शन के प्रमुख विचारक थे, जिनके विचारों ने पूँजीवाद और विज्ञान के विकास को प्रेरित किया। देकार्त ने पश्चिम में द्वैतवाद की अवधारणा दी, जिसमें उन्होंने शरीर और मन या चेतना को अलग-अलग और स्वतंत्र अस्तित्व माना। उनके अनुसार, मन सर्वोपरि है, क्योंकि यह सोचने और आत्म-ज्ञान का स्रोत है, जबकि शरीर का स्थान मन के बाद है और यह भौतिक मशीन की तरह है जो मन के आदेशों का चुपचाप पालन करता है। इस द्वैतवाद ने ही निम्नता और श्रेष्ठता के बीच के विभाजन को जन्म दिया और यह ऐसा विभाजन बना कि भौतिक शरीर के निम्न होने की स्थिति अब उस शरीर से परे अन्य भौतिक चीजों यानि प्राकृतिक संसाधनों तक चली गई। यह द्वैतवाद अन्याय की नींव पर ही टिका है और कथित श्रेष्ठ तबके को शोषण का अधिकार भी देता है।
वहीं, फ्रांसिस बेकन ने विज्ञान के अनुभवात्मक दृष्टिकोण का समर्थन कर इसे बढ़ावा दिया और प्राकृतिक संसाधनों के शोषण के लिए प्रायोगिक विधियों का प्रयोग किया। बेकन का यह विचार कि मनुष्य को प्रकृति पर जीत हासिल करने लिए तर्क और अनुभव का उपयोग करना चाहिए, पूँजीवाद में उत्पादकता और लाभ बढ़ाने के सिद्धांतों से मेल खाता है। इस तरह के दर्शन ने मानवता को विज्ञान, तर्क, और व्यक्तित्व की स्वतंत्रता के माध्यम से विकास की दिशा में अग्रसर किया, लेकिन जिस पूँजीवादी व्यवस्था का आज बुद्धिजीवी जमात विकल्प ढूंढ़ रहा है,उस व्यवस्था का आधार इसी दर्शन से तैयार हुआ। ऐसे में वक़्त एक आधारभूत बदलाव की माँग करता है और जो आज के परिप्रेक्ष में संवेदनशीलता के साथ संकट की गहराई को समझे और समाधान से पहले संकट के नब्ज़ को पकड़ लेना ही इसके हल के लिए पहला कदम साबित होगा क्योंकि तथाकथित समाधान इस व्यवस्था के लिए फ़िर से कोई न कोई बचाव का रास्ता ही प्रदान करेंगे।
ईकोसोशलिज़्म एक विचारधारा के रूप में महत्वपूर्ण बदलाव की आवश्यकता को उजागर करता है, जिसमें वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था को पर्यावरणीय संकट के समाधान के लिए सक्षम नहीं माना गया है और संरचनात्मक बदलाव पर बल दिया गया है, जो समाजवादी अर्थव्यवस्था पर आधारित होगा क्योंकि लगातार मुनाफ़े की मंशा से विकास न केवल पर्यावरण के लिए, अपितु यह ख़ुद मानवता की प्राकृतिक नींव को भी समाप्त कर रहा है। इकोसोशलिज्म पारम्परिक पूँजीवादी व्यवस्था की आलोचना के साथ-साथ लोवी ने कुछ मौलिक बदलाव को भी प्रस्तावित किया है। पर्यावरण संकट से निपटने के लिए गहरी तकनीकी और सामाजिक पुनर्रचना आवश्यक है। लोवी का मानना है कि यदि हम प्रदूषण और सीमित ऊर्जा स्रोतों को छोड़कर नवीकरणीय और प्रदूषण रहित ऊर्जा स्रोतों, जैसे कि पवन और सौर ऊर्जा को अपनाना चाहते हैं, तो हमें एक नया दृष्टिकोण अपनाना होगा। यह नया दृष्टिकोण मार्क्सवादी धारा से भिन्न है क्योंकि यह जहाँ एक तरफ़ वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था की आलोचना करता है, वहीं दूसरी ओर आज के सन्दर्भ में तकनीकी विकास और उसके दुष्परिणामों को समझ फ़िर बदलाव की बात करता है। इस परिवर्तन के लिए मुख्य सवाल यह है कि बदलाव उत्पादन के साधनों पर नियन्त्रण के बिना नहीं हो सकता।
यह आर्टिफीसियल इंटेलीजेंस का दौर है और इसपर किस तबके या देश का नियन्त्रण होगा, यह बात ही इसके भविष्य को भी तय करेगी। इस बात को कतई नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि नियन्त्रण में ही वास्तविक समाधान छिपा है और लोवी भी इन्हीं गहरे सवालों से जूझते हुए इसी नियन्त्रण की बात करते हैं कि “उत्पादन के साधनों पर नियन्त्रण कैसे स्थापित किया जाए, विशेष रूप से निवेश और तकनीकी बदलावों पर निर्णय कैसे लिए जाएं। इन निर्णयों को बैंकों और पूँजीवादी कंपनियों से दूर करके समाज के सामान्य भले के लिए लिया जाना चाहिए।”
तकनीकी विकास इस दौर की वो सच्चाई है जिसे स्वीकार करने में ही भलाई है क्योंकि अब वक़्त से पीछे लौटना संभव नहीं। मार्क्स ने तकनीकी उन्नति को संपत्ति के संचयन के तौर पर नहीं बल्कि काम करने के दिन में कटौती और बचे वक़्त के संचयन के तौर पर देखा था अर्थात हैविंग नहीं बल्कि बीइंग था मार्क्स के मस्तिष्क में, किन्तु हो इसके उलट रहा है। मार्क्स के तकनीकी विकास के रिक्त स्थान भरते हुए और पर्यावरणविद के तर्क को बढ़ाते हुए लोवी लिखते हैं कि “वास्तव में, यह सिर्फ उत्पादन की बात नहीं है, बल्कि उपभोग की भी समस्या है। हालांकि, यह कहना कि बुर्जुआ/औद्योगिक सभ्यता का मुख्य मुद्दा “अत्यधिक उपभोग” है, पूरी तरह से सच नहीं है। समाधान यह नहीं है कि उपभोग पर सामान्य “सीमा” लगा दी जाए। बल्कि समस्या यह है कि उपभोग का जो प्रकार प्रचलित है, वह दिखावा, अपव्यय, वाणिज्यिक अलगाव और संचय की लत पर आधारित है। इसे चुनौती दी जानी चाहिए, क्योंकि यह प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक शोषण करता है।”
पूँजीवाद के अनुसार, बाजार को रेशनल माना जाता है, क्योंकि यह मांग और पूर्ति के आधार पर काम करता है, और यह माना जाता है कि उपभोक्ता की पसंद और पूर्ति अपने आप सही और संतुलित हो जाती है।
यह दलील अक्सर दी जाती है कि द लॉज़ ऑफ़ मार्किट काफ़ी है बाज़ार को प्राकृतिक तरीक़े से चलने के लिए किन्तु यह दलील पर्यावरण के नज़रिये से तर्कहीन मालूम पड़ती है क्योंकि टेक्नोलॉजी के इस दौर में इलेक्ट्रिकल सामानों को नियोजित अप्रचलन या मूल्यह्रास की नीति के तहत तैयार किया जाता है,जिसमें इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं को इस तरह से डिज़ाइन किया जाता है कि उनका जीवनकाल सीमित हो और उन्हें कुछ सालों के अंतराल में बदलने की जरूरत पड़े। इसके कारण, उपभोक्ता बार-बार नया सामान खरीदने के लिए विवश है, भले ही पुराने उत्पाद अभी भी काम करने की स्थिति में हो। इससे संसाधनों की बर्बादी होती है और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जो बाजार की रेशनालिटी के खिलाफ जाता है। इस दौर की एक बड़ी समस्या फास्ट फैशन की है और पूँजीवादी व्यवस्था के गैर-ज़रूरी उपभोग पर आधारित है। फ़ास्ट फैशन अब उद्योग का रूप ले चुका है, जहां कपड़े जल्दी-जल्दी बदलते हैं, और हर मौसम में नए डिज़ाइन पेश किए जाते हैं। उस नए डिज़ाइन की जीवन रेखा अत्यंय छोटी होती है लेकिन यह प्रणाली उपभोक्ताओं को जल्दी-जल्दी नए कपड़े खरीदने के लिए उकसाती है, जिससे बड़े पैमाने पर कपड़े की बर्बादी होती है। यह इस बात को साबित करता है कि बाजार का रेशनालिटी वास्तव में दीर्घकालिक सोच और टिकाऊपन पर आधारित नहीं होता, बल्कि अधिक से अधिक मुनाफा कमाने पर केंद्रित होता है, भले ही इससे पर्यावरणीय और सामाजिक नुकसान हो। चिली के कपड़ों का कचरा पहाड़, जिसे कपड़ों का कब्रिस्तान भी कहा जाता है, अपनी व्यथा पूरी दुनिया को सुना रही है।
माइकल लोवी के अलग-अलग लेखों के माध्यम से यह आम अवधारणा भी टूट जाती है कि पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन की चिंता केवल तथाकथित “प्रिविलेज़्ड क्लास” तक सीमित है। अगर हम सतही स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की चर्चा को देखें तो एक ख़ास किस्म की तस्वीर निकलकर आती है कि पर्यावरणीय मुद्दों पर केवल वही लोग ध्यान देते हैं जो आर्थिक और सामाजिक रूप से मज़बूत हैं, जैसे कि दुर्लभ प्रजातियों को बचाने या ग्लोबल वॉर्मिंग पर चर्चा या गोष्ठी करने वाले लोग। लेकिन आदिवासी समुदायों के संघर्ष इस रूढ़िबद्ध धारणा को तोड़ते हुए नज़र आते हैं और यह समझाने का प्रयास करते हैं कि पर्यावरणीय समस्याओं का सबसे गहरा प्रभाव उन्हीं पर पड़ता है, जो सीधे तौर पर नदी, जंगल और भूमि जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर इंहिसार हैं। आदिवासी समुदायों के लिए यह केवल “पर्यावरण बचाने” की जंग नहीं है, बल्कि उससे कहीं अधिक यह उनके अस्तित्व, परम्परा और सामूहिक अधिकारों की रक्षा का प्रश्न है। यह उनके रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा हुआ है, जिसे वो जी रहे हैं। उदाहरण के लिए, पेरू के बागुआ संघर्ष और कॉन्गा प्रोजेक्ट में आदिवासी और ग्रामीण समुदायों ने “पानी को हाँ, सोना को नहीं” जैसे नारे लगाकर यह संदेश दिया कि उनके लिए महत्वपूर्ण उनका जीवन और जीविका से जुड़ी चीजें हैं, न कि मुनाफा कमाने की पूँजीवादी मानसिकता से।
लोवी पूँजीवादी व्यवस्था या आधुनिक राज्य की विज्ञापन उद्योग पर प्रकाश डालते हैं। विज्ञापन उद्योग मेन्टल मेनीपुलेशन के माध्यम से कृत्रिम ज़रूरतों को तैयार करता है और एक भ्रम की स्थिति भी बनाता है कि जैसे यह वास्तविक ज़रूरतें ही हो। मानव जीवन के लगभग हर पहलुओं में घुसपैठ कर चुका है।
धर्म से लेकर राजनीति तक इसकी ज़द में हैं। इस टेक्नोलॉजी के दौर में राज्य के लिए जीवन के हर पहलुओं पर नज़र रखना कहीं ज़्यादा आसान हो चुका है। वास्तविक और कृत्रिम ज़रूरतों के बीच के अंतर को बड़ी चालाकी से मिटा दिया गया है। इससे पूँजीवाद को मुनाफ़ा तो ख़ूब हो रहा है लेकिन झूठी ज़रूरतें अनावश्यक वस्तुओं की खपत को बढ़ा रहा है और जिसका सीधा प्रभाव पर्यावरण पर पड़ रहा है,यह फ़ास्ट फैशन इसी कृत्रिम ज़रूरत से उबजा है।
निष्कर्ष
डूम्सडे क्लॉक आज केवल परमाणु युद्ध के खतरे तक सीमित नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक शोषण और सामाजिक असमानताओं जैसे मसलों ने इसे और अधिक जटिल और चिंताजनक बना दिया है। इस वैश्विक संकट के हल के लिए एक गहन और वैकल्पिक दृष्टिकोण की सख़्त ज़रूरत है। माइकल लोवी का इकोसोशलिज्म इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण विचारधारा प्रस्तुत करता है, जो पूँजीवाद और पर्यावरणवाद की सीमाओं को पार कर, एक नई टिकाऊ और न्यायपूर्ण व्यवस्था आग्रह करता है क्योंकि यह मात्रात्मक की जगह गुणात्मक परिवर्तन की बात करता है जो एक तीसरे रास्ते की तरफ़ ईशारा करता है। अगर विकल्पों की एक फेहरिस्त तैयार करें तो इकोसोशलिज्म का स्थान गिनती की शुरुआत में शुमार होगा। यह टेक्नोलॉजी के खिलाफ़ नहीं है बल्कि वास्तविक ज़रूरतों को ध्यान में रख उसके वाजिब इस्तेमाल का हिमायती है। यह डिस्कोर्स पश्चिम और पूर्व के बीच की खाई को भी मिटाने की बात करता है। अब इकोसोशलिज्म का विचार एक आदर्शवादी कल्पना मात्र हैं या वास्तविक समाधान, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन यह एकदम स्पष्ट है कि यह विचार हमें एक नई दिशा में सोचने पर विवश करता है। यह केवल एक वैकल्पिक व्यवस्था की कल्पना नहीं, बल्कि एक बड़ी चेतावनी भी है कि यदि हम पर्यावरण और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता नहीं देंगे, तो हमारी वर्तमान व्यवस्था मानवता और पर्यावरण दोनों के लिए विनाशकारी साबित होगी।
लोवी का दृष्टिकोण हमें यह समझने में मदद करता है कि संकट को हल करने के लिए सर्वप्रथम उसकी गहराई को समझना और उसकी जड़ों तक पहुँचना ज़रूरी है। पूँजीवादी धारा जिन संसाधनों पर निर्भर है, उन्हीं को खोखला भी कर रहा है। टेक्नोलॉजी इस दिशा में एक हथियार की तरह भी इस्तेमाल हो सकता है और ऐसे में इसकी पूरी प्रणाली की फलसफ़ा पर पुनःविचार करने की सख़्त ज़रूरत है। पर्यावरणीय संकट की समस्या किसी एक ख़ास देश में जन्म लेने के बाद भी उसके प्रकोप को उसी देश तक सीमित नहीं रखा जा सकता बल्कि उसकी ज़द में प्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से पूरा विश्व होगा। इस विचारधारा का अंतिम लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि मानवता एक अधिक अनुकूल, स्थायी और सामूहिक रूप से विकसित समाज का निर्माण करे। यह बदलाव केवल तब संभव होगा, जब हम पूँजीवाद और उपभोग पर आधारित सोच को पीछे छोड़, एक नवीन सामूहिक और स्थायी व्यवस्था को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ें। इस किताब का मूल सार यह है कि लाभप्रदता के पैमाने की माइक्रोरेशनलिटी को पर्यावरणीय और सामाजिक मैक्रोरेशनलिटी से बदला जाए। इसका सीधा अर्थ हुआ कि सभ्यता को एक नए पैराडाइगम के अनुरूप संचालित होना पड़ेगा।